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इंडियन रेलवे : एक चलता-फिरता समाज

दुनिया और ज़िंदगी को ठहरकर नहीं, घर से निकलकर ही देखा जा सकता है। ज़िंदगी को जानने और समझने के लिए ठहराव ज़रूरी है, लेकिन उम्मीद और नाउम्मीदी से भरी तमाम यात्राओं के बाद। हमारी ज़िंदगी ट्रेन जैसी रफ़्तार से चलती जाती है—कभी बेहद तेज़, तो कभी बेहद धीमी गति से। हर सुबह हम ख़ुद को ज़िंदगी के एक नए प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा पाते हैं। यदि हम देख पाएँ, तो ज़िंदगी के सारे रंग हमारे आस-पास बिखरे पड़े हैं। हर कोई अपनी एक यात्रा में है, भले ही वह ठहर जाने की यात्रा क्यों न हो।

ट्रेन का सफ़र एक ऐसी ही यात्रा पर निकलना है, जो हूबहू जीवन-यात्रा जैसी है। ट्रेन कभी ज़िंदगी की तरह बेहद तेज़ रफ़्तार से भागती है, तो कभी एकदम धीमी गति से चलती जाती है। यह ज़िंदगी की तरह अलग-अलग पड़ावों पर रुकती और चलती रहती है, और इस यात्रा में जुड़ती जाती हैं अनगिनत कहानियाँ—बिल्कुल ज़िंदगी की तरह।

ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन जाते समय भी ऐसा लगता है कि हम एक ऐसी राह की ओर जा रहे हैं, जहाँ से अनेक राहें फूटती हैं। जहाँ से न सिर्फ़ एक निश्चित सफ़र किया जा सकता है, बल्कि हम ज़िंदगी के एक अज्ञात सफ़र पर भी निकल सकते हैं। प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँचते-पहुँचते जीवन की वह तस्वीर सामने आती है, जिससे हम अक्सर मुँह मोड़ना चाहते हैं। मैले कपड़ों में हाथ फैलाकर भीख माँगते बच्चे हमारे समाज के भविष्य की एक भयावह तस्वीर की ओर इशारा करते हैं। बेसहारा छोड़ दी गई दादी-अम्मा का सीढ़ियों पर बैठकर गिड़गिड़ाना और संवेदनहीन भीड़ का सब कुछ नज़रअंदाज़ करके गुज़र जाना, ज़िंदगी की निर्मम तस्वीर को सामने रख देता है।

ट्रेन के भी अलग-अलग प्रकार हैं—पैसेंजर, एक्सप्रेस और सुपरफ़ास्ट। यह वर्गीकरण आवश्यकता और हैसियत का संकेत देता है। यह भी बिल्कुल ज़िंदगी जैसा ही है। वस्तुओं को सहेजने और लोगों का इस्तेमाल करने के इस दौर में यह वर्गीकरण संसाधनों की बढ़ती अहमियत और संवेदनाओं की कमज़ोर होती कड़ियों की ओर इशारा करता है।

ट्रेन का जनरल डिब्बा, आरक्षित कोच और एसी कोच बिल्कुल समाज की तरह हैं। जनरल डिब्बों का ठसाठस भरा होना, आँखों में निराशा लिए शौचालय के पास बैठे लोग और शौचालय की दुर्गंध—समाज की उस बदसूरत तस्वीर की ओर संकेत करते हैं, जिसे लोग नाक बंद करके बिना देखे ही गुज़र जाना चाहते हैं। आरक्षित डिब्बा भारतीय मध्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। थोड़े-से संसाधनों में ख़ुद को ज़िंदगी के द्वार तक पहुँचा हुआ मानने वाले लोग, जिनके पास अदृश्य उम्मीदों का पहाड़ और धुँधले-से जलते-बुझते सपनों की लंबी शृंखला है।

एसी डिब्बा उस भारत की तस्वीर दिखाता है, जिसे हम ‘इंडिया’ कहते हैं। वह इंडिया, जिसने संसाधनों पर अपनी पहुँच बना ली है। जिनके व्यवहार में उस मुस्कुराहट का अभाव है, जिससे एक समाज निर्मित होता है। अपनी दुनिया में खोए हुए लोग विकसित होते आभासी समाज की रहनुमाई करते प्रतीत होते हैं। ट्रेन के सभी डिब्बों से गुज़रते हुए यह जाना जा सकता है कि ट्रेन में वह सब कुछ है, जो समाज में है; और समाज में वह सब कुछ है, जो ट्रेन में है।

ट्रेन की यात्रा की तस्वीरें वह सब कुछ समेटे हुए हैं, जो समाज में उपस्थित है। एक-दूसरे का हाथ थामे प्लेटफ़ॉर्म की सीट पर बैठे युगल को देखकर मुहब्बत भरी दुनिया पर यक़ीन बढ़ता है। वहीं सामान की गठरी और बच्चों को सँभालते विवाहित दंपति ज़िंदगी की जद्दोजहद बयाँ करते हैं। पति-पत्नी इस प्रकार साथ चलते हैं, जैसे साइकिल के दो पहिए। एक की अनुपस्थिति में जीवन-यात्रा की कल्पना असंभव जान पड़ती है। ज़िंदगी की थकान से जूझते बीमार और बेसहारा लोग कहीं पहुँचने की कोशिश में ट्रेन पर चढ़ते जा रहे हैं।

ट्रेन के जनरल और आरक्षित कोच में शोर है—बिल्कुल ज़िंदगी जैसा। वहीं वातानुकूलित कोच में एक अलग प्रकार का सन्नाटा भी है। ट्रेन में निश्छल हँसी है, तो अनगिनत पीड़ाएँ भी; बिछोह का दर्द है, तो मिलन की आस भी। शहर, क़स्बे और गाँवों से गुज़रती ट्रेन समाज की अलग-अलग तस्वीरों से रूबरू कराती हुई आगे बढ़ती जाती है। ट्रेन में वैसी ही गंदगी है, जैसी गंदगी में समाज का एक बड़ा हिस्सा जीने को अभिशप्त है। वहीं ट्रेन का साफ़-सुथरा हिस्सा समाज की उस तस्वीर का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे देखकर स्वर्ग की कल्पना में खोए लोग भी आकर्षित हुए बिना नहीं रह सकते।

ट्रेन भीड़ के बीच अकेलेपन की वास्तविक तस्वीर भी दिखाती है। आस-पास बैठे लोग एक-दूसरे से कटकर आभासी दुनिया में खोए हुए हैं। अधूरेपन से भरे लोग रील्स देखते हुए लगातार स्क्रीन स्वाइप किए जा रहे हैं, मानो न जाने क्या खोज रहे हों। समय के साथ स्टेशनों की तस्वीर और तक़दीर दोनों बदलती जा रही हैं। अत्याधुनिक मशीनें जहाँ ज़िंदगी को आसान बना रही हैं, वहीं कुछ ज़रूरी चीज़ों की अनुपस्थिति एक अनिश्चित और अंधकारमय भविष्य की ओर भी संकेत करती है।

स्टेशनों पर किताबों की समृद्ध दुकानें टूट रही हैं या बंद हो चुकी हैं। जहाँ कुछ किताबें बची भी हैं, उन्हें एक कोने में समेट दिया गया है। उनकी जगह चिप्स, बिस्किट और दूसरे उपभोक्ता उत्पादों ने ले ली है। ट्रेन में अख़बार और किताब पढ़ने की तस्वीरें अब दुर्लभ हो गई हैं। ट्रेन से वह सब कुछ धीरे-धीरे ग़ायब होता जा रहा है, जो समाज और ज़िंदगी से भी ग़ायब हो रहा है—चाहे वह सौहार्द हो या सामूहिकता।

ट्रेन में वे सब कहानियाँ हैं, जो ज़िंदगी में हैं। ट्रेन में भीख माँगते बच्चे, महिलाएँ और बुज़ुर्ग अभाव और पीड़ा की अनगिनत कहानियाँ समेटे हुए हैं। प्रत्येक यात्री के सामने फैली ये बेबस हथेलियाँ न सिर्फ़ समाज और शासन-व्यवस्था, बल्कि पारलौकिक सत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती प्रतीत होती हैं।

ट्रेन की यात्रा पर निकलना जीवन-यात्रा पर निकलने जैसा है। ट्रेन ज़िंदगी जैसी होती है और ट्रेन की यात्राएँ जीवन-यात्रा जैसी ही।

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