noImage

गवरी बाई

1758 | डूंगरपुर, राजस्थान

'वागड़ की मीरा' के उपनाम से भूषित। राजस्थान की निर्गुण भक्ति परंपरा से संबद्ध।

'वागड़ की मीरा' के उपनाम से भूषित। राजस्थान की निर्गुण भक्ति परंपरा से संबद्ध।

गवरी बाई के दोहे

बन में गये हरि ना मिले, नरत करी नेहाल।

बन में तो भूंकते फिरे, मृग, रोझ, सीयाल॥

छापा तिलक बनाय के, परधन की करें आसा।

आत्मतत्व जान्या नहीं, इंद्री-रस में माता॥

गवरी चित्त तो है भला, जो चेते चित मांय।

मनसा, वाचा, कर्मणा, गोविंद का गुन गाय॥

अड़सठ तीरथ में फिरे, कोई बधारे बाल।

हिरदा शुद्ध किया बिना, मिले श्री गोपाल॥

बावन अक्षर बाहिरो, पहुँचे ना मति दास।

सतगुरु की किरपा भये, हरि पेखे पूरन पास॥

साखी आँखी ज्ञान की, समुझि देख मन मांहि।

बिनु साखी संसार का, झगड़ा छूटत नाँहि॥

गवरी चित में चेतिऐ, लालच लोभ निवार।

सील संतोष समता ग्रहे, हरि उतारे पार॥

दरी में तो बहू दिन बसे, अहि उंदर परमान।

दरी समारे मिले, सुनियो संत सुजान॥

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

Recitation

जश्न-ए-रेख़्ता (2023) उर्दू भाषा का सबसे बड़ा उत्सव।

पास यहाँ से प्राप्त कीजिए