बिछिया, बिछोह और वह आख़िरी ख़ाली पन्ना
मलय नीरव
03 जनवरी 2026
ठहरे हुए हैं, याद आ रही है यात्राओं की। अलग-अलग जगहों की, अलग-अलग समय पर की गई यात्रा की। अलग-अलग सामान पर लटके विभिन्न देशों के स्टीकर दृश्य में हैं, कि अचानक इन दृश्यों को परे धकेलता हुए सामने आ जाती है शिमले (शिमला) की सूनी गलियाँ, ठंड में चारों तरफ़ बिखरी बर्फ़ और भूतहा मकान। बचपन की ये स्मृतियाँ आख़िर वर्षों बाद—जब दूर देश की यात्राओं को लिखने बैठते हैं—क्यों लौट आती हैं? क्या बचपन ख़ुद को अनकहा छूट जाने के डर से स्वतः प्रकट हो जाता है? या बचपन की स्मृति ही हमारी सारी स्मृतियों का आधार स्तंभ होती हैं, जहाँ से शुरू होना ही हमारी नियति बन जाती है। ‘चीड़ों पर चाँदनी’ को पढ़ना निर्मल (निर्मल वर्मा) हो जाना है, जहाँ से आप ख़ुद के बचपन को साफ़ देख पाते हैं।
बर्लिन—एक संजीदा उदास शहर... निर्मल जब ऐसा कह रहे थे, तब मैं भी खोजने लगा था एक उदास शहर जो मेरे अनुभव की स्मृति में दर्ज हो। लेकिन ऐसा शहर कहीं नहीं दिखा। अचानक मेरे अंदर से उदासी उभरने लगी थी। यह उदासी हर शहर, हर ऋतु में बैठी दिखने लगी थी। यह उदासी सिर्फ़ मेरी था, जो विभिन्न परिवेश, समय में मुझमें जन्म लिया था। मेरा उदास शहर ‘मैं’ ही था।
शहरों को पन्नों से जानना या फिर शहर को वहाँ रहते हुए जानना, कौन बेहतर होगा! पन्नों से होते हुए शहर जब हम तक आता है, तब वह कुछ ज़्यादा क़रीब लगता है। ऐसा लगता है मानो हम शहर को छू, सहला रहे हों। जब हम शहर में होते हैं, तब सड़क पर होते हैं, कुछ चौकन्ना, कहीं पहुँचने की भागदौड़ में व्यस्त, कुछ ज़्यादा बेईमान, कुछ ज़्यादा धैर्यवान।
तेज़ हवाएँ, बारिश की फुहार... मध्यम से तेज़ होती हुई, पर्दों का डोलना, बदली-वस्त्र में इठलाता सूर्य, पास के तालाब में तैरती नाव, चप्पू को चलाता मानव और इनके बीच ‘चीड़ों पर चाँदनी’ का सैर करता हुआ मैं। उधर निर्मल बीयर पी रहे हैं, जहाज़ के डेक पर खड़े हो समंदर की लहरों का नाचना देख रहे हैं... इधर मैं चाय, उसमें डूबी बिस्किट के साथ उनको आइसलैंड पहुँचता देख रहा हूँ।
आइसलैंड, खड़ा समुद्र, किताब और शराब में डूबा शहर। कला का देश। सेनाविहीन आत्मरक्षित देश। मूर्ति, लेकिन अमूर्त शैली में बनी, घर-द्वार, सड़क पर खड़ी। लोक-संस्कृति में रंगा लेकिन आधुनिक। ठहरिए, यहाँ लोक-संस्कृति और आधुनिकता पर्याय हैं, अलग-अलग नहीं। इतना आधुनिक कि हम उनके सामने ख़ुद को मध्ययुगीन न समझ बैठे। यहाँ उत्प्रेरित, उद्वेलित करने वाले नारों की ज़रूरत नहीं, सब सहज है प्रकृति की तरह। निर्मल चौंक जाते हैं, जब उन्हें यह पता चलता है कि यहाँ दशकों से हत्या जैसे अपराध नहीं हुए हैं। प्रकृति जीना बतलाती है, सभ्यता जीवन लेना! घास को किसी ने कभी देखा है क़त्ल करते हुए!
