कर्म का चरित्र पर प्रभाव ही वह सबसे बड़ी शक्ति है, जिससे मनुष्य को निपटना पड़ता है। मनुष्य मानो एक केंद्र है, जो ब्रह्मांड की सभी शक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करता है और इस केंद्र में उन सभी को मिलाकर एक विशाल धारा में फिर से प्रवाहित करता है। ऐसा केंद्र ही वास्तविक मनुष्य है—सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और वही इन शक्तियों को अपनी ओर खींचता है।