घर में है नायाब
वागीश शुक्ल
14 जनवरी 2026
एक
मृदुला गर्ग समकालीन हिंदी रचना-जगत् की सर्वाधिक समादृत लेखिका होने के साथ सर्वाधिक वरिष्ठ और हमारे सौभाग्य से सर्वाधिक सक्रिय रचनाकारों में से हैं—वह उन विरले लेखकों में से हैं जिन्होंने मिर्ज़ा बेदिल के नविश्तम आँ चि0 दिल फ़रमूद, खाँदम हर चि0 पेश आमद (= मैंने वह लिखा जो मेरे दिल ने चाहा, और वह सब पढ़ा जो मेरे सामने आया) की घोषणा को शब्दशः निभाया है।
एक बहुत लंबी अवधि से सोचते-सोचते उनकी एक पुस्तक (‘वे नायाब औरतें’, वाणी प्रकाशन, द्वितीय संस्करण : 2024) पर कुछ कहने का अवसर पाया तो मेरा सौभाग्य है।
दो
कभी-कभार कोई कृति कुछ ऐसे कारणों से चर्चा में आ जाती है जो उसका एक गौण पक्ष उजागर करते हैं—मृदुला गर्ग की ‘चित्तकोबरा’ के साथ ऐसा हुआ था जो अप्रासंगिक विवाद में ऐसी उलझी कि उसे पढ़ने के लिए हिंदी पाठक ठीक-ठीक आज भी तैयार न हुआ। उनकी ‘कठगुलाब’ एक बिल्कुल ही अलग किताब थी और आज भी अलग ही है। यह ‘अलग होना’ मृदुला गर्ग के लिखने में सायास नहीं आता; वह सहज ही अपने देखने में कुछ ऐसा देखती रही हैं जो औरों की नज़रों से छूट जाता है, क्योंकि सबके देखने में एक ‘नज़रिया’ शामिल रहता है जो एक ‘प्रिज़्म’ से गुज़ारते हुए ही दृष्टि को गुज़रने की अनुमति देता रहा है। उन पर लिखी गई बहुत-सी आलोचना इस कारण भी ग़लत-अंदाज़ रही है।
‘वे नायाब औरतें’ इस ख़ुसूसीयत का एक और निदर्शन है। इसमें मृदुला गर्ग ने कुछ स्त्रियों के बारे में लिखा है।
तीन
स्त्री (विषयक) लेखन वस्तुतः एक पुनरुक्ति है, एक ‘रिडंडैंसी’। कहते हैं कि एक मुशाइरे में अहमद फ़राज़ से कहा गया कि वह स्त्रियों पर कोई कविता सुनावें और उन्होंने जवाब दिया, ‘‘मेरी सारी कविता औरतों के ही बारे में है।’’ इस पर जो ठहाके लगे, उनसे बिलगा कर भी यह बात सच है क्योंकि कविता एक सांसारिक कर्म है और संसार स्त्री से ही बनता है—हमारी दार्शनिक शब्दावली के अनुसार नपुंसक ब्रह्म में माया ही उस स्पंद का संचार करती है जो उसमें पुरुषत्व का आधान करती है और फिर इस सामरस्य का बहिर्भवन ही सृष्टि है।
और अस्तित्व स्वयं एक हिंसा से परिभाषित है—आक्सीजन खींचने और उसके बदले में कार्बन उगलने से। यही काम हम करते हैं—यही हमारा अन्न पकाने वाली आग करती है। इस बेईमान वाणिज्य से ही हमारा रोज़गार बनता है।
किंतु चुनौती इसका बयानिया नहीं है। अस्तित्व संदर्भ-परिभाषित होते हैं—हम कपड़ा-जूता नहीं पहनते इस कंपनी की क़मीज़ और उस कंपनी के जूते का विज्ञापन कर रहे होते हैं। ठीक इसी तरह, स्त्री के बारे में सोचते-लिखते उसे ‘आँचल में है दूध और आँखों में पानी’ से बिलगाया नहीं जा सका है—भले ही उसे माँ, बहन, बेटी, पत्नी की भूमिकाओं से अलग करने के नाम पर उसकी दैहिकता से बाँध दिया गया हो और वह एक ‘मेन्स्ट्रुएटर’ बना दी गई हो। चुनौती अगर है तो इन संदर्भों के परे जाने की है।
मृदुला गर्ग ने हमेशा दिए गए संदर्भों और दिशा-निर्देशों के पार जाने की कोशिश की है।
चार
यद्यपि पृष्ठ 8 पर यह घोषणा है कि स्त्रीवाद के बलुआ पंक में धँसने का अपना तनिक इरादा नहीं है, सच यह है कि हिंदी में अगर ‘स्त्रीवाद’ पर कुछ गंभीर चर्चा हो सकी है तो इसका प्रमुख श्रेय मृदुला गर्ग को ही जाता है। उन्होंने इसके लिए पौराणिक पात्रों का सहारा नहीं लिया, न ही ‘थेरीगाथा’ आदि में अपनी सोच को टिकाया, वह अपने इर्द-गिर्द की स्त्रियों में ही इस चर्चा को बसाती रही हैं। कभी उन्होंने अपनी सैद्धांतिक पसंद को भी बताया था—‘इको-फ़ेमिनिज़्म’—जिसका उल्लेख इस किताब में भी है। बहरहाल, इस पुस्तक में भी उन्होंने ‘स्त्रीवाद’ पर हुई एक परिचर्चा का उल्लेख किया है, यह बताया है कि उन्होंने क्या कहा, और यह भी, कि दूसरों ने उस पर क्या कहा।
यह बयान पृष्ठ 370-371 पर है—मृदुला गर्ग ने कहा था कि नारीवाद का आंदोलन मातृत्व से छूट भागने के नारे से शुरू हुआ, किंतु अब मातृत्व से इनकारी फ़ैशन में नहीं रही और इस पर सुधा अरोड़ा ने कहा कि ऐसा कोई समय रहा ही नहीं जब नारीवाद ने मातृत्व से इनकार किया हो।
यहाँ ‘मातृत्व’ एक उपलक्षण है जिसका खुलासा पृष्ठ 382 पर यों है :
स्त्रीवादी विमर्श आधी सदी तय कर लेने पर इस निष्कर्ष पर आ टिका है कि भई कुछ तो है जो स्त्री-पुरुष के स्वभाव को विलग करता है। दोनों बराबर होंगे ज़रूर, पर एक जैसे कदापि नहीं हैं। करुणा, ममता, नज़र की बारीकी, भावों का तीव्र उच्छ्वास, कुछ ऐसे तत्त्व हैं जो स्त्री के स्वभाव के अभिन्न अंग माने जाते रहे हैं। समय के साथ व्यक्ति के अधिकाधिक आर्थिक प्राणी बनते जाने के साथ मनुष्य के दैनिक व्यवहार से ये तत्त्व विलीन होते गए। हर देश में स्त्री-समुदाय कमोबेश मुद्रानिर्दिष्ट व्यवहार से विलग रहा है। स्त्री, या फिर क़बीलों में जीने वाला आदिवासी समुदाय। इसलिए उनमें ये प्राकृत तत्त्व अब भी वर्तमान हैं।
घुमा-फिरा कर यह रूसो के ‘नोबुल सैवेज’ का ही गुणगान है, किंतु इसके दार्शनिक उलझाव में गए बिना भी, इसी पुस्तक में अनेकत्र मृदुला गर्ग ने सोदाहरण इस मान्यता का खंडन किया है—उदाहरण के लिए पृष्ठ 241 पर एक हृदय-विदारक असहयोग का बयान करने के बाद उनकी टिप्पणी है :
जब लोग कहते हैं स्त्रियों में करुणा ज़ियादा होती है, मुझे वह दृश्य याद आ जाता है।
मेरी समझ में, असली समस्या किसी भी सैद्धांतिकी (= Theory) के निर्माण की प्रक्रिया को लेकर है। फ़िलहाल यह प्रक्रिया समकालीन भौतिकी—विशेषतः ब्राह्मांडिकी (= Cosmology) और कणभौतिकी (= Particle Physics)—के सैद्धांतिकी प्रस्तावों के अनुकरण पर सोत्साह होती है, किंतु उसकी बुनियादी विनम्रता का उसमें अभाव है और वह सब कुछ समझ लेने के दावों के साथ अपने काम में जुटती है।
मैंने अपनी अ-प्रकाशित पुस्तक ‘व्याकरण में स्त्री’ पर कुछ स्त्रीवादी स्थापनाओं पर भी लिखा है। उसमें से फ़िलहाल इतना कि करुणा, लालित्य आदि के ‘स्त्रियोचित’ होने के भरोसे ही सुमित्रानंदन पंत ‘प्राणों की प्राण’ आदि लिखते रहे। इस लिहाज़ से फ़ारसी वाले सबसे सही हैं—आशिक़ भी मर्द, माशूक़ भी मर्द। ओठ की ललाई में हज़रत ईसा तो ओठ के ऊपर उभरती मूँछ में हज़रत ख़िज़्र—सोने में सुहागा और किसको कहते हैं!
ख़ैर, उनमें नारी होने के ही बल पर सही, दिनेश द्विवेदी की शानदार शख़्सियत का तआरुफ़ हमें इस किताब से हुआ। और जब यह तर्क सामने हो कि आख़िर सिर्फ़ लिंग से कोई औरत-मर्द नहीं होता, अन्य विशेषताएँ भी होती हैं (पृष्ठ 193) तो फिर हरिचरण ही क्यों किसी को भी औरत मान लेने में हमें क्यों हिचकना चाहिए। किताब का शीर्षक ठीक ही है—यह एक स्त्रीलोक है जिसमें प्रवेश करते ही कोई भी स्त्री ही हो जाएगा। हाँ, केवल लिंग-परिवर्तन होता है, स्वभाव-परिवर्तन नहीं—जैसे ख़ुशवंत सिंह स्त्री बन जाने के बाद भी ‘ढुलमुल’ ही रहे।
पाँच
पुस्तक में हाज़िरजवाब, मस्त खिलंदड़, और ‘रसरंजन’ की जगह सीधे ‘मयनोशी’ करने वालियों की भरमार के बावजूद दुख के पहाड़ भरे पड़े हैं—स्वयं लेखक के भी और अनेक ख़ुशदिल उदारचरित लोगों के भी जिन्होंने अपने कुटुम्ब का विस्तार वसुधा तक कर रखा है। कुछ पहले नीलाक्षी सिंह की एक किताब ‘हुकुम देश का इक्का खोटा’ देखी थी जिसमें उन्होंने अपने उपन्यास ‘खेला’ के लिखे जाने के दौरान ही कैंसर से जूझने की कहानी बताई थी। इस किताब मैं ऐसी कई स्त्रियाँ दिखीं जिन्होंने हाथ से फिसलती रेत की तरह किसी अपने की ज़िंदगी को जाते हुए देखा—ऐसी मजबूरियों को ‘धैर्य’, ‘वीरता’ जैसे शब्दों में समेटना भाषा के दारिद्र्य को ही रेखांकित कर सकता है।
