राह में दिअरी जरावे के पड़ी
raah mein diari jarave ke paDi
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
राह में दिअरी जरावे के पड़ी
raah mein diari jarave ke paDi
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
राह में दिअरी जरावे के पड़ी।
रोशनी के फेरू बोलावे के पड़ी॥
ई हवा में हाथ में लेके दीआ
चलके हिम्मत बढ़ावे के पड़ी॥
आदमी में जे सुतल बा आदमी
झोर के ओह के जगावे के पड़ी॥
गाँव के पैरा चाहे शहरू सडक
खाड़ मउअत बा भगावे के पड़ी॥
प्रीत के सौदा कइल ना खेल बा,
दाव पर जिनगी चढ़ावे के पड़ी॥
गजल खाली दरद ना, आवाज ह
फाड़ के सीना देखावे के पड़ी॥
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 30)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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