वियोगिनी ठाकुर के बेला
बाग़ी मन की बातें : एक पुरुष की देह को लेकर
बहुत याद करने पर भी और बहुत मूड़ मारने पर भी पिछले दिनों ठीक-ठीक यह याद नहीं आया कि उस दिन हमारे घर में कौन-सा आयोजन था। हाँ, यह ख़ूब याद है कि उसी बरस किसी महीने दादी मरी थीं; पर यह याद नहीं आता कि वह
प्रेम तुम्हारे लिए नहीं है
पेट में कई रोज़ से पीर उठती है। उठती क्या है बंद ही नहीं है। जितनी देर आँख लगी रहे, उतनी ही देर पता नहीं चलता। नहीं तो हर पल छोटी-छोटी सुइयाँ चुभती हुई महसूस होती हैं। कभी लगता है बहुत सारे कीड़े