यह किताब उन तमाम ‘सहेलियों’ के लिए याद की जाएगी जिनके बयान इसमें आए हैं, लेकिन इससे भी ज़ियादा उन ‘कामवालियों’ के लिए याद की जाएगी जो इन सहेलियों पर भी ‘भारी’ हैं। स्वर्णा आया से शुरू कीजिए जो एक ऐसे घर को चुपचाप छोड़ गईं जिसमें वह मुलाज़िमत और हुकूमत दोनों करती थीं—इसलिए कि उनकी सिफ़ारिश पर नौकर रखा गया उनका भानजा चोर निकला। ये मूल्य ‘सामंती’ हैं जिन्हें पूँजीवाद और समाजवाद की शब्दावली में समझना संभव नहीं है। ये ही सामंती मूल्य हमें हरिचरण और शांति में दिखाई देंगे। इसे सिर्फ़ ‘मालिक की सज्जनता’ के मत्थे मढ़ कर अलग नहीं हो सकते।
बरअक्स इसके, इसी किताब में हम दुर्गापुर स्टील प्लांट की हड़ताल का विवरण पाते हैं जिसमें मज़दूर एक बड़े कर्मचारी को भट्टी में झोंक देते हैं और एक साथी मज़दूर को इसलिए लिंच करने पर तुले हैं कि वह हड़ताल के दौरान काम पर चला गया है। यह अजय मुखर्जी की सरकार का ज़माना था; लेकिन यह सरकार की विशेषता नहीं, सिस्टम की तात्त्विकता है। रुख़ और रुजहान क़ाइम हैं—उसके कुछ ही समय बाद वाइस चांसलर को घेर कर उन तक पानी और दवाई न पहुँचने देने वाले छात्र नज़र आए, फिर बाज़ारों और मंदिरों में बम फोड़ते फ्रीडम-फ़ाइटर्स और अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए कोसते-सरापते कवि-कथाकार-पत्रकार। इन सबमें कोई राजनीति खोजना व्यर्थ है—जो चालीस लोग उस मज़दूर को इस नाते लिंच करना चाहते थे कि वह हड़ताल के दौरान काम पर गया, उनके लिए अगर तब यह मृत्युदंड पाने वाला अपराध था कि वह हड़ताल का हुक्म न मानकर काम पर चला गया तो शायद आज इतना ही पर्याप्त हो कि वह बिहारी था।
इस पुस्तक में चाहे-अनचाहे कई राजनैतिक घटनाएँ और परिप्रेक्ष्य हैं जिनसे हमारे लेखकों में ‘पब्लिक इंटेलेक्चुअल’ बनने की लालसा का व्यावहारिक रूप सामने आता है। सचेष्ट राजनीति मुझे इसमें नज़र नहीं आई, किंतु समकालीन हिंदी बौद्धिकता का माहौल कुछ ऐसा है कि निश्चेष्टतया भी राजनीतिक शब्दजाल का कुहासा उसे घेरे रहता है। पृष्ठ 301 से एक उद्धरण देखिए :
दीवार ढहने से पहले पूर्वी बर्लिन में एक विशाल पुस्तकालय था।
दीवार क्या ढही, पुस्तकालय हटाकर एक व्यावसायिक दफ़्तर बना दिया गया। किताबें रद्दी में फेंक दीं या जला दीं ख़ुदा जाने या नालंदा का भव्य पुस्तकालय जलाने वालों की भटकती रूहें। पर जैसे दुनिया में किताबों की नाक़द्री और अदीबों पर ज़ुल्म करने वाले बेअक़्ल सितमगर मौज करते हैं क्या पता उनकी रूहें भी जन्नतनिशीं हो मस्त रहती हों।
यह पढ़कर ऐसा लगता है कि किताबों के क़द्रदान पूर्वी बर्लिन के कम्युनिस्ट शासन के दौरान ही थे और पश्चिमी जर्मनी के लोग किताबें जलाने वालों में से हैं। जिस पुस्तकालय का ज़िक्र मृदुला गर्ग ने किया है उससे छपी किताब ‘विश्व की प्रेम कहानियाँ’ में उनकी कहानी भी यशपाल की कहानी के साथ शामिल थी। यह स्पष्ट होना चाहिए कि अगर किताब की कोई ‘अहमियत’ थी तो वह यशपाल की कहानी के नाते थी जो लेखक जैसे भी रहे हों, कम्युनिस्ट पक्के थे। मृदुला गर्ग की कहानी का शामिल किया जाना महज़ ढोंग है।
एक और उदाहरण नादिया तेसिच का विवरण है। एक आत्मीय की त्रासद स्थिति का यह बयान दिल को पिघलाने वाला है, लेकिन इसमें कुछ अख़बारी ज्ञान भी सम्मिलित हो गया है। पृष्ठ 431 से 434 तक फैले इस बुलेटिन से कुछ वाक्य ये हैं :
आज पूरी दुनिया जान गई है कि युगोस्लाविया की आर्थिक तरक़्क़ी और अनेक जातियों का मिल-जुलकर सोशलिस्ट ढाँचे के भीतर रहना अमेरिका की महत्त्वाकाँक्षा में एक विकट अवरोध था।
(अमेरिका ने) तय किया कि व्यापक मीडिया प्रोपेगेंडा द्वारा वहाँ की विभिन्न जातियों के बीच जाति-आधारित मतभेद पैदा करवाएगा।
