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मन का उजियारा

हर महीने किसी न किसी उत्सव के रंग में रँगी हमारी इस संस्कृति में अनगिनत पर्व हैं, पर उन सबमें मुझे सबसे अधिक प्रिय है—दीपावली। कारण अत्यंत सहज है, यह प्रकाश का पर्व है। अमावस की घनी स्याह रात को धता बताते टिमटिमाते अनगिनत दीये... मिट्टी के वे छोटे-छोटे पात्र जो केवल देहरी को ही नहीं, जीवन और मन को भी आलोकित कर जाते हैं।

बचपन में एक लंबे अरसे तक मैं बाहर की इसी चकाचौंध और जगमगाहट को देखकर विस्मित होती रही। हमारे भीतर भी एक ज्योति प्रज्वलित रहती है, इसका बोध बहुत बाद में हुआ। बचपन में अँधेरे से एक अजीब-सा डर लगता था। उस डर के घेरे से बाहर निकलने में मुझे कई बरस बीत गए। फिर भी अँधेरे को लेकर मन में एक विचित्र-सी कोफ़्त हमेशा बनी रहती थी। लगता था कि काश, कहीं से बस एक हल्की-सी किरण फूट पड़े! घर में ज़रा भी अँधेरा मुझे सुहाता न था। इन्वर्टर के दौर से पहले का वह समय था; मैं मोमबत्ती, इमरजेंसी लाइट और दीया—सब पहले से तैयार रखती थी, ताकि बिजली कटते ही पलक झपकते उजाला किया जा सके।

फिर जब उम्र के साथ जीवन और विचारों का फलक विस्तृत हुआ, तो एक दिन कहीं एक पंक्ति पढ़ी—‘अँधेरा और कुछ नहीं, केवल रोशनी का अभाव है।’

इस एक विचार ने जैसे अंतर्मन में ज्ञान का उजियारा भर दिया। इसे दो-तीन बार ठहरकर पढ़िए, तब आप गहराई से समझ पाएँगे कि मैं क्या कहना चाह रही हूँ। अंधकार का तो अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है; वह केवल उस रिक्त स्थान पर पसर जाता है, जहाँ प्रकाश उपस्थित नहीं होता। जीवन का कितना बड़ा सत्य एक छोटी-सी पंक्ति में सिमटा हुआ था!

इसके बाद जब-जब जीवन के मोड़ों पर निराशा और अवसाद के अँधेरों ने दस्तक दी, मैंने बाहर रोशनी तलाशने के बजाय भीतर के उजास को बढ़ाना शुरू कर दिया। यक़ीन मानिए, वह काला साया फिर कभी मेरे जीवन पर हावी नहीं हो सका।

लेकिन यह अंतस का उजास आता कहाँ से है? इसे जानने से पहले यह समझना आवश्यक है कि भीतर की ‘आग’ और ‘उजास’ में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। टूटे हुए ख़्वाबों, कुंठाओं और अधूरे अरमानों की भट्टी से जो धुआँ और लपटें निकलती हैं, वही आग है—जो व्यक्तित्व को भीतर तक झुलसा देती है। अपने भीतर ईर्ष्या और रोष की इस आग में सुलगता मनुष्य न केवल स्वयं को नष्ट करता है, बल्कि पूरे समाज के लिए विषाक्त भी बन जाता है।

मन के उजियारे की तासीर इससे सर्वथा भिन्न है। सिर्फ़ किताबों से मिला ज्ञान या बड़ी-बड़ी बातें भीतर का अँधकार नहीं मिटा सकतीं। कोरा ज्ञान तो मिट्टी के उस कोरे दीये की तरह है, जिसमें जब तक जीवन के अनुभवों की बाती न पड़े और आत्मबोध का तेल न डले, वह प्रज्वलित हो ही नहीं सकता। अंतस का असली उजियारा तब फैलता है; जब हम अपनी ठोकरों, असफलताओं और आँसुओं से गुज़रकर समझदारी की लौ जलाते हैं। ज़िंदगी के कड़वे-मीठे अनुभवों की आग में तपकर जो रोशनी निकलती है, वही अस्ल में टिकती है; क्योंकि पढ़ी हुई बातें दिमाग़ तक रह सकती हैं, मगर अनुभव की बाती सीधे दिल और रूह को रोशन करती है।

अपने आस-पास झुलसे हुए, नकारात्मक मनोवृत्ति वाले लोगों के बीच इस जुगनू जैसी कोमल आभा को बचाए रखना सरल नहीं होता। पर यदि आपने इस अंतर्मुखी शांति को साध लिया, तो भीतर की वह नन्हीं-सी रोशनी भी पर्याप्त सिद्ध होती है; क्योंकि जहाँ एक जुगनू भी मौजूद है, वहाँ पूर्ण अँधेरे का साम्राज्य नहीं हो सकता। अपने भीतर के उस जुगनू को जगाकर तो देखिए, एक दिन वह कब तेजस्वी सूर्य में परिवर्तित हो जाएगा, इसका आभास भी आपको नहीं होगा। अपने भीतर की आग को उजास में बदलिए, आपका जीवन भी दीपावली के इस त्योहार की तरह जगमगा उठेगा।

कई बार अंतस की यह ज्योति कोई दूसरा जला देता है। हमारे आस-पास ऐसे अनेक विरल व्यक्तित्व होते हैं, जिनके मात्र सान्निध्य से लाखों लोग जीने की प्रेरणा पा जाते हैं। ये वे जाग्रत दीप हैं, जो स्वयं जलकर न जाने कितनी बुझी हुई ज़िंदगियों को रोशन कर देते हैं।

मेरे जीवन में भी कई बार यह रोशनी अपनों और शुभचिंतकों के माध्यम से आई। मोमबत्ती, दीये या जुगनू जितनी रोशनी भी जिन-जिन लोगों ने मेरे जीवन की राहों में बिखेरी; मैं उन सभी के प्रति सदैव नतमस्तक और कृतज्ञ रहती हूँ, क्योंकि उन्होंने नैराश्य के भ्रम को तोड़कर मेरे भीतर आशा का बीजारोपण किया।

अब हर दीपावली पर मैं केवल मुँडेरों और देहरियों पर दीप नहीं सजाती, बल्कि अपने और आप सबके अंतस के उसी शाश्वत आलोक का उत्सव मनाती हूँ।

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