बिंदुघाटी 2.0 : बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं
अखिलेश सिंह
19 जुलाई 2026
• इन दिनों पॉपुलर स्पेस में कहीं-कहीं और बहुत सारी बातों के साथ-साथ लोग यह भी कह रहे हैं कि भूख-हड़ताल भारतीय संस्कृति नहीं है। ये कमाल के लोग हैं और कमाल की ही हैं इनकी सांस्कृतिक व्याख्याएँ! इनके इस तर्क से तो यह भी कहा जा सकता है कि लोकतंत्र ही भारतीय संस्कृति नहीं है, क्योंकि महात्मा गांधी ने क़ानून से चलने का दावा रखने वाली शासन-व्यवस्था से अपनी माँगें मनवाने के लिए सत्याग्रह की प्रविधियाँ विकसित कीं। ‘लेक्स-रेक्स’ के आदर्श पर चलने वाली इस देश की व्यवस्था जितनी भारतीय है; उतनी ही उसके समक्ष अनशन, भूख-हड़ताल करके उसे सही राह पर लाने के तरीक़े भी।
गांधी ‘हिंद स्वराज’ में कहते हैं : “सत्याग्रह अपने अधिकार सुरक्षित करने का एक तरीक़ा है और यह स्वयं को पीड़ा में रखकर किया जाता है, यह हथियार उठाकर प्रतिरोध करने के विपरीत है। यह तो हर आदमी मानेगा कि दूसरों को मारने से कहीं श्रेष्ठ है—आत्मबलिदान!”
• अब सब बहुत फूँक-फूँककर चल रहे हैं। उनका तर्क है कि वे अन्ना [हज़ारे] से धोखा खाए हुए हैं, जबकि तक़रीबन पिछले डेढ़ दशकों से वे सोशल मीडिया पर देखे गए हैं—अधिक चर्बीयुक्त, प्रॉपर्टीदार, फ़ेमस, नक़ली, पर्यटन करते और हर तरह से सेटल। यह कैसा धोखा था जिसके चलते वे इतने चैन-ओ-आराम से रहे! कितने नाख़ून कटाए थे उन्होंने अन्ना के साथ और फिर कहाँ गाड़े थे!
वे आख़िर कहना क्या चाहते हैं कि अन्ना के आंदोलन का फ़ायदा उसी पार्टी को मिलना चाहिए था, जिससे बनी सरकार के ख़िलाफ़ वह आंदोलन था!
• दरअस्ल, बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं। इस सभ्यता में अब सब तरफ़ साँप ही साँप हैं... इनके पास और कुछ न सही तो धोखे की एक कहानी ज़रूर होती है, जो इन्हें बेहद यूनीक लगती है। इनके लिए सारी मानवता में कुछ मिलावट है और केवल यही हैं जो चौबीस कैरेट होने के बाद फिर से धरती के गर्भ में चले गए और सुरक्षित हैं।
• सोनम वांगचुक को समझना चाहिए कि हमारा क़बीलाई समाज केवल जाति और धर्म की लड़ाई लड़ता है। इन लड़ाइयों की पैरोडी रचता है। न्याय-योद्धागण दिन भर अपनी-अपनी पार्टियों के लिए यूट्यूब पर नैरेटिव बनाते हैं। यह एक धमकी या एक एफ़आईआर पर बीसियों वीडियोज़ बनाकर लाखों कमाने के फ़र्ज़ी नायकत्व से भरा समय है। यहाँ ‘लड़ने वाला/वाली’ तो वे हैं जो दिनोंदिन पैसे-जुगाड़-सुविधा से लैस होते जाएँ। यह सत्ताई-प्रेतों और ऐसे ही प्रतिनायकों से भरा समय है।
यहाँ सोनम वांगचुक या लेफ़्ट के स्टूडेंट्स—नेहा, मनीष, दानिश, आमीन आदि का क्या काम!
वैसे क्या सोनम वांगचुक की राहुल गांधी से की गई अपील दुर्भावनाग्रस्त थी? क्या जनांदोलन समर्थन और एकता की अपील नहीं करते हैं? इंडिया ब्लॉक क्या है? क्या उसमें तमाम पार्टियाँ नहीं शामिल हैं? आपको समझना होगा कि गठबंधनों में सहमति के कॉमन मिनिमम पॉइंट होते हैं। पूर्ण एकाकार होने की हालत में गठबंधन क्यों होगा, वहाँ तो विलय हो जाएगा। लेकिन वही बात! ये तथाकथित धोखा खