दलित पर उद्धरण
हिंदी कविता में गए कुछ
दशकों में दलित-विमर्श के उजाले में चेतना की नई रोशनाई से लिखी गई कविताओं की विचलित कर देने वाली दुनिया सामने आई है। यह चयन ऐसी ही दुनिया के बीच से किया गया है।
दलित के सत्ता विमर्श में एक कबीर का, एक अम्बेडकर होना भी अगर नहीं भाता; तो इस नव ब्राह्मणवादी पेटूवाद को क्या कहा जाए, जो कुछ प्रगतिशील दिमाग़ों में भी बैठा हुआ है।
यज्ञ करने और करानेवालों का यही उद्देश्य है कि वही पिछड़ी हुई रुग्ण मानसिकता बनी रहे, जिससे वर्ण और वर्ग-भेद बने रहें। वही मानसिकता बनी रहे कि हरिजन दूल्हा घोड़े पर बैठे, तो ऊँची जाति के लोग भड़ककर कहें—'देखो इस ‘चमरे’ की हिम्मत, हमारे सामने घोड़े पर बैठता है।'
कबीर के होने न होने से सत्ता बदलती है। कबीर के बदलने से, उसके पाठ के बदलने से सत्ता बदलती है। कबीर जाता है, तो एक इतिहास खंड में विच्छिन्नता पैदा हो जाती है। उसका सातत्य भंग हो जाता है और वेदवादी वर्णवादी गर्व खंडित हो जाता है, और हिंदुत्व के एजेंडे की समस्या बढ़ जाती है।
दलित साहित्य को व्यापक जीवन के दलित विमर्श के भीतर ही पढ़ा जा सकता है। यही दलित की देह गाथा है, जिस पर वर्णवादी इतिहास अपनी इबारत लिखता रहा है।
सरकार ने हरिजनों व आदमियों की समस्या पर इस तरह कमीशन बिठाया है, जैसे अभी पहली बार मालूम हुआ है कि कुछ ऐसे प्राणी भी हैं, जो हरिजन और आदिवासी कहलाते हैं।
छठी-सातवीं शताब्दी के आसपास भारतीय इतिहास में भक्ति की जो ऐतिहासिक क्रान्तिकारी घटना हुई थी, उसका जन्म लोकजीवन में हुआ था, लोकभाषा में हुआ था। उसका श्रेय आदि-अद्विज अब्राह्मणों को है। इसे दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों ने शुरू किया था।
अछूत दलित की अवमानना की अवस्था केवल व्यक्तिगत नहीं होती।
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