(अमेरिकी) मदद उन हिस्सों को दी जानी थी जो खुले बाज़ार और जातीय बँटवारे के समर्थक थे। निहितार्थ, जो प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी थे।
‘प्रतिक्रियावादी’ और ‘दक्षिणपंथी’ के कोसने जिस शब्दकोश से आ रहे हैं; वह कई पीढ़ियों से हिंदी लेखक को उसकी पहली रचना छपने के पहले ही उपहार में भेंट दिया जाता है, ताकि उसे कोई और शब्दकोश खोजने की ज़रूरत न पड़े। परिणामतः साहित्य ‘समाज के लिए’ समर्पित हो जाता है—फिर कुछ और कह पाने की गुंजाइश ही कहाँ बच रहती है। सब लेखक पहरेदारी में जुट जाते हैं कि कोई दक्षिणपंथी शब्द तो नहीं घुस आया।
‘क़ौमों का मिल-जुलकर रहना’ सिर्फ़ मार्शल टीटो के ‘सोशलिस्ट ढाँचे के भीतर’ ही नहीं था, बालकन इलाक़ों पर उस्मानियाई तुर्कों के क़ब्ज़े के दौरान भी था जब बिना किसी जातीय भेदभाव के सर्बियाई क्रोएशियाई अल्बानियाई बच्चे उठाकर लश्कर+ए+इस्लाम में भरती किए जाते थे। झंडे के रंग से फ़र्क़ नहीं पड़ता जब तक डंडा वही है।
बहरहाल, दलीलें जानी-पहचानी हैं—क्या ही तो मेल-जोल था हिंदुस्तानी हिंदू-मुसलमान में, अँग्रेज़ों के नाते वे एक-दूसरे के बैरी हो गए। ‘खुला बाज़ार’ और ‘जातीय बँटवारा’ भी यहाँ है ही तो उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिकी मदद के डालरों की मिसीसिपी हिंदुस्तान में जल्द ही उफनाती-उतराती नुमूदार होगी।
छह
मैं जीवन और साहित्य में कोई संबंध होना साहित्य की कमी मानता हूँ और इसलिए ‘आत्मकथात्मक’ लेखन का समर्थक भी नहीं हूँ। ‘आत्मकथात्मक लेखन’ से दूसरों के बारे में ज़रूर पता लग सकता है—उदाहरण के लिए यह हम बियांका की आत्मकथा से ही जान पाए कि प्रख्यात नारीवादी सिमोन अपने प्रेमी सार्त्र के लिए अपनी कमसिन छात्राओं को उपभोगार्थ जुटाया करती थीं—किंतु क्या अपने बारे में कोई आत्मकथा कुछ बता सकती है? हिंदी में आत्मकथा में सच बयान करना हरिवंशराय बच्चन की किताब से शुरू हुआ जिससे यह साबित हुआ कि वह स्त्रियों के लिए कामदेव के रूप में ही इस धरती पर अवतरित हुए थे—बाद में कई पुरुषों और कुछ स्त्रियों ने भी उनके अनुकरण पर ऐसी आत्मकथाएँ लिखी हैं। किंतु क्या किसी पाठक की कोई वास्तविक दिलचस्पी ऐसी जानकारियों में हो सकती है?
अज्ञेय कहते थे कि आत्मकथा में सच नहीं लिख सकते, उपन्यास में लिख सकते हैं। मेरा ख़याल है कि सच कभी लिखा ही नहीं जा सकता। ‘संस्मरण’ अनिवार्यतः आत्मकथात्मक होते हैं; किंतु ‘सचाई’ एक ऐसी चीज़ है जिसकी ज़रूरत ज़िंदगी को तो है, लेकिन साहित्य में उसे क्यों आना चाहिए?
ऐसा नहीं है कि निज मन की बिथा सुनकर सब लोग इठलाते ही हैं, किंतु इतना तो सच है कि बाँट कोई नहीं सकता। फिर कोई भी व्यथा-कथा अरण्य-रोदन ही होती है। गुणाढ्य पंडित की ‘बृहत्कथा’ के सातवें खंड का संस्कृत रूपांतर ‘कथासरित्सागर’ हमारे साहित्य का गौरव-ग्रंथ है, किंतु जो छह खंड उन्होंने हिरनों को सुनाते हुए जला दिए, वे भी बहुत कुछ कहते हैं—जिसे तुम साहित्य कहते हो, वह तुम्हारे मूँड़ हिलाने के लिए रचा ही नहीं गया था, वह उन हिरनों के लिए था जो उसे निःस्तब्ध सुन रहे थे।
फिर मायूसी से उबरेंगे, कुछ मज़ेदार इहसास होंगे (पृष्ठ 89) या लौटूँगी एक बार फिर... जाइक़ा बदलता रहना चाहिए न (पृष्ठ 113) जैसी मध्यांतर-घोषणाओं का क्या हासिल है? लेखक के ठीक विपरीत, पाठक को उस मकड़जाल की हर गाँठ से जूझना पड़ता है जिसे ‘रचना’ कहते हैं—पढ़ते समय वही उसका संसार है। वह स्पेन-राजा फिलिप द्वितीय की तरह अपने ज़िरह-बख़्तर को फ़ौज की क़वाइद देखने के लिए भेजकर अपने महल में दूसरे कामों में मशग़ूल नहीं रह सकता—वह तो कुरुवंश के विनाश पर कुंती और गांधारी के साथ ही रोने के लिए भी विवश है और नेवले के सुर में सुर मिलाते हुए यह पूछने के लिए भी कि युधिष्ठिर के अश्वमेध में क्या कमी थी जो उसका पुण्य सेर भर सत्तू के दान के बराबर न ठहरा।
इसलिए उस दुख के फैलाव में शिरकत नहीं, लेकिन ग़र्क़ाबी पाठक की मजबूरी है—दुख जो कामवालियों से रईसज़ादियों के बीच का साझा सायबान है। लेखक के बयान में आए चरित्र चाहे लेखक के जीवन से ही क्यों न उठकर आए हों, वे होते बयानिया ही हैं। इसलिए लेखक को ‘निर्मम = मेरा नहीं’ होना ही पड़ता है। व्यास और धृतराष्ट्र में यही अंतर है—व्यास की ही संतानें ‘महाभारत’ में लड़ रही थीं; लेकिन वह अपने बयानों में निस्संग हैं, जबकि धृतराष्ट्र हमेशा मामकाः पाण्डवाश्चैव (= मेरे बेटे और पाण्डु के बेटे) की शब्दावली में बात करते हैं।
मृदुला गर्ग की इस लेखकीय ‘निर्ममता’ पर समीक्षकों का ध्यान गया भी है, किंतु इस निर्ममता को उनके लेखक से अलग करना कुछ वैसा ही होगा जैसे ‘कठगुलाब’ पर चर्चा के दौरान उसमें आए बलात्कारी जीजा का ज़िक्र आते ही मन्नू भंडारी का यह कहना कि लेकिन हमारे जीजा जी तो बहुत अच्छे थे।
बयान से यह निस्संगता पाठक को हासिल नहीं है। लेखकीय वर्णना की ख़ूबी ही यही है कि वह पाठक को उस वर्णना-जगत के भीतर खींच ले जाती है—वह उन्हीं पात्रों के साथ, उन्हीं घटनाओं को जीता-भुगतता है। जो लोग ऐसा नहीं कर पाते वे बहस करते रहते हैं कि हक़ तो दुर्योधन का ही था राज पर, व्यास ने ज़बरदस्ती युधिष्ठिर को हक़दार बनाया है—ये लोग पाठक नहीं, मुक़दमा बनाने वाले दलाल हैं।
इसलिए इस किताब का पढ़ना एक अतल में समाना हुआ—सीधे वाड़वाग्नि तक।
सात
‘उल्लेखनीय चरित्र’ कौन-से हैं, तय करना मुश्किल है—सारे ही नायाब हैं और सिर्फ़ मृदुला गर्ग के बयान के नाते नहीं। किंतु ‘नायाब’ का क्या मतलब है?
निश्चय ही सुशीला मौसी ‘नायाब’ हैं; अगर वे अपनी जिस्मानी ज़रूरत के इज़हार को शादी तक पहुँचाने से इनकार करती हैं, किंतु उनके जज़्बे को सलाम कह देने के बाद क्या? हमारे आस-पास, हमारी नज़दीकियों के बीचोबीच, तमाम स्त्रियाँ ऐसी हैं जिनके विवाहेतर यौन-संबंध रहे हैं, ऐसे पुरुषों की भी कमी नहीं है। वे सभी तिरस्करणीय ही होते हैं, ऐसा भी नहीं है—अनेक अपने पूरे रुआब और सम्मान के साथ परिवार और समाज के बीच विराजमान हैं। कोई भी नियम ऐसा नहीं है जिसका पालन या भंग सर्वत्र और सर्वदा एक जैसी प्रतिक्रिया जगाता हो।
भारतीय समाज की ‘बहुलता’ की चर्चा होती है, किंतु स्थानीय अनुकूलन में निहित उसकी शक्तियों की पहचान का अभाव है। ‘समाज’ क्या है... यह विश्वविद्यालयों के समाज-शास्त्र विभागों के अनुसंधाता नहीं तय करते, ज़मीनी सच्चाइयाँ तय करती हैं। और क्या स्वीकार्य है, क्या नहीं, यह भी ज़मीन ही तय करती है। नायाबों का बसाव भी मामूल की बस्ती में ही होता है।
आठ
मृदुला गर्ग ने एक महत्त्वपूर्ण लेखक होने के सारे परिणामों का सामना किया है—षड्यंत्र से लेकर सम्मान तक से मुक़ाबिल रही हैं। उनके लेखन के छपने और अनूदित होने के क़िस्से भी इस किताब में हैं और साहित्य, समाज तथा इनके अंतःसंबंधों के बारे में बहुत कुछ बयान कर जाते हैं।
बड़ा दिखने के लिए छोटी हरकतें करने वाले हर क्षेत्र में होते हैं और लेखक-समाज में भी हैं। इसलिए नंदकिशोर आचार्य या सीमा सहगल की कारस्तानियाँ अफ़सोसनाक होने के बावुजूद हैरतनाक नहीं लगीं। पर मुझे नहीं लगता कि ‘मशक’ के लिए mussick के चुनाव पर इतनी झिकझिक की कोई ज़रूरत थी—यह शब्द अँग्रेज़ी का नहीं है, ‘मशक’ का ही साहबी उच्चारण है और मेरे पास लंदन में छपा किपलिंग की बीस कविताओं का जो संग्रह है, उसमें इसका अर्थ स्पष्ट करने के लिए फ़ुटनोट में water-skin दिया हुआ है। इसलिए किपलिंग साहब ने भले ही ‘बिना खुलासा किए’ (पृष्ठ 332) इस शब्द का इस्तेमाल किया हो, उनके प्रकाशक ने अँग्रेज़ पाठक के लिए इस शब्द का खुलासा करना ज़रूरी माना था—कुछ ऐसा ही इस अनुवाद में भी हो सकता था।
जो सवाल है वह शायद यह कि अँग्रेज़ी में ‘मशक’ या ‘भिश्ती’ के लिए शब्द है क्यों नहीं। जहाँ तक मैं समझ पाया, यूरोप में नहाना-धोना, मुँह पोंछना जैसी क्रियाएँ बहुत बाद में पुरबियों की देखा-देखी शुरू हुईं और कच्ची सड़क पर छिड़काव की कोई परंपरा कभी थी नहीं। लेकिन अल्लाह बेहतर जानता है।
नौ
जब ‘धार्मिक’ होना शर्म की बात समझी जाए तो यह साबित करना भी ज़रूरी होता है कि मैं धार्मिक नहीं हूँ—और यह सबसे आसान कामों में से है जो एक ब्राह्मण जनेऊ उतारकर या एक जैनी चिकन खाकर कर सकता है। ‘मैं वह नहीं हूँ जो तुम समझते हो’ कहने के तरीक़े आसान हैं—मक़बूल फ़िदा हुसैन की तरह चप्पल उतारकर रहिए, या लँगोटी पहने कॉलेज चले जाइए; किसी ने टोक दिया तो आप सफल क्रांतिकारी, किसी ने न टोका तो आपका ग़ुब्बारा फुस्स। वक़्त देखकर तय करना पड़ता है कि आप कैसे अलग दिखेंगे—पियक्कड़ों के बीच मिनरल वाटर माँगकर या शेरी पेश किए जाने पर व्हिस्की माँगकर।
‘धार्मिक’ होने के आरोप-पत्र के जवाब में मृदुला गर्ग ने सिर नीचा नहीं किया है और न ही ‘आध्यात्मिक अनीश्वरवादी’ क़िस्म की कोई गढ़ंत अपने पर ओढ़नी चाही है। उनका ॐ-कार-जप बंद आवाज़ को खोलने के लिए भी है और पहाड़-समुद्र-गगन-वन से तालमेल बिठाने के लिए भी—भागवत-पाठ पारिवारिकता की एक शर्त निभाना है। बिना इसकी परवाह किए कि गायत्री मंत्र पढ़ने का ‘अधिकार’ स्त्रियों को है कि नहीं, उसे लोरी की तरह इस्तेमाल करना भी ख़ुशगवार है। इससे अधिक, या इससे कम, धार्मिकता भारतीय परिप्रेक्ष्य में असंतुलन ही है। मुझे इन संस्मरणों में कुछ जैन संतों के भी ज़िक्र की उम्मीद थी जिनके प्रति मृदुला गर्ग का सम्मान सु-विदित चाहे न भी हो, अ-विदित नहीं है—तब हम ‘साध्वी बनाने की कुप्रथा’ के अतिरिक्त भी कुछ उन जैनियों के बारे में समझ पाते जो शिवमंदिर जाने से परहेज़ नहीं करते।
बहरहाल, ‘मैं बचपन से ही रुढि-तोड़क थी’ के दावों से खाली भी एक ज़िंदगी कोई लेखक जी सकता है तो लेखन के लिए अच्छा ही है। लेकिन मैं पुस्तक के पृष्ठ 310 से एक उद्धरण देना चाहता हूँ जिसमें मृदुला गर्ग ने अपने एक लेख के छपने के बारे में लिखा है :
मुद्दा यह था कि बीफ़ खाने न खाने का मसअला मज़हब ही नहीं जीभ के स्वाद से भी तअल्लुक़ रखता था। उसे खाने वाले हिंदू उतने ही कठमुल्ला हो सकते थे जितने न खाने वाले। हैरान करने वाली बात यह थी कि ‘द वायर’ जैसी प्रगतिशील वेबसाइट ने मुझसे बिना पूछे आलेख में ‘बीफ़’ को ‘मीट’ कर दिया। यानी उसका निहितार्थ, भावार्थ, या सतही अर्थ बेमानी कर दिया। क्यों? क्या वे यह कहने से डर गए कि भारतीय कोंसुलेट में बीफ़ पकाया गया था? वजह जो थी, मन बेहद खट्टा हो गया।
‘वजह’ किसी को भी साफ़ होनी चाहिए। आहार के राजनैतिक उपयोग सु-विदित हैं—बीफ़ का मसअला न मज़हब का है, न स्वाद का, इसका एकमात्र उद्देश्य हिंदू को नीचा दिखाना होता है। सरदार ख़ुशवंत सिंह—जिनके स्वागत में यह बीफ़-पार्टी दी गई थी ने सिखों के इतिहास पर एक किताब लिखी है और उसमें बताया है कि अब्दाली ने जब हरिमंदिर साहब पर आक्रमण किया तो उसके सरोवर को भ्रष्ट करने के लिए उसमें गायें काट कर फिंकवा दी थीं। जो गोवध अब्दाली के समय में सिखों का अपमान करता था क्या वह अँग्रेज़ों के आने के बाद से सिखों के लिए सम्मानजनक हो गया? अँग्रेज़ों ने भी नंदकुमार को फाँसी देने के पहले उनका जनेऊ उतार फेंका था और 1857 जीतने के बाद ग्रामीणों को फाँसी देने के पहले उनके गलों में बेयोनेट से गोमांस ठूँसना ज़रूरी माना था—स्वाद के लिए नहीं, मज़हब के लिए नहीं—हिंदू का अपमान करने के लिए। गो-वध और ब्राह्मण का जनेऊ तोड़ना, ये दो तरीक़े केवल हिंदू का अपमान करने के लिए अपनाए जाते हैं—कोई और कारण इनके पीछे नहीं होता।
