अष्टभुजा शुक्ल के बेला
होली खेलें रघुवीरा अवध में
बसंत को लेकर अब तक इतना गाया-बजाया गया, इतना लिखा-पढ़ा गया, इतना ढोल-नगाड़ा-झाँझ पीटा गया, इतनी धुन-रागिनियाँ बनीं—फिर भी आज तक न तो कोई इससे ऊबा और न उकताया। ऐसा क्या है कि पपीहे और कोयल की एक ही रट भ
ओ इरशाद, प्यारे इरशाद! अलविदा!
ओ अज़ीज़ इरशाद खान सिकंदर! ओ बुजुर्गों की तमीज़ से भरे युवा इंसान और शाइर-कवि! यह अचानक क्या! तुम्हारी हमेशा-हमेशा की ख़ामोशी हमें बहुत सताएगी यार! हमें फ़ख़्र है कि दिल्ली में दिल जीतने