रउँए से सीखनी हम परेम के ककहरा
raune se sikhni hum parem ke kakahra
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
रउँए से सीखनी हम परेम के ककहरा
raune se sikhni hum parem ke kakahra
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
रउँए से सीखनी हम परेम के ककहरा।
आज काहे बइठल बा आँखिन पर पहरा॥
अढ़ाई अच्छिरया के अरथ सभ समुझला पर
सबद-के रूप में रंगा जाला चेहरा॥
एक तरफा रोग ना ई लागेला सबका
हियरा के आगि ई लहोक मारे दोहरा॥
भीतरे में कुलबुल कुछ होत बा लहरियन क
पपनी पर औंस लेखा लोर झांके बहरा॥
नयनन के भाषा से आसा-पियास जागे
पासा फेंका जाता दिन यां दुपहरा॥
आख ना खेलावत में कान के महातम बा
छूटी सभ परेम कवनो लाग जाई लहरा॥
अजुबे पीरितिया के रीति देखनी आजुकाल्ह
जर रहल गुलाब-बाग अईठत जड़-मोहरा॥
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 8)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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