असहमति की परंपरा और भारत का विचार
संतोष सिंह
26 जनवरी 2026
सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के ‘फ़िराक़’
क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया
रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’ का यह शेर वर्षों से पढ़ा जा रहा है। शायद इससे बेहतर भारत होने की यात्रा इतने कम शब्दों में कोई और बयाँ नहीं कर सकता। इस यात्रा को इतिहासकार, साहित्यकार, राजनीति शास्त्र के विद्वान अपने तरीक़े से व्याख्यायित करते आए हैं। चाहे वह रामधारी सिंह दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ हो, जवाहरलाल नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’, आर्थर लेवेलिन बाशम की ‘द वंडर दैट वाज़ इंडिया’ या अमर्त्य सेन की ‘एन आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन’—भारत को सबने अपने तरीक़े से खोजा है। तमाम इतिहासकारों ने इसकी गहन व्याख्या की है और इतिहास लेखन और पुनर्लेखन जारी है।
ऐसे में साहित्यकार, समाजवादी चिंतक और अंशकालीन राजनीतिज्ञ प्रेमकुमार मणि जब ‘भारत : एक विचार परंपरा’ लेकर आते हैं तो एक प्रश्न सहसा उठता है—इसमें क्या अलग है और क्या ज़्यादा है। क्या इस किताब का कोई सामयिक संदर्भ या इमेडिएट ट्रिगर है या इन सबसे परे यह किताब कुछ और ही बातें रेखांकित करती है। मेरे हिसाब से यह किताब इन सब बातों से परे है। इस किताब की तुलना किसी अन्य किताब से नहीं की जाए तो यह किताब भार और अपेक्षा मुक्त होकर पढ़ी जाएगी। आप इसके सामने दिनकर और नेहरू रख देंगे तो पूर्वाग्रह और दुराग्रह से शुरुआत हो सकती है। मेरी लिए यह किताब एक कैप्सूल की तरह है, जिसमें पाषाण काल से आज़ादी तक के भारत के बारे में कुछ न कुछ है, अपितु आर्यावर्त और उसके पहले महज़ एक भौगोलिक आवर्त की दास्तान है। इसको पढ़ना एक टाइम मशीन से गुज़रना है। यह इतिहास के बहुतेरे मील के पत्थरों को आलिंगन करते हुए गुज़रती है—मक्खलि गोशाल से महात्मा गांधी, बुद्ध, महावीर, कालिदास, कबीर, अमीर ख़ुसरो और अल्लामा इक़बाल तक।
भारत की खोज करते-करते यह पुस्तक चार महान् महत्त्वपूर्ण रचनाओं से हिंदू होने का तात्पर्य समझाने की भी कोशिश करती है। लेखक ‘आनंदमठ’ के प्रखर हिंदू के बजाय ‘गोरा’ के हिंदू को चुनता है, वहीं सावरकर के जागृत और मुखर हिंदू के बजाय गांधी के हिंद स्वराज वाला हिंदू चुनता है।
यह किताब—भारत क्या है, के यक्ष और प्रत्यक्ष प्रश्न से शुरू होकर नदी घाटी सभ्यता से गुज़रते हुए, आर्य से आर्यावर्त होते हुए उपनिषद् काल और फिर मगध में विचारों के मेले पर थोड़ी रुकती है। बुद्ध, जैन दर्शन से निकलकर चाणक्य और कौटिल्य का संशय बताती है। इस किताब में चाणक्य के अर्थशास्त्र पर प्रश्न भी है, मुद्राराक्षस से उसकी तुलना भी है। इसमें हर्षचरितम् भी है, वैदिक धर्म दर्शन भी है, भक्ति आंदोलन भी। राजतरंगिणी की यशोमती, सुगंधा, लल्ला और दिद्दा जैसी सशक्त नारियाँ हैं। मध्य काल, मुग़ल काल होते हुए आज़ादी के आंदोलन तक। कुल मिलाकर, भारत—एक विचार की बातें ज़्यादा हैं। इतिहास से ज़्यादा उसका हासिल है। और यही इस किताब का हासिल है।
लेखक की दृष्टि भारत को लेकर स्पष्ट है : “...भारत कोई देश नहीं, एक सोच है, विचार है और शायद कह सकते हैं कि उसने एक विचारधारा या विचार-परंपरा का रूप ले लिया है। मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ कि भारत केवल एक भूगोल है जो 15 अगस्त 1947 को या और भी किसी तारीख़ को अस्तित्व में आया और तबसे रूढ़ है। नहीं, भारत रूढ़ नहीं हो सकता, होना भी नहीं चाहिए। 15 अगस्त 1947 को कश्मीर भारतीय भू-भाग में नहीं था, गोवा नहीं था, सिक्किम नहीं था। बाद में ये सभी भारतीय भूगोल से जुड़े। अशोक के ज़माने में दक्षिण के चोल-पांड्य राज्य उसके साम्राज्य में नहीं थे, और पश्चिम के हिंदुकुश तक उसकी सीमाएँ थीं। मुग़लों और अँग्रेज़ों के ज़माने में भारत का भूगोल अलग-अलग रहा। यहाँ तक कि 14 अगस्त 1947 का भारत और कुछ घंटे बाद 15 अगस्त 1947 का भारत अलग-अलग भूगोल का था। तो इन सबके बीच भारत कहाँ है? वह हमारे राजनेताओं द्वारा तय की हुई चंद लकीरों के बीच क़ैद है? शायद नहीं। क्या अब हमें सिंधु-सभ्यता का इतिहास भारत से नहीं जोड़ना चाहिए कि वह पाकिस्तान का हिस्सा हो गया? हम ऐसा नहीं कर सकते। कुछ लोगों के लिए भारत एक माता है, कुछ लोगों के लिए पितृभूमि भी। बहुत से लोग इसे नदियों-पहाड़ों का एक सम्पुंजन भी स्वीकारते हैं, तो कुछ लोगों के लिए यह एक संवैधानिक अवस्थिति है, जिसे 26 नवंबर 1949 को हमने आत्मसात किया था। कुछ लोगों के लिए भारत संसद में घिरा हुआ है, तो कुछ लोगों के लिए माता का स्त्री रूप लेकर बाघ पर बैठा है। कुछ लोग इसे राम मंदिर में बैठाना चाहते हैं, तो कुछ अपने बजरंगी हथियारों में। कवि बंकिम के लिए यह ‘सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्’ है, तो हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत के लिए ग्रामवासिनी और तरुतल निवासिनी। लेकिन मेरे लिए भारत न कोई माता है, न पिता, न सुजलाम्, सुफलाम् है, न वंदे मातरम् के नमन-भाव जैसा, मेरा भारत यहाँ के लोग हैं, फावड़ा चलाते किसान और हथौड़े चलाते मज़दूर हैं, वे बच्चे हैं—जो उल्लास के साथ कूदते-फाँदते स्कूल की ओर भाग रहे हैं। धान रोपती, बर्तन माँजती, भेड़-बकरी चराती, बच्चों को सँभालती महिलाओं में मुझे भारत का मातृ रूप दिखा है, वही मेरे लिए भारत माता हैं। बाघ पर बैठी माता मेरे लिए भारत माता नहीं हो सकती। मैं उसके जयकारे में स्वयं को शामिल नहीं कर सकता। मेरा भारत मेरी धड़कनों का हिस्सा है, वह हमसे अलग-विलग नहीं है, अन्य नहीं है, उसकी वंदना हम कैसे कर सकते हैं? वंदना तो अन्य की होती है, उसकी होती है जो पृथक है। मेरा भारत मेरे साथ है, इसका ध्यान मैं अवश्य कर सकता हूँ, पूजा-वंदना कैसे कर सकता हूँ?” विचार परंपरा की सबसे बड़ी ख़ासियत असहमति और वैकल्पिक सिद्धांतों का प्रतिपादन रहा है। लेखक प्रश्न और प्रति प्रश्न करते आए हैं और विमर्श को खुला छोड़ दिया है। सार यह है कि यह किताब सिर्फ़ आपको ऐतिहासिक मील स्तंभों से गुज़रते हुए आपको प्रश्न पूछते हुए गुज़रती है।
मनुस्मृति, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक दृष्टिकोण
मनुस्मृति की चर्चा करते हुए मणि लिखते हैं कि कैसे 1771 के आस-पास अँग्रेज़ शासक ने हिंदुओं के उन संस्कृत ग्रंथों को देखना चाहा जिनमें उनके सामाजिक रिवाजों और विधि-विधानों का ब्योरा हो। इसी क्रम में मनुस्मृति जैसे ग्रंथ का अध्ययन आवश्यक प्रतीत हुआ। आख़िर, तुर्कों ने भी हिंदुओं के रीति-रिवाजों को समझने की कोशिश की थी। अल-बिरूनी (973-1049 ई.) की यात्रा-परक किताब इसी की सूचना देती है। लेकिन इसका आशय यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि मनुस्मृति के अध्ययन को प्रेमकुमार मणि ने जाएज ठहराया है, बल्कि कठोर शब्दों में इसकी भर्त्सना की है।
इसी क्रम में इतिहास को पहली बार सांप्रदायिक दृष्टिकोण से देखने लिए 1817 में प्रकाशित जेम्स मिल की किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया’ की चर्चा करते हैं—“बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी इतिहासकारों का दौर आरंभ होता है। आर.सी. दत्त ने अपनी किताब ‘द इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया’ में भारतीय इतिहास को राष्ट्रवादी नज़रिये से देखा और फिर इस ढर्रे से इतिहास-लेखन की एक परंपरा ही शुरू हो गई। एच.सी. रायचौधरी, काशीप्रसाद जायसवाल, आर.सी. मजूमदार, आर. के. मुखर्जी जैसे कतिपय इतिहासकारों ने राष्ट्र-निर्माण के लिए इतिहास की मनमानी व्याख्या की!”
सिंधु सभ्यता और आर्यावर्त
लौटते हैं इतिहास की तरफ़ और बात सिंधु घाटी सभ्यता के एक रोचक पहलू से करते हैं। “सिंधु-सभ्यता निश्चित ही आर्यों की सभ्यता नहीं थी, लेकिन यदि स्वस्तिक चिह्न से आर्यों का जुड़ाव है, जैसा कि बीसवीं सदी में हिटलर ने उसे अपने आर्य प्रभुत्व वाले नाज़ी राष्ट्र का प्रतीक चिह्न बनाकर बताया था, तो हमें यह भी देखना होगा कि हड़प्पा (और) मुअन-जो-दड़ो से प्राप्त मुहरों (सील) पर इस स्वस्तिक के भी निशान मौजूद हैं। संभव है, सभ्यताओं और संस्कृतियों के समन्वय की प्रक्रिया सिंधु-सभ्यता के उत्कर्ष-काल में ही आरंभ हो गई हो। क्योंकि इसी उत्कर्ष-काल में इस सभ्यता को अधिक श्रमिकों की आवश्यकता हुई होगी और इसकी पूर्ति के लिए स्वाभाविक रूप से अन्य लोग आए होंगे। किन्हीं अन्य कारणों से भी धीरे-धीरे आर्यजनों का प्रभुत्व कुछ ख़ास क्षेत्रों में बढ़ सकने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन अधिक संभावना इस बात की ही है कि आर्यजनों से अधिक आर्य-संस्कृति का प्रभाव बढ़ता गया।” इतिहासकार का इस पर भिन्न मत हो सकता है। लेखक ने प्रश्न को खुला छोड़ दिया है।
आर्य से आर्यावर्त की चर्चा करते हुए लेखक इस बात पर क्षुब्ध दिखते हैं कि कैसे आर्य कालांतर में जातिवाचक संज्ञा हो गया। “गोलवलकर से पूर्व सावरकर ने, जैसाकि पहले बतला चुका हूँ, अपने हिंदुत्व की सैद्धांतिकी में दयानंद की आर्यभूमि को हिंदुओं की पुण्यभूमि में परिवर्तित कर दिया था। इस पूरे सिलसिले में दयानंद सरस्वती कुछ अधिक ईमानदार दिखते हैं। वह किसी तिलक, सावरकर या गोलवलकर की अपेक्षा संस्कृत के अधिक आधिकारिक विद्वान थे, जिसे उनकी पुस्तक ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’, जो ऋग्वेद का भाष्य है, को देखकर समझा जा सकता है। उन्होंने हिंदू अथवा हिंदुत्व, या राजा राममोहन राय के ‘हिंदुइज़्म’ जैसे किसी शब्द पर कोई दावा नहीं किया है। वह आर्य समाज की बात करते हैं, वैदिक समाज की बात करते हैं। हिंदू शब्द पर ज़ोर आधुनिक भारत में केवल सावरकर देते हैं। हालाँकि इससे मिलते-जुलते ‘हिंद’ शब्द का प्रयोग गांधी ने अपनी किताब ‘हिन्द स्वराज’ (1909) में किया है। हिंद और हिंदू में एक अंतर्संबंध है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह आर्य या वैदिक सभ्यता का शब्द नहीं है।”
मक्खली गोशाल, बुद्ध और विचारों का मेला
बुद्ध के आने के पूर्व गिरिव्रज में कुल 63 विभिन्न मतावलंबी जमातों के विचारक जमे हुए थे—पूरण कस्सप, अजित केशकम्बलि, पकुध कच्चायन, संजय वेलट्ठिपुत्त, मक्खलि गोशाल और निगंठ नाथपुत्त। इनकी ख्याति ऐसी थी कि सिद्धार्थ गौतम इनसे मिलने या विचार-विनिमय के आकर्षण में गिरिव्रज आए। बौद्ध-ग्रंथ ललितविस्तर सूत्र के अनुसार, सिद्धार्थ पहले वैशाली गए जहाँ उन्होंने आलार कालाम के साथ कुछ समय बिताया। कालाम के दो शिष्यों, उद्दक रामपुत्त और भरंडु से वह पहले मिल चुके थे और उनके गुरु से मिलने की उनकी लालसा थी। लेकिन कालाम के पास वह बहुत समय तक रुके नहीं। उनका अगला पड़ाव गिरिव्रज बना, लेकिन वहाँ मौजूद परिव्राजकों से उनके संवाद के ब्योरे बौद्ध ग्रंथों में अप्राप्य हैं।
भारत-विशेषज्ञ ब्रिटिश इतिहासकार ए.एल. बाशम की किताब ‘हिस्टी एंड डॉक्ट्रिन’ की किताब लोकायत ने भी आजीवकों, विशेषकर मक्खलि गोशान्त पर गंभीरतापूर्वक चर्चा की।
मक्खली गोशाल के दर्शन में निषेध ज़्यादा है या फिर वह किसी स्वप्नदृष्टा की तरह लगते हैं एक चेतावनी देते हुए। उनके एक शिष्य-मित्र आयमपुत्त ने उनसे जब कुछ पूछना चाहा, तब उन्होंने इतना ही कहा—“हे प्रिय, वीणा बजाओ, वीणा बजाओ।” शायद यही उनकी आख़िरी दास्तान थी। नृत्य करते हुए ही उनकी मृत्यु हुई। उनके आठ सूत्र हैं—चरिमे पाने (अंतिम पेय), चरिमे गेये (अंतिम गीत), चरिमे नत्ते (अंतिम नृत्य), चरिमे अंजलिकम्में (अंतिम अभिनंदन), चरिमे पक्खाल-समवाते महामेहे (अंतिम प्रलयंकारी महामेघ), चरिमे सेयने गन्ध-हस्ती (सुगंध का हाथियों द्वारा अंतिम छिड़काव), चरिमे महाशिलाकार्त संगामें (बड़े पत्थरों का अंतिम युद्ध) और चरिमे तीर्थंकर (अंतिम तीर्थंकर)। “बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग की तरह गोशाल के ये आष्टांगिक उद्गार आज हमारे ज़माने में भी एक महाप्रश्न की तरह हमसे मुख़ातिब हैं। दुनिया हमेशा बदलती है। गोशाल अपने समय की समीक्षा करने कि गोशाल की विफलताएँ ही बुद्ध की सफलताएँ हैं। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की गोशाल पर की गई टिप्पणी ग़ौरतलब है : “गोशाल मात्र एक भाट या चारण कवि नहीं था। वह एक भविष्यद्रष्टा दार्शनिक भी था। वह विश्व के संबंध में कोई दृष्टिकोण बनाना चाहता था, अधांत वह संसार को समझना चाहता था, जिसमें वह रह रहा था। यही परिस्थितियाँ ये जो गोशाल के लिए घातक बंधन बन रही थीं और यही अनुभव बुद्ध ने भी किया जनजातियों का ह्रास होते जाना या नवोदित राजसत्ताओं की भीषण शक्ति के हाथ इनका विनाश होना ऐसे विकट सामाजिक परिवर्तन थे जिनका औचित्य उस कु के महानतम चिंतक की समझ से भी बाहर था। इसलिए बुद्ध समझ गए कि इसे घटनाओं के कारणों के संबंध में कोई प्रश्न उठाने के ब-जाए लोगों के तप्त हृदय को शांति दिलाना अच्छा होगा। यथार्थ से जूझने के ब-जाए किसी समुचित भ्रम का आश्रय लेना होगा। यही बात हमें बुद्ध की सफलता और गोशाल की विफलता को समझने में सहायक होती है। बुद्ध अपने युग का सर्वाधिक सुसंगत व्यामोह उत्पन करने के कार्य में लग गए। जबकि गोशाल यथार्थ से जूझने और ऐतिहासिक बंधन को तोड़ने के प्रयास करते रहे। वह अपने युग के सबसे बड़े ऐतिहासिक परिवर्तन अर्थात् जनजातीय व्यवस्था के पतन और राजसत्ता द्वारा प्रदत्त नए मूल्यों के उदय को समझना चाहते थे। और वह इस कार्य में विफल हो गए। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो संसार का संचालन कोई बहुत बड़ी, प्रचंड, अथाह और अज्ञात शक्ति कर रही है, जिसे हम नहीं जानते। यह शक्ति थी भाग्य। यही उनका नियति-दर्शन था।” चूँकि बुद्ध और महावीर पर काफ़ी विमर्श हैं, यहाँ उनकी चर्चा संक्षिप्त रखते हैं। शेष सबको पता है बुद्ध और महावीर के दर्शन किस तरह समय की सीमा से परे है और उनपर आज भी शोध होते जा रहे हैं।
अर्थशास्त्र, कालिदास और संगम साहित्य
प्रेम कुमार मणि पहले तो चाणक्य के होने पर इतिहासकारों के मतांतर रेखांकित करते हैं और कौटिल्य और चाणक्य के एक होने पर प्रश्न करते दिखते हैं। अर्थशास्त्र में राज्य को सर्वोपरि बनाने को भी चुनौती देते हैं। “कौटिल्य के अर्थशास्त्र का सत्ता-सापेक्ष रुख मैकियावेली के ‘द प्रिंस’ से कहीं गहरा और जनविमुख है। प्रथमद्रष्ट्या प्रतीत होता है कि यह राज्य (स्टेट) को सर्वोपरि मानता है और तमाम चीजें, चाहे वे धर्म हों, या नैतिकता या कि प्रजा-केवल राज्य के लिए होने चाहिए। ऐसा राज्य आख़िर क्यों होना चाहिए? और फिर राज्य किसके लिए होने चाहिए? लेकिन अर्थशास्त्र को इसकी चिंता नहीं है। हर हाल में राज्य-हित, जिसका मतलब सिर्फ़ कर-संग्रह है, सर्वोपरि है। धर्म और नैतिकता का कोई औचित्य नहीं है।”
विचार परंपरा के प्रेमकुमार मणि महाकवि कालिदास को भी शामिल करते हैं। कालिदास जनकवि नहीं थे और उस सामंती व्यवस्था में शायद हो भी नहीं सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी रचनाओं से भाषा, विचार और संस्कृति को जो समृद्धि दी वह अन्यतम है। यह स्वीकार किया जा चुका है कि वह गुप्त काल में हुए थे। यह भी लगभग तय है कि राजदरबार से उनका जुड़ाव था, वह वाल्मीकि-व्यास अथवा कबीर-तुलसी की परंपरा के कवि नहीं थे। “यह अवश्य है कि दरबार का प्रभाव कुछ अंशों में पाया जा सकता किंतु कवि अपनी रचनाओं में स्वतंत्र है, वह चारण कवि कहीं से नहीं श्रेष्ठ परंपराओं का अनुपालन किया गया है और कुछ ऐसे काव्यादर्श गए हैं, जिनके कारण इतने दिनों बाद भी कालिदास सम्मानित हैं।”
कुल मिलाकर उनकी उपस्थिति चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय की बनती है। इतिहासकार भगवतशरण उपाध्याय ने 16 वर्ष तक परिश्रम करके एक किताब लिखी है—‘कालिदास का भारत’। उनका निष्कर्ष यही है कि कवि का जन्म समुद्रगुप्त के समय में होना संभव है, उन्होंने चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के शासन में उज्जैन राजसभा की शोभा बढ़ाई और कुमारगुप्त के विकास को भी देखा, संभवतः स्कंदगुप्त के जन्म के भी वह साक्षी रहे हों। अनुमान से उनका समय 365-445 ई. निर्धारण किया है, यदि उन्होंने 80 वर्ष की उम्र पाई हो।
द्रविड़ों के इतिहास की पृष्ठभूमि हमें संगम-साहित्य से मिलती है। इसलिए इससे ऋावेद है। यहाँ से हम उत्तर भारतीय इतिहास का आरंभ करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर भारतीय समाज में जो स्थान ऋषियों को प्राप्त था, वह स्थान द्रविड़ समाज में कवियों को प्राप्त था। ये द्रविड़ कवि किसी धार्मिक आस्था से नहीं, सामाजिक यथार्थ से अधिक जुड़े थे, अतएव इनकी रचनाओं में किसी संस्कार अथवा कर्मकांड का कोई प्रस्ताव नहीं है। इसकी जगह वे प्रेम, करुणा, युद्ध, ईर्ष्या जैसी मानवीय भावनाओं के कुशल चितेरे दिखते हैं। जनश्रुति है कि अति प्राचीन ज़माने के किसी कालखंड पर द्रविड़ भूमि के मदुरै नगर, जो कि अब इसी नाम के एक ज़िले का मुख्यालय है, में एक ऐसा संगम (मुच्वंगम) अथवा सम्मेलन हुआ जिसमें द्रविड़ भूमि के तमाम छोटे-बड़े कवि एकत्रित हुए। यहाँ तक कि उनके देवता मुरुगन भी इसमें शामिल हुए। इसी क्रम में दो और संगम हुए, जिनमें दूसरा कपाटपुरम में और फिर तीसरा उसी मदुरै में हुआ जहाँ प्रथम संगम हुआ था। इन संगमों में प्रथम में तो नहीं, लेकिन दूसरे और तीसरे में कवियों की रचनाओं का संपादन हुआ। इन संपादित रचनाओं का जो संकलित रूप है वही संगम-साहित्य है। वेदों के बारे में भी लगभग ऐसा ही हुआ, लेकिन वहाँ संगम की जगह कृष्ण द्वैपायन अथवा व्यास ने उसका संपादन किया।
राजतरंगिणी: महज़ कश्मीर का इतिहास नहीं
“कल्हण की कृति राजतरंगिणी भारतीय इतिहास-लेखन का ऐसा दस्तावेज़ है जिस पर कोई समाज गर्व कर सकता है। यह इतिहास और काव्य का अद्भुत अभिराम संयोजन अथवा संगम है जिसे संस्कृत में कवि कल्हण ने 1148 से 1150 के बीच लिखा है। राजतरंगिणी राज और तरंगिणी दो शब्दों का युग्म है, जिसमें राज का अर्थ शासन अथवा पॉलिटिक्स और तरंगिणी का अर्थ नदी है। इस ग्रंथ में तरंगिणी अध्याय के लिए व्यवहृत हुआ है। यह ग्रंथ आठ तरंगों अथवा अध्यायों में है और कुल मिलाकर इसमें लगभग आठ हजार श्लोक हैं।”
लेखक हमें राजतरंगिणी से परिचय करवाते हैं और बताते हैं कि क्यों सर्वकालिक क्लासिक में यह कृति शामिल है। कवि के पिता चंपक राजा हर्षदेव के महामात्य थे, जिनका समय 1089 ई. से 1101 ई. तक रहा है। अनुमान के अनुसार कवि का जन्म सन् 1100 ई. के आस-पास हुआ प्रतीत होता है, इस तरह राजतरंगिणी की रचना के समय वह प्रौढ़वय, लगभग 50 का होगा। राजतरंगिणी में परिहासपुर नगर की ख़ूब चर्चा है।
कल्हण ने नीलमत पुराण का गहराई से अध्ययन किया। प्रतिष्ठा शासन, वास्तुशासन, प्रशस्तिपट्ट, जनश्रुतियों और दूसरे अभिलेखों का भी राजतरंगिणी में भरपूर उपयोग किया गया है। इन सबके आधार पर ही उसने लगभग 5000 वर्ष के कश्मीरी इतिहास को अपनी इस कृति में दर्ज किया है। “भारत में इतिहास-लेखन की कोई विकसित परंपरा कभी नहीं थी। इतिहास के नाम पर पुराण और कुछ काव्य-ग्रंथ थे, जिनमें से इतिहास के तत्त्वों को हासिल करना मुश्किल होता था। रामायण और महाभारत जैसे काव्य-ग्रंथ भी इतिहास की तरह समादृत थे, जिनमें पौराणिकता, इतिहास और काव्य-तत्त्वों की ऐसी सघन बुनावट है जिसे पूरे तौर पर इतिहास नहीं कहा जा सकता। लेकिन राजतरंगिणी इतिहास है। आरंभिक तरंगों में प्राचीन ज़माने के राजाओं के जो ब्योरे काव्य-ग्रंथों और पुराणों से लिए गए हैं, को छोड़ दें, तो ईसा की आठवीं सदी के बाद के ब्योरे तो अत्यंत क्रमबद्ध और जीवंत हैं।”
रजिया सुलतान
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के तीन बेटे थे और एक बेटी। बेटों के नाम थे—रुक्मुद्दीन फ़िरुज, मुजुद्दीन बहराम और नसरुद्दीन महमूद। बेटी थी—रज़िया-अल-दीन जिसका जन्म 1205 ई. में बदायूँ में हुआ था, जहाँ इल्तुतमिश गवर्नर के रूप में तैनात था। रज़िया का ज़िक्र इसलिए ज़रूरी है कि क्योंकि उस ज़माने में लड़कियों की शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। इल्तुतमिश ने अपनी बेटी में कुछ ख़ास देखा होगा, इसलिए उसने उसे सैनिक और प्रशासनिक प्रशिक्षण दिलवाया। ऐसा लगता है, दिल्ली में रहते हुए अपने पिता के काम-काज में वह सहयोग करती थी, क्योंकि 1231 ई. में जब इल्तुतमिश रणथम्भौर के सैनिक अभियान पर निकला था तो सल्तनत की प्रशासनिक ज़िम्मेदारी रज़िया को ही सौंपी थी। कहा जाता है रज़िया ने ज़िम्मेदारी को इतनी कुशलता से पूरा किया कि उसका पिता उस पर बहुत विश्वास करने लगा। इसके लिए इल्तुतमिश की भी प्रशंसा करनी होगी कि उसने परंपरा से हटकर अपनी बिटिया को इस लायक़ बनाया।
बुद्ध की धरती पर इस्लाम
अरब व्यापारियों के साथ इस्लाम का बिरवा मुहम्मद के ही ज़माने में भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित केरल में आया। तत्कालीन शासक की अनुमति से वहाँ एक मस्जिद भी बनी थी। यह 629 ई. की घटना है, यानी मुहम्मद के मदीना जाने के सात साल बाद, मुहम्मद की मौत इसके तीन साल बाद हई। उस वक़्त चेरामन पेरुमल चेर देश के राजा थे और उनकी अनुमति से यह मस्जिद बनी थी। यही कारण है कि उसे चेरामन जुमा मस्जिद कहते थे।
“इसके कोई 83 साल बाद मुहम्मद-बिन-कासिम ने अधिकार जमा लिया। यह भारत में मुस्लिम कॉलोनी बनने की शुरुआत थी। उसके बाद गजनी के महमूद और गोर के मुहम्मद के हमलों के रूप में इस्लाम की टक्कर भारतभूमि से हुई। 1192 ई. में जब तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की हार हुई और कुछ साल बाद दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ी, तब पश्चिमी भारत से लेकर पूर्वी गौड़ देश तक और शिवालिक से लेकर दक्कन के किनारे तक किसी न किसी रूप में भारतीय समाज इस्लाम से परिचित हो गया। इस्लाम का यह आना नहीं, बल्कि उसका आक्रमण था। आना तो अरब व्यापारियों द्वारा मुहम्मद के ज़माने में हुआ था।”
बसवन्ना, ख़ुसरो और कबीर
बसवन्ना का प्रभाव उत्तर भारत के पूरे भक्ति आंदोलन पर परिलक्षित है, किंतु शायद ही इसकी सम्यक व्याख्या भक्ति आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में कभी की गई है। बसवन्ना को समझे बग़ैर कबीर और नानक को भी समझना मुश्किल है। द्रविड़ भूमि से भक्ति की यही लहर उत्तर की ओर हहराती हुई आती हैं और पश्चिम के पंजाब से लेकर पूरब के बंगाल तक को प्रभावित कर जाती है। बसवन्ना की एक कविता जिसे कन्नड़ में याचना या वचन कहा गया है—
“अमीर बना लेंगे मंदिर शिव का मैं ग़रीब करूँगा क्या!
मेरे पाँव ही खंबे शरीर ही मंदिर मेरा सिर शिखर का मंगल-कलश सोने का
सुनो, कुडाल संगम देव चीज़ें जो आज खड़ी हैं, गिरेंगी बचेंगी केवल वे जो चलायमान हैं...”
जब तुर्क ताक़तें भारत पर काबिज़ हईं तब केवल सत्ता और धन के लालची और हिंसक खूँखार जाहिल लड़ाके ही नहीं आए, कुछ दूसरे लोग भी आए जिनकी रुचि मारकाट और लूट-पाट की जगह, ज़िंदगी में थी, जीवन दर्शन में थी। “जिन ईरानियों ने जबरन दबाव में इस्लाम क़ुबूल लिया, वे भी अपने स्वभाव कैसे बदल सकते थे। इन लोगों ने इस्लाम को अपनी तरह से आत्मसात कर उसका एक नया रूप-ढंग विकसित किया। इसी का एक रूप सूफ़ीवाद था, जो जब भारत में आया, तो वेदांत के फ़लसफ़े और बौद्धों के ध्यान से भी जुड़ गया और सब मिलाकर एक ऐसी रूहानी चीज़ बन गई जिसमें पूरे एशिया की ख़ूबियाँ और ईरानी-अरबी-हिंदुस्तानी फ़लसफ़ों की बारीक़ियाँ गुँथी हुई थीं। हिंदुस्तान के गाँव-क़स्बों और नगर-डगरों में यह सूफ़ीवाद आहिस्ता-आहिस्ता फैलता चला गया। इसका फैलाव तलवार के बूते नहीं, प्यार मुहब्बत भरे क़व्वाली और दुआओं से भरे ताबीज़ों के बूते हुआ। धीरे-धीरे यह हिंदुस्तानी रस्मों-रिवाज़ और तहज़ीब का एक हिस्सा बन गया। सूफ़ी-संत, जिन्हें औलिया कहा जाता था, के मक़बरे या मज़ार इन आस्थाओं के केंद्र बनते चले गए और यहाँ हिंदू-मुसलमान का कोई भेद न रहा। यह हिंदुस्तान की एक नई-ताज़ा संस्कृति थी। यह हिंदू-मुसलमान की मिली-जुली कोई साझा संस्कृति नहीं थी। एक नई तीसरी चीज़ थी, जो न हिंदू थी, न इस्लाम। यह इंसानियत की संस्कृति थी।”
अबुल हसन यामीनुद्दीन ख़ुसरो (1253-1325 ई.) या अमीर ख़ुसरो इस संस्कृति की बुनियाद रखनेवालों में अग्रणी थे। उनके पिता अमीर सयुमुद्दीन महमूद लाचन जाति के तुर्क थे, जो मंगोलों के हमलों से भाग कर भारत आए थे। दिल्ली में उन्होंने शरण ली और ऐसा लगता हैं फिर उत्तर प्रदेश के एटा ज़िले के एक गाँव पटियाली में उन्हें जीवन-यापन का कुछ आधार मिल गया। वह वहाँ जा बसे। तब बलवन का राज चल रहा था। अमीर ख़ुसरो को विरासत में पिता की ओर से ईरानी और माँ की ओर से हिंदुस्तानी तहज़ीब मिली थी। बालक ख़ुसरो का अधिक समय ननिहाल में बीता, जहाँ उन्होंने ओहदेदार नाना के रुतबे और लाचारगी को देखा होगा। पिता के बसाव पटियाली में उन्होंने किसानों, पनिहारिनों, जोग-जोगीनियों से लेकर कुएँ, पोखर, सरसों के खेतों और आकाश में घुमड़ते आवारा बादलों को देखा होगा। माँ की ब्रज बोली ज़ुबान में अपने अनुभवों को जब गुनगुनाया, तब लोगों ने उन्हें शायर कहना शुरू किया। कहते हैं बीस की उम्र तक वह काम भर मशहूर हो गए थे। दरबार तक उनकी ख्याति पहुँची और राज्याश्रय भी मिल गया। तबीयत से थोड़े अहदी और ख़ूबसूरत मिजाज़ ख़ुसरो जानते थे कि ज़िंदगी जीनी है और उसके तरीक़ों को अपनाना है। उनका मन राजकाज में लगे-न-लगे, उसके तरीक़ों को उन्होंने मंजूर किया और ज़िंदगी भर उससे रिश्ता बनाए रखा। “रूहानी तौर पर वह दिल्ली के हज़रत निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे और शायद यह उनकी ही सीख थी कि आमजन से जुड़ो और जो दिखे वह लिखो। ख़ुसरो ने जीवन भर यही किया। जनता के राग-रेशे से गहराई से जुड़े और जो देखा, सो लिखा। उन्होंने ‘सकल बन फूल रही सरसों’ के गीत गाए और, ‘जो पिया आवन कह गए, अजहुँ न आए’ के मर्म रेखांकित किए। स्वाइयाँ लिखीं, ख़याल, ग़ज़ल, क़व्वाली रची। ब्रजबोली, हिन्दवी, फ़ारसी को एक में मिलाकर मथ डाला और खड़ी बोली का एक साहित्यिक ठाट तैयार कर दिया। ढोलक अथवा मृदंग को आधा काट डाला और तबला बना दिया। पुरानी दुनिया की वीणा को सुधार कर सितार बना दिया। भारतीय और ईरानी रागों को मिलाकर खैल ईमान, जिल्फ और साजगरी के सुर सजाए। आईने सिकन्दरी, मजनूँ-लैला, मल्लोल अनवर, हज-विहिश की ज़िल्दें रच दीं। सब मिलाकर आने वाले हिंदुस्तान ही मुहब्बत थी।”
कबीर की बात ही क्या करें। भारत की विचार परंपरा के आधार स्तंभों में से एक। कबीर सबसे अधिक पढ़े जाते रहे हैं। उनकी तासीर जाती ही नहीं। शायद जिसकी तासीर कभी ख़त्म न हो वही कबीर है। प्रेमकुमार मणि उद्धृत करते हैं : “मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारै, क्या साहब तेरा बहिरा है चींटी के पग नेउर बजता, सो भी साहेब सुनता है। पंडित होके आसन मारै, लंबी माला जपता है। अंतर तेरे कपट कतरनी, सो भी साहब लखता है।”
और यह भी : “मस्जिद में दस दरवाज़े, द्वार-द्वार पर सुर रखवारे, तिनकी दहशत क्यों नहीं मानै, ऐसा क्या मतवाला है। इस मस्जिद में तीन कंगूरा, पंडित जानैगा कोई पूरा राम रहीम तिन्हो ने घेरा, जिसके ऊपर बैठा है। वह सबके ऊपर वाला है।”
एक कविता में उनका ईश्वर उनसे कहता है—
“मोको कहाँ ढूँढ़े बन्दे मैं तो तेरे पास में ना मैं मंदिर, ना मैं मस्जिद, ना काबे-कैलास में ना तो कोनो क्रिया-कर्म में, नहीं जोग-बैराग में खोजि होय तो तुरतै मिलहौं, पल भर की तलास में कहत कबीर सुनै भाई साधो! हर साँसों की साँस में।”
राजा राममोहन राय और जोतिबा फुले
बंगाल में 1772 तक मुगलों द्वारा स्थापित क़ानून चलता रहा था, 1773 में रेगुलेटिंग एक्ट बनने और लागू होने के बाद मुग़ल राजकाज की प्रणाली ख़त्म हो गई। ठीक 1772 में ही राममोहन राय का जन्म कलकत्ता से लगभग 100 किलोमीटर दूर एक गाँव राधानगर में हुआ। उस ज़माने में पढ़ाई की जो व्यवस्था थी उसमें उन्होंने पढ़ाई की। बाद में पटना के एक मदरसे में आकर अरबी-फ़ारसी की शिक्षा हासिल की और इसके बाद बनारस जाकर संस्कृत का भी अध्ययन किया। वह किसी सम्प्रदाय विशेष से बंध कर रहने के समर्थक नहीं थे। उनकी इच्छा यही थी कि हिंदूजन ख़ासकर है। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘ब्राह्मणिकल मैगज़ीन’ का संपादन-प्रकाशन किया था। वह चाहते थे कि ब्राह्मणजन विश्व की बदली हई परिस्थितियों को समझें अन्यथा उनका अंत निकट है। वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1816 में पहली बार अपने लेखन में हिंदूइज्म (Hinduism) शब्द का व्यवहार किया। “हिंदू धर्म के अमानवीय पक्षों से लड़कर वह उसे एक ऐसी शक्ति के रूप में परिणत करना चाहते थे जो आधुनिक दुनिया की चुनौतियों को सँभाल सके। स्त्रियों की मुक्ति और उनके प्रति संवेदनशीलता उनके सोच का केंद्रीय पक्ष था। सती प्रथा के विरुद्ध उनकी ज़ोरदार आवाज़ का महत्त्व बना रहेगा।”
महाराष्ट्र में अपनी आवाज़ बुलंद करनेवाले जोतिबा फुले (1827-1890) तब केवल छह वर्ष के थे, जब राममोहन का निधन हुआ था। 1827 में महाराष्ट्र के पुणे में एक माली-कुनबी परिवार में जन्मे जोतिबा की पृष्ठभूमि राममोहन से बिल्कुल अलग थी। न वह राजा थे, न राय, बल्कि एक ऐसे अनपढ़ माली परिवार से थे, जहाँ पढ़ना तक सामाजिक अवज्ञा थी, विद्रोह था। जोतिबा के पिता गोविंदराव सीधे-सादे और कुछ दब्बू स्वभाव के किसान थे। माँ बचपन में ही मर गई थीं। बड़ी बहन सगुणाबाई ने जोतिबा का लालन-पालन किया। पढ़ाई की उम्र में वह स्कूल जाने लगे, जहाँ उनकी प्रतिभा की प्रशंसा शिक्षकों ने की। लेकिन किसी शूद्र माली का स्कूल में पढ़ना सामाजिक रूप से मना था। ब्राह्मणों ने इस पर ऐतराज जताया कि कोई शूद्र बालक पढ़ कैसे सकता है। जोतिबा के पिता पर इतना दबाव हुआ कि उन्होंने अपने बेटे को स्कूल से हटा लिया। बाद में पादरी लिजीट से जोतिबा की मुलाक़ात हुई और एक मिशनरी स्कूल में उसने फिर से नामांकन लिया। यहाँ ब्राह्मणों का कोई ज़ोर नहीं था। पढ़ाई में तीक्ष्ण बुद्धि के जोतिबा ने मैट्रिक की परीक्षा समय पर पास कर ली। इससे अधिक पढ़ाई की व्यवस्था तब महाराष्ट्र में नहीं थी।
प्रेमकुमार मणि कहते हैं जोतिबा को राममोहन की अगली कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए जो एक क़दम आगे जाकर दलित और मातहत के प्रश्न उठाते हैं। राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया था, जोतिबा ने स्त्रियों के लिए ज्ञान की ज्योति जलाई। “मुक्ति के संदेश को शूद्रों, किसानों और दस्तकारों तक ले गए। समाज में काफ़ी विरोध हुआ, अनेक तरह के अवरोध खड़े हुए ब्राह्मणों और नवाबों के, किंतु जोतिबा और उनकी पत्नी सावित्री अडिग रहे। सावित्री को भारत की पहली शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है। जोतिबा ने महाराष्ट्रीय भक्ति आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे अपने ज़माने के अनुरूप सामाजिक-राजनीतिक मामलों से प्रगल्भ किया और सामाजिक विभेदकारी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरुद्ध सीधा हमला बोल दिया। बंगाल में राममोहन ने ब्राह्मणों को संबोधित किया था कि अँग्रेज़ों के आगमन को एक अवसर के रूप में लो; अपनी मुक्ति के लिए उठ खड़े होओ। वह अपनी तरह से मानवतावादी समाज के निर्माण की ओर बढ़ रहे थे। ...जोतिबा ने भी ब्रह्मसमाज की तरह सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी, जिसके उद्देश्य कहीं व्यापक थे। हिंदू धर्मशास्त्रों की जोतिबा ने तीखी आलोचना की, क्योंकि उनकी नज़र में ये सब धूर्त ब्राह्मणों के प्रपंच हैं। किसानी और दस्तकारी के पेशे से जुडे लोगों को धर्म की जगह आधुनिक विचारधारा से जोड़ने की उन्होंने भरसक कोशिश की।”
