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नई कविता और संवाद का दूसरा पड़ाव

‘नई कविता’ के अनेक आयामों पर विभिन्न दृष्टिकोणों से बहस होने के बाद भी इसमें लगातार कुछ नए की तलाश बनी रहती है। इसके केंद्र में ‘मुक्तिबोध’ या ‘अज्ञेय’ की बाइनरी को भी प्रश्नांकित किया जाता रहेगा। इसी के साथ ‘कविता के नए प्रतिमान’ में नामवर सिंह की आलोचकीय दृष्टि को हमेशा कसौटी पर रखा जाएगा और उनसे सहमति एवं असहमतियाँ दर्ज़ की जाती रहेंगी। बड़ी बहसों के निर्माण में छोटी-छोटी अनेक बहसें, चर्चाएँ और असहमतियाँ शामिल होती हैं। परिश्रम और निरंतरता किसी भी विषय-सारणी के लिए कल्याणकारी होती हैं। इसी कड़ी में 15 नवंबर की शाम ‘अर्थात्’ का दूसरा संस्करण आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में शशिभूषण मिश्र आमंत्रित थे। अपनी बौद्धिक तृषा को बुझाने के लिए अनेक विद्यार्थियों और शोधर्थियों ने इस कार्यक्रम में भागीदारी की।

मुख्य वक्ता का परिचय और कार्यक्रम की संकल्पना बताते हुए दीपक जायसवाल ने इस कार्यक्रम की शुरुआत की और कहा कि ‘अर्थात्’ एक ऐसा अनौपचारिक मंच है, जिसका उद्देश्य—पढ़ने-लिखने और साहित्यिक रूचि रखने वालों को मासिक रूप से एक जगह पर मिलाना और तय विषय पर चर्चा-वार्ता एवं सवाल-जवाब करना। इस बैठकी में कोई बड़ा-छोटा नहीं है, यह हिंदी की चरण-स्पर्श दुनिया से दूर है। इस बार इस कार्यक्रम का केंद्र ‘कविता के नए प्रतिमान और नई कविता’ और उनके कवि रहे। साथ ही अनेक विद्यार्थियों और शोधार्थियों द्वारा कविताओं का पाठ किया गया।

इनमें—‘कलगी बाजरे की’ (अज्ञेय); ‘प्रतिबद्ध हूँ’ (नागार्जुन); ‘मगध’, ‘हम’, ‘जंगली गुलाब’ और ‘सरहपा’ (कुंवर नारायण); ‘लापरवाही’, ‘औरत की ज़िंदगी’, ‘कोई एक और मतदाता’ और ‘हँसो-हँसो जल्दी हँसो’ (रघुवीर सहाय); ‘हम सभी बेचकर आए हैं अपने सपने (विजयदेव नारायण साही); ‘यह दर्द’ (धर्मवीर भारती); ‘पता नहीं कब कौन कहाँ’, ‘मुझे क़दम-क़दम पर’ और ‘सहर्ष स्वीकारा है’ (मुक्तिबोध); ‘चुपाई मारो दुल्हिन मारा जाई कौवा’ (सर्वेश्वर डायल सक्सेना) की कविताएँ शामिल थीं। इनपर टिप्पणी करते हुए शशिभूषण मिश्र कहते हैं—“इन कविताओं के पाठ से वे सभी कवि पुनः जीवित हो उठे। साथ ही ये कविताएँ छात्रों के साहित्य-बोध को दर्शाती हैं।” साथ ही उन्होंने ‘असाध्य वीणा’ की स्मृति से एवं भावपूर्ण वाचन की प्रशंसा भी की।

कविताओं के पाठ के बाद कुछ विद्यार्थियों ने नई कविता पर अपने विचार रखते हुए पर्चे पढ़े। इनमें शिवांगी, आदर्श, संस्कार, सत्यम ने कुछ महत्त्वपूर्ण दृष्टियों से नई कविता और कविता के नए प्रतिमान पर अपनी बात कही। आदर्श ने काव्य भाषा और सृजनात्मकता पर नामवर सिंह के हवाले से बात करते हुए उनकी स्थापनाओं का विस्तार भी किया। साथ ही सुमित्रानंदन पंत को लेकर उनके विचारों और ‘काव्याभास’ शब्द को लेकर अपनी असहमति भी जताई। इसी के ‘तनाव’ शब्द पर अपने विचारों को रखते हुए, उसे कोई नई अवधारणा नहीं मानते हैं और‘असाध्य वीणा’ कविता की भाषा को तनावहीन कहने पर भी अपनी असहमति जताई।

शिवांगी ने अपने पर्चे—मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ में व्यक्त ‘कविता का हिंदुस्तान’ में कविता के माध्यम से उस वक़्त के भारत की परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए उसे कविता के विभिन्न हिस्सों से जोड़कर एक समीक्षात्मक वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने इस कविता को नई कविता के केंद्र में रखा, साथ ही उसे समय की आवाज़ तथा भविष्य की आहट के रूप में इसकी पहचान की। उन्होंने इसकी पड़ताल करने की कोशिश की कि ‘कविता का हिंदुस्तान’ में कवि मुक्तिबोध ने अपने समय के भारत को किस रूप में अभिव्यक्त किया है और वह कितना सच है।