‘भारतीय दूतावास में बीफ़ पकने’ से कोई क्यों डरेगा—आख़िर गोवा भारत में ही है जहाँ बैठकर बीफ़ खाने का वीडियो रामचंद्र गुहा अपलोड करते हैं। वह न स्वाद के नाते ऐसा करते हैं, न मज़हब के नाते, वह केवल हिंदू का अपमान करने के लिए ऐसा करते हैं जैसे विद्यापति की ‘कीर्तिलता’ में ब्राह्मण-पुत्रों को बुलाकर उनके माथे पर पके हुए गोमांस की हाँड़ी चढ़ाने वाले तुर्क करते थे। यह हठाग्रह अकारण नहीं है—इस दुनिया में सिर्फ़ हिंदू ही बच रहे हैं जो अपना ख़ुदा ख़ुद तराश सकते हैं। तो जैसा कि अल्लामा इक़बाल ने फ़रमाया है, मख़लूक़ ख़ुदाबंदों के पैकर तोड़ना ही ईमानवालों का काम है।
एक विशुद्ध राजनीतिक कृत्य को और विस्तार देने के लिए ही ‘द वायर’ ने ऐसा किया—‘प्रगतिशील’ तर्कणा में ‘बीफ़’ को ‘मीट’ में बदलना सहज स्वाभाविक था। यद्यपि भारत में मांसाहारी हमेशा से—और कसरत से—रहे हैं, ओविड के ज़माने से ही ‘भारतीय’ की पहचान ‘शाकाहारी’ के रूप में है—सेनेका के बाप ने अकारण ही नहीं सेनेका का शाकाहारी रहने का संकल्प तुड़वाया था। भारत शाकाहारी रहने के नाते ही मांसाहारी पश्चिम से पिछड़ा है, यही प्रगतिशील विचार है जिसके तहत राजा राममोहन राय के हिंदू कॉलेज के विद्यार्थी पड़ोसियों के घर में गोमांस फेंकते थे ताकि विधवा बुआओं, बहनों, बेटियों के एकादशी-प्रसाद भ्रष्ट हो जाएँ। ‘द वायर’ ने कुछ अप्रत्याशित नहीं किया।
महाराष्ट्र में एक सरकारी नियम था—शायद अभी भी हो—कि जैनियों के एक पर्व के दौरान उनकी भावनाओं का ख़याल रखते हुए पशु-वध और मांस-विक्रय पर कुछ दिनों का प्रतिबंध रहता था। कुछ समय पूर्व शिवसेना ने इसके विरुद्ध आंदोलन किया था और उन्हीं दिनों में हर आते-जाते को पकड़कर चिकन खिलाने की कोशिश करते थे। यह न स्वाद के नाते था, न मज़हब के नाते—जिस नाते था, उस नाते नहीं होना चाहिए था।
जो भी हो, ख़ुशवंत सिंह की थाली से बीफ़ निकालकर बाक़ी तर माल अपने सामने खींच लेने के लिए मृदुला गर्ग निश्चय ही धन्यवाद की हक़दार हैं—कम-अज़-कम उनकी ओर से जिनका अस्तित्व बीफ़ खाने का मुहताज नहीं है।
दस
इधर ‘हिंदी’ की बात करना सांप्रदायिक माना जा रहा है और सामाजिक समरसता लाने के लिए अरबी-फ़ारसी के शब्दों का बेबूझ इस्तेमाल फ़ैशन में है, किंतु मृदुला गर्ग की भाषा में ‘उर्दू के शब्द’ बहुत पहले से रहते आए हैं और किसी आग्रह के अधीन नहीं हैं। इसलिए यह जानकर बुरा लगा कि उनकी एक रचना इस कारण भी एक पुरस्कार के ‘अयोग्य’ ठहराई गई कि उसमें उर्दू के अलफ़ाज़ बहुत हैं। (पृष्ठ 371)
लेकिन तब मैं यह भी चाहूँगा कि ‘पशोपेश’ (पृष्ठ 256) की जगह ‘पसोपेश’, ‘तार्रफ़’ (पृष्ठ 355) की जगह ‘तआरुफ़’, ‘मुनहिस्सर’ (पृष्ठ 77) की जगह ‘मुनहसिर’, ‘तवासुन’ (पृष्ठ 160) की जगह ‘तवाज़ुन’ लिखा जाए, और ‘मुतमईन’ (पृष्ठ 65) अगर ‘मुतमइन्न’ न हो तो कम-से-कम ‘मुतमइन’ तो हो। पृष्ठ 268 पर उर्दू के तीन शे’र दिए हुए हैं—तीनों की चार-पाई नादुरुस्त है और जो एक शे’र दरअस्ल ग़ालिब का ही है, उसका भी पहला मिसरा ता फिर न इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर है न कि तो फिर ना इंतज़ार में नींद आए उम्र भर।
उर्दू शब्दों के मुद्रण में हिंदी मुद्रक अतिरिक्त सावधानी बरतते हैं जिसके चलते ऐसा बराबर होता है कि ‘मुज़ायक़ा’ (पृष्ठ 8) के ‘क़’ से नुक़्ता उड़कर ‘लोगबाग’ को ‘लोगबाग़’ कर दे (पृष्ठ 9) और लेखक की पीठ थपथपाने के लिए ‘क़ामयाब’, ‘क़शिश’, ‘बेलाग़’, ‘वाज़िब’, ‘सितमग़र’ भी अपने ‘उर्दू अलफ़ाज़’ होने के पक्के सबूतों के साथ दिखाई पड़ें। क्या कोई बता सकता है कि एक ढंग का प्रूफ़रीडर हिंदी के प्रकाशकों को क्यों नहीं मिलता?
