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स्वामी विवेकानन्द के उद्धरण

कर्तव्य शायद ही कभी मधुर होता है। यह तभी सुचारू रूप से चलता है; जब प्रेम इसके पहियों को चिकनाई देता है, अन्यथा यह निरंतर घर्षण होता है।