रामायण : महाकाव्य और सिनेमा के बीच
युवराज सिंह
07 नवम्बर 2026
सियाराममय सब जग जानी।
करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी॥
यह बीते महीने की ही बात होगी... हिंदी विभाग, बीएचयू से पीएचडी कर रहे एक भावी डॉक्टर से जब पूछा गया कि इस पंक्ति में ‘पानी’ का क्या अर्थ है, तो उन्होंने बताया : “पानी के तो कई अर्थ निकल सकते हैं। आप रहीम के यहाँ देखिए—‘रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून...’ पानी के बिना मनुष्य का जीवन कहाँ चल सकता है!” इसके साथ ही उन्होंने ‘जल ही जीवन है’ जैसे उद्धरण भी दिए। इसके बाद का प्रसंग न तो मुझे याद है, न ही मैंने उसे जानने का प्रयास किया।
बड़े-बड़े हिंदी विभागों से भी कुछ ऐसे लोग डॉक्टरेट की उपाधि पा ही जाते हैं, जिन्हें देखकर केवट निषादराज की भाँति ‘कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू’ के भाव में आना पड़ता है। बहरहाल, शीर्षक देखकर आप सोच रहे होंगे कि यहाँ तो शायद नमित मल्होत्रा की फ़िल्म ‘रामायण’ पर चर्चा होनी थी; फिर ये सब बातें क्यों बताई जा रही हैं! सचमुच इन बातों का इस फ़िल्म या इस लेख से कोई सीधा संबंध नहीं है। किंतु इन्हें यहाँ उद्धृत करके मैं आपको और स्वयं को भी मानसिक रूप से तैयार करने का प्रयास कर रहा हूँ कि जब मैं आगे इस लेख में और आप इस फ़िल्म को देखकर छिद्रान्वेषण कर रहे हों, तब ऊपर बताए गए प्रसंग को ध्यान में रखते हुए यह ज़रूर सोचें कि एक साहित्य के शोधार्थी से तुलसी की एक सामान्य-सी पंक्ति का अर्थ समझने में चूक हो सकती है, तो वाल्मीकि और तुलसी की महागाथा को पर्दे पर उतारते समय साहित्यिक समझ और संवेदनशीलता की कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी निभानी पड़ती होगी।
आज से लगभग तीन महीने पहले होमर की कृति ‘ओडिसी’ पर भी फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी। उसकी कथा भी कुछ-कुछ रामायण जैसी ही है। एक स्त्री विशाल सागर के उस पार अपने पति की प्रतीक्षा कर रही है। उसे पाने के लिए दूसरे पुरुष भी प्रयासरत हैं। उसके पति को विशाल सागर पार करके उन लोगों से युद्ध करना है और अपनी पत्नी को वापस पाना है। उधर उस स्त्री के सामने विवाह के इच्छुक पुरुषों की चुनौती है। अंततः धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने की परीक्षा में केवल वही पुरुष सफल हो पाता है, जो वास्तव में उस योग्य है।
होमर का समय भी सामान्यतः आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास का माना जाता है। साहित्य की दुनिया में इस बात पर तमाम चर्चाएँ होती रही हैं कि क्या होमर ने वाल्मीकि को पढ़ रखा था या नहीं। हालाँकि दोनों महाकाव्यों के बीच समानताओं के बावजूद उनकी कथा-संरचना और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में पर्याप्त अंतर है।
होमर ने वाल्मीकि को पढ़ा या नहीं, यह आज के लिए महत्त्वपूर्ण प्रश्न नहीं है। अभी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि बताए जा रहे लगभग समान बजट और पहली बार किसी भारतीय फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतने बड़े पैमाने पर प्रदर्शित करने की महत्त्वाकांक्षा के बावजूद ‘रामायण’ की पहले दिन की कमाई ‘ओडिसी’ की तुलना में लगभग एक-चौथाई रही। आगे के शुरुआती आँकड़े भी बहुत उत्साहजनक नहीं दिखाई देते। आख़िर ऐसा क्यों? क्या सिर्फ़ अँग्रेज़ी भाषी फ़िल्म होने के कारण ‘ओडिसी’ को यह फ़ायदा मिला या बात कुछ और है?