ग़ुलामगिरी और आनंदमठ
लेखक इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए ज्योतिबा फुले की किताब ‘ग़ुलामगिरी’ के मर्म को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के ‘आनंदमठ’ से तुलना करके समझाना चाहते हैं। ‘ग़ुलामगिरी’ 1873 ई. में मराठी में छपी और ‘आनंदमठ’ जबकि 1882 ई. में प्रकाशित हुई। आर्य प्रभुत्व का विवरण जोतिबा के शब्दों में उद्धृत करना ही अधिक उपयुक्त होगा—“आर्य सिर्फ़ अप्रवासी के रूप में उपनिवेश बनाने के लिए नहीं, बल्कि आततायी बनकर आए। प्रतीत होता है यह ऐसी नस्ल थी, जो अपने अहंकार में डूबी हुई थी। वे धूर्त, घमंडी तथा धर्मांध भी थे। आर्य और भूदेव जैसी आत्मप्रशंसक तथा आत्मगौरव से भरी उपाधियाँ, जो उन्होंने स्वयं को दे रखी हैं, के कारण हमारे मन में उनके आरंभिक व्यवहार के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता। इसी व्यवहार को उन्होंने वर्तमान समय में भी बेहतरी की बहुत कम गुंजाइश के साथ संजोकर रखा है। आर्यों ने मूलनिवासियों को या तो अधीन किया या फिर उन्हें विस्थापित होने के लिए मजबूर किया। लेकिन आदिवासियों ने जिस अंदाज़ से आर्य घुसपैठियों का मुक़ाबला किया, उससे ऐसा मालूम होता है कि वे काफ़ी मजबूत शरीर वाले और साहसी लोग थे। आर्यों ने उन्हें शूद्र, महार, नीच जन्मा अन्त्यज, चांडाल आदि ऐसे अपमानजनक नाम दिए, उससे निश्चित तौर पर ऐसा लगता है कि शुरू में इन लोगों ने आर्यों के यहाँ बसने का पुरज़ोर विरोध किया होगा, जिसकी वजह से आर्य उनसे इतनी नफ़रत करते थे। पीढ़ियों से चले आ रहे कुछ रीति-रिवाजों तथा ब्राह्मणों के धर्म ग्रंथों में वर्णित पौराणिक कथाओं से यह स्पष्ट होता है कि इन दो नस्लों में वर्चस्व के लिए कठोर संघर्ष हुए थे। ब्राह्मण ग्रंथों में देवों और दानवों के बीच की लड़ाइयों की जो अनगिनत कथाएँ बिखरी पड़ी हैं, उनका संबंध इसी संघर्ष से है। यही कारण था कि जिन मूलनिवासियों के ख़िलाफ़ ये ब्राह्मण लड़े, उन्हें राक्षस के नाम से पुकारा गया, क्योंकि वे अपनी ज़मीन (मातृभूमि) के रक्षक थे...”
‘आनंदमठ’ एक सुगठित औपन्यासिक रचना है और इसकी भाषा भी परिष्कृत है। यह बांग्ला भाषा में लिखी गई है। इसी उपन्यास में ‘वंदे मातरम्’ का वह प्रसिद्ध गीत है जो राष्ट्रीय आंदोलन पर तो छाया ही रहा देश की आजादी के बाद उसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त हुआ। ‘आनंदमठ’ की कथा रचना का आधार 1770 में आया हुआ बंगाल का भयावह अकाल है, जिसके कारण कहते हैं, वहाँ की एक-तिहाई आबादी को असमय भूखों मर जाना पड़ा था। यह वह समय था जब बंगाल में द्वैध शासन था। मालगुज़ारी वसूलने का अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी के पास था और सत्ता मीरजाफ़र और उसके वंशजों के हाथ। सिराजुद्दौला की पराजय 1757 में यूँ ही नहीं हुई थी। प्लासी युद्ध, जो कुछ ही घंटे चला था, में सिराजुद्दौला के 60 हज़ार सैनिकों को कंपनी के तीन हज़ार सैनिकों ने हरा दिया था। राष्ट्रवादी आधुनिक इतिहासकारों ने इस हार के लिए अँग्रेज़ों की धूर्तता और मीरजाफ़र की गद्दारी को आगे करके इसके मूल कारणों को छुपा लिया है। सिराजुद्दौला और उसके पूर्व का अलीवर्दी ख़ान कोई लोकप्रिय शासक नहीं था।
उपन्यास में वर्णित इस संन्यासी-विद्रोह का इष्ट अँग्रेज़ी राज का अंत नहीं, मुसलमानी शासन का अंत है। हिंदुओं के पास शक्ति कम है, लेकिन संख्या है। संन्यासी लोग मजबूत शरीर वाले हिंदुओं को किसी तरह मठ में दीक्षित करते हैं और उन्हें युद्ध और शस्त्र संचालन की शिक्षा भी देते हैं। गाँव-गाँव घूमकर ये संन्यासी ऐसे बच्चों को चुरा कर लाने से भी परहेज नहीं करते जो संन्यासी सह-सैनिक बनने की दक्षता रखते हैं। इसीलिए इन संन्यासियों को ‘बच्चा चोर’ भी कहा जाता था। संन्यासियों की खुली घोषणा है—“हम राज्य नहीं चाहते। ये मुसलमान अब ईश्वर विद्वेषी हो गए हैं, इसलिए इनका संहार करना चाहते हैं।” ‘आनंदमठ का हर सदस्य अपने को संतान सम्प्रदाय का सदस्य बताता है। सबके सब मातृभूमि की संतान हैं और उनका राष्ट्रगीत है ‘वदे मातरम्’; हर हमले और अभियान में वे उसका गान करते हैं। संतान सम्प्रदाय जाति भेद को नहीं मानता और अंतरवर्णीय विवाहों का औचित्य बताता है। जोतिबा भी इसी तरह जाति भेद का विरोध करते हैं। फुले के जाति विरोध का उद्देश्य शूद्र एकता है और बंकिम के जाति विरोध का उद्देश्य हिंदू एकता।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के विचार परंपरा का शीर्ष बिंदु है। 1857 के विद्रोह के 28 साल बाद बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में क्रिसमस (25 दिसंबर) के रोज़ भारत के विभिन्न हिस्सों से आए 72 प्रतिनिधियों की एक सभा बिना किसी शोर-शराबे के संपन्न हुई और इस मजलिस का नाम दिया गया—इंडियन नेशनल कांग्रेस। “आज यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल होगा कि उस समय जो मुल्क के हालात थे, उसमें ऐसी किसी संस्था की स्थापना कितनी बड़ी बात थी। बंबई प्रेसीडेंसी एसोशिएशन ने इस सभा के आयोजन का दायित्व निभाया था। कलकत्ता के जाने-माने वकील और बुद्धिजीवी व्योमेशचंद्र बनर्जी जिन्हें डब्ल्यू.सी. बनर्जी के नाम से भी जाना जाता है, इस कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुए। अत्यंत ही राजभक्ति भरे वातावरण में नरम शब्दावली में ब्रिटिश हुकूमत से भारत में उसकी सरकार के साथ हिंदुस्तानियों की समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने की प्रार्थना की गई। इसके साथ ही क़ानून बनानेवाली कौंसिल के सदस्यों को चुनकर आने के प्रावधान की माँग की गई। निश्चित ही कोई हंगामा नहीं हुआ और न ही कोई राजनीतिक या सामाजिक आलोड़न, लेकिन स्थिर समय को एक मामूली-सा ही सही आवेग अवश्य मिला।”
रवींद्रनाथ ठाकुर का उपन्यास गोरा
रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941) का उपन्यास ‘गोरा’ 1909 में प्रकाशित हुआ। अन्य आधुनिक भारतीय भाषाओं की तरह बांग्ला के उत्त्थान का भी वह उषा काल था, यानी अपने विकास के वह प्रथम चरण में ही थी। अपने पूर्व के बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय जैसे महत्त्वपूर्ण लेखक की विरासत उन्हें ज़रूर हासिल थी; लेकिन सबसे बड़ी सांस्कृतिक थाती उन्हें जो मिली थी वह बंगाल के मध्यवर्ग में उभरे उस वैचारिक आंदोलन की, जिसे बांग्ला नवजागरण कहते हैं। इस वैचारिक आंदोलन ने बांग्ला जन-जीवन में, विशेषकर उसके भद्रलोक में एक उथल-पुथल मचा दी थी। मध्ययुगीन विचारों पर सवाल उठाए जा रहे थे और कुछ विशिष्ट किस्म के लोग एक वैश्विक सोच से अनुप्राणित हो रहे थे, जिसके तहत उनका भारत विश्व से अलग-थलग नहीं, उसका एक हिस्सा था और उसकी नियति उससे जुदा नहीं हो सकती थी।
किताब से गुज़रते हुए आप इन पंक्तियों पर ठहर जाते हैं : “तुम्हारी जात नहीं है, तुम ऊँच-नीच का विचार नहीं करती, घृणा नहीं करती—तुम केवल कल्याण की प्रतिमा हो। तुम मेरा भारतवर्ष हो! माँ, अब तुम लछमिया को बुलाओ—उसे कहो मुझे पानी पिला दे।” रवींद्रनाथ ठाकुर ने जिस भारतवर्ष का सन्धान किया है, यह बंकिमचंद्र के ‘आनंदमठ’ के ‘वंदे मातरम्’ चिह्नित भारतवर्ष से कहीं आगे का है, मानवीयता से निमंत्रित और करुणा से परिष्कृत। यह भारत मानवीय, संस्कृत और वैश्विक दृष्टि से संपन्न है। यह नफ़रत और संकीर्णता से मुक्त भारत है, जिस पर किसी का वर्चस्व नहीं, सबके लिए करुणा है।
मोहनदास से गांधी तक
अगर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस विचार परंपरा का शीर्ष बिंदु है तो उस बिंदु पर शीर्षस्थ हैं। प्रेमकुमार मणि लिखते हैं : “मोहनदास करमचंद गांधी का परिचय देने में शब्दों की बर्बादी अपराध ही होगा। क्योंकि भारतीय काव्य परंपरा में शब्द को ब्रह्म जैसा महत्त्वपूर्ण माना गया है और उसके दुरुपयोग की मनाही है। ...कार्ल मार्क्स कहा करते थे, मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ, और गांधी ने भी गांधीवाद जैसी किसी चीज़ को कभी स्वीकार नहीं किया। वह कहते थे मेरा जीवन ही मेरे विचार हैं। जीवन से मतलब उनकी जीवन-शैली यानी कर्म थे। वह कर्म पर विश्वास करते थे और उस वायवीय विचार या विचारों की सरणी का उनके लिए कोई महत्त्व नहीं था, जिन्हें कभी ज़मीन पर उतारा न जा सके।” मणि, गांधी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ की चर्चा करते हुए कहते हैं कि किसी शुरू में उनके हीयूरी गोपाल कृष्ण गोखले और तब के प्रखर युवा नेता जवाहर लाल नेहरू को भी इसमें कुछ ख़ास नहीं लगा। लेकिन गांधी जब महात्मा गांधी बने तो इस किताब को गंभीरता से लिया गया। इस किताब में गांधी यूरोपीय तकनीक, ख़ासकर औद्योगिक क्रांति से उपजी मशीनी संस्कृति, इंग्लैंड के संसदीय लोकतंत्र और मॉडर्न साइंस की समीक्षा करते हैं और उन्हें पूरी तरह खारिज करते हैं। अपने आकार और ओज में ‘हिन्द स्वराज’ की तुलना कार्ल मार्क्स के कम्युनिस्ट घोषणा पत्र से की जा सकती है, जो इससे कोई 61 साल पहले 1848 में लंदन में जारी किया गया था। “मार्क्स और गांधी, पश्चिम और पूरब के दो विचारक, औद्योगिक पूँजीवादी सभ्यता के आलोचक हैं। दोनों ने अपने-अपने तरीक़े से पूँजीवादी सभ्यता की आलोचना की है। मार्क्स ने पूँजीवादी संकट के आरंभिक रूप को अपने यूरोप में देखा था। इतिहासकारों ने औद्योगिक क्रांति को 1760 से 1850 यानी कुल 90 वर्ष तक फैला हुआ स्वीकार किया है। कम्युनिस्ट घोषणा पत्र इसकी अवधि में ही आया।”
गांधी की कल्पना में एक विकसित गाँव था। वह इसे यूँ रखते हैं—“ग्राम स्वराज की मेरी कल्पना यह है कि ग्राम एक ऐसा पूर्ण गणतंत्र हो, जो अपनी मुख्य ज़रूरतों के लिए अपने पड़ोसियों पर निर्भर न हो, और फिर भी दूसरी बहुतेरी ज़रूरतों के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हो, जिसमें दूसरों पर निर्भरता ज़रूरी है। इस तरह हर एक गाँव का पहला काम यह होगा कि वह अपनी ज़रूरत का अनाज और कपड़े के लिए कपास ख़ुद पैदा कर ले। उसके पास अपने पशुओं के लिए चरागाह और गाँव के वयस्क व्यक्तियों और बच्चों के लिए मन बहलाव और खेल-कूद के मैदान होने चाहिए। ...हर एक गाँव में अपना एक नाटक घर, एक पाठशाला और एक सभा भवन होगा। पानी के लिए अपना इंतजाम होगा— पानी कल होंगे—जिससे गाँव के सभी लोगों को पीने का शुद्ध पानी मिलेगा। गाँव का शासन चलने के लिए हर साल गाँव के पाँच आदमियों की एक पंचायत चुनी जाएगी। बालिग स्त्री-पुरुषों को इस पंचायत को चुनने का अधिकार होगा।” ये ग़ौरतलब है कि जात-पात पर टिके हुए गाँव के लिए गांधी एक पाठशाला, एक सभा भवन की बात करते हैं। अर्थात् उनका ग्राम-स्वराज अलग-अलग जाति-पंचायतों का निषेध करता है। शिक्षा, कला और आधुनिक सुविधाओं, जैसे शुद्ध पेय जल के लिए पानी कल की बात करके वह एक विकसित, समृद्ध गाँव की बात करते हैं। एक ऐसा गाँव जो शहर की भीड़-भाड़ और कोलाहल से मुक्त हो और जहाँ विकास ऐसा बेलगाम न हो, जिससे विलासितापूर्ण जीवन को बल मिले।
सावरकर और उनका हिंदुत्व
‘आनंदमठ’, ‘हीओरा’ और फिर ‘हिंद स्वराज’ के हिंदू की तुलना विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) के हिंदुत्व से किए बिना बात अधूरी रह जाएगी। सावरकर का हिंदुत्व व्यापक हैं, लेकिन उनकी समस्या यह है कि हिंदू उनके लिए सिर्फ़ एक मत या धर्म नहीं है, पूरा राष्ट्र है। “उनकी दृष्टि में बौद्ध, शैव, वैष्णव, सिक्ख, जैन, लिंगायत आदि इसके सम्प्रदाय हैं, जो भारत-भूमि में विकसित हए हैं और ये सब हिंदू किसी उपासना पद्धति से जुड़ना आवश्यक नहीं है। हममें से कोई आर्य है, तो हैं। यहाँ तक कि नास्तिक भी हिंदू हैं, अर्थात् हिंदू होने के लिए आस्तिक होना, कोई अनार्य, कोई अय्यर है तो कोई नायर। वे सभी हिंदू ही थे, अतः इनमें जो रक्त प्रवाहित होता रहा, वह भी हिंदू रक्त था और है। हममें से कोई नमः शूद्र है तो कुछ ब्राह्मण। किंतु ब्राह्मण से चांडाल तक में एक ही हिंदू रक्त प्रवाहित हो रहा है। हममें से कोई दाक्षिणात्य है तो दूसरा गौड़, पर कोई गौड़ हो अथवा सारस्वत, किंतु उसमें एक ही हिंदू रक्त का संचार हो रहा है।” प्रेमकुमार मणि आगे लिखते हैं, सावरकर का अंतर्विरोध यह है कि वह आर्य और अनार्य मिलाकर पुराने ज़माने में एक राष्ट्र तो बना रहे होते हैं, किंतु आधुनिक ज़माने में, अपने समय में, हिंदू-मुस्लिम, ईसाई-पारसी को एक राष्ट्र रूप में बाँधने में उन्हें कठिनाई हो रही है।
