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‘अर्थात्’ की चौथी कड़ी में जमकर हुई चेख़व-चर्चा

यौवन भोगते वसंत के बीच जब बोगनवेलिया के फूलों का रंग गाढ़ा हो रहा था और अलसायी हवा धूप के तीखेपन को सरकाकर लास्य बिखराने की कोशिश में थी—जब 29 मार्च को दोपहर दो बजे से शुरू हुई ‘अर्थात्’ की चौथी गोष्ठी रात साढ़े आठ बजे संपन्न हुई। गत तीन गोष्ठियों में ‘अर्थात्’ जहाँ अपनी परंपरा को खँगाल रहा था, वही इस दफ़ा केंद्र में था—‘चेख़व के कथासाहित्य का सौंदर्यशास्त्र’। दिल्ली के विभिन्न विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों से आए विद्यार्थियों के साथ इस अवसर पर सुप्रसिद्ध कथाकार योगेंद्र आहूजा, सुपरिचित आलोचक रश्मि रावत, सुपरिचित कवि-लेखक अविनाश मिश्र और नई पीढ़ी के कवि-गद्यकार अखिलेश सिंह मौजूद रहे। 

कुछ अनिवार्य औपचारिकताओं के बाद ‘अर्थात्’ की इस चौथी गोष्ठी का चेख़व-चर्चा-सत्र शुरू हुआ। यह सत्र महज़ पर्चा पढ़ने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें चेख़व की कहानियों का नाट्य-रूपांतरण भी शामिल था। ‘ख़ुशी’, ‘एक क्लर्क की मौत’, ‘गिरगिट’ का मंचन जहाँ हास्य और ट्रेजेडी के कंट्रास्ट में संभव हुआ वहीं ‘वांका’ अपनी पूरी करुणा के साथ अभिनेताओं में उतरा। इन प्रस्तुतियों में अर्चना, अतुलप्रिया, दानिश, राकेश, नरेश और जितेंद्र ने प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। 

पर्चा पढ़ने की शुरुआत चेख़व के वतन रूस से आईं हिंदी की विद्यार्थियों विक्टोरिया एवं एनी से हुई। विक्टोरिया ने बताया कि चेख़व की सख़ालिन-द्वीप की यात्रा अपने जीवनानुभवों को गहन करने की प्रक्रिया की कड़ी थी। वहीं एनी के अनुसार चेख़व के पात्र अच्छे और बुरे होने के बजाय अपनी पूरी सच्चाई के साथ प्रस्तुत होते हैं। 

दुर्गेश मिश्र ने नोट किया कि चेख़व की कहानियाँ घटनाओं की शृंखला से मुक्त होकर मानवीय अनुभव की गहनतम अभिव्यक्ति बनती हैं। वे ‘स्लाइस ऑव लाइफ़’ हैं—चेख़व जीवन के विराट नैरंतर्य के बजाय उसके एक हिस्से को दिखाते हैं—जहाँ करुणा है, अकेलापन है, मौन है और उसको पकड़ती विडंबना है। उनके यहाँ संवाद बहस की तरह नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविकता से बद्ध ध्वनियों की तरह आते हैं।

‘नक़ाब’ कहानी के हवाले से संक्षिप्त, लेकिन चुस्त बात करते हुए उज्ज्वल शुक्ल ने उसकी प्रतीकात्मकता को खोलकर कहानी में आगे घटते स्थिति-विपर्यय को स्पष्ट करते हुए दर्ज किया कि नैतिकता तीन स्रोतों से शह पाती है—समृद्धि, बौद्धिक सत्ता और नुक़सान कर सकने की शक्ति। अपनी बात पूरी करते हुए उन्होंने कहानी के विखंडन-आधारित पाठ की ओर भी कुछ संकेत जोड़े। 

अद्वितीय की चिंता के केंद्र में पात्रों में व्याप्त यांत्रिकता और कहानी की नाटकीयता रही। चेख़व के संदर्भ में वह शून्यक्रियासिद्धांत का उल्लेख करती हैं जिसके अनुसार नाट्य-मंच पर जो पात्र शून्य नज़र आता है, कहानी में चेख़व उसकी मानसिक स्थिति का इंटेंस विश्लेषण करते हैं। 