मृत्यु, जीवन, वरदान, अभिशाप... कौन शब्द किस शब्द के कब क़रीब हो जाता है, फिर दूर छिटक जाता है, कह पाना उतना ही सहज है जितना बारिश में कपड़ों का सूख जाना। निर्मल वर्मा लिदीत्से घूम रहे हैं लेकिन घूमना कहना कितना सही होगा, जहाँ 1942 में पूरे गाँव को ही जिंदा जला दिया गया था। गाँव जो क़ब्र बन गया, श्मशान, उस जगह को सहेज कर रखा गया है। क्रूर यातनाओं को झेल चुकी ज़मीन के बीच से जब निर्मल गुजर रहे होते हैं, तब उन्हें मृत्यु की छाया महसूस होती है। भले वह 1942 की निर्दयता से परिचित नहीं होते हैं, लेकिन उस आतंक की बदबू को अब भी वहाँ सूँघ पा रहे थे।
तस्वीर बन रही होती है, हल्की, धुँधली, अस्पष्ट, धुएँ से लिपटी, बनते-बनते अचानक सब ग़ायब। अब साफ़ दिख रहा है सामने टंगी शिव-पार्वती की फ़ोटो, गणेश और नंदी भी... लेकिन निर्मल जिस पेरिस का चित्रण कर रहे थे, वह मेरे चेतन में पूरी तरह उभर नहीं पाया। शब्द और कल्पना के सहारे जो पेरिस मैं गढ़ रहा था वह फ़ोटो में परिवर्तित हो गया।
सड़क—सुदूर गाँव की। चलता चला जा रहा हूँ। सड़क के किनारे घर, झोपड़ी, कहीं पक्का तो कहीं कच्चा घर। सड़क के किनारे घर नहीं, ऐसा लगता है मानो सड़क इन घरों के बीच से निकला हो। सड़क घर का दालान हो। लोग, महिला-पुरुष, बच्चे-बूढ़े सब बैठे हुए हैं।
बातचीत चल रही होती है। शब्द उड़ते-उड़ते मेरे पास पहुँच रहे हैं। कुछ समझ पाता हूँ, शेष बुदबुदाहट की ओट में ही रह जाता है। कुछ ऐसा ही ‘चीड़ों पर चाँदनी’ को पढ़ते हुए लगता है। कुछ स्वर पहचाने लग रहे हैं, कुछ अनजाने। जाने हुए ध्वनियों के सहारे अनजाने तक पहुँचने की कोशिश करता रहता हूँ। “विस्कौण्टी से अन्तोन्योनी—यह एक लंबी यात्रा है, कुछ ऐसा ही जैसे हम दोस्तोयवस्की की अभिशप्त भूलभूलैया से बाहर निकलकर चेखव के सूने, गोधूलि से सने आँगन में चले आए हों।” कभी सफल, फिर कभी असफल। लेकिन सड़क के किनारे चलते हुए कान लगाए रहता हूँ कि कहीं कुछ समझ आ जाए। क्या पता वे लोग मेरी ही बातें कर रहे हों? अगर सुनना, पढ़ना छोड़ दूँ तो कहीं गाँव, निर्मल की बातों की डोर ही हमसे न छूट जाए।
बिछिया, बिछोह, चेखव के पत्र के साथ ‘चीड़ों पर चाँदनी’ का आख़िरी पन्ना पलटता हूँ। ख़ाली है वह। कुछ अनकहा कहना निर्मल के लिए भी असंभव होगा, व्यक्त की परिधि से बाहर! वह बात कह दे रहा है यह ख़ाली पन्ना!
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