Font by Mehr Nastaliq Web

नाना पाटेकर : असा नटसम्राट पुन्हा होण नाहि

जब कोई कलाकार यथार्थ और स्वप्न में भेद ख़त्म करके जीने लगता है तो उसका कहीं कोई घर नहीं होता, कोई ठिकाना, कोई निवास नहीं। न बाहर और न ही भीतर। वह दोनों जगह से विस्थापित है। वह हर जगह से विस्थापित है। यह एक शापित जीवन है; भले ही जीवन-मुक्ति का एक अवसर माना गया है, किंतु उन मनुष्यों को जीने का शाप मिला है जो जीवन और मृत्यु दोनों को अपनी नंगी आँखों से देख लेते हैं, किंतु यथार्थ और स्वप्न को आपस में घोलकर जीने वाले मनुष्य को भी अंत में एक जगह चाहिए, जहाँ वह अपनी मुक्ति को रख सके। उसे मुक्ति मिलेगी तो वह उसे रखेगा कहाँ? भले वह इस देह को चंद साँसों की वासना में क़ैद और चार मुट्ठी राख कहता रहा हो।

अपनी मुक्ति की उसी जगह के लिए जब नाना पाटेकर एक अँधेरी गली में यह चीत्कार लगाते हैं कि कोणी घर देत का रे घर...? (कोई घर देगा क्या घर) तो यह चीख़ दुख की सीमा की आख़िरी सीमा को भी लाँघ जाती है। 

मनुष्य की देह और रूह दोनों एक साथ कभी नहीं काँपते, दोनों भिन्न चेतना से संचालित होते हैं, यदि कोई चीख़ सुनकर दोनों एक साथ काँप जाए तो यह मान लेना चाहिए कि यह दुख और अकेलेपन की आख़िरी आवाज़ है... वही आख़िरी आवाज़ ‘कोणी घर देत का घर...’ संवाद में सुनाई देती है।

कुर्सियों की चरमराहट, तंबाकू की पीक, पान मसालों की गंध, पुरानी जर्जर दीवारों की सीलन और कुछ मराठी फुसफुसाहटों के बीच मैं महाराष्ट्र के एक उपेक्षित थिएटर में नटसम्राट के सामने हूँ। तब तक मुझे मराठी उतनी ही समझ आती है, जितनी किसी ग़ैर-मराठी और हिंदीभाषी को समझ आती है, किंतु अनजान भाषा से परे जाकर मेरी आत्मा की आख़िरी परत ने इस फिल्म के बारे में जो जाना है, वह मैंने अपनी मातृभाषा हिंदी में भी कभी नहीं जाना। देह और आत्मा में भेद ख़त्म हो चुका है, आँख और दृश्य दोनों एक ही हैं, यहाँ सिनेमा और थिएटर में कोई अंतर नहीं, मैं और गणपतराव रामचंद्र बेलवलकर एक ही आदमी हैं। सारे संसार का दुख एक ही है। सारे मनुष्य अभिशप्त हैं, सारे शापित हैं, सभी अंतिम बार मरने से पहले कई-कई बार मरेंगे, मर चुके हैं। सभी जीवन के कीचड़ और ख़ून से सने हैं। आख़िरी बार दाह होने से पहले देह का ज़्यादातर हिस्सा जलकर ख़ाक हो चुका है। आत्मा के रेशे जगह-जगह फैले-पसरे हैं। आँखों की कतरनें उड़ती हैं—यहाँ-वहाँ... ‘कोणी घर देत का घर...?’

मराठी के महान् नाटककार विष्णु वामन शिरवाडकर ‘कुसुमाग्रज’ ने जब अपने किसी रात कमरे की मेज़ पर घोर अकेलेपन में कालजयी नाटक ‘नटसम्राट’ लिखा होगा तो उन्होंने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि उनके शब्द में दृश्य की तरह उपस्थित होकर नाना पाटेकर इस नाटक को और गणपतराव रामचंद्र बेलवलकर को सिनेमा के पर्दे पर भी टाइमलेस कर देंगे और मराठी सिनेमा को उसके उच्चतम स्तर पर स्थापित कर देंगे।

इस जीवन के रंगमंच पर हम मनुष्य भी गणपतराव जैसे नट में तब्दील हो चुके हैं। हम भूल गए हैं कि यह सब कुछ वास्तव में हो रहा है, यह स्वप्न में। कुछ जानते हैं कि वे नट हैं, कुछ नहीं जानते। जो नहीं जानते, वे दुख के सागर में हैं।

