दीपावली की रोशनी में ओढ़नी का भूगोल
अंजना रतनू
08 नवम्बर 2026
अक्टूबर 2025
दीपावली से एक दिन पहले की रात...
रात के साढ़े ग्यारह बजे हैं। मैं और मेरा वैवाहिक सहयात्री विक्रम, जो घर का स्वयंभू बावर्ची और घोषित रसोई-प्रेमी है, अगले दिन बनने वाले व्यंजनों की तैयारियों में जुटे हैं। वैसे तो मुझे न कोई ख़ास पकवान बनाने आते हैं, न ही रसोई से मेरा कोई गहरा प्रेम रहा है। पर प्रेम-विवाह और व्यस्त जीवन की अपनी-अपनी क़ीमतें होती हैं। उनमें से एक यह भी है कि कभी-कभी साथ समय बिताने के लिए भी कोई बहाना ढूँढ़ना पड़ता है। हमारे लिए वह बहाना अक्सर रसोई बन जाती है।
विक्रम की नौकरी चाहे कितनी भी व्यस्त क्यों न हो, उसे खाना बनाना, लोगों को घर बुलाना और सबके साथ बैठकर घर का बना भोजन करना किसी उत्सव से कम नहीं लगता। आधुनिक जीवन में लैंगिक समानता का झंडा उठाए हुए वह अपनी वर्क फ़्रॉम होम वाली नौकरी के कारण मेरे साथ उदयपुर आ बसा, जहाँ मैं अपनी पीएचडी पूरी करने की पुरज़ोर और फ़िलहाल कुछ हद तक नाकाम कोशिशों में लगी हुई हूँ।
उदयपुर में विक्रम के अपने मित्र तो थे नहीं, इसलिए धीरे-धीरे उसने मेरे मित्रों पर ही अपना अनौपचारिक क़ब्ज़ा जमा लिया। मैं स्वभाव से थोड़ी संकोची हूँ या सच कहूँ तो थोड़ा आलस्य और थोड़ा आत्मविश्वास की कमी भी इस संकोच के सह-अपराधी हैं। इसलिए लोगों से बहुत जल्दी घुल-मिल नहीं पाती।
लेकिन अब स्थिति यह है कि मेरे मित्र किसी काम से घर आते हैं, तो मुझसे दो मिनट हालचाल पूछकर सीधे विक्रम के साथ गंभीर गपशप-सत्र में प्रवेश कर जाते हैं। फिर चर्चा स्वयं-घोषित बहुविदों की बौद्धिक कलाबाज़ियों से शुरू होकर शेयर बाज़ार, फ़िल्मों, इतिहास, भूगोल और न जाने किन-किन विषयों तक पहुँच जाती है।
मेरे कुछ मित्र, जो मेरी ही तरह पीएचडी पूरी करने की पुरज़ोर कोशिशों में लगे थे, और कुछ अन्य कारणों से भी दीपावली पर अपने घर नहीं जा पाए थे। सो हमने उन्हें पूरे भरोसे के साथ निमंत्रण दे डाला कि इस बार व्यंजनों में मिर्च-मसाले का स्तर मानवीय सहनशक्ति की सीमा के भीतर रखा जाएगा।
मुझे पूरा विश्वास है कि लगभग बीस प्रतिशत लोग हमारे इस आश्वासन पर भरोसा करके आने वाले थे और बाक़ी अस्सी प्रतिशत केवल विक्रम के हाथ की बनी उस शाकाहारी बिरयानी के लालच में, जो बिरयानी की तथाकथित असली नस्ल को भी चुनौती दे सके।
बस, अगले दिन की तैयारियों के बहाने हम दोनों हँसते-बतियाते रसोई में व्यस्त थे कि अचानक विक्रम ने पूछा, “तुम्हारे जीवन की सबसे यादगार दीपावली कौन-सी रही है?”
सवाल जितना सीधा था, उसका जवाब उतना ही उलझा हुआ। बत्तीस दीपावलियाँ देख चुके व्यक्ति से उसकी सबसे यादगार दीपावली पूछ लेना कोई साधारण प्रश्न नहीं होता। उस समय तो मैं कोई जवाब नहीं दे पाई, क्योंकि शरबत की बोतल लापता थी। अब यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि हमारे घर में शरबत कोई सामूहिक पेय नहीं है। वह मुख्यतः मेरी निजी जीवन-रेखा है। इस घर में शरबत की बोतल का लापता होना लगभग वैसा ही संकट है, जैसे किसी साम्राज्य का अपना मुख्य व्यापारिक मार्ग खो देना। यह मेरे निजी पेय-संसार पर आया हुआ संकट था, लेकिन उसकी खोज का नाटकीय विस्तार ऐसा था मानो घर की संपूर्ण सभ्यता उसी बोतल पर टिकी हो। ऐसे में विक्रम का प्रश्न थोड़ी देर के लिए स्थगित करना पड़ा। पहले यह देखना ज़्यादा ज़रूरी था कि मेरी शरबत-आधारित जीवन-व्यवस्था के विरुद्ध यह षड्यंत्र रसोई की किस शेल्फ़ से संचालित हो रहा है।
दिन भर की व्यस्तता में वह प्रश्न कई बार फिर दिमाग़ में आया, लेकिन बिरयानी के लिए काली मिर्च कहाँ रखी है, पराठों का आटा लगाते हुए सूजी कहाँ गई और सामने वाले फ़्लैट में रहने वाली प्रियंका के घर से बड़ा भगोना लाने जैसी अत्यंत महत्त्वपूर्ण घरेलू आपातकालीन स्थितियों के बीच मैं उस प्रश्न को बार-बार किनारे करती रही।
वह प्रश्न तब गहराया; जब मित्र-मंडली के साथ पेट भर भोजन हो चुका था, रसोई में पड़े बर्तन मिलकर धो लिए गए थे और पीएचडी के दुखों की सामूहिक गाथाएँ भी मित्रों के साथ लिखी जा चुकी थीं। इसके बाद जब मैं ख़ुशबू और अनुभव के साथ स्कूटी पर उदयपुर की दीपावली देखने निकली और रानी रोड पर फ़तेहसागर झील को निहारते हुए मुझे लगा कि उदयपुर से मेरा प्रेम पहले से थोड़ा और बढ़ने लगा है, तभी मन में अचानक जवाब आया कि शायद यही दीपावली मेरी सबसे यादगार दीपावली है।
लेकिन ठीक उसी क्षण मन की भूली हुई स्मृतियों में से एक ऐसी दीपावली उभर आई, जो कब की है, यह तो मैं आज तक नहीं जानती; लेकिन कहाँ की थी, यह मुझे बहुत साफ़ याद है। यूँ तो जेएनयू में प्रेरणा के साथ मनाई हुई दीपावली मुझे बहुत याद आती है। बचपन की दीपावलियाँ भी बहुत याद आती हैं, जब घरवालों के साथ मैं और मेरा भाई कुलदीप, मम्मी-पापा के सामने आस्था का बड़ा सच्चा-सा दिखावा करते हुए लक्ष्मी-पूजन में पूरे उत्साह से भाग लेते थे। ताँबे की घंटी कौन ज़्यादा ऊँची आवाज़ में बजाएगा, इसका पूरा मुक़ाबला मेरे और मेरे भाई के बीच रहता था। पर्यावरणवादी तो हम दोनों बचपन में ही बन गए थे। मम्मी-पापा के लाख समझाने पर भी मजाल है कि हम दोनों में से कोई पटाख़े को हाथ लगा दे। फिर शगुन के नाम पर मम्मी के कहने से पापा एक फुलझड़ी, एक अनार और एक चकरी चला देते थे और हँसते हुए कहते, “चलो, पटाख़ों का ख़र्चा तो बचा।”
इन सारी दीपावलियों की स्मृतियों के बीच एक स्मृति ऐसी भी थी, जो कहीं पीछे छूट गई थी। मैं न जाने किस उम्र की रही होऊँगी, लेकिन शायद सात-आठ साल से ज़्यादा बड़ी नहीं थी। यूँ तो हॉस्टल के अलावा शादी से पहले की लगभग सारी दीपावलियाँ मैंने मम्मी-पापा और भाई के साथ अजमेर में ही मनाई थीं, लेकिन एक दीपावली की वह भूली हुई स्मृति मेरे पैतृक गाँव की थी।
अब ‘पैतृक गाँव’ लिखते हुए भी मन में एक छोटा-सा वैचारिक काँटा चुभता है। आख़िर यह गाँव पैतृक ही क्यों है? जिन घरों की दीवारों पर औरतों के हाथों से लिपाई होती है, जिन आँगनों में उनकी दिन-रात की आवाजाही से जीवन बसता है, वे घर वंश और विरासत की भाषा में पुरुषों के नाम से क्यों पहचाने जाते हैं? हालाँकि यह कहते हुए भी मन झिझकता है, क्योंकि मेरी स्मृति में दादोसा भी उस घर से उतने ही जुड़े हैं, जितनी दादीसा। शायद दिक़्क़त ‘पैतृक’ शब्द से नहीं, उसके अकेलेपन से है। ख़ैर, समाज की भाषा में वह मेरा पैतृक गाँव था। मेरी स्मृति की भाषा में वह ‘बाई-कँवर जी का घर’ था। वह दीपावली मैंने दादोसा-दादीसा के साथ अकेले गाँव में मनाई थी।
हमारे घर में दादोसा को सब ‘कँवर जी’ और दादीसा को ‘बाई’ कहते हैं। अब ये अनोखे नाम उन्हें क्यों मिले, इसकी भी अपनी एक अलग कथा है, जो कभी फिर फ़ुर्सत में लिखी जाएगी। शायद मैं सात-आठ साल से बड़ी नहीं रही होऊँगी। ज़रूर कोई अलग बात रही होगी कि मैं अकेली गाँव में थी। या यह भी हो सकता है कि स्मृतियाँ मेरे साथ कुछ छल कर रही हों। लेकिन इतना मुझे साफ़ याद है कि उस साल हमारे गाँव के घर में कोई दीपक नहीं जलाया गया था, सिवाय माता जी महाराज के उन दो थानों के, जिन्हें मेरी बाई ने गाँव में रहते हुए कभी दीये के बिना सूना नहीं रहने दिया। उनके जाने के बाद वहाँ क्या हाल है, यह तो अब मम्मी-पापा ही बता सकते हैं।
स्मृति कुछ यूँ है कि दीपावली की रात है। घर में सिर्फ़ दो दीपक जल रहे हैं। रसोई में चिमनी जल रही है और चूल्हा भी, जिस पर मेरी बाई खाँसते हुए खाना बना रही हैं। मैंने अपने जन्म से लेकर बाई की मृत्यु तक उन्हें खाँसते हुए ही देखा। यह खाँसी उन्हें कब से थी, यह तो मुझे याद नहीं और क्यों थी, इसका जवाब दिल्ली के बड़े अस्पतालों के बड़े डॉक्टर भी कभी ठीक से नहीं दे पाए। बस, जब तक बाई जीवित रहीं, तब तक वह खाँसी भी उनके साथ जीवित रही।
कँवर जी घर के चौक में बैठकर मचली पर खाना खा रहे थे। अब उनकी थाली में क्या था, यह मेरी स्मृति में सचमुच है या नहीं, इस पर मुझे पूरा विश्वास नहीं। लेकिन मुझे लगभग पूरा यक़ीन है कि बाई ने उनकी थाली में भिंडी की सब्ज़ी ज़रूर परोसी होगी।
