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‘स्मृति ही दूसरा समय है’ : परमानंद श्रीवास्तव पर हुई संगोष्ठी का हाल

‘स्मृति ही दूसरा समय है’—मंगलेश डबराल की यह काव्यपंक्ति मन में कौंध रही थी, हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक परमानंद श्रीवास्तव की याद में हो रहे गोरखपुर के आयोजन में जाते हुए। प्रेमचंद साहित्य संस्थान और 'साखी' पत्रिका द्वारा हिंदुस्तानी अकादेमी, परमानंद श्रीवास्तव स्मृति न्यास और रज़ा फाउंडेशन के सहयोग से हो रही बौद्ध संग्रहालय के यशोधरा सभागार में हो रही राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘परमानंद श्रीवास्तव : महत्व और अवदान’ में पूरे देश से लिखने-पढ़ने वालों का जुटान था। इन मुश्किल दिनों में इतने लोग केवल प्रेम और आदर के चलते किसी को याद करने के लिए इकट्ठा हों, यह वाक़ई रोमांचकारी तो है।

हॉल में परमानंद जी का परिवार मौजूद था, उनकी पत्नी ज्ञानवती जी, बेटियाँ—अपराजिता, अन्विता और श्रुति फिर उनके बच्चे और भी कई लोग। साहित्यिक दुनिया के तमाम लोग, उनमें से कई जो एक-दूसरे से लंबे अरसे बाद मिले थे।

थोड़े ही विलंब से शुरू हुए उद्घाटन सत्र का संचालन विश्वभारती में हिंदी की प्राध्यापिका श्रुति कुमुद कर रही थीं, उन्होंने ‘रोशनी’ कविता पढ़ते हुए नरेश सक्सेना को बुलाया। इसके बाद उन्होंने गोष्ठी के संयोजक सदानंद शाही को ढेर सारे विशेषणों से बुलाया, इस बीच यह बात फिर से याद आने लगी कि सेमिनार का पहला दिन स्वागत की औपचारिकताओं में चला जाता है और दूसरा दिन समापन की। उधर श्रुति कह रही थीं कि आलोचना दिल्ली केंद्रित हो रही थी लेकिन परमानंद जी ने गोरखपुर से अलख जगाए रखी। स्वागत गीत और वक्तव्य परमानंद जी की छोटी बेटी श्रुति श्रीवास्तव ने प्रस्तुत किया, वे अँग्रेजी की प्राध्यापिका हैं और हाल में ही एमिली डिकिनसन की कविताओं के अनुवाद की एक किताब आई है। स्मारिका विमोचित हुई, आवरण बहुत सुंदर है, पता चला इसे परमानंद जी के नाती ऋत्विक ने डिजाइन किया है, ऋत्विक ने ही उनपर केंद्रित एक वेबसाइट भी बनाई है। संजोना-बचाना तो हमेशा सुंदर-सुखकर ही लगता है।

सदानंद शाही ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि गोरखपुर से विस्थापित हुए मुझे पच्चीस साल हो गए। वे बताने लगे कि गोरखपुर आया तो परमानंद जी ने ‘भूल-ग़लती’ कविता पढ़ाई और सारी विचार-सरणियाँ जो गाँव से लेकर आया था वह हवा हो गईं, उन्होंने आधुनिकता के प्रति आकर्षण पैदा किया। इसी सिलसिले में शांता सिंह का नाम लेते हुए उनका गला रुँध गया। उन्होंने ठीक ही कहा कि अलग-अलग पीढ़ियों को साहित्य की नई भाषा सिखाने का काम परमानंद जी ने किया।

उद्घाटन-वक्तव्य कोलकाता से आए ‘वागर्थ’ के संपादक शंभुनाथ ने दिया। परमानंद जी को याद करते हुए उन्होंने कहा कि अपने जीवन और रचना से साहित्य में उन्होंने बहुत कुछ अर्थपूर्ण जोड़ा। वे बौद्धिक मिठास को लुटाते रहे और दूरियों को ध्वस्त करते रहे। रागदीप्त बौद्धिकता विभिन्नताओं के बीच पुल बनाती है, जिसकी बात परमानंद जी ने की। आलोचना ऐसी होनी चाहिए जो रचना से प्यार करे, उसे छुए, उसे सूंघे। यह समारोह परमानंद जी की सदेह अनुपस्थिति में उनको छूने का प्रयत्न है।