दरअस्ल, किसी महाकाव्य की महानता और उस पर बनी फ़िल्म की वैश्विक सफलता दो अलग-अलग चीज़ें हैं। ‘ओडिसी’ पश्चिमी साहित्य और संस्कृति में पहले से स्थापित कृति है। उसके पात्रों और कथा से वहाँ के दर्शकों का एक पुराना परिचय है। दूसरी ओर, रामायण भारतीय जनमानस में जितनी गहराई से रची-बसी है, अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए वह उतनी ही नई और अपरिचित हो सकती है। इसके अतिरिक्त हॉलीवुड की वैश्विक वितरण व्यवस्था और अँग्रेज़ी भाषा की व्यापक पहुँच भी इस अंतर को प्रभावित करती है। इसलिए केवल पहले दिन की कमाई से दोनों महाकाव्यों या उन पर बनी फ़िल्मों की श्रेष्ठता तय करना उचित नहीं होगा। लेकिन यह तुलना हमें इतना सोचने पर विवश ज़रूर करती है कि वैश्विक दर्शकों तक पहुँचने के लिए केवल विशाल बजट और भव्य निर्माण पर्याप्त नहीं हैं।
‘रामायण’ देखने के बाद कुछ कमियाँ सामने आती हैं, तो कुछ बातें तारीफ़ के योग्य भी लगती हैं। इस फ़िल्म में सबसे दुःखद यही लगा कि इतनी अपार संभावनाओं और संसाधनों से भरी फ़िल्म एक बड़ी चूक के कारण केवल एक ठीक-ठाक फ़िल्म बनकर रह जाती है। वह चूक है—इसका संगीत! यह संगीत दर्शकों के हृदयपट पर कोई गहरी छाप छोड़ सकने में पूरी तरह असफल है। ए.आर. रहमान और हैंस ज़िमर के संगम से जिस संगीतात्मक भव्यता की उम्मीद थी, यह फ़िल्म उसे पूरा नहीं कर पाती। ‘रामायण’ जैसी महागाथा में संगीत केवल दृश्यों के बीच बजने वाला पार्श्वसंगीत नहीं है। वह करुणा, वीरता, भक्ति, विरह और युद्ध जैसे भावों को दर्शकों के भीतर उतारने का माध्यम भी है। ‘रामायण’ की कथा में इन भावों की कोई कमी नहीं है, लेकिन इस फ़िल्म का संगीत उन संभावनाओं को उस स्तर तक नहीं पहुँचा पाता जिसकी अपेक्षा थी। इतनी बड़ी परियोजना में संगीत का यह पक्ष और अधिक प्रभावशाली हो सकता था।
इस ‘रामायण’ में रावण को अस्मितावादी विमर्श से जोड़ने का भरपूर प्रयास दिखाई देता है। यहाँ रावण को वंचितों के नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ये वे वंचित हैं जिनके पास लंका जैसी समृद्ध नगरी थी, जिसे विष्णु ने उनसे छीन लिया था। रावण कुबेर को वहाँ से हटाकर अपना राज्य वापस प्राप्त करता है। वह लगातार ‘संयम या बदला’ के बीच झूलता हुआ अपनी नीतियाँ बनाता है और अपने वंश, पराक्रम तथा खोई हुई गरिमा को पुनः प्राप्त करने की जुगत में क्रूर से क्रूरतर होता दिखाई देता है।
इस प्रयोग की एक कोण से सराहना भी की जा सकती है। निर्माताओं का मुख्य लक्ष्य अधिक से अधिक विदेशी दर्शकों तक पहुँचना है। ऐसे में मुख्य खलनायक के चरित्र पर ख़ासा समय ख़र्च करके उसके पीछे की परिस्थितियों और मानसिकता को समझाने का प्रयास किया गया है। अभिनेता यश ने भी इस भूमिका को बख़ूबी निभाया है। लेकिन किसी पात्र को मानवीय बनाने के लिए उसके मूल चरित्र को बदलना आवश्यक नहीं होना चाहिए। रावण की विद्वत्ता, पराक्रम, महत्त्वाकांक्षा, अहंकार और प्रतिशोध की भावना के भीतर पहले से ही एक जटिल चरित्र मौजूद है। उसे आधुनिक विमर्शों के माध्यम से देखने में कोई बुराई नहीं है; लेकिन उस प्रक्रिया में यदि दूसरे पात्रों के चरित्र-निर्माण का समय और अवसर छिन जाता है, तो यह एक बड़ी सिनेमाई समस्या बन जाती है। इस फ़िल्म में भी रावण के चरित्र पर जितना ध्यान दिया गया है; उतना राम, सीता और दूसरे पात्रों को विकसित करने में दिखाई नहीं देता।