कुंठा पर उद्धरण
कुंठा मानसिक ग्रंथि
अथवा निराशाजन्य अतृप्त भावना या ‘फ़्रस्ट्रेशन’ है। स्वयं पर आरोप में यह ग्लानि या अपराध-बोध और अन्य पर दोषारोपण में ईर्ष्या या चिढ़ का द्योतक भी हो सकता है। मन के इस भाव को—इसके विभिन्न अर्थों में कविता अभिव्यक्त करती रही है।
जब किसी की निंदा का विचार मन में उठे तो जानना कि तुम भी उसी ज्वर से ग्रस्त हो रहे हो। स्वस्थ व्यक्ति कभी किसी की निंदा में संलग्न नहीं होता।
काम भावना का हनन ही गूढ़ अनुभवों की राह खोलता है और यह हनन उन्हें कहाँ ले जाता है, यह जानने के बाद एक शख़्स सिर्फ़ यही कहेगा कि गूढ़ अनुभव मात्र मतिभ्रम और हिस्टीरिया की बीमारी है।
जब भी हम ख़ुद से ज़्यादा प्रेम कर रहे हों या दूसरे हमसे प्रेम कर रहे हों, तो दमित भावनाओं में उभरकर सामने आने की प्रवृत्ति होती है और वे हमारी प्रेमपूर्ण जागरूकता पर हावी हो जाती हैं। वे इसलिए उभरती हैं, ताकि उनका उपचार हो सके और वे मुक्त हो सकें। इस वजह से हम अचानक चिड़चिड़े, रक्षात्मक, आलोचनात्मक, विद्वेषपूर्ण, माँग भरे, कुंद या क्रोधित हो सकते हैं।
सच तो यह है कि ऐसी योग्यता; जिसमें महान प्रेरणा न हो, जिसमें लोक-कल्याण के लिए त्याग की भावना न हो, जिसमें जन-जीवन की अंतर्धाराओं को देखने की दृष्टि न हो—ऐसी योग्यता निरर्थक है।
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