शैरिल शर्मा के बेला
सावन-गात खँची कजरी की अल्पना
आषाढ़ की साँझें हमेशा किसी के लौटने की आहट लेकर आती हैं। दिन भर की धूप से तपे हुए आकाश के किसी कोने में जब पहली कारी रेखा दिखाई देती है, तो लगता है जैसे बहुत दूर गया हुआ कोई अपना, स्मृति की देहरी पर
सहन : चुप्पी की अंतिम सीमा
घरेलू हिंसा पर केंद्रित फ़िल्मों की भीड़ में ‘सहन’ अपनी संयमित अभिव्यक्ति, सौंदर्यबोध और गहन संवेदनात्मक परतों के कारण, एक विशिष्ट स्थान अर्जित करती है। यह फ़िल्म अपने कथ्य को किसी ऊँचे स्वर में नहीं क