इस बीच कुर्सियाँ कम पड़ गईं और पीछे से आवाज़ें आने लगी। शंभूनाथ जी ने ‘आत्मा के अँधेरे’ की बात की और लाइट चली गई। इस बीच बात चलती रही कि परमानंद जी उन आलोचकों से अलग हैं जो नायक पूजा में लगे रहे इसीलिए उन्होंने नए लोगों पर निगाह रखी। आज रचनाकारों ने आलोचकों का इस्तीफ़ा मंज़ूर कर लिया है। हर साहित्यकार अनसुनी आवाज़ों का मूर्तिकार होता है। कई बार धीमी आवाज़ में भी महत्त्वपूर्ण बात कही जाती है ज़रूरी नहीं कि हल्लाबोल ही किया जाये।

अवधेश प्रधान बोलने आए और कहा कि आज भूलने का महाभियान ज़ोरों पर है। यह ज्ञान और संस्कृति के अपमान का दौर है। परमानंद जी लिखावट बड़ी सुंदर थी जैसे शिवपूजन सहाय की थी। वे निंदा में रुचि नहीं लेते थे। काशीनाथ सिंह के हवाले से उन्होंने कहा कि घूमना, घूमते हुए लिखना और लिखते हुए घूमना परमानंद जी से सीखना चाहिए। भूलने के विरुद्ध याद करना एक धर्मयुद्ध है।

नरेश सक्सेना आए और अपने चिरपरिचित अंदाज में बोले—ऐसा लग रहा है कि यह जगह जंतर-मंतर होती जा रही है। बहुत दिनों बाद किसी आयोजन में इतनी भीड़ दिखी। फिर शंभुनाथ की कही एक बात काटी कि कोई एक बार आलोचक हो जाए तो फिर कितना भी कविता लिख ले कवि नहीं हो सकता। फिर बोले कि हिंदी में पाठक हैं नहीं और लेखकों की कमी नहीं। आलोचक लेखकों के लेखक होते हैं इसलिए सारे लेखक उनको पढ़ते ही हैं।

इसके बाद पहला ‘परमानंद श्रीवास्तव स्मृति आलोचना सम्मान’ आलोचक रघुवंशमणि को प्रदान किया गया। रघुवंशमणि ने कहा कि इस पुरस्कार के मिलने से प्रसन्नता के कई व्यक्तिगत और सांस्कृतिक कारण हैं। उन्होंने जिन रचनाकारों को उनकी शुरुआत के समय पहचाना, आज वे बड़े लेखक हैं। उनसे पहली ही मुलाक़ात में मुझे लगा कि वे एक साधारण युवा लेखक को कितना महत्व देते थे। वे केवल नए लोगों पर लिखते भर नहीं थे बल्कि उन्हें उत्साहित कर अच्छा लेखक बनने की ओर आगे भी बढ़ाते थे। हिंदी की साहित्यिक संस्कृति की सजाने का काम परमानंद जी ने किया। उन्होंने नयी रचनाधर्मिता की प्रवृत्तियों को अत्यंत गहराई से रेखांकित किया है।

रामदेव शुक्ल ने कहा कि अक्सर अध्यक्ष के लिए बहुत कम समय बचा रहता है। परमानंद जी मेरे सीनियर थे। हम दोनों के गुरु आनंद प्रकाश दीक्षित थे। आज अख़बार में किसी नए कवि की कविता छप जाये तो अगले ही दिन उसकी समीक्षा परमानंद जी करते थे। परमानंद जी साहित्य के नहीं साहित्यकारों के निर्माता थे।