संस्कार ने रेखांकित किया कि चेख़व पात्रों के अधूरेपन को काव्यात्मक ढंग से दर्शाते हैं। पलक गुप्ता ने चेख़व की सहज असहजता पर बात करते हुए ‘शर्त’ कहानी के ज़रिये कुछ रचनात्मक तोड़-फोड़ भी की। शिवानी ने दर्शाया की आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा दुख है कि मनुष्य के पास अपना दुख साझा करने को कोई न हो और यह चेख़व की कहानी ‘दुख’ के बाबत बहुत गहरे ढंग से व्यक्त होता है। रश्मि रावत के प्रश्न—‘डार्लिंग’ कहानी की नायिका डार्लिंग क्यों है? पर अतिथियों की व्याख्याओं ने माहौल को रचनात्मक ऊर्जा से भर दिया। अंजलि ने चेख़व की रचना में प्रकृति और बाह्य परिवेश की ओर ध्यान दिलाते हुए ‘नेचर थेरेपी’ की बात की।  ओम ने चेख़व की संवेदना को परमाणु मॉडल के तौर देखा जहाँ नाभिक के केंद्र में करुणा प्रोटॉन और विरक्ति न्यूट्रॉन के तौर पर रहती हैं और हास्य-व्यंग्य परिधि पर इलेक्ट्रान की भाँति चक्कर काटता रहता है। 

प्रिया गुप्ता ने चेख़व के अस्तित्ववादी पाठ की संभावनाओं को एक्स्प्लोर करते हुए रेखांकित किया कि चेख़व के कथा-संसार में कोई बड़ी घटना नहीं होती, न ही कोई आदर्श अंत; बल्कि इनके पात्र चाय पीते हैं, कार्ड खेलते हैं, मौसम की बातें करते हैं और एक न एक दिन यह होगा, इस यूटोपिया की आस में वर्तमान को शिथिल तथा जड़ बना देते हैं। 

फ़ातिमा की समझ में टॉल्स्टॉय की तरह चेख़व किसी निश्चित ‘चरम ध्येय’ (ultimate meaning) या नैतिक अमरता में विश्वास नहीं करते। उनके लिए जीवन का उद्देश्य स्वयं ही एक रहस्य है और यही अनिश्चितता उनकी रचनाओं में समय को एक बोझिल अनुभव और प्रतीक्षा को एक अस्तित्वगत स्थिति के रूप में स्थापित करती है।

विनीत, अदिति, दानिश और भारती ने अपने पर्चे पढ़ने के दौरान चेख़व की आधुनिकता, असाधारणता और व्यंग्य-योजना को उनकी कथा-स्थितियों के माध्यम से स्पष्ट किया। यहाँ कहना न होगा कि इस गोष्ठी में लगभग सभी विद्यार्थियों ने चेख़व की पुनर्निर्मिति को रचनात्मक औज़ारों से तो परखा ही, वे ख़ालिस अकादमिक निरीक्षण करने से भी नहीं चूके।  

नई पीढ़ी के कवि-कथाकार अखिलेश सिंह ने चेख़व के कृतित्व में ऐंद्रियता की बड़ी सूक्ष्म डिटेलिंग की ओर ध्यान दिलाया कि कैसे वह पात्र का कैरीकेचर बड़े भयानक व्यंग्य के साथ खींचते हैं। शुरुआती कहानियों में इसकी प्रधानता दिखाते हुए उन्होंने चेख़व की कहानियों में निरंतर विकास को भी रेखांकित किया जहाँ संश्लिष्टता बढ़ती जाती है। ‘द फ़िश’ कहानी का रूसी परिवेश अवध की ग्राम-संस्कृति से कैसे जुड़ता है, इसकी चर्चा करते हुए उन्होंने एक रचनाकार की सौर्वभौमिकता पर बल दिया। चेख़व की कहानियों में कहीं-कहीं अतिशय डिटेलिंग की ओर भी उन्होंने ध्यान दिलाया। ‘रसभरी’, ‘स्टेपी’ एवं ‘बारबर’ जैसी कहानियों का उनका विश्लेषण विद्यार्थियों के लिए पाठ को खोलने के गुर सिखाने वाला रहा। उन्होंने यह भी दर्ज किया कि Angularity in slender body— that is Anton Chekhov!

कथाकार योगेंद्र आहूजा ने चेख़व से अपने संपर्क को निर्मल वर्मा के हवाले से होने से बात शुरू की और चेख़ोवियन-कैनन का उल्लेख किया जिसका आशय सूक्ष्मता, खुला अंत और बिना किसी शोर के पाठक के भीतर उतरती ज़िंदगी की अनकही बेचैनी है। भाषा का सादापन और सच्चापन चेख़व की अनिवार्य विशेषता है। चेख़व की पृष्ठभूमि एवं सख़ालिन-द्वीप की उनकी दुर्गम यात्रा ने उनके साहित्य को कैसे बदला—योगेंद्र आहूजा ने इस पर विस्तार से बात की। इस यात्रा ने उनको मनुष्य की गहराई से जोड़ा और यह चेतना उत्पन्न की कि अपराध एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे समाज की नैतिक विफलता है। उनकी इस यात्रा और दोस्तोयेवस्की की कारावास के क्रम में साइबेरिया की यात्रा और उसके प्रभाव के बीच अंतर दर्शाते हुए योगेंद्र आहूजा ने कहा कि इन यात्राओं में दोस्तोयेवस्की के लिए जो निजी अनुभव था, चेख़व के लिए वह एक सामाजिक यथार्थ था। इसीलिए एक के यहाँ आत्मा आग में जलती है, लेकिन दूसरे के यहाँ धीरे-धीरे ठंडी होती हुई महसूस होती है। उन्होंने आगे कहा कि चेख़व पहले एक व्यंग्यात्मक ऑब्ज़र्वर थे, लेकिन बाद में वह मनुष्य की पीड़ा के गवाह बने। चेख़व का स्थान टॉल्स्टॉय की नैतिक ऊँचाई और दोस्तोयेवस्की के मनुष्य के भीतर के अँधेरे और जटिलता की चिंता के बीच में है। 

रश्मि रावत ने स्वतंत्र वक्तव्य देने के बजाय बीच-बीच में छोटी-छोटी टिप्पणियों के ज़रिये वातावरण को ऊर्जस्वित बनाए रखा। 

लगभग साढ़े छह घंटे के सत्र में अनवरत ऑब्ज़र्वर की भूमिका में रहे अविनाश मिश्र ने चेख़व के पाठ में विद्यार्थियों के प्रयत्नों में प्रशंसामूलक टोन में कुछ चूकों की ओर ध्यान दिलाया और चेख़व की एक छोटी कहानी ‘समुद्र’ की चर्चा की।   

सत्र का अंत संयोजक दीपक जायसवाल की रीडिंग को और बेहतर करने के गुर देने वाली टिप्पणी से हुआ।

लगभग आधे दिन की रचनात्मक मेहनत ने विद्यार्थियों को थकाया तो ज़रूर, किंतु वापसी में उनकी संतुष्टि ने यह भी बताया कि वे समृद्ध होकर लौट रहे हैं। एक श्रोता ने यह बात उठाई थी कि सौ सालों बाद सुदूर देश में चेख़व की बात हो रही है, क्योंकि मनुष्य अपनी संवेदना में एक-सा है और रचनाकार टाइम-स्पेस का अतिक्रमण करके भी मनुष्य की संवेदना को कुरेद देता है। ऐसा जितनी बार होता है, रचनाकार उतनी बार जन्म लेता है। इस अर्थ में ‘अर्थात्’ की इस गोष्ठी में प्रस्तुत प्रत्येक वक्तव्य में चेख़व का पुनर्जन्म हुआ।

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‘अर्थात्’ की अन्य रपट यहाँ पढ़िए : ‘अर्थात्’ की तीसरी गोष्ठी में खुले छायावाद के बंध | नई कविता और संवाद का दूसरा पड़ाव | ‘अर्थात्’ की शुरुआत

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