लेखक अपने चुनाव को लेकर स्पष्ट है : “गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ और सावरकर के हिंदुत्व में एक बड़ा भेद है। गांधी का हिंदू विनम्र है। उसमें दूसरों के साथ सहअस्तित्व की इच्छा है। लेकिन सावरकर का हिंदू अतिरिक्त रूप से जाग्रत और सतर्क है। वह आंतरिक और बाह्य दोनों स्तरों पर एक भय का अनुभव करता है। इस कारण उसे आवश्यक लगता है कि हिंदुओं का सैन्यीकरण किया जाए, जैसे मुसोलिनी को लग रहा था कि इटली का सैन्यीकरण किया जाए। हिंदुत्व लिखे जाने के बस साल भर पहले मुसोलिनी इटली में सत्तासीन हुआ था, ऐसे में सावरकर का चेतन-अवचेतन उससे प्रभावित हो, यह संभव है।”
आम्बेडकर और दलित प्रश्न
आम्बेडकर के एक अभिभाषण की चर्चा करते हुए, प्रेमकुमार मणि उन्हें उद्धृत करते हैं—“मैंने हिंदुओं की आलोचना की है, मैं, महात्मा गांधी की सत्ता के आगे भी, जिन पर उनकी श्रद्धा है, प्रश्नचिह्न लगाए हैं। हिंदू मुझसे घृणा करते हैं, मुझे अपने बग़ीचे का साँप मानते हैं। निस्संदेह राजनीतिक दिमाग़ वाले हिंदू भी मंडल से जवाब-तलब करेंगे कि उसने इस प्रतिष्ठित स्थान के लिए मुझे ही क्यों चुना है।” अभिभाषण के दूसरे बिंदु में राजनीतिक सुधारों के लिए सामाजिक सुधारों को आवश्यक बतलाते हुए, भारतीय राजनीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की विवेचना है और तीसरे बिंदु पर इस बात की समीक्षा की गई है कि आर्थिक सुधारों के लिए भी सामाजिक सुधारों की ज़रूरत क्यों है। वह समाजवादियों से मुख़ातिब होते हुए पूछते हैं—“क्या समाजवादी सामाजिक व्यवस्था से उत्पन्न होनेवाली समस्या को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं? भारत के समाजवादी, अपने यूरोपीय साथियों का अनुकरण करते हुए भारतीय तथ्यों पर इतिहास की आर्थिक व्याख्या को लागू करना चाह रहे हैं। वह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य एक आर्थिक प्राणी है, उसकी गतिविधियाँ और आकांक्षाएँ आर्थिक तथ्यों से बँधी हैं और सम्पत्ति ही शक्ति का एकमात्र स्रोत है। इसलिए उनका आग्रह है कि आर्थिक सुधार के बिना राजनीतिक और सामाजिक सुधार केवल बड़े भ्रम हैं, और किसी भी अन्य सुधार के पहले ज़रूरी है कि सम्पत्ति की बराबरी को ध्यान में रखकर आर्थिक सुधार किया जाए। इन तर्कों पर ही समाजवादियों की यह धारणा टिकी है कि आर्थिक सुधार को दूसरे सभी सुधारों की तुलना में प्राथमिकता देनी चाहिए। ...आर्थिक शक्ति ही मूल शक्ति है, यह मानव-समाज का कोई भी विद्यार्थी स्वीकार नहीं कर सकता।”
अभिभाषण के अगले हिस्से में वह धर्म की शक्ति की विवेचना विस्तार से करते हैं—“धर्म शक्ति का स्रोत है, इसके तमाम उदाहरण भारतीय जनजीवन में मिलते हैं, जहाँ जन साधारण पर पंडों-पुजारियों की पकड़ प्रायः मजिस्ट्रेट से अधिक होती है। जहाँ हर चीज़, यहाँ तक कि हड़ताल और चुनाव भी इतनी आसानी से एक धार्मिक मोड़ ले लेते हैं और इतनी ही आसानी से उन्हें धार्मिक मोड़ दिया जा सकता है।”
आम्बेडकर की विचार परंपरा सिर्फ़ संविधान निर्माता होने तक नहीं टिकी है, वरन् उन्होंने पूरे दलित विमर्श को बदल दिया। उनकी किताब ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कॉस्ट’ प्रश्न पूछते रहेगी। डॉ. राममनोहर लोहिया ने भी जाति तोड़ने की बात की थी, लेकिन वर्ग और जाति के बीच फँसकर उनका समाजवाद भटक गया। लोहिया और आम्बेडकर एक साथ आते तो भारतीय इतिहास की धारा कुछ और ही होती।
जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस
सुभाष चंद्र बोस (1897-1945) और जवाहरलाल नेहरू (1889-1964) युवाओं के दिल-दिमाग़ पर छा गए थे। जब कांग्रेस के बूढे और जमे हुए अधिकांश नेता बदल रही दुनिया और ज़माने को समझ नहीं पा रहे थे। उनके दिल-दिमाग़ पर सोच की एक पुरानी-मैली चादर पसरी थी और नई बातें उनकी समझ के बाहर थीं। गांधी ने अपने तरीक़ों से उन्हें कुछ साहसी बनाने का प्रयास ज़रूर किया था, उन्हें उनके आरामगाहों से खींचकर किसानों-मज़दूरों के बीच ले गए और यदा-कदा जेल की चहारदीवारी के भीतर भी भिजवा दिया, लेकिन अपनी तबीयत से ये सब सुरक्षित जीवन जीनेवाले लोग थे, जो सुंदर शैली में प्रतिवेदन लिख सकते थे और दस्तावेज़ तैयार कर सकते थे। 1920 में असहयोग आंदोलन की विफलता का बड़ा कारण यह था कि उसके उद्देश्यों के साथ जिस समर्पण की ज़रूरत थी, उसका कांग्रेसियों में अभाव था। प्रेमकुमार मणि कहते हैं, नेहरू की बौद्धिकता ज़रूर सुभाष से ज़्यादा होगी लेकिन सुभाष की एक अलग ही लोकप्रियता थी।
‘भारत : एक विचार-परंपरा’ संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग पर समाप्त होती है। यहाँ पर संभव नहीं है कि पाँच हज़ार सालों के विचार परंपरा की तफ़सील से चर्चा की जाए। मैंने कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को उठाकर यहाँ किताब की एक विस्तृत झांकी सौंपी है। आगे की यात्रा आपको पूरी करनी है। इस किताब में कोई पूर्वाग्रह और दुराग्रह नहीं है। बस आग्रही बनकर किताब पढ़ी जाए, परत ख़ुद ही खुलती जाएँगीं। रही मेरी बात, मैं इस किताब को पढ़कर बहुत समृद्ध हुआ। इसकी भाषा शैली एक शिल्पी की है, जिसे शब्दों को ज़ाया करना नहीं आता। और जहाँ अलंकार चाहिए, ख़ुद चलकर आता है। विचार की परंपरा यूँ ही चलती रहे।
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