राजेश मल्ल के धन्यवाद ज्ञापन तक जाने क्यों मंच पर गर्मी बहुत बढ़ गई थी और संचालिका तथा नरेश सक्सेना काग़ज़ से पंखा झलने लगे थे। निराशा हुई कि परमानंद जी पर बनाई प्रदीप सुविज्ञ की फ़िल्म तकनीकी कारणों से नहीं चल पायी, कहा गया कि दूसरे दिन कोशिश करेंगे (हालाँकि दूसरे दिन भी नहीं ही चल पाई)

इस निराशा से उबरकर सब बाहर चाय और भोजन के लिए इकट्ठा हुए, जहाँ गर्मी और भीड़ हॉल से भी ज़्यादा थी। बाहर लगे किताबों के स्टाल पर शोधार्थी लड़के-लड़कियाँ बहुतायत में थे, जिनकी वजह से माहौल जीवंत लग रहा था।

दूसरे सत्र की शुरुआत में माइक लगातार शंख की तरह बज रहा था। मुमताज़ ख़ान ने परमानंद जी को छोटे शहरों के रंगमंच पर आधारित कार्यक्रम के बहाने याद किया। रविनंदन सिंह कहने लगे कि कुछ वक्ताओं ने कहा कि परमानंद जी साहित्य के अतिरिक्त विषयों में रुचि नहीं लेते थे (हालाँकि यह बात सही नहीं है)। बड़ा साहित्यकार पनडुब्बा होता है। प्रेमव्रत तिवारी बोले कि मैंने परमानंद जी से कहा कि मैं या तो आपके साथ शोध करूँगा या नहीं। इसकी व्यवस्था उन्होंने कर दी थी। अशोक वाजपेयी ने उनको तुरंता आलोचक कहा तो उन्होंने पलटकर उन्हें फ़िलहाल का आलोचक कह दिया था। नागेश राम त्रिपाठी ने कहा कि मैं यहाँ केवल सुनना चाह रहा था, मैं उनके साथ जीवन के अंतिम क्षण तक था। एक बार यात्रा के दौरान वे शाही जी के साथ थे तो उनका भोजन भी बनवा कर ले गए थे। अनामिका के काव्य-पाठ के बाद साहित्य अकादेमी में उन्होंने हौसला बढ़ाते हुए कहा था कि तुम बहुत आगे जाओगी।

मधुप कुमार ने कहा कि नामवर जी के व्याख्यान ‘सादगी का सौंदर्यशास्त्र’ और केदार जी की कविता ‘एक देहाती कार्यकर्ता के प्रति’ को यदि मिला दिया जाए तो परमानंद जी की छवि बनेगी। वे मेरे शोध कार्य के वाह्य परीक्षक थे। मैनेजर पांडे परमानंद जी को व्यंग्य में नामवर जी का संस्करण कहते थे, जबकि मैं उनको नामवर युग का सर्वश्रेष्ठ भाष्यकार मानता हूँ।

डॉ. उषा ने कुछ बातें परमानंद जी के और बहुत सारी बातें अपने बारे में साझा कीं। रंजना जायसवाल ने एक लिखा हुआ पर्चा पढ़ा जो शायद समालोचन या कहीं पहले छप चुका था। कृष्ण चंद्र लाल ने कहा कि परमानंद जी साहित्य के पारस पत्थर थे। उनका व्यक्तित्व साहित्यिक था, वे अपने वेश, चाल-ढाल और बातचीत में एक स्तरीयता बनाए रखते थे। मैं उनके साथ रिक्शे से आता-जाता था और वे सारे रास्ते एक ही बात करते थे—साहित्य की।

विश्वनाथ जी ने कहीं लिखा है कि परमानंद जी टनाटन बोलते हैं। उन्होंने एक मारके की बात कही कि परमानंद जी के इतना सब कर पाने में उनकी पत्नी का बड़ा योगदान है।

