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संस्कार पर उद्धरण

जो निकट होने से बृहत्; दूर होने से छोटा है, जो बाह्य होने से प्रत्यक्ष और आंतरिक होने से प्रच्छन्न है, रूप में निरर्थक और संयुक्त रूप में सार्थक है, उसकी यथार्थता सुरक्षित रखते हुए उसे देखना—यही हमारी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए।

रवींद्रनाथ टैगोर

संस्कारों की बाधाएँ टूटकर, जो मिलन स्वाभाविक हो उठता है―वही तपोवन का मिलन है।

रवींद्रनाथ टैगोर

सत्य अपना पूरा मूल्य चाहता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी
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महिला में जीवन की बड़ी चीज़ों के साथ-साथ, छोटी चीज़ों की क़द्र करने की भी विशेष योग्यता होती है।

जॉन ग्रे