मुझे इन सबसे बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ा, किंतु जो एक ग़लती मुझे वस्तुतः खटकी वह है किपलिंग की कविता ‘गंगादीन’ का ‘गंगादिन’ लिखा जाना (पृष्ठ 352) जबकि कविता में भी ‘दीन’ का क़ाफ़िया ‘क़्वीन’ से मिलाया गया है जिसके बिना भी एक हिंदीभाषी को यह स्पष्ट होना चाहिए कि कविता जिस व्यक्ति पर लिखी गई है, उसका नाम ‘गंगादीन’ है, ‘गंगादिन’ नहीं।
ग्यारह
इन संस्मरणों में डॉ. एन.सी. जैन का भी संस्मरण है जो आँखों के मशहूर डाक्टर थे और अपनी पत्नी की हत्या के सिलसिले में अपनी प्रेमिका सहित जेल गए थे। जहाँ तक याद है, ‘दिनमान’ में श्रीकांत वर्मा ने इसकी विस्तार से रिपोर्टिंग भी की थी। डॉ. जैन का ज़िक्र इस किताब में जिस तरह आया है उससे कुछ बातें उठती हैं।
हर संघटन में कुछ लोग विशिष्टता से संपन्न होते हैं और उन्हें विशेष महत्त्व प्राप्त होता है। पुलिस और सेना में विशिष्टता दिखाने वालों को पदक, प्रोमोशन और पेंशन में अतिरिक्त बढ़त देकर, खेलकूद में पुरस्कार और नियुक्तियाँ देकर, समाज अपनी कृतज्ञता जताता है। कलाकारों और लेखकों के लिए भी सम्मान जताने के कुछ तरीक़े बने हुए हैं। ठीक इसी तरह, वंचितों के लिए भी समाज कुछ विशेष व्यवस्थाएँ करता है। किंतु इन सबसे उन्हें नागरिक-आचरण में कोई छूट अलग से नहीं मिलती।
लेखन कर सकना एक शक्ति है जो कुछ नागरिकों के पास होती है, कुछ के पास नहीं। इसके होने से लेखक को सम्मान मिलना चाहिए और उसकी आर्थिक स्थिति भी समाज की चिंता का विषय होनी चाहिए, किंतु उसको लेखक होने के नाते कोई विशेष नागरिक-अधिकार नहीं मिल जाते। फ़्रांस में ज्याँ जेने, लूवी आलतूशे और ज़ाक़ दरीदा के पक्ष में सरकारों ने ताक़त झोंकी है, किंतु किसी संवैधानिक शक्ति के पार वे सरकारें भी नहीं गई थीं।
इधर जो एक गुणात्मक परिवर्तन हुआ है वह यह है कि जो पीड़ित है उसे क़ानून तोड़ने पर कम सजा मिलनी चाहिए, क्योंकि क़ानून पीड़कों के बनाए हुए हैं। इसलिए हिंसा की वैधता का निर्धारण जाति, धर्म, रंग आदि के आधार पर होता है। अत्याचार अब कर्मणा परिभाषित नहीं होता, जन्मना परिभाषित होता है।
फिर करुणा भी जन्मकुंडली बाँच कर ही जागती है। इसलिए पृष्ठ 333 पर आया वाक्य—वाक़ई जिस तरह हिंदुस्तान के लोग कश्मीरी हिंदू पंडितों के दर्द से उदासीन रहे, तर्कसम्मत कदापि न था—सच नहीं है—वह न्याय-सम्मत चाहे न हो, पूरी तरह तर्क-सम्मत था। जो ‘बहुसंख्यक’ हैं, उनका दर्द भी कम होगा—उसकी तरफ़ से उदासीन रहना ही तर्क-सम्मत है।
ज़मीर एक पोशाक है जिसे पहनकर शाहंशाह इतराते हैं—दर्शक का काम उसकी प्रशंसा करना है, न कि यह पूछना कि वह है कहाँ!
बारह
‘जब नेहरू जी ने मेरी पीठ थपथपाई’ और ‘जब मैंने अज्ञेय जी को शराब पिलाई’ क़िस्म के संस्मरणों को छोड़ने के बाद हिंदी में कुछ अच्छे संस्मरण-लेखक हुए हैं—अज्ञेय और मनोहर श्याम जोशी का नाम दिमाग़ में आता है, किंतु महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों के बाद मेरी सीमित पढ़ाई में ऐसे संस्मरण पहली बार इस किताब में दिखे जिन्हें में ‘औसत की नायाबियाँ’ कह सकूँ। ‘हाथ भर का घूँघट निकालने वाली’ फूलवती देवी के साथ राजमाता जोधपुर की जुगलबंदी हमें हिंदुस्तान के उस हरित प्रदेश की ओर ले जाती है जिससे मुंबई और अमेरिका की ‘टर्फ़ ग्रास’ में निवसता हिंदी साहित्य अभी भी दूर है।
जो कहा जाता है, उससे ज़ियादा कहने से बच जाता है। लेकिन जितना कहा जा सकता है उससे कुछ ज़ियादा ही इन याददाश्तों में कहा गया जिसके लिए हम कृतज्ञ हैं; क्योंकि ज़िंदगी एक की ही क्यों न हो, उसे जीते सभी हैं।
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