Font by Mehr Nastaliq Web

ममता कालिया के नाम एक छात्र का खुला ख़त

आदरणीय ममता कालिया जी,

नमस्कार!

“रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों।”

विद्यानिवास मिश्र के निबंध ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ की इन पंक्तियों से बात शुरू करने का कारण है—एक हादसा। ऐसा हादसा, जिसने मुझे लिखने पर मजबूर कर दिया। और क्यों न लिखूँ? वे छात्र भी तो अपने भाई ही थे। अब ‘थे’ का अर्थ तो आप समझ ही गई होंगी।

जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ गत 6 सितंबर वाली घटना की; जो दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस में घटी, जिसमें एक जर्जर पीजी ताश के पत्तों की तरह ढह गया और जिसकी तस्वीरें भुलाए नहीं भूलतीं। वहीं दूसरी ओर 8 सितंबर को उसी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में ‘विकसित भारत : हिंदी भाषा और साहित्य’ का कार्यक्रम हुआ। आपको तो पता ही होगा कि इस कार्यक्रम में स्वर्गीय जगदीश मित्तल जी आने वाले थे। हालाँकि उनका निधन 3 सितंबर को ही हो गया। उनके जाने की सूचना मिली तो लगा कि इस कार्यक्रम को टाल दिया जाएगा। पर ऐसा नहीं हुआ।

ममता जी, आख़िर क्या ग़लती थी उन छात्रों की? वे न जाने कितने सपने लेकर आए होंगे? डीयू जाकर ये करेंगे, वो करेंगे! पर हुआ क्या? जिसकी भनक उन मासूमों को सपने में भी नहीं थी। उन्होंने तो रील्स और टेलीविजन पर बड़ा नाम सुन रखा होगा। फ़ेस्ट की वीडियोज़ भी देखी ही होंगी। लेकिन उन्हें क्या पता था कि सच्चाई तो कुछ और ही है? वे जब यहाँ आए होंगे और उन्हें ‘खोखानुमा’ कमरा मिला होगा, तब जाकर उन्हें डीयू का पता चला होगा। ऐसा नहीं है कि उन्होंने कम रुपये दिए होंगे। बीस-इक्कीस हज़ार से कम में कोई पीजी तो मिलता ही नहीं है। ऊपर से एक महीने की सिक्योरिटी-मनी और महीने भर का एडवांस। विडंबना देखिए कि सिक्योरिटी के नाम पर उनसे हज़ारों ऐंठे जाते हैं और उन्हें सिक्योरिटी के नाम पर ही जान गँवानी पड़ी।

अगर मुझे आकर कोई कहे कि ये तो आकस्मिक घटना है, किसी के साथ भी घट सकती है; तो ऐसी घटनाएँ सरकारी दफ़्तरों और नेतृत्व करने वालों के आलीशान बंगलों में क्यों नहीं घटती? कुछ ही दिन तो हुए हैं न लाइब्रेरी वाली घटना को! वहाँ से भी दिल्ली की बे-हिस सरकार को सीख नहीं मिली। प्रेमचंद के ‘गो-दान’ उपन्यास में रामसेवक नाम का पात्र कहता है न—“किसान इस देश का नरम चारा है।” प्रेमचंद की आत्मा से माफ़ी माँगते हुए, आज मैं यह कहने पर विवश हूँ—“छात्र इस देश का नरम चारा है।”

आज तो और ज़्यादा पीड़ा हुई, क्योंकि मध्य प्रदेश के एक पिता की रील देख ली। इस रील में वह कह रहे थे, “अब किसी को दिल्ली नहीं आने दूँगा। दिल्ली भेजा था पढ़ने को, पर घर का चराग़ बुझ गया।”

ममता जी, इस पिता का दर्द वही समझ सकता है, जिसने अपनों को खोया है। हम और आप उनके साथ खड़े हो नहीं सकते, पर उनकी पीड़ा में सम्मिलित ज़रूर हैं। ये उनकी पीड़ा नहीं है, सारे भारत की पीड़ा है। इतना होने के बावजूद कुछ लोग चुप हैं, तो उनकी बे-हिसी को मेरा धिक्कार है।

बतौर हिंदी शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय से भी मुझे शिकायत है। सर, आप तो मंचों से बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, पर कुछ किलोमीटर दूर आपके ही बच्चे नाहक़ दुनिया से चले गए। आपके पास इतना समय नहीं था कि वहाँ जाते? क्या आपको अपनी नाकामी का बोध हो गया था? इसीलिए नहीं गए क्या?

विश्वविद्यालय में जो कुछ अच्छा हो, उसका श्रेय आपको मिलता है; तो ये जो हुआ, इसका श्रेय किसको?

ममता जी, आपसे मेरी शिकायत इसलिए है; क्योंकि आपसे उम्मीद थी। शायद इसी उम्मीद ने यह ख़त लिखवाया है; क्योंकि अगर साहित्य भी ऐसे समय में चुप हो जाए, तो फिर हम जाएँ कहाँ?

मैंने तो बचपन से आपकी कहानियाँ और कविताएँ पढ़ी हैं, उपन्यास भी... इसीलिए आपसे यह सवाल और भी ज़्यादा बेचैन करता है कि आपको नहीं पता था कि सत्य निकेतन में छात्रों के साथ क्या हुआ था? फिर आप दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के कार्यक्रम में आ गईं—वो भी ऐसे समय में, जब इतना भयंकर हादसा हुआ!

आपका आना ग़लत नहीं था, ममता जी। लेकिन शायद इस बार आपका न आना साहित्य के पक्ष में होता। यदि आप आने से इनकार कर देतीं, तो आपका क़द और आला होता।

मैं आपकी कोई आलोचना नहीं कर रहा, मैडम! क्योंकि मेरी बुद्धि उतनी विकसित भी नहीं है। लेकिन मैं कितना ग़लत सुनता था कि साहित्य वाले संवेदनशील होते हैं। एक चींटी के मरने तक से रो पड़ते हैं। पर आपके आँसू तो दूर की बात है, एक कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं कर सकीं। आप कम से कम इसे टाल ही देतीं।

शायद इसलिए ही आपके एक बुज़ुर्ग कह गए हैं—“अधिकांश हिंदी विभाग साहित्य के अजायबघर हैं।”

बहरहाल, आप भी ट्रेंड के हिसाब से चलती हैं.. क्योंकि इस देश में लोगों को फ़ोटो खिंचाने की बीमारी लग गई है। 

और हाँ, शासन-प्रशासन से क्या ही कहूँ? वे इस लायक़ ही नहीं कि उनसे मुझ जैसा अदना विद्यार्थी सवाल कर सके। आप तो अमर हैं। आपको कहाँ फ़र्क़ पड़ता है? बच्चे मरें तो मरें, आपको क्या है? आप तो मस्त होकर अपने आलीशान बंगलों में आराम करिए, क्योंकि आप तो जनता की सेवा कर-करके थक गए हैं।

ऐसे में बस इतना करवा दीजिए कि वो जो आपकी पीली वाली तीन अक्षरों की गाड़ी है न, उसको उन सभी माचिस के डिब्बे वाले पीजी पर चलवा दीजिए, ताकि आगे किसी का लाल न दब जाए। कुछ दिनों के लिए उसे झुग्गियों पर चलवाना बंद करवाकर इन पीजियों पर चलाइए-चलवाइए... 

कहाँ आपको तो भुवनभास्कर होना चाहिए था, पर आप तो विनाशकारक बनते जा रहे हैं।

और ममता जी, शायद मैं बहुत छोटा हूँ... आपको यह सब कहने के लिए। लेकिन एक छात्र होने के नाते इतना तो पूछ ही सकता हूँ कि जब हमारे साथी मर रहे हों, तब एक साहित्यकार आख़िर किसके साथ खड़ा होगा?

आपका पाठक,
एक आहत छात्र

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट