Font by Mehr Nastaliq Web

‘चींटी की अर्थी’ पर कुछ बातें

इस पुस्तक का शीर्षक उसकी अंतर्वस्तु का कोई सिरा हाथ नहीं लगने देता, लेकिन उसके प्रति जिज्ञासा को लाकर एक जगह संकेंद्रित ज़रूर कर देता है।

इस कहानी में प्रेम है, बंद कमरों की सुराख़ों से नज़र रखने वाली चोर आँखें हैं। जेठ की गर्मियों के लिए सूती कपड़ों की नरमाई है, तो उसी सूत के रेशों से बुनी रस्सी का फंदा भी है।

हमारे समाज को लेकर जब कभी ऑनर किलिंग की बात आती है, तो हमारा विमर्श घूम-फिरकर हरियाणा की खाप पंचायत-उत्प्रेरित हत्याओं पर आकर ठहर जाता है। इसे लेकर सर्वाधिक प्रचलित रूपक गाँव के बाहर पेड़ से लटके उस जवान लड़का-लड़की का है; जो शायद एक ही गोत्र के थे, लेकिन सच इससे कहीं अधिक गहरा और व्यापक परिमाप वाला है।

अगर मैं पूछूँ कि ऑनर किलिंग क्या है, तो फटाक से जवाब मिल जाएगा। लेकिन यह तो उसकी अंतिम परिणति है और अंतिम परिणति को ही सब कुछ मान लेना नासमझी और बेअक़्ली होगी। दरअस्ल, हमारे यहाँ ऑनर किलिंग का एक पूरा जैविक तंत्र है, जो इतना सामान्य है कि हमें उसका हत्या वाला पहलू ही ग़लत या आपराधिक नज़र आता है। सच तो यह है कि हममें से अधिकांश इस जैविक तंत्र के पुर्ज़े हैं।

‘चींटी की अर्थी’ का कथानक ऑनर किलिंग के इर्द-गिर्द बुना गया है। हर सामान्य आदमी की तरह मेरा भी यही मानना रहा है कि ऑनर किलिंग में पीड़ितों और उनके घर-परिवार के नज़दीकी चार-छह लोग ही शामिल होते हैं। लेकिन इस किताब को पढ़ते हुए यह बात समझ आई कि हमारे समाज में ऑनर किलिंग का एक पूरा इकोसिस्टम मौजूद है।

जिस समाज में राधा-कृष्ण के किशोर-वय प्रेम को ईश्वरीय दर्ज़ा प्राप्त है, उसी समाज में ईश्वर में घनघोर आस्था रखने वाले बद्रीनाथ शुक्ला और बबलू जैसे लोग भी हैं; जो प्रेमातुर युवाओं के निजी एकांत की उन दरारों को भी अपनी रूढ़ता के गारे से भर देना चाहते हैं, जहाँ से प्रेम भोर की पहली किरण की तरह छनकर चला आता है।

इस उपन्यास की पृष्ठभूमि प्रयागराज बनने से पहले के इलाहाबाद की है। इसमें इलाहाबाद आपको ऐतिहासिकता का चोग़ा पहने या गेरुआ लपेटे किसी संन्यासी की तरह नहीं मिलता। यहाँ वह इलाहाबाद है, जो इज़्ज़त और सम्मान की नेमप्लेट के रूप में बेटी की झुकी हुई नज़रों और बहू के खिंचे हुए घूँघट की नुमाइश करता है।

दरअस्ल, हम भारतीयों की प्रेम को लेकर जो सामान्य समझ बनी हुई है, उसका आधार या तो पौराणिक कथाएँ हैं, जहाँ प्रेम मांसलता से रहित सौंदर्य और आचरण के शिखर गढ़ता है; या फिर सिनेमाई प्रेम, जिसमें सौंदर्य और आचरण के साथ मांसलता और काम-बोध उसी तरह चिपके रहते हैं—जैसे : हड्डी से मांस। यही कारण है कि हमारे समाज में सामान्यतः सिनेमाई प्रेम के व्यवहार को अपवर्जित माना गया है।

विरोध के सहज प्रतिकार में हो या यथार्थ के दबाव में, युवा जीवन में प्रेम धर्म और नैतिकता की किताबों से निकलकर सिनेमा के पर्दे के अधिक निकट घटित होता है और समाज भी इस विपथगामी विद्रोह की प्रतिक्रिया में या पुरानी परिपाटियों के कारण इस प्रेम को न केवल अस्वीकार करता है, बल्कि उसका कीमा बनाकर गली के कुत्तों और सुअरों को खिला देने पर आमादा रहता है।

यही परिणति उपन्यास के दो पात्रों—विनोद और प्रिया—के साथ होती है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि प्रेम की हर परिणति यही हो, लेकिन यह जो कुछ भी होता है, वह प्रेम के कारण ही होता है। कुल-मान की रक्षा के नाम पर समाज में प्रेम-विरोधी कार्रवाइयाँ जिन विधियों से आकार लेती हैं, उनके लिए हम स्वयं को रूढ़िवादी बनाकर भी प्रेम को दोषसिद्ध नहीं कर सकते।

समाज अपनी सान चढ़ी रूढ़ता में इतना कुंद हो जाता है कि प्रेम का कीमा बनाकर उसे सड़ने के लिए दफ़ना देता है। फिर भी प्रेम मरता नहीं, बल्कि कब्र के बाहर दोनों हाथों से सिर पकड़े जड़वत् बैठा मिलता है। उसकी आँखों में आँसू सूख चुके हैं। शायद इसी कारण विनोद के पिताजी की आँखों में आँसू भाप बनकर उड़ते नहीं; बल्कि जहाँ आँसू का सोता मौजूद होता है, वहाँ एक किरच भर शेष बची रहती है और पूरे परिवेश में हवा के साथ घुला हुआ एक शब्द—‘काश’—अलग-अलग वाक्यों और अभिव्यक्तियों का पूरक बन जाता है।

उपन्यास विधा को लेकर एक प्रचलित प्रश्न रहा है कि किसी रचना को असाधारण या कालजयी बनाने वाला सबसे मूल तत्त्व क्या है। इस विषय में कहानी, प्लॉट, परिवेश और भाषा—सभी के पक्ष में अपने-अपने तर्क दिए जाते रहे हैं। मुझे लगता है कि उपन्यास में भाषा सबसे मूल तत्त्व है, जो उसे असाधारण बना सकती है। अन्य पहलुओं का भी अपना महत्त्व है, लेकिन भाषा निर्णायक है।

स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न भी उठता है कि यदि भाषा ही सबसे बड़ा निर्धारक है, तो हर लेखक की सभी रचनाएँ समान रूप से महान् क्यों नहीं होतीं? और फिर क्यों श्रीलाल शुक्ल अपने आरंभिक समय में लिखी गई ‘राग दरबारी’ के समकक्ष दूसरी रचना नहीं लिख पाए? यह जटिल प्रश्न है और मेरी समझ की सीमा से बाहर भी, लेकिन इसके बावजूद मैं यही कहूँगा कि भाषा केंद्रीय निर्धारक है। हाँ, भाषा का अर्थ कोई लेखक किस रूप में ग्रहण करता है, यह एक अलग प्रश्न है।

कहानियाँ हर लेखक के पास होती हैं, पर ‘चींटी की अर्थी’ के बारे में मैं इतना अवश्य कह सकता हूँ कि जिस प्रकार का भाषिक कौशल कौशलेंद्र के पास है, उसके बल पर वे न केवल अपना पाठक-वर्ग निर्मित करेंगे, बल्कि भविष्य में निश्चित ही कुछ असाधारण रचेंगे।

•••

~ समीक्षित पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें : चींटी की अर्थी
सुशीलनाथ कुमार को और पढ़िए : सिंधियों की पीड़ा का बयानयथार्थ का जादू और जादुई यथार्थवाद

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट