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घाटों पर बदलता बनारस

चइत की एक शाम अस्सी घाट पर

चइत [चैत] चल रहा है। गुलमोहर में लाल-लाल फूल आ गए हैं। महुए रस से भर गए हैं। दिन-रात टप-टप-टप चू रहे हैं। आम के मंज़र अब टिकोरे में बदल गए हैं। गेहूँ की बालियाँ पक गई हैं। तरबूज़, खीरे, ककड़ी और बेल से ठेले सज गए हैं। शिकंजी, बर्फ़, लस्सी, छाछ के ग्राहक बढ़ गए हैं। सूरज दादा अपने फ़ुल फ़ॉर्म में आ गए हैं।

दिन में घर से निकलना लगभग मुश्किल हो गया है। पेड़ की छाँव भी अब रास नहीं आ रही। हवाएँ लू में बदल गई हैं। पानी की टंकियाँ उबलने लगी हैं। कमरे तपने लगे हैं। घर-बाहर चइत महाराज का प्रभाव है।

बिस्तर अब गर्म रहने लगा है। लेटते ही उठ जाने का जी होता है। रात का समय है। चाँद अपने उरोज पर है। चाँद की रोशनी में किताब के काले अक्षर पढ़े जा सकते हैं। परछाइयाँ देखी जा सकती हैं, वैसे ही जैसे दिन में देखी जाती हैं। घाट पर आते-जाते मुसाफिरों के चेहरे पहचाने जा सकते हैं।

सामने गंगा है। चंद नावें हैं। कुछ खड़ी, कुछ बँधी, कुछ चल रही हैं। सामने की नाव पर चाँद की किरणें पड़ रही हैं। इन किरणों के स्पर्श से गंगा और नाव, दोनों प्रफुल्लित हैं। अद्भुत दृश्य है। मोटरवाली नाव चंद सवारियों को लिए फ़र्राटेदार ढंग से दादागिरी दिखाती, बाजा बजाती इधर-उधर दौड़ रही है। एक नाव पर माँझी बैठा है। शायद मछलियों के लिए जाल लगा रहा है। नाव और मछलियाँ ही उसका जीवन हैं। वह दिनभर गंगा में रहता है। सवारियों को घुमाता है।

पहले माँझी सवारियों को पार उतारता था, यानी नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे पर ले जाता था। तब गंगा पर पुल नहीं थे। थके-हारे राही अबेर-सबेर, दिन-दुपहर, कभी भी घाट पर पहुँच जाते थे। माँझी को आवाज़ लगाते थे। खाना, पीना, उठना-बैठना, सोना-जागना, सबकुछ छोड़कर माँझी यात्री को गंगा पार कराता था, जिससे उसे अपार संतुष्टि मिलती थी। यात्री उसके कृतज्ञ होते थे, ख़ासकर वे यात्री जो रात के पहर आते थे। रात में नाव चलाना हर नाविक के बस की बात नहीं होती थी। कुछ निडर और इरादे के मज़बूत नाविक ही पतवार पकड़ते थे।

अब समय बदल गया है। गंगा पर पुल बन गया है। अब लोगों को पार नहीं उतरना है। उन्हें घाट-घाट घूमना है। किसी को कहीं जाने की जल्दी नहीं है। उन्हें बस दृश्य का आनंद लेना है। लगभग सबकुछ बदल चुका है। लेकिन गंगा, नाव, मछलियाँ और माँझी आज भी नहीं बदले हैं।

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नागाओं के प्रवास के दौरान घाट यात्रा

बनारस के घाट मल्टीपरपज़ घाट हैं। यहाँ मल्टीटैलेंटेड लोग आते हैं और मल्टीटास्किंग करते हैं। यहाँ रागी, विरागी, आध्यात्मिक, संत, असंत, पॉकेटमार, ठग—सभी यूँ ही टहलते मिल जाते हैं। यहाँ के एक घाट पर चिता जलाई जाती है तो वहीं सौ क़दम की दूरी पर चिंता की अग्नि भी जलती दिखाई देती है। चिता की अग्नि में मनुष्य मरने के बाद जलता है और चिंता की अग्नि में मनुष्य जीते-जी जलता है।

हरिश्चंद्र घाट और महानिर्वाणी घाट आस-पास ही हैं। हरिश्चंद्र घाट पर चिता जलाई जाती है। मिथकों के अनुसार, यह वही घाट है जिस पर राजा हरिश्चंद्र डोम बनकर लाशों को जलाने के लिए कर वसूल किया करते थे। यह घाट डोम जाति का था, लेकिन जब से राजा हरिश्चंद्र ने इस पर डोम बनकर कर वसूल किया, तब से यह हरिश्चंद्र घाट के नाम से जाना जाने लगा। यहाँ समय के हर पहर चिता जलती रहती है। मज़े की बात है कि यहाँ लोग चिता की अग्नि और चूल्हे की अग्नि में कोई फ़र्क़ नहीं करते। चिता जलती रहती है और लोग बग़ल में ही चाय, पकौड़ी, चिप्स, फल, जूस खाते-पीते रहते हैं। दुकानें गुलज़ार रहती हैं। समझना मुश्किल हो जाता है कि चिता पर लेटा मनुष्य इन पर हँस रहा होता है या ये लोग चिता पर लेटे मनुष्य का मज़ाक़ उड़ा रहे होते हैं। लोग प्रकृति के जन्म और मृत्यु के नियम से डरकर ऐसा करते हैं या इन्हें शाश्वत ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होती है।

महानिर्वाणी घाट बहुत ही सुंदर और बड़ा घाट है। इसका संबंध अघोर संप्रदाय से है। यह अमूमन शांत ही रहता है। लेकिन कुंभ लगने से लेकर अभी तक यह अशांत बना हुआ है। बड़ा घाट होने के कारण कुंभ से आए अधिकतर नागा साधुओं ने अपना जमावड़ा इसी घाट पर जमाया था। कुंभ तो ख़त्म हो गया, शिवरात्रि और होली भी ख़त्म हो गईं, लेकिन कुछ नागाओं की नागा आराधना अभी तक ख़त्म नहीं हुई है। इनमें कुछ नागाओं की आराधना अब आध्यात्मिक साधना से अधिक नग्नता के प्रदर्शन में बदल गई है।

नागा शब्द ही नागाओं के लिए कपड़े का कार्य करता है। समाज उन्हें आदर-सत्कार देता है, क्योंकि भौतिकता के धरातल से उठकर ही वे आध्यात्मिकता को पाते हैं। लेकिन जब वही नागा आध्यात्मिकता का चोला लपेटकर भौतिकता को पाने के लिए नंगई करने लगते हैं, तब वे शारीरिक और आध्यात्मिक, दोनों तरह से नंगे हो जाते हैं और नग्नता को प्राप्त करते हैं। वे गृहस्थ मनुष्य से भी नीचे गिर जाते हैं। समाज उन्हें दुत्कारने लगता है। लेकिन आज समाज बचा ही कितना है? समाज का अस्तित्व ख़तरे में है। पूँजीवाद ने समाज को व्यक्ति में बदल दिया है। आज सिर्फ़ व्यक्ति बचा है—अकेला, तन्हा, परेशान। जो अपनी तन्हाई और परेशानी के आगे सही-ग़लत देखने और समझने की स्थिति में नहीं है। इसी व्यक्ति का शिकार आज के धर्म के ठेकेदार कर रहे हैं। फिर वे नागा हों, संत हों, महंत हों या सत्ताधारी हों।

अधिकतर नागा तो चले गए। कुछ ही बचे हैं, जिनकी आराधना देखकर मैं चकित रह गई। सामने यज्ञ की जलती वेदी, एक हाथ में मोबाइल, जिस पर धर्मभीरु भक्त ऑनलाइन माध्यम से जुड़े हुए थे। दूसरे हाथ में समिधा डालने का यंत्र। मुँह से कभी ईश्वर के लिए मंत्र निकलते तो कभी भक्त के लिए सलाह। दोनों अनवरत एक साथ।

