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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

मनुष्य को ईश्वर का अनुभव करके ही दिव्य बनना है। मूर्तियाँ, मंदिर, गिरजाघर या किताबें—ये सब केवल उसके आध्यात्मिक बचपन के सहारे और सहायता के साधन हैं।