नाना पाटेकर जानते थे कि वह इस संसार के मंच पर एक नट हैं, इसलिए उन्होंने कहा था, “मैंने अपनी बारह मन सूखी लकड़ियाँ जमा कर रखी हैं, वही मेरी फ़ाइनल प्रॉपर्टी है। वही राख आख़िरी अवशेष।”

इसलिए गणपतराव रामचंद्र बेलवलकर को अपने मंच में किसी की घुसपैठ पसंद नहीं। वह नहीं चाहता कि कोई उसके यथार्थ और स्वप्न के भेद को ख़त्म करे। वह सभी जगह एक है। एकाकार। अद्वैत।

उसे खीझ होती है : जब कोई उसकी टेरिटरी में ख़लल डालता है... “दूर हटो... हे थिएटर है, आणि माझी विरासत है...”

लेकिन वह मजबूर भी है—नियति का मारा... “होना या न होना, यही प्रश्न है...” (To be or not to be, that is the question...)

जिएँ या मरें, बस यही एक सवाल है। इस दुनिया के घूरे (कचरे के ढेर) पर झूठी पत्तल का टुकड़ा बनकर जिएँ बेशर्म, लाचार आनंद से? या फेंक दें शरीर का यह चीथड़ा मृत्यु के गहरे काले कुंड में और अंत कर दें सबका एक ही वार से? क्या करें, कोई बताएँ? ये लाचारी! ये अकेलापन! ये जीवन का रहस्य! और यह सब कुछ जान लेना...! यह सब कुछ जान लेने की त्रासदी! 

अभिशप्त मनुष्यों के दुख की यह यात्रा कोई अभी की बात नहीं है, यह अनंत रही है, हैमलेट से लेकर ओथेलो तक, सीजर से लेकर बैकेट तक। 

मनुष्य का यह दुख नाना पाटेकर की देह में ‘वजूद’ फ़िल्म में भी परिलक्षित हुआ था, जब ‘वजूद’ का मल्हार सच और झूठ में फ़र्क़ करना भूल जाता है। माधुरी से एकतरफ़ा प्रेम में प्रेम के साथ ही कितने सारे दुखों की सूची उसके चेहरे पर नुमायाँ हो जाती है! यथार्थ के कीचड़ से सनी इस दुनिया में मल्हार एक फ़िक्शन बीस्ट की तरह जिए चला जाता है। यह संसार उसके लिए मंच भर है।

‘प्रहार’ में अपनी तवायफ़ माँ को याद करता हुआ मेजर प्रताप चौहान कितने हज़ार बेटों का दुख अपने चेहरे में समेटे हुए है, बैकग्राउंड में शोभा गुर्टू की आवाज़ में बजता हुआ ‘याद पिया की आए...’ की ध्वनि में उसका चेहरा कितना प्राचीन पत्थर है, जिसकी सख़्त खोल के पीछे एक बेहद नाज़ुक हृदय निवासरत है, जो किसी की सिर्फ़ एक नम छुअन भर से बिखरकर गिरने को बेताब है। वही एक सवाल, चेहरे पर उसी एक खोज के निशान... “टू बी ऑर नॉट टू बी...”

जीवन की शुरुआत से लेकर अब तक वही बात दोहराई जा रही है। विलियम शेक्सपियर का ‘किंग लियर’ भी वही कहता रहा—जिएँ या मरें? एक ही सवाल है... और नटसम्राट का विष्णु वामन शिरवाडकर का गणपतराव बेलवलकर भी वही कहता है—जिएँ या मरें?

लाचारी भी, खीझ भी, उपेक्षा भी, अकेलापन भी, क्रोध और जीवन से विद्रोह भी। दूर रहो, सब कुछ निरर्थक है, मैं अपने ही क़ातिलों के पैरों में गिरकर दया की भीख माँगता हूँ, जिन्होंने मुझे मारा है। हे विधाता! तू इतना कठोर क्यों हैं?

दूर हटो...! असा नटसम्राट पुन्हा होण नाहि। मैं ही जूलियस सीजर हूँ, आणि प्रताप राव, मी ओथेलो, सुधाकर, आणि मी गणपत रामचंद्र बेलवलकर नटसम्राट! सारे क़ातिलों ने मुझे घेर लिया है, मृत्यु ने मुझे घेर लिया है, किंतु मैं इसका सामना करूँगा... मृत्यु की आँखों में शूल गाड़ दूँगा।

•••

नवीन रांगियाल को और पढ़िए : 80 के दशक के रेट्रो लुक से स्मृति और नॉस्टेल्जिया तक | क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ : होमर के महाकाव्य की उदास सिनेमाई पुनर्रचना | मुकुल शि‍वपुत्र : समदरसी है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो

 

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट