बहुत घिना के ना, तनिको दुलार के देखीं
bahut ghina ke na, taniko dular ke dekhin
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
बहुत घिना के ना, तनिको दुलार के देखीं
bahut ghina ke na, taniko dular ke dekhin
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
बहुत घिना के ना, तनिको दुलार के देखीं।
जिया में पिआर के दियना त बार के देखीं॥
भरम के भीड़ में आपन पराया भुतला ला
केहू के नांव के सुर में पुकार के देखीं॥
चलत में रूप केतना आँखि में समा जाला
हिया में एगो के मुखड़ा उतार के देखीं॥
चिहिक गईल बा सही में करेज के सीसा
फेरू सहेजि के दरपन सम्हार के देखीं॥
करम-धरम के भरम हम त एतने जानिले
सभे के जोड़ के जिनगी सँवार के देखीं॥
असल में अब अँजोर के समुझ रहल बा 'सतीश'
दुआर खोल के परदा उघार के देखीं॥
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 4)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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