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रमेशचंद्र शाह

1937 | अल्मोड़ा, उत्तराखंड

समादृत साहित्यकार और लेखक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

समादृत साहित्यकार और लेखक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

रमेशचंद्र शाह के उद्धरण

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साहित्य में आध्यात्मिक भावबोध या उसकी ज़रूरत का अहसास, दर्शन को अनुभूति के भीतर चरितार्थ करके या दर्शन को अनुभूति में घुलाकर ही संभव और कृतिकार्य हो सकता है।

जीवंत, आँख के सामने घटित होने वाले इतिहास को भी, कैसे हमारे अपने लोग एक पुराण की रूपावली-शब्दावली में ही देखते-परखते-महसूस करते रहे है—यह तो शायद हम सभी जानते होंगे। किंतु हमारे उस 'जानने' को इतने तीव्र, सघन और संश्लिष्ट रूप में रचकर; उसे हमारे अंत:चक्षुओं के सामने प्रत्यक्ष करा देने की क्षमता, उपन्यासकार में ही होती है।

विलगाव की स्थिति में, आधुनिक जीवन की अधिकाधिक यांत्रिक और जनसंकुल परिस्थितियों में, मानव समुदायों के आस्तित्विक और सांस्कृक्तिक लयभंग के मानसोपचार की ज़रूरत के तकाज़े से ही; प्रकृति के साथ मानवीय चेतना के संबंधों की खोज, जीवन की औपन्यासिक पुनर्रचना में और भी गहरे और भी सूक्ष्मतम घरातलों पर अनिवार्य उठती है।

निराला के कुल्लीभाट में भी व्यंग्य की जो धार; जो प्रभविष्णुता संभव हुई है, वह तथाकथित व्यंग्यकारों के बूते के बाहर की चीज़ है। वह कवि की ही वाग्विभूति है, जो गद्य को फली है।

हिंदी का सजग लेखक-पाठक, निश्चित रूप से भाषाभाषी लेखकों-पाठकों की तुलना में कहीं अधिक अखिल भारतीय दृष्टि रखनेवाला होता है।

आदर्श और यथार्थ के परस्पर विरोधी ध्रुवांतों पर; शायद ही किसी और सभ्यता को जन्म देने वाली चेतना इस क़दर मथी गई हो, जिस तरह रामायण और महाभारत में।

अज्ञेय के 'शेखर : एक जीवनी' से पहले हिंदी उपन्यास में 'प्रकृति' लगभग अनुपस्थित दीखती है, और नश्वरता-बोध की उत्कटता भी।

औपन्यासिक चरित्रों की अंतर्यात्रा और सामाजिक परिस्थितियों का चित्रण-उ‌द्घाटन, एक-दूसरे से असंबद्ध और स्वायत्त ही हों—यह कदापि आवश्यक नहीं।

संवेदन की तीव्रता, गहराई और सृजनात्मक परकायाप्रवेश की प्रतिभा, मात्र जीवन की घटना-बहुलता या मात्र संयोगाश्रित सुख-दु:ख-प्रचुरता पर निर्भर नहीं हुआ करती।

हिंदी का तो जन्म ही मानो इसीलिए हुआ था कि उसमें कोई सुपरिभाषित प्रादेशिक अस्मिता नहीं, बल्कि एक समग्र भारतीय अस्मिता बोले।

समग्र भारतीय अस्मिता की गूँज पैदा करने की जो हिंदी की अपनी टेक; अपनी आन-बान है, उसकी सुध ही बिसर जाने का, 'लोकल कलर' और 'फ़्लेवर' पैदा करने में ही सारी औपन्यासिक ऊर्जा बिसरा देने का है।

निर्मल वर्मा के उपन्यास में तो प्रकृति मानो स्वयं नेपथ्य से बीच-बीच में अवतरित होकर, अग्रभूमि में घटित हो रही मानवीय जीवन-लीला में शामिल हो जाती लगती है—जीवन में घुली मृत्यु और मृत्यु में ओझल होते जीवन की आहट सुनती, अपने-ढंग से अकेली आकृतियों के उस ड्रामे में साझा करती हुई सी।

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