समझ नहीं आता, मनुष्य एक साथ बुद्धिमान और मूर्ख दोनों कैसे हो जाता है! वर्चुअल भक्ति कौन-सी भक्ति है? अभी तक तो भक्तों को मंदिर के द्वार पर माथा पटकते देखा था। इसमें इतना तो था कि व्यक्ति घर से निकलकर मंदिर तक जाता था, कुछ कर्म करता था। लेकिन वर्चुअल में कौन-सा कर्म हो रहा है? जब कर्म नहीं, तो फल कैसा? सारा कर्म तो पूँजीपति महाराज का नेटवर्क कर रहा है और बचा-कुचा कर्म नागा महाराज कर रहे हैं, तो ज्ञानी मनुष्य, फल तुम्हें कैसे मिलेगा? और सारे कर्म में लगने वाला पैसा तुम दे रहे हो। दिमाग़ की सभी खिड़कियाँ बंद कर खुले हाथ से पैसा लुटा रहे हो। और तो और, तुम यह पूजा-पाठ, सारा कर्मकांड और अधिक पैसा कमाने के लिए ही कर रहे हो। ज़रा सोचो, तुम क्या कर रहे हो!

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बनारस के घाट इतिहास के अजायबघर है

बनारस के घाट सिर्फ़ घाट नहीं हैं। ये इतिहास के अजायबघर हैं। हर घाट का अपना एक इतिहास है। घाट का हर पत्थर, पत्थर से बने क़िले, मंदिर, चबूतरे और यहाँ तक कि सीढ़ियाँ भी इतिहास से लबरेज़ हैं।

कहने को तो ये सभी बनारस के घाट हैं, लेकिन इनका इतिहास समस्त भारत से जुड़ा है। भारत के हर कोने से आकर लोगों ने इसे बुना है। जैसे चेतसिंह घाट, राजा घाट, मान मंदिर घाट, मीर घाट, तुलसी घाट, राजेंद्र प्रसाद घाट, हरिश्चंद्र घाट, मणिकर्णिका घाट आदि। ये सभी ऐतिहासिक घाट हैं। इनके साथ भारत का इतिहास जुड़ा है।

नदी मुझे हमेशा से आकर्षित करती रही है। नदी के कारण ही घाट से भी संबंध जुड़ा। घाटों की सैर करना अब मेरी आदत-सी हो गई है।

ऐसे ही एक सैर के दौरान ‘निषाद राज’ घाट पर पहुँच गई। वैसे तो कई बार इस घाट से गुज़री हूँ, लेकिन कभी इसका इतिहास जानने की कोशिश नहीं की। घाट से गुज़रते समय अचानक ही जब सीढ़ियों पर लिखे इतिहास के टुकड़े दिखे, तो ऊपर स्थित मंदिर के इतिहास को जानने से ख़ुद को रोक न सकी। ऊपर गई। एक मंदिर देखा, जोकि ‘निषाद राज’ का था। इतिहास पढ़ा और कई नाविकों से घाट और मंदिर से संबंधित बातें कीं। उनके व्यवसाय और जीवन-शैली पर चर्चा हुई।

इस घाट पर अधिकतर घर निषादों के ही हैं, जो कि बीसवीं शताब्दी से भी पहले से यहाँ रह रहे हैं। बीसवीं शताब्दी में इस घाट का नाम ‘निषाद घाट’ किया गया।

बनारस के घाटों पर तीन जातियाँ अधिक संख्या में रहती हैं—निषाद, डोम और चमार। इन सभी का अपना-अपना घाट है। जैसे हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट के आस-पास डोम और चमार जाति का निवास है। निषाद घाट पर निषाद जाति का।

संवाद से निष्कर्ष निकला कि ‘निषाद बाँसुरी’ अब उतनी सुरीली नहीं रह गई है, जितनी कि कभी कुबेरनाथ राय ने लिखी थी। बाँसुरी से अब सुरीली आवाज़ों की जगह नगर निगम और सत्ता की गलियों से आने वाले फ़रमानों की धुनें निकलती हैं, जिससे यह समुदाय डरा-सहमा रहता है। न जाने कब नावों पर टैक्स लग जाए, न जाने कब घाट पर टैक्स लगा दिए जाए। न जाने कब इनकी नावें नदी से सड़क पर आ जाएँ, न जाने कब इनके जालों को जला दिया जाए और न जाने कब इन्हें कारागार में भेज दिया जाए।

हालाँकि सबकी स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ इन फ़रमानों के डर से ऊपर उठ चुके हैं, क्योंकि वे धन-कुबेर बन चुके हैं। अपवाद तो हर जगह होते हैं। यहाँ धन-कुबेरों की बात नहीं हो रही है। यहाँ उनकी बात हो रही है, जिनकी संख्या अधिक है, जो ग़रीब हैं और हाशिए पर हैं।

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