सीमा आज़ाद ने कहा कि परमानंद जी की कविताएँ अपने समय को जनपक्षीय ढंग से प्रकट करती हैं। उनका साहित्य राजनैतिक आशयों से संबद्ध दिखाई देता है। विभूति नारायण ओझा ने कहा कि परमानंद जी को थोड़ा दुश्मन भी पैदा करने चाहिए थे।

स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि मेरे कवि होने की निर्मिति में परमानंद जी का बड़ा योगदान है। वे कह रहे थे कि तारीख़ें बदलने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। ‘अगली शताब्दी के बारे’ में संग्रह से उन्होंने परमानंद जी की दो कविताएँ पढ़ीं। अनंत मिश्र ने कहा कि मैं साहित्य के लिए बदनाम होने वाले लेखक के रूप में परमानंद जी को याद करता हूँ। वे केवल मुहावरे में नहीं बल्कि जागतिक रूप में भी साहित्य ओढ़ते-बिछाते थे। सत्संगति कुछ देती है तो कई बार कुछ ले भी लेती है।

यह मैराथन सत्र था जिसने सबके धैर्य की प्रतीक्षा ले ली। वक्ता कुछ कम रहे होते तो ठीक था। हालाँकि मगध विश्वविद्यालय के युवा प्राध्यापक परम प्रकाश राय ने बहुत अच्छा संचालन किया।

इसके बाद एक और सम्मान-सत्र हुआ जिसमें अरुण कमल के हाथों शंभुनाथ को विमला देवी स्मृति सम्मान दिया गया। अरुण कमल ने कहा कि शंभुनाथ ने हमेशा असहमति का विवेक दिखाया है और हिंदी में व्यक्तिगत प्रयासों से ऐसे बड़े काम किए हैं जो कई बार संस्थाओं से भी संभव नहीं हो पाते। अवधेश प्रधान ने कहा कि शंभुनाथ ने हिंदी समाज को विवेकपूर्ण चयन और समझ का संस्कार दिया है। इसी सत्र में पत्रकार राघवेंद्र दुबे भाऊ को बुद्धचर्या सम्मान भी दिया गया।

अगले दिन सुबह शुरुआत बहुत देर से हुई। पहले कुछ युवा शोधार्थी अपने पर्चे पढ़ रहे थे, जिनमें कंचन, आकाश, अखिलेश, शिवांगी, मृत्युंजय और नीलकमल का नाम याद है। इसी सत्र में नालंदा विश्वविद्यालय से आए परिचय दास ने परमानंद श्रीवास्तव के सिनेमा और अन्य सामाजिक अनुशासनों की गहरी जानकारी के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि परमानंद जी की आलोचना में जो मूल्य थे वे जीवन के ही मूल्य थे और वे आंतरिक रूप से अनुस्यूत थे, बाहरी नहीं थे। उनकी आलोचना प्रेरित करती है कि भाषा की गतिकी को कैसे देखा जाए।

सुबह का सत्र परमानंद जी की कविता-संबंधी आलोचना पर केंद्रित था। बंगाल से आए कवि निशांत ने कहा कि सामान्य और साधारण घटनाओं-स्थितियों को कविता में तब्दील कर देने की काव्य-प्रतिभा उनमें थी। हिंसा को प्रेम बचाएगा और हिंसा मुक्त समाज बनाने में कविताएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी। कवि-प्राध्यापक विशाल श्रीवास्तव ने कहा कि परमानंद जी नई पीढ़ी के प्रति अत्यंत वत्सल थे और उनके साहित्यिक विकास की चिंता करते थे। ‘एक विस्थापित की डायरी’ के हवाले से उन्होंने यह कहा कि कई बार एक आलोचक अपनी अनौपचारिक टिप्पणियों में अधिक खुलता हुआ दिखाई देता है। यह कहना सही नहीं है कि वे सदैव प्रशंसा ही करते थे या सिलेक्टिव नहीं थे। विष्णु खरे की कविता पर परमानंद जी की यत्किंचित क्रिटिकल टिप्पणियों को भी उन्होंने प्रस्तुत किया।

कवि बोधिसत्त्व ने कहा कि परमानंद जी कविदृष्टि के आलोचक थे। यदि वे कवि नहीं होते तो कविता की वैसी आलोचना नहीं कर पाते जैसी उन्होंने की। परमानंद जी के अनुसार निराला के यहाँ मृत्युभय नहीं बल्कि जीवन के सत्कार की कविताएँ हैं।

पंकज चतुर्वेदी जब इधर-उधर इजरायल फ़िलिस्तीन घूमते हुए लगभग साढ़े सात मिनट बाद मुद्दे पर लौटे तो कहा कि हम कितने कृतघ्न समाज में बदल गए हैं कि परमानंद जी की मृत्यु के तेरह साल बाद उन पर कोई सेमिनार संभव हो पा रहा है। परमानंद जी को फ़ाशीवाद की आहटें बहुत पहले से सुनाई दे रहीं थीं, वे उस फाशीवाद को साम्राज्यवाद से संबद्ध मानते थे।

रघुवंशमणि ने कहा कि परमानंद जी के व्यक्ति को उनके कृतित्व से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। परमानंद जी का अध्ययन बहुत व्यापक था। परमानंद जी की आलोचना ऐतिहासिक संदर्भों और वैचारिक हथियारों से लैस थी। वे नए कवियों के प्रति तो उदार थे लेकिन अपने हमउम्र कवियों पर लिखते हुए वे कई जगह अत्यंत कठोर भी दिखाई देते हैं। वे द्वंद्वात्मकता के माध्यम से समय की गतिशीलता को देख रहे थे, यही कारण है कि सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद जैसे प्रत्ययों की वे सटीक पहचान कर रहे थे। परमानंद जी यथार्थ को महत्व देते थे।

अष्टभुजा शुक्ल ने कहा कि ऐसा कहा जाता है कि आलोचक को रचनाकार के बराबर तरजीह नहीं मिलती। जबकि हमारे यहाँ आलोचना या मीमांसा को कभी अवर दृष्टि से नहीं देखा गया। परमानंद जी के संदर्भ में यह कहना चाहूँगा कि साहित्य के लोकतंत्रात्मक स्वरूप पर बात होनी चाहिए। विस्थापन की पीड़ा के बरक्स मैं संस्थापन की पीड़ा का अधिक प्रभाव पाता हूँ। परमानंद जी अपनी पीढ़ी के एकमात्र ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने नब्बे के दशक की कविता का सम्यक संज्ञान लिया।

अरुण कमल ने कहा कि परमानंद जी उस दौर के आलोचक हैं जब पाठ और उसके अंतरालों को देखते हुए निष्कर्षों तक पहुँचने की कोशिश की जाती थी। वे विमर्शों के दौर से पहले के बड़े आलोचक थे। भारत में साहित्यिक आलोचना का प्रारंभ हाली से होता है। हर निजी अनुभव सार्वजनिक बनता है या कि कहें पहले से होता है। बड़ी कविता वह है जिसे एक ही अर्थ में सीमित करना संभव न हो। जो नाचना जानता है वह चलना भी अच्छा जानता है। परमानंद जी के अनुसार जो श्रेष्ठ कविता होगी वह मुक्त और स्वच्छंद होगी। श्रेष्ठ कविता वह है जहाँ कुछ बाहर नहीं छोड़ा जाता, जिसमें अधिक से अधिक का समावेश होगा।

इसके बाद परमानंद श्रीवास्तव स्मृति न्यास की वेबसाइट का लोकार्पण हुआ। यह वेबसाइट परमानंद जी के नाती ऋत्विक और बेटी अन्विता श्रीवास्तव ने मिलकर बनायी है। ऋत्विक युवा हैं और उन्होंने बहुत सधे अंदाज़ में इसका परिचय दिया।

अगला सत्र परमानंद जी की कथा आलोचना पर था। श्रुति कुमुद ने ‘अच्छा और महान् आलोचक’ विषय से बात शुरू करते हुए कहा कि ‘हिंदी कहानी की रचना-प्रक्रिया’ पुस्तक के माध्यम से परमानंद जी से पहला परिचय हुआ। परमानंद जी अपनी आलोचना में रचनाकारों द्वारा यथार्थ की जगह यथार्थ जैसा कुछ लिख देने के दबाव को रेखांकित करते हैं। उनके जीवन के पूर्वार्ध में आलोचना प्रतिबद्धता से आविष्ट दिखाई देती है।

रामनरेश राम ने अपने छोटे से वक्तव्य में कहा कि परमानंद जी का प्रमुख योगदान पाठ-केंद्रित आलोचना को साहित्य में प्रमुखता दिलाना रहा है। समकालीन आलोचना में उनका नाम और महत्त्व के साथ लिया जाना चाहिए।

प्रो. श्रुति ने कहा कि नए रचनाकारों पर लिखते हुए परमानंद जी नई समीक्षा-प्रविधियों पर भी गहरी नज़र रखते थे। उनके अनुसार समयबोध और परंपरा का नैरन्तर्य रचनाकार के लिए अत्यंत आवश्यक है। आलोचक के लिए भी आवश्यक है कि वह परंपरा और इतिहासबोध से अपना जुड़ाव रखे।

प्रेम शंकर ने बताया कि राजेंद्र कुमार जी के कहने पर ‘कौमुदी’ के लिए मैंने उनका एक लंबा इंटरव्यू लिया था। कविता और कथा-आलोचना दोनों ही उनके लिए प्रारंभिक और अनिवार्य कार्यभार थे। छायावाद पर किया काम परमानंद श्रीवास्तव की आलोचना का प्रस्थानबिंदु है।

विमलेश मिश्र ने बताया कि परमानंद श्रीवास्तव जी मेरे गुरु रहे हैं, मैं उन्हें उसी रूप में याद कर रहा हूँ। आज भी गोरखपुर को जिन विभूतियों के कारण जाना जाता है, परमानंद जी उनमें से एक हैं। अनिल राय ने अपना लिखित वक्तव्य प्रस्तुत करने से पहले शाही जी को बात करने के लिए टोका। उन्होंने कहा कि मैं उन्हें साहित्य के एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में अनुभव करता रहा हूँ। उनके आस-पास जैसे एक सदैव प्रशिक्षण शिविर चलता रहता था। जो रचना का सच होता है वही आलोचना का सच होता है।

अवधेश प्रधान ने कहा कि इतने अनुशासित वक्ता किसी सत्र को मिलना एक दुर्लभ घटना है। परमानंद जी और उनके समय के आलोचक एकदम नई चुनौतियों से संघर्ष कर रहे थे। हर दौर में नई रचनाधर्मिता के बरक्स नए काव्यमूल्य स्थापित करने के लिए आलोचना को संघर्ष करना ही पड़ता है। काव्यात्मक यथार्थवाद की अवधारणा को हिंदी में लाने का श्रेय परमानंद श्रीवास्तव को है।

ग़ौरतलब है कि सुबह से बौद्धिक विमर्श सुन रहे वक्ता चाय पीने के बाद दोबारा इकट्ठा हुए और उन्होंने समापन सत्र (जो कविता-पाठ सत्र में बदल गया था) में नरेश सक्सेना की अध्यक्षता में अरुण कमल, अष्टभुजा शुक्ल, स्वप्निल श्रीवास्तव, बोधिसत्त्व, विशाल श्रीवास्तव, निशांत, विहाग वैभव और शिवांगी गोयल की कविताएँ भी सुनीं।

सदानंद शाही की इस टिप्पणी कि ‘विस्थापन जीवन में अनेक रूपों में घटित होता है, जिसकी बात परमानंद जी भी करते थे’ और आभार-प्रकाश के साथ संगोष्ठी ख़त्म हुई। अंत में उन्होंने ग़ालिब का एक ख़ूबसूरत शे’र भी पढ़ा : 

गो वाँ नहीं, प वाँ के निकाले हुये तो हैं
का‘बे से इन बुतों को भी निस्बत है दूर की

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