अब यह स्मृति सचमुच मेरी अपनी है या इतने वर्षों से मन में छिपी बैठी स्मृतियों ने मेरे साथ कोई षड्यंत्र कर दिया है, यह कहना मुश्किल है। मनोविज्ञान में इसे शायद सोर्स मॉनिटरिंग एरर कहते हैं, जहाँ हमारा मन किसी देखी हुई घटना और बाद में सुनी हुई बात के स्रोत को आपस में गड़बड़ा देता है। यानी जो बात हमने सचमुच देखी नहीं हो; लेकिन बार-बार सुनी होती है, वह भी धीरे-धीरे हमारी अपनी स्मृति का हिस्सा लगने लगती है। शायद मेरी भिंडी वाली स्मृति भी मन की ऐसी ही कोई चालाकी है—एक रिकंस्ट्रक्टेड मेमरी। क्योंकि मुझे यह बहुत साफ़ याद है कि हर दीपावली पर मम्मी रात के भोजन के मेन्यू में भिंडी की सब्ज़ी जोड़ने का सुझाव हमेशा देती रही हैं। इसके साथ यह भी कहती रही हैं, “बाई भोत सुवाद भिंडी की सबजी बणाता। कोई पावणूँ आतो के कोई बार-त्युँहार हुतो, जद बाई हमेशा ही भिंडी बणाता, अर भोत ही सांतरी बणाता।”
कँवर जी की थाली में भिंडी थी या नहीं, यह स्मृति का अपना षड्यंत्र हो सकता है। लेकिन उस रात की रोशनी और शोर मुझे याद है। उस दिन भले ही हमारे घर की छत दीयों के बिना सूनी रही हो, लेकिन गाँव ख़ूब जगमगा रहा था। दीपक भी जल रहे थे और पटाख़ों का शोर तो जैसे सीधे जर्मनी तक पहुँच रहा था। बचपन में जर्मनी ही सबसे दूर लगता था। ख़ैर, बचपन में दूरी के मामले में जर्मनी दूर लगता था और अब पहुँच के मामले में दूर लगता है।
तो उस दिन मेरे बचपन के शोर से डरते मन को पटाख़ों की हर आवाज़ जर्मनी तक जाती हुई लग रही थी। पटाख़ों की आवाज़ जितनी ऊँची होती, मेरे रोने की आवाज़ भी उतनी ही ऊँची हो जाती। उस रात घर में तीन आवाज़ों का एक विचित्र संगीत गूँज रहा था—तेज़ पटाख़े, मेरा रौद्र-गान और बाई की खाँसी।
इन तीनों ध्वनियों में अगर किसी एक पर रोक लग सकती थी, तो वह थी मेरा रौद्र-गान। और सच कहूँ तो मेरे रावळे में मेरे इस रौद्र-गान की अपनी अलग ही ख़्याति रही है। आज भी जब कभी गाँव जाती हूँ, तो कोई-न-कोई बूढ़ी भाभू मुझे देखकर यह ऐतिहासिक टिप्पणी ज़रूर कर देती है, “भइ, अब तो घणी समझणी हुगी दुर्गा की बेटी, पण टाबरपणा में तो रोती झको सगळो गाँव जगा देती। सूबे का चार ही कोनी बजबा देती आ तो।”
हालाँकि अब ऐसी बूढ़ी भाभुएँ कम ही बची हैं, जिन्हें इतनी पुरानी बातें याद हों। या फिर यह भी संभव है कि मेरे रौद्र-गान के वे कीर्तिमान अब टूट चुके हों और गाँव में ध्वनि-प्रदूषण के नए, ज़्यादा प्रतिभाशाली रुदन-कलाकार पैदा हो गए हों। ख़ैर, ऐसे गौरवशाली ध्वनि-इतिहास वाली बालिका के रोने पर कँवर जी का विचलित हो जाना स्वाभाविक ही था। इसलिए मेरी झूठी स्मृतियों में यह भी दर्ज है कि उस रात वे भी उस विचित्र संगीत में शामिल हो गए थे और ऊँचे स्वर में मुझे डाँट रहे थे कि त्योहार के दिन मैं क्यों रो रही हूँ।
मैं इन्हें ‘झूठी स्मृतियाँ’ इसलिए कहती हूँ, क्योंकि मुझे कोई दूसरी स्मृति याद नहीं, जिसमें कँवर जी ने कभी मुझे डाँटा हो। हाँ, बचपन से ही ईश्वर के मामले में मेरा स्वभाव थोड़ा संदिग्ध रहा है—कभी नीत्शे की तरह ईश्वर की अनुपस्थिति पर सिर हिलाती हुई, तो कभी कार्ल रिटर की टेलियोलॉजिकल जियोग्राफ़ी की तरह इस संसार में किसी गहरे उद्देश्य और ईश्वरीय व्यवस्था की संभावना टटोलती हुई।
ईश्वर के होने पर या उनके किए उन कामों पर, जिनसे सबको उनका ईश्वरत्व दिखाई देता है, मैंने हमेशा खुले स्वर में प्रश्न उठाए हैं। इस मामले में कँवर जी, बड़े पापा, पापा, बड़ी माँ या मम्मी—सबने कई बार ऊँचे स्वर में मुझे समझाया है। लेकिन उसे डाँट कहना शायद ग़लत होगा। मेरे हिसाब से वे बस अपने-अपने ईश्वर की रक्षा करने की जद्दोजहद में थे या मुझे अपना नज़रिया दिखाने की कोशिश कर रहे थे—वह नज़रिया, जिसे मैं कभी पूरी तरह देख ही नहीं पाई। हालाँकि बाई ने हमेशा मेरे इस तरह के प्रश्नों को बहुत ध्यान से सुना। उन्होंने कभी अपना स्वर ऊँचा नहीं किया। वह अपने हिसाब से तर्क देकर अपने ईश्वर को बचाती रहीं और मैं, कम-बुद्धि वाली, कभी उनके ईश्वर को तो कभी अपने ईश्वर को अपने प्रश्नों के कठघरे में खड़ा करने से नहीं लजाई। अब इस बुरी आदत का पालन मैं बड़े चाव से अपने ससुराल में भी करती हूँ।
तो ईश्वर से जुड़े इन प्रसंगों को छोड़ दें, तो कँवर जी ने मुझे कभी किसी बात पर डाँटा हो, यह मुझे याद नहीं। और इसका कारण यह क़तई नहीं है कि मैं चारण जाति में जन्मे घर की डूंगरेच की सुवासणी हूँ। मुझे बहुत अच्छे से याद है कि कँवर जी ने मुझे, मेरे छोटे भाई कुलदीप को और बड़े पापा के चारों बच्चों को—हम छह बहन-भाइयों में से किसी को भी—कभी किसी ग़लती पर डाँटा हो, ऐसा याद नहीं आता। हम छह में विद्रोही प्रवृत्ति थोड़ी मेरी ही रही है। इसलिए ईश्वर की रक्षा सभी ने की, लेकिन उसके अलावा कँवर जी से डाँट खाने की कोई स्मृति हममें से किसी के पास नहीं है।
हाँ, पापा, बड़े पापा और सज्जू बाई भुआजी, कँवर जी के ग़ुस्से के बहुत-से क़िस्से सुनाते हैं। लेकिन ईश्वर की कृपा कहूँ या सच कहूँ तो बाई की अनुकंपा, हम छह बहन-भाइयों ने कभी कँवर जी से डाँट नहीं खाई।
लेकिन मेरी झूठी स्मृति मुझसे कहती है कि उस दिन मेरे रौद्र-गान से परेशान होकर कँवर जी मुझे डाँट रहे थे और बाई चूल्हे पर रोटी बनाते हुए, चिमटे की आवाज़ और पटाख़ों की गूँज के बीच, उल्टा कँवर जी को ही डाँट रही थीं, “काई ह्यूगो? टाबर डरे है पटाखां ऊँ। सहळासो लडो मती।”
अब मेरे रौद्र-गान, पटाख़ों की गूँज, तवे पर चिमटे की खट-खट और साँस के साथ आती खाँसी के बीच मेरा पक्ष लेती हुई वह डाँट कँवर जी को सुनाई दी या नहीं, यह तो नहीं जानती; लेकिन मेरे कानों में वह साफ़ सुनाई दे रही थी। शायद उसी को सुनकर मैं चूल्हे के पास जाकर बैठ गई। पटाख़ों की गूँज और कँवर जी की डाँट से बचने के लिए मैं बाई की ओढ़नी में दुबककर बैठी रही। जब तक बाई ने खाना बनाया, कँवर जी ने खाना खाया, बाई ने बर्तन माँजे, बिछौने लगाए और न जाने कितने काम किए, मैं उन सबके बीच उनकी ओढ़नी में छिपी रही।
और अब, जब एक बार यह स्मृति मुझे याद आ गई है, तब से जब भी कोई डर, दुख या पीड़ा होती है—चाहे पीएचडी की प्रस्तुति का डर हो, परीक्षा-हॉल में बैठकर किसी प्रश्न का उत्तर भूल जाने की घबराहट हो, रास्ते में किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनकर मन का सहम जाना हो या किसी जर्नल में भेजे गए शोधपत्र पर समीक्षकों का ईमेल पढ़ते हुए उठने वाली धड़कन... मुझे वही भूली हुई स्मृति याद आती है।
अब बाई नहीं हैं। लेकिन उनकी अपने लिए सिलवाई हुई चटख़ पीले रंग की एक बेस है, जो मम्मी ने शादी के समय मुझे दी थी। मम्मी ने बताया था कि बाई ने उसे बहुत मन से अपने लिए सिलवाया था, लेकिन तबीयत ख़राब होने के बाद कभी पहन नहीं पाईं। उन्होंने उसे अपनी पेटी में रखवाते हुए कहा था, “मीनुड़ी ब्याव तणी तो गीगायजी महाराज ही जाणे कद मानेली, पण बिनणी जे मैं पेली चली जाऊँ, तो छोरी ने म्हारो ओ बेस दीजे। फूटरो लागि मीनुड़ी पर।”
यहाँ ‘मीनुड़ी’ मेरे नाम-जीवन की यात्रा का एक पड़ाव है। वैसे इस यात्रा की शुरुआत मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण ‘मूली’ से हुई थी। फिर मूली से मैं मीनू बनी, मीनू से मीनाक्षी हुई और फिर मेरे नानाजी, जिनका अपना नाम हनुमान सिंह था, उन्होंने इस पूरी नामावली को लगभग पूरी तरह दरकिनार करते हुए मुझे ‘अंजना’ तक पहुँचा दिया।
तो वैसे तो मैं, जो सांस्कृतिक भूगोल में पीएचडी कर रही हूँ, अपने ही दोहरेपन को आधुनिकता और ‘माय चॉइस, माय वॉइस’ का नारा लगाकर पारंपरिक पोशाकें कम ही पहनती हूँ। लेकिन मेरी सासू माँ ने बड़े चाव से मेरी सारी भारी-भरकम पोशाकों के ऊपर बाई की दी हुई वह बेस मेरी अलमारी में सजा रखी है। जब भी मैं ससुराल जाती हूँ, उसे देखती हूँ। उसकी पैकिंग खोलती हूँ। कुछ देर उसकी ओढ़नी को छूती हूँ, खोलती हूँ और फिर उल्टा-सीधा समेटकर वापस रख देती हूँ। शायद मेरे उदयपुर लौट आने के बाद सासू माँ उसे फिर से अच्छे से समेटकर, कभी नई पैकिंग में तो कभी उसी पैकिंग में, वापस रख देती हैं।
मैं वैसे तो भूगोल की शोधार्थी हूँ; लेकिन जब अपने आस-पास के साथी शोधार्थियों को देखती हूँ, तो कभी-कभी लगता है कि शायद मैं ग़लत विषय में आ गई हूँ। जिस तरह वे एक बादल को देखकर उस पर पूरा व्याख्यान दे सकते हैं या एक छोटे-से पत्थर को देखकर पृथ्वी के इतिहास की पूरी परतें खोल सकते हैं, वैसा ज्ञान तो मुझे अपने विषय के बारे में नहीं है।
हाँ, एक-दो ऐसे शोधार्थी भी हैं, जिन्होंने ख़ुद को बहुविद् की उपाधि दे रखी है और अपने बौद्धिक ओहदे को बाकियों से ऊँचा समझने लगे हैं। लेकिन उन्हें फ़िलहाल इस कथा से बाहर ही रखते हैं।
मैं इतना जानती हूँ कि यदि भूगोल में कभी भावनात्मक भूगोल और सिनेमाई भूगोल पर किसी विश्वविद्यालय का अलग विभाग बने, तो उसमें स्नातक से लेकर पीएचडी तक दाख़िला लेने और फिर सहायक आचार्य की रिक्ति आने पर आत्मविश्वास से आवेदन करने की क्षमता मुझमें अवश्य है। इसी भावनात्मक भूगोल ने मुझे यी-फ़ू तुआन के टोपोफ़ीलिया के विचार से बहुत प्रभावित किया है। यह विचार कि स्थानों के साथ मनुष्य की भावनाएँ कैसे जुड़ती हैं, कैसे कोई जगह केवल भौतिक जगह नहीं रह जाती; बल्कि प्रेम, भय, स्मृति और अपनत्व से भरी हुई एक जीवित अनुभूति बन जाती है। इसे और समझने के चक्कर में मैं एडवर्ड रैल्फ़ के प्लेस और प्लेसलेसनेस के विचारों की भी पड़ताल करती रहती हूँ।
अब जब मैं बाई की उस ओढ़नी को याद करती हूँ, तो सोचती हूँ कि कैसे एक साधारण-सी ओढ़नी संरक्षण-स्थल बन जाती है। कैसे किसी विशेष व्यक्ति की उपस्थिति या शायद कहना चाहिए, कभी रही हुई किसी उपस्थिति का अस्तित्व, किसी वस्त्र का अर्थ पूरी तरह बदल देता है। यही वह जगह है, जहाँ मेरा अपना संघर्ष भी शुरू होता है।
मैं अक्सर यह लड़ाई लड़ती रहती हूँ कि परंपराओं की रक्षा का भार हमेशा औरतों के कंधों पर ही क्यों डाला जाए? क्यों लड़के साफ़ा, धोती और कानों में कुंडल पहनकर रोज़ अपनी संस्कृति को बचाने नहीं निकलते? क्यों और कब तक लड़कियाँ ही ओढ़नी, घूँघट, मंगलसूत्र, सिंदूर, झुमके और नाक की बाली के सहारे संस्कृति की अंतिम चौकीदार बनी रहें? इन सब चिह्नों को कई बार अस्वीकार करती हुई, हर रोज़ किसी-न-किसी से उलझती हुई, जब मैं बाई की उस बेस की ओढ़नी को हाथ लगाती हूँ, तो मेरे भीतर की सारी वैचारिक बहसें कुछ देर के लिए शांत हो जाती हैं। तब मुझे लगता है कि तुआन के टोपोफ़ीलिया को और ध्यान से पढ़ना चाहिए। यह समझना चाहिए कि किसी स्पेस को प्लेस बनने के लिए केवल भूगोल नहीं, स्मृति भी चाहिए। लेफ़ेब्र के प्रोडक्शन ऑफ़ स्पेस को भी शायद फिर से और अधिक सजग होकर पढ़ना चाहिए; ताकि यह समझ सकूँ कि बाई की ओढ़नी मेरे लिए केवल वस्त्र नहीं, बल्कि एक सेफ़ स्पेस कैसे बन जाती है।
और फिर मैं अपनी अलमारी के आईने में अपना ही दोग़लापन देखती हूँ। एक ओर मैं ओढ़नी, घूँघट और चूड़ियों जैसी बाध्यताओं का विरोध करती हूँ। दूसरी ओर बाई की वही ओढ़नी बड़े जतन से सँभालकर रखती हूँ। शायद अंतर वस्तु में नहीं, उसके संबंध में है। मेरे लिए बाई की ओढ़नी परंपरा का आदेश नहीं है। वह मेरी स्मृति का आश्रय है। अब यह तो नहीं जानती कि अगली दीपावली किस शहर में मनाई जाएगी। लेकिन हो सकता है कि फिर किसी दीपावली पर, किसी रसोई में अमचूर का डिब्बा ढूँढ़ते हुए या बड़ी इलायची का डिब्बा टटोलते हुए, विक्रम मुझसे वही प्रश्न फिर पूछ ले।
तब शायद मैं उसे बिना ज़्यादा उलझाए, तुआन और रैल्फ़ के साधे शब्दों में बाई की ओढ़नी का भूगोल ज़रूर समझा पाऊँगी... और संभव है, मेरे इस भावनात्मक भूगोल के व्याख्यान के अंत तक अमचूर मिल भी जाए।
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