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शहर में होना कैसा होता हैं?

shahr mein hona kaisa hota hain?

अवनीश यादव

अवनीश यादव

शहर में होना कैसा होता हैं?

अवनीश यादव

और अधिकअवनीश यादव

    घर से निकलते हुए ही महसूस करता हूँ

    घर की कमी, कमरे का नीला रंग,

    रसोई की रोटी, माँ की आवाज़,

    घर के साथ

    सड़क के फासले,

    जैसे-जैसे बढ़ते हैं

    वैसे-वैसे रुकती है मेरे दिल की धड़कने

    घड़ी में भी 5 बज गए हैं और अब सुबह हो चली है

    घर से निकला था, तो शायद रात ही थी

    मैं जब अपनी उम्र के अठारहवें में था

    तो अँधेरे से डरता रहता था,

    डर को ही महसूस करता रहता था

    कि अँधेरा से थोड़ा सहम जाता हूँ

    लेकिन अब 25 का हो गया हूँ

    अब मुझें दिन के उजाले से डर लगता है

    ये डर शायद मेरी उम्र के पड़ाव से ही जुड़ा है,

    घर से निकल तो गया हूँ

    ट्रेन में भी बैठ गया हूँ लेकिन कुछ है जो

    छूट रहा है घर में ही मेरे,

    शायद मेरा दिल?

    रेलगाड़ी की खिड़की वाली सीट पर बैठ गया हूँ

    और जैसे-जैसे रेलगाड़ी आगे बढ़ती है

    वैसे-वैसे मैं कुछ न कुछ पीछे ही छोड़ता हूँ,

    कभी माँ के चूड़ियों की आवाज़,

    तो कभी पिता जी के साइकिल में लगे

    पैडल के खट-खट की आवाज़,

    तो कभी-कभी दादा जी का वात्सल्य,

    धीरे-धीरे ये सब धूमिल होता जाता हैं

    एक-एक करके,

    थोड़ी ही देर में

    खिड़की से देखते हुए,

    खेत की हरियाली, मिट्टी की ख़ुशबू

    और हवा में बिखरी गाँव की महक,

    मुझे खींचती है अपनी तरफ़

    और अब ना चाहते हुए भी

    मैं शहर की तरफ़ बढ़ता जा रहा हूँ

    लो अब शहर भी आ गया,

    लेकिन मैं गाँव में ही छूट गया हूँ

    कहीं नदी के किनारे,

    या किसी जंगल के बीचों बीच,

    या अपने ही घर माँ के आँचल में

    या फिर पिता जी के साइकिल के पीछे,

    या दादा जी का डँडा पकड़े,

    शहर के बिल्कुल केंद्र में खड़ा तो हो गया हूँ

    लेकिन शायद यह मैं नहीं हूँ

    यह मेरा ही कोई हमशक्ल है

    जो बस मंज़िल तक साथ खड़ा है

    क्या ऐसा होना ही,

    शहर में होना होता होगा...?

    स्रोत :
    • रचनाकार : अवनीश यादव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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