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘रामायण’ जैसी महागाथा को तीन या छह घंटे में समेटना असंभव है। इसके लिए कथा को संक्षिप्त करना आवश्यक है। ‘रामायण’ में अनेक ऐसे कथा-प्रवाह हैं, जिनमें से प्रत्येक अपने-आपमें एक स्वतंत्र कथा की संभावनाएँ समेटे हुए है। राम का वनगमन, भरत का त्याग, लक्ष्मण का समर्पण, सीता का संघर्ष, हनुमान की भक्ति, विभीषण का धर्मसंकट और रावण का अहंकार... इनमें से प्रत्येक को विस्तार दिया जा सकता है। ऐसे में फ़िल्मकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल घटनाओं को चुनना नहीं, बल्कि यह तय करना है कि किन घटनाओं को हटाने के बाद भी मूल कथा का भाव सुरक्षित रह सकता है। ‘रामायण’ की आत्मा केवल उसकी घटनाओं में नहीं, बल्कि उन घटनाओं के भीतर उपस्थित मानवीय और नैतिक द्वंद्वों में भी है। संक्षिप्तीकरण के नाम पर उन द्वंद्वों और चरित्रों की मूल संवेदना का हनन नहीं होना चाहिए। भव्यता से अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि कथा का मूल भाव बचा रहे।
इस ‘रामायण’ में सीता के किरदार के साथ भी बहुत प्रयोग हुए हैं। धान रोपने से लेकर तलवार चलाने तक सीता जी से कुछ छूटा नहीं है। लेकिन एक बात समझ से परे है कि जो सीता खर-दूषण के विरुद्ध दुहत्थी तलवार भाँज लेती हैं, वे रावण के आगे ऐसा कोई करतब क्यों नहीं दिखातीं? लड़ना तो दूर, इस फ़िल्म में सीता रावण का विरोध करती हुई भी पर्याप्त रूप से दिखाई नहीं देतीं। पुष्पक विमान में वह चुपचाप रावण और जटायु की लड़ाई समाप्त होने की प्रतीक्षा करती हैं। फिर जब रावण को फ़ुर्सत मिलती है, तब दोनों के बीच संवाद शुरू होते हैं। इसके बरअक्स एक पुरातनी सीता हैं, जिनका स्वरूप वाल्मीकि अपने शब्दों से ऐसा खींचते हैं कि आपको आश्चर्य होता है। वाल्मीकि की ‘रामायण’ में सीता जब रावण की भर्त्सना करती हुई कहती हैं :
त्वं पुनर्जम्बुकः सिंहीं मामिहेच्छसि दुर्लभाम्।
नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुमादित्यस्य प्रभा यथा॥
अर्थात्, “तुम्हारे जैसा गीदड़ मुझ जैसी सिंहनी को पाने की कामना करता है! यह तुम्हारे लिए दुर्लभ है। मैं तुम्हारे द्वारा वैसे ही स्पर्श नहीं की जा सकती, जैसे सूर्य की प्रभा को कोई छू नहीं सकता।” यह एक श्लोक उस पूरे दृश्य पर भारी पड़ता हुआ प्रतीत होता है।
