जगह-जगह 2.0 : उत्तर-पूर्व दिशा नहीं है!
निशांत कौशिक
11 सितम्बर 2026
प्रस्थान-पूर्व
नीचे लिखी बातों का उत्स यात्रा में है, लेकिन यह यात्रा-वृत्तांत नहीं है। यह न तो क्रमिक और तथ्यपूर्ण विवरण है, न शहर घूमने की कुंजी। इसे लेख की सीमा या मेरे द्वारा खींची हुयी सीमा समझा जाए।
आसाम में मेरे प्रवास के समय बाढ़ का पानी उतर रहा था, उसका असर निकलकर आ रहा था, ख़बरें बढ़ रही थीं। गुवाहाटी सुरक्षित तो था लेकिन उसमें गहमागहमी थी। आज जब पुणे में हूँ, शिलॉन्ग में आक्रामक घटनाएँ चल रही हैं। यह दुखद संयोग है।
उत्तर-पूर्व
साढ़े तीन का वक़्त था जब अलीगढ़ जंक्शन गुज़रा और फिर अगली आँख नौ बजे कानपुर सेंट्रल में खुली। नींद के तीसरे पड़ाव में पहुँचा तो गंगा जी के पुल पर से ट्रेन धड़ाधड़ गुज़री; इलाहाबाद जा चुका था। मैं न्यू जलपाईगुड़ी, बोंगाईगाँव और फिर रंगिया जंक्शन के प्लेटफ़ॉर्म पर उतर-उतरकर हैरान होता रहा कि इतना हरापन और इतनी उमस! आते-जाते लोग पुख़्ता करते रहे कि यहाँ ऐसा ही होता है। मैं उत्तर को लाँघकर, पूर्व होते हुए गुवाहाटी पहुँचा, सरईघाट पुराना पुल था, नीचे ब्रह्मपुत्र का प्रवाह था, जल इतना था कि गुवाहाटी शहर जल में डूबती-उभरती माया की तरह था।
मैंने गुलज़ार को कहते सुना था कि उन्होंने कार से उत्तर-पूर्वी राज्यों में सफ़र किया है और सबसे अच्छी कविताएँ आज वहीं से उठ रही हैं। भारत में दिशाओं का कुछ अधिक महत्त्व नहीं है, वह स्थान-सूचक से अधिक प्रवृत्ति, जीवनशैली और उत्तर भारत से सांस्कृतिक फ़ासले की ओर इशारा करने वाले शब्द और शब्द-समूह हैं। वे दक्षिण कहते हैं तो दक्षिण उनसे छूट जाता है, वे उत्तर-पूर्व कहते हैं तो उनके माथे पर एक ‘टेम्पलेट’ चिंता होती है, वे कुर्सी ठीक करते हैं और इरोम शर्मिला का ज़िक्र करते हैं, निराश हो जाते हैं।
उत्तर-पूर्व दिशा नहीं है!
मैं लाल बहादुर वर्मा के शानदार उपन्यास ‘उत्तर पूर्व’ के किरदारों को याद कर रहा हूँ। वर्मा जी बार-बार इशारा करते हैं कि शीर्षक का अर्थ सिर्फ़ नार्थ-ईस्ट नहीं है। यह जवाब के पहले की कैफ़ियत या उत्तर के पूर्व की दशा है। मुझे अनिल यादव की पुस्तक के विवरण याद आते रहे। मैं सावधान था कि कभी कोई ठस्स से हँसकर कहे, अरे मारिए, ‘वह भी कोई देस है महराज’!
