क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ : होमर के महाकाव्य की उदास सिनेमाई पुनर्रचना
नवीन रांगियाल
20 जुलाई 2026
एक राजा और महानायक होते हुए भी ओडिसस की ज़िंदगी कोई जश्न नहीं है, बल्कि एक लंबा इंतज़ार, एक बेबसी और ज़िंदगी के आख़िर में पसरा हुआ एक अंतहीन सन्नाटा है। यह एक ऐसे दुख की किरच के साथ घर लौटने की कहानी है, जिसके अंत में यही अर्थ मिलता है कि अंततः ज़िंदगी का कोई अर्थ नहीं। फिर वह ज़िंदगी स्वयं महाकवि होमर के ओडिसस की ही क्यों न हो।
इस फ़िल्म को देखते हुए बार-बार मुझे यह अहसास होता रहा कि ज़िंदगी और समंदर एक ही चीज़ हैं। ज़िंदगी बार-बार समंदर की तरह उफनती है, स्थिर होती है और फिर किसी अंतहीन गहराई की तरह पसर जाती है। इस गहराई का दूर-दूर तक कोई अर्थ नहीं, सिवाय इसके कि वह बस हमारी आँखों के सामने कभी बेसाख़्ता, तो कभी बेतरतीब-सी फैली रहती है—अपने अनंत और विराट विस्तार में फैले नीले समंदर की तरह।
न जाने क्यों, मुझे ‘द ओडिसी’ की कहानी में मुख्य किरदार (प्रोटैगोनिस्ट) समंदर लगता है। उसकी आवाज़, उसका मौन, उसकी गहराई, उसकी आत्मीयता और उसका विद्रोह। दूर तक फैले इस बे-शक्ल पानी में कितना कुछ है, जबकि असल में कुछ भी नहीं।
निर्देशक क्रिस्टोफ़र नोलन का ओडिसस भी समंदर की तरह अपनी गहराई, अपने अकेलेपन, अपनी विफलता और अपनी अंतहीन निरर्थकता के बीच अपनी ज़िंदगी के दस साल गुज़ारता है। वह कई बार एक ऐसे योद्धा की तरह नज़र आता है, जो लहरों के ख़िलाफ़ लड़ना चाहता है; तो कई जगह एक उलझा हुआ आदमी दिखाई देता है।
हालाँकि ट्रॉय के युद्ध के बाद इथाका के राजा ओडिसस के पास घर लौटने का एक मक़सद है। उसकी स्मृति में इंतज़ार करती हुई एक औरत है, जो उसकी पत्नी है। उसका एक मृतप्रायः कुत्ता भी इसलिए इंतज़ार कर रहा है कि जब ओडिसस लौटेगा, तभी वह मरेगा। और ऐसा ही होता है। ओडिसस के आते ही कुत्ता मर जाता है।
ओडिसस की वफ़ादार और बेहद ख़ूबसूरत पत्नी पेनेलोप उसका इंतज़ार कर रही है। वह ओडिसस के लिए अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर देने को तैयार है।
मैं हैरान हूँ। इस ख़ूबसूरत औरत को देखते हुए दृश्य नहीं, बल्कि पंक्तियाँ याद आती हैं। एक पंक्ति याद आती है—Waiting is the most intense way of living.
क्रिस्टोफ़र नोलन की फ़िल्म ‘द ओडिसी’ मानो समंदर पर लिखी हुई कोई उदास कविता हो।
यही वजह है कि ‘द ओडिसी’ में मुझे युद्ध के साथ-साथ प्रेम और इंतज़ार भी दो बड़े तत्त्व महसूस होते हैं। हालाँकि ‘द ओडिसी’ में भावनाओं का ट्रीटमेंट कुछ टूटा, खोया और दरका हुआ-सा है। मैं एक बार भी किसी दृश्य या किसी जेस्चर पर सिहर नहीं पाया। किंतु इसकी सिनेमाई भव्यता, ओडिसस की ज़िंदगी की त्रासदी और इस कहानी का दृश्य-विन्यास इसे इतना बड़ा बना देते हैं कि हम अपनी अदृश्य और नाज़ुक भावनाओं को कुछ देर के लिए कुचलकर भूल जाने को तैयार हो जाते हैं।
लुडविग गोरान्सन का संगीत—जिसमें सिंथेसाइज़र के साथ-साथ प्राचीन और पुनर्निर्मित ग्रीक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल किया गया है, शायद ब्रॉन्ज़ गोंग भी—समंदर की लहरों, गहरे अँधेरों, दृश्यों की विराटता, कहीं-कहीं पसरी हुई ख़ामोशी और समंदर की विशालता के बीच कभी-कभी शोपाँ की याद दिलाता है।
फ़िल्म में परदे पर अतीत और वर्तमान किसी मौसम की तरह आते-जाते रहते हैं। इन दृश्यों के बीच ओडिसस अपने घर लौटने की कहानी कहता हुआ लड़ाई लड़ रहा है। इस संघर्ष में एक बाहर की लड़ाई है और भीतर की एक भावुक लड़ाई भी। ओडिसस राक्षसों से लेकर प्रेतात्माओं तक से लड़ता है। कभी अच्छी आत्माएँ और देवता उसकी मदद करते हैं। वह अपने स्मृतिलोप से भी लड़ता है और अपने अपराधबोध से भी।
घर लौटने के इस संघर्ष में वह अपने सारे योद्धाओं को खो देता है। कभी समंदर, तो कभी राक्षस उसके सारे प्रिय साथियों को निगल जाते हैं और आख़िर में वह अकेला, ख़ाली हाथ घर लौटता है। इसलिए कई जगह ओडिसस की आत्मा मुझे कलिंग के युद्ध में जीतकर भी अपनी आत्मा से हार चुके सम्राट अशोक की आत्मा जैसी लगती है। कलिंग विजय के लिए सम्राट अशोक ने एक ओर भीषण नरसंहार किया और दूसरी ओर, जीत के बाद भी वह अकेले और एक उलझे हुए दार्शनिक की तरह खड़ा नज़र आया—नितांत अकेला और निसंग। हज़ारों लाशों के बीच खड़ा एक सम्राट, जो यह तय नहीं कर पाया कि वह जीता है या हार गया।
दिलचस्प बात यह है कि जिस अनुवादक एमिली विल्सन ने ‘द ओडिसी’ का अँग्रेज़ी में अनुवाद किया है, उसकी पहली पंक्ति ही कहती है—"Tell me, Muse, of the man of many ways."
‘द ओडिसी’ महाकवि होमर की लिखी तक़रीबन तीन हज़ार वर्ष पुरानी कविता पर आधारित ग्रीक साहित्य का एक मील का पत्थर है। यह भारत के महाकाव्यों ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के समकक्ष माना जाने वाला काव्य है, जिसके रचयिता होमर के वजूद को लेकर भी अनेक रहस्य और मत हैं। कुछ उन्हें एक ही व्यक्ति मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि होमर एक नहीं, बल्कि इस नाम के कई व्यक्ति थे।
कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि ‘होमर’ कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि प्राचीन ग्रीस के चारणों (घूम-घूमकर कविता गाने वाले कवियों) के एक समूह का नाम मात्र था। कई सदियों से चली आ रही इन मौखिक या वाचिक रचनाओं को जब एक साथ संकलित किया गया, तो उसे ‘होमर’ का नाम दे दिया गया। इस रहस्य को होमरिक प्रश्न (The Homeric Question) कहा गया है।
बहरहाल, क्रिस्टोफ़र नोलन ‘ओपनहाइमर’ बनाकर फ़िल्म-निर्माण का वह बेंचमार्क स्थापित कर चुके हैं कि अगले स्तर पर ‘द ओडिसी’ जैसी फ़िल्म लगभग अनिवार्य थी। अब उनके दर्शकों को भी ‘द ओडिसी’ केवल एक दृश्य-अनुभव की तरह नहीं, बल्कि एक महाकाव्य, एक त्रासदी और मनुष्य के अकेलेपन की यात्रा की तरह देखनी चाहिए। शायद तभी वे उस जगह तक पहुँच पाएँगे, जहाँ पहुँचकर नोलन ने इस फ़िल्म की कल्पना की है।
•••
नवीन रांगियाल को और पढ़िए : बीथोवन के संगीत के लिए | पंडित छन्नूलाल मिश्र : तकलीफ़ में गाने से ही सिद्धि मिलती है | सुमन कल्याणपुर : स्वर और स्वर-भ्रम | मुकुल शिवपुत्र : समदरसी है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट