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कवन बन गइलैं ललना हमार हो

kavan ban gailain lalana hamar ho

रामजियावान दास ‘बावला’

रामजियावान दास ‘बावला’

कवन बन गइलैं ललना हमार हो

रामजियावान दास ‘बावला’

और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’

    ऊँच नीच रहिया में अगम बन झार हो,

    कवन बन गइलैं ललना हमार हो।

    लगिहैं पियासि जब तउ पनियाँ पइहैं,

    पथरा पहरवा में कतौं ढँगिलइहैं,

    पैदल पनहियाँ नाहीं गोड़वा उघार हो,

    कवन बन गइलैं ललना हमार हो।

    भूख लगि जाई जब तउ कहाँ किछु खइहैं,

    पेटवा दबाइ के ललन लुलुवइहैं,

    सुनीला की बन में लागैं बघवा हुड़ार हो,

    कवन बन गइलैं ललना हमार हो।

    बरखा तरखा कइसे तन पै अंगेजिहैं,

    केकरा से दुख सुख मोरे लगे भेजिहैं,

    लड़िका उमिरिया अबहीं अति सुकुवार हो,

    कवन बन गइलैं ललना हमार हो।

    मघवा जड़वा लागी हड़वा छेदाई,

    दँतवा पर दाँत बाजी मिली ना रजाई,

    काँपि-काँपि रतिया जूनी होई भिनुसार हो,

    कवन बन गइलैं ललना हमार हो।

    रितु अनरितु में कवन बिधि तुलिहैं,

    गरमी के दिन में गुलाब कइसे फुलिहैं,

    सन सन सनकै लागी तपती बयार हो,

    कवन बन गइलैं ललना हमार हो।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीतलोक (पृष्ठ 39)
    • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
    • प्रकाशन : सेवक प्रकाशन, वाराणसी
    • संस्करण : 1997

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