सीता की शक्ति केवल शारीरिक पराक्रम में नहीं है। उनका आत्मसम्मान, उनकी वाणी, उनका नैतिक साहस और रावण के सामने निर्भीक होकर खड़े होने का उनका व्यक्तित्व भी उनकी शक्ति का परिचायक है। यदि सीता को तलवार चलाने वाली स्त्री के रूप में तो प्रस्तुत किया जाए; लेकिन रावण के सामने उनकी वाणी और आत्मसम्मान को पर्याप्त स्थान न मिले, तो यह उनके चरित्र की शक्ति को एक सीमित अर्थ में प्रस्तुत करना ही होगा। आधुनिकता के नाम पर किसी पात्र को नया स्वरूप देना ग़लत नहीं है; लेकिन उस प्रक्रिया में उसके मूल व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता ही छूट जाए, तो प्रयोग अपनी सार्थकता खोने लगता है।
इन सब बातों के बाद हमें एक चीज़ की सराहना अवश्य करनी होगी और वह है निर्माताओं का साहस और जीवटता। उन्होंने इतने बड़े अनुपात में समय, श्रम और धन का व्यय करने का जोखिम उठाया है। यह जानते हुए भी कि ‘रामायण’ जैसी परियोजना में जितनी राशि ख़र्च होगी; केवल उतनी ही राशि बिना किसी मुनाफ़े के वापस मिल जाए, वही अपने-आपमें बहुत बड़ी बात होगी। भारतीय महाकाव्य को इस स्तर पर वैश्विक दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने का साहस अपने-आपमें सराहनीय है।
इस स्थिति में एक सवाल हमेशा से इस फ़िल्म के ऊपर तलवार की तरह झूल रहा था कि कहीं भव्यता के चक्कर में ‘रामायण’ की आत्मा तो नहीं कुचल दी जाएगी? मेरे मानने में अँग्रेज़ी संस्करण में आधे घंटे का समय और कम करके बहुत हद तक ऐसा ही किया गया है। हालाँकि इसके पीछे निर्माताओं की यह व्यावसायिक विवशता भी हो सकती है कि अमेरिकी और यूरोपीय दर्शक आज के समय में इतनी लंबी फ़िल्म देखने से कतराने न लगें। वहीं हिंदी संस्करण में चरित्र-निर्माण पर थोड़ा अधिक समय दिया गया है, लेकिन रामानंद सागर की ‘रामायण’ को टेलीविज़न स्क्रीन पर बार-बार देखकर आत्मसात् कर चुकी हिंदी भाषी जनता के लिए वह भी ऊँट के मुँह में जीरे के समान ही है। दर्शकों की स्मृति में ‘रामायण’ के पात्रों की एक निश्चित छवि बसी हुई है। उस छवि को बदलना या नए सिरे से प्रस्तुत करना अनुचित नहीं है, लेकिन उसके लिए चरित्रों का पर्याप्त विकास और उनकी मनोवैज्ञानिक विश्वसनीयता भी आवश्यक है। नई पीढ़ी को ‘रामायण’ से परिचित कराने के लिए नए प्रयोग ज़रूरी हैं, किंतु पुरानी पीढ़ी की स्मृति में बसे पात्रों को विस्थापित करने के लिए केवल भव्य दृश्य पर्याप्त नहीं हो सकते।
अंततः यह फ़िल्म अपनी तमाम कमियों के बावजूद एक ऐसी कोशिश है जिसकी सफलता केवल इसके निर्माताओं के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के भविष्य के लिए भी महत्त्वपूर्ण हो सकती है। आशा रहेगी कि यह फ़िल्म अपना बजट निकाल पाए, ताकि भविष्य में कोई फ़िल्म निर्माता ऐसे बड़े निर्णय लेने और भारतीय कथाओं तथा महाकाव्यों को दुनिया के सामने प्रदर्शित करने से पहले कतराए नहीं... क्योंकि ‘रामायण’ सरीखी महागाथाएँ केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर नहीं हैं, बल्कि विश्व साहित्य और सिनेमा के सामने प्रस्तुत की जा सकने वाली हमारी सबसे बड़ी कथात्मक संभावनाओं में से भी एक हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि उन्हें प्रस्तुत करते समय उनकी भव्यता के साथ-साथ उनकी आत्मा को भी सुरक्षित रखा जाए।
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