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भर्तृहरि के उद्धरण

यह असार संसार; जिसकी अंत अवस्था अतिचंचल है, उसमें पंडितों के लिए दो ही सुलभ गति हैं कि या तो तत्त्वज्ञानरूपी अमृत रस में स्नान करने वाली निर्मल बुद्धि से उनका काल अच्छा व्यतीत होता रहे, अथवा सुंदरकामिनी जो कि पुष्ट स्तन और जघन से भोग में सुखदायी हैं; उनके शरीर पर हाथ दिए, चंचलता से उद्योग में तत्पर रहते हुए उनका काल भली-भाँति व्यतीत होता रहे।