मैं गुवाहाटी में था, मैं मीना प्रभु नहीं था, मैं बहुत थककर पलटन बाज़ार से कालीपुर पहुँचा। मैंने असमिया पढ़ने में बाँग्ला का सहारा लिया, थोड़ी सफलता मिली। कुमार भास्कर वर्मा सेतु में एक बोर्ड पर फ़ैंसी बाज़ार लिखा है, मैंने जाना कि वहाँ अँग्रेज़ों के ज़माने में फाँसी दी जाती थी।
ब्रह्मपुत्र
गुवाहाटी की उमस यहाँ आख़िरी दुख भी नहीं है। बाढ़ के बारे में सबके पास अनुभव और बातें थीं। पानी उतर चुका था, विनाश के क़िस्से थे। हर बात में दूसरी बात बाढ़ की थी। मैं हॉल में शतरंज खेलते और ‘शांताराम’ पढ़ते हुए बारिश और ब्रह्मपुत्र के क़िस्से सुनता रहा। नदी के इतना नज़दीक मैं पहली बार था कि अल-सुबह ब्रह्मपुत्र के पीछे उठता सूरज मेरी खिड़की से दिखे। मैं दूर से आया था—जहाँ तारे, परिंदे और आसमान ग़ायब हो गए थे और सूर्यास्त देखने सभ्यता से दूर एक ऐसे पहाड़ पर जाना होता है जिसके ऊपर पुल गुज़रने वाला है और जिसके नीचे मेट्रो गुज़र रही है।
धूप गर्म नहीं थी लेकिन ठहरे पानी को देखने पर आँख में चुभती थी।
गुवाहाटी मायावी है, यह भीतर खुलते अन्य राज्यों की दहलीज पर है। यहाँ जनसंख्या का पारंपरिक नगरीय उफान नहीं है। कुछ प्रतीत होता है और उससे अधिक विलुप्त होता है। यह क़यास और अंदाज़ में व्याप्त है। मैं बनारस में पान और आसाम में सूत के कपड़े नहीं ढूँढ़ना चाहता, मैं ढूँढना और बचाना तो क़तई नहीं चाहता। मैं आमंत्रित होना और निगल लिया जाना चाहता हूँ। मैं शहर में भूत-जोलोकिया [Ghost pepper] ढूँढ़ते हुए घुसना चाहता हूँ और ख़ाली हाथ बाहर आना चाहता हूँ। मैं असमिया बोलने वाले का ‘स’ और ‘ख’ सुनना चाहता हूँ। मैं खिड़की से देखना चाहता हूँ कि पहाड़ बचपन की उस तस्वीर जैसा बन जाएँ जिसमें बीच सूरज डूबता है और एक ज़ाती सड़क मेरे दरवाज़े तक आती है।
मैं गुवाहाटी में तीन दिन रहा और उसके अनिच्छुक कोनों तक गया। हर कोने में एक बन रही इमारत थी और कुछ प्लास्टिक की बोतलें। एक कैफ़े में लक्ष्मीनंदन बोरा का उपन्यास ‘कायाकल्प’ मिला। ऑटो वाले ने मुझे भबेंद्र नाथ सैकिया के बारे में बताया, बाज़ार में मुझे इंदिरा गोस्वामी के पाठक मिले जिन्होंने उज़ान बाज़ार का पता दिया जो ब्रह्मपुत्र के चढ़ाव की तरफ़ का एक पुराना बाज़ार है। मछली बेचने वाले ने तफ़सील से बताया कि ब्रह्मपुत्र के उछाल में पाई जाने वाली मछलियाँ यहाँ बिकती थीं—इसीलिए यह उज़ान बाज़ार कहलाता है।
नभ
गुवाहाटी के दक्षिण में खानपारा है, उसका एक क़दम मेघालय में है और दूसरा आसाम में। मैं शिलॉन्ग के लिए निकला।
शिलॉन्ग ठंडा, मौसमों में उतराता और गलियों के घमासान में व्यक्त होता है। अभी शहर शुरू, अभी शहर ख़त्म। All Saints’ चर्च की छत मोहक ढंग से काली थी। आप इस काले रंग को श्याम रंग नहीं कहेंगे। आप इसे ऐसा ही स्वीकार करेंगे। चर्च के सामने एक बोर्ड खासी में कहता है : Khublei Shibun.
यहाँ बादल मिथक हैं, परिंदे कुछ ऊँचाई पर जाते ही धूप-रंग हो जाते हैं। बशीर बद्र ने कहा था, “फ़ाख़्ता धूप के पुल पर बैठी रही।” यहाँ श्रीकांत वर्मा वाला ‘नभ’ है। यहाँ झील में ‘पानी की जड़ें’ है और बादल उसके ‘पल्लव’ हैं। ऐसी कई सड़कें थीं जो सीधे बादल की ओर जाती थीं।
यह छायावाद-लोक था? चलिए ‘रोमांटिक्स’ कहें, बेहतर होगा। यहाँ किसी घर में बैठकर युद्ध-केंद्रित उपन्यास लिखे जा सकते हैं? रॉबस्पियर पर लिखने के लिए यह जगह माक़ूल होगी? क्या यहाँ I wandered lonely as a cloud लिखा जाएगा? सुंदर जगहों के दुःख क्या हैं? क्या उन्हें क्षमा कर दिया जाए? क्या इस ‘पुण्य सृष्टि में सुंदर पाप नहीं है।"
Temsüla Ao की एक कहानी है ‘Laburnum for My Head’, यह एक सुंदर फूल के प्रति अवसादपूर्ण आग्रह की कहानी है। शिलॉन्ग की गलियाँ उत्तर की गलियों की तरह रोमांटिसाइज नहीं होती। प्रेयसी केवल बनारस की गली बन सकती है, जहाँ आशिक़ घूमे, नज़्म लिखे?