इसी के साथ कुछ अन्य विद्यार्थियों ने भी ‘नई कविता’ की अवधारणा पर अपने वक्तव्य रखते हुए अपने संशय और प्रश्न भी रखे। कार्यक्रम को आख़िरी मोड़ देने से पहले मुख्य वक्ता से पहले दीपक जायसवाल ने कुछ महत्त्वपूर्ण कविताओं के माध्यम से नई कविता पर अपनी संक्षिप्त बात रखी। मुख्य वक्ता शशिभूषण ने कहा—“कविता मूलतः जीवन की संवेदनात्मक लय है। इस लय में निजता और सामाजिकता का कोई दुराव नहीं है। कविता के लिए जितनी ख़तरनाक कृत्रिम सामाजिकता और राष्ट्रीयता है, उतनी ख़तरनाक निजता नहीं। निजता में कम से कम अपने अनुभव की ईमानदारी तो होती है। नामवर जी ‘कविता के नए प्रतिमान’ में लिखते हैं कि मुक्तिबोध की स्थिति नई कविता में  वही है जो छायावाद में निराला की। मुक्तिबोध ने अपने युग की काव्य की सामान्यीकृत स्थितियों और उसकी सीमाओं  को चुनौती देकर उस सर्जनात्मक विशेषता को चरितार्थ किया, जिससे समकालीन काव्य का सही मूल्यांकन संभव हो सका।” 

नामवर सिंह, जगदीश गुप्त की इस स्थापना का हवाला देते हुए अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, “नई कविता में ‘नया’ क्या है और ‘कविता’ क्या है। ये दोनों प्रश्न परस्पर-संबद्ध हैं और एक ही सिक्के के दो पहलू हैं क्योंकि जीवन में नवीनता की उत्पत्ति वस्तुतः सच्ची कविता लिखने की आकांक्षा से ही होती है। जो कथन सृजनात्मकता तथा संवेदनीयता से रहित हो उसे किसी भी स्तर पर कविता नहीं कहा जा सकता।”

नई कविता को समझने के लिए हमें अनिवार्यतः विजयदेव नारायण साही के पास जाना पड़ेगा।  साही लिखते हैं कि ‘कामायनी’ में जो अनुभूति, दर्शन में परिवर्तित हो जाती है, उसे अज्ञेय फिर दर्शन से अनुभूति में परिवर्तित करते हैं। कविता-संबंधी हमारी धारणाओं में इससे गहन परिवर्तन हो जाता है—विशेषतः अनुभूति की सार्वजनीनता को लेकर। यह सार्वजनीनता अपनी अनुभूति के प्रति कृतिकार की ‘तटस्थता’ अथवा ‘निर्वैयक्तिकता’ से उत्पन्न होती है। अपने विनिबंध  ‘शमशेर की काव्य अनुभूति की बनावट’ में वह लिखते हैं कि नई कविता की बहसों में यह मान्यता अंतर्भुक्त रही है कि न सिर्फ़ कविता का ऊपरी कलेवर बदला है, बल्कि गहरे स्तर पर काव्यानुभूति की बनावट में ही परिवर्तन आ गया है। लेकिन बहस में इस पर कम बल दिया गया है।”

इस चर्चा के बीच सभी वक्ताओं और पर्चा पढ़ने वालों से प्रश्न भी किया गया, जिससे वार्तालाप की शृंखला लगातार बनी रही। इनमें कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न भी उठाए गए, जिसमें ‘सौंदर्य का अर्थ’, ‘छायावाद और प्रगतिवाद से नई कविता का अंतर’, ‘सृजन के क्षण और उसके इतर क्षणों में कवि के द्वैत’, ‘पूर्वाग्रहों से पूरी तरह मुक्त होकर किसी भी रचना की आलोचना’ संबंधी प्रश्न इनमें महत्त्वपूर्ण रहे।

इन विद्यार्थियों में मानसी, सलोनी, प्रिया, फातिमा, विपुल, पीयूष, संध्या, शिवम, दीपशिखा, दुर्गेश, पायल, शिवानी और दीक्षा के साथ अन्य ने भी सक्रियता से न केवल महत्त्वपूर्ण प्रश्न किए बल्कि सक्रियता से इस पूरी बातचीत में बने रहे। विद्यार्थियों की सक्रियता और कार्यक्रम की अनवरतता पर समय की दृष्टि रहेगी और इसी के साथ इस पर भी निगाह रहेगी कि कार्यक्रम का स्तर निरंतर किस ओर जाएगा। भविष्य की ओर आशान्वित नज़रिए से ही देखा जा सकता है जैसे साही अपनी कविता में घुड़सवार की प्रतीक्षा कर रहे हों।

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‘अर्थात्’ की पहली रपट यहाँ पढ़िए : ‘अर्थात्’ की शुरुआत

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