खासी, गारो और जैंतिया तीनों ही मातृवंशीय समाज हैं। इसीलिए सत्ता और आर्थिक निर्णय का समीकरण, जो भारत के अन्य सभी राज्यों में है, यहाँ वह मनोरंजन का विषय नहीं हो सकता। इसीलिए यहाँ एकता कपूरीय मनोरंजन काम नहीं करेगा, क्योंकि उसको देखने वाला दर्शक-वर्ग ड्राइवर है, दफ़्तर जा रहा है, दुकानें चला रहा है। उसके पास थैला है जिसमें क्वाई (खासी में पान का पत्ता) और एक सुपारी की छिलके वाली डली है।
इस महादेश में यात्राओं के अलावा फ़ासलों को और कुछ इतनी गहनता से अभिव्यक्त नहीं कर सकता।
खासी और प्नार
मैं खासी-वादियों को देखकर अभिभूत था, जब मुझे बोला गया कि गारो-वादियाँ इससे अधिक घनी और गहरी हैं। अर्नाल्ड ने मुझे एक जंगल के दहाने में बताया कि यह पवित्र जंगल है। यहाँ भीतर न कुछ छोड़ना, न यहाँ से कुछ लाना।
मैं अर्नाल्ड को सुनता रहा। घने हरेपन और जंगली सन्नाटे में उसकी आवाज़ मेरा पुल थी। उसने मुझे जो कथाएँ कहीं, मैं उन्हें सुन सकने के लिए कृतज्ञ था। उसकी आवाज़ में हज़ारों साल पुराना एक कथा-विन्यास बोल रहा था।
उसने मुझे खासी के बारे में बताया कि इसे कुछ समय बांग्ला और असमिया लिपि में लिखा गया और अंततः इसे रोमन स्क्रिप्ट मिली। अर्नाल्ड ने ही सोहरा के एक वेल्श मिशनरी स्कूल के बारे में बताया, जहाँ खासी को रोमन में लिखा जाना शुरू हुआ था। आज से डेढ़ दशक बाद खासी को रोमन स्क्रिप्ट मिले दो सौ साल हो जाएँगे।
मेघालय के भीतर मैंने कई-कई बार भाषाई फ़ासला महसूस किया। यह जाने हुए संसार की भंगुरता थी—वाक्यों की बुनावट और अन्य अंदाज़ लगाने के सारे समीकरण अक्षम थे। खासी की बनावट नितांत अलग थी और मैं कुछ पढ़कर, कुछ समझकर, कुछ वाक्य इसमें बना भी पाता था, लेकिन खासी का diphthong या द्विस्वर मेरे उच्चारण अनुभव से सर्वथा अलग था।
जोवाई के नज़दीक एक गाँव में मैं जयंतिया परिवार के रसोई में बैठा था। उन्होंने मुझे शराब बनाने के यीस्ट केक बनाने की विधि बताई, उबला मक्का और चावल की रोटी दी। मैं जिस भाषा के खासी होने का अंदाज़ा लगा रहा था—वह प्नार थी। मैंने उनसे एक वाक्य पूछा, “Sohra - Madan Shad Seng Khasi.”
उन्होंने पुष्टि की कि यह खासी है, जिसका अर्थ है—पुराने समय से अब तक जहाँ हमारी जीवनशैली थिरकती है, सोहरा वह जगह है।
यह ‘कोस-कोस की बानी’ से दूर बैठा एक भाषा संसार है। भाषा-प्रेम में एक अनिवार्य क्षेपक अन्य भाषाओं के प्रति जिज्ञासु और सम्मानपूर्ण रहने में है। खासी, प्नार आदि जिस परिवार की भाषाएँ हैं, उनमें अधिक भाषाएँ वाचिक हैं—जिनके साहित्य, भाषा व्यवहार की दस्तावेज़ी लगभग नहीं के बराबर है।
भाषाओं और क्या-क्या बचाने-बचाने के थियेटर का जो तमाशा सारा देश बनता रहता है, उसकी अश्लीलता पर Kynpham Sing Nongkynrih की एक कविता की आख़िरी पंक्तियाँ चमकती हैं :
Only the bamboos watched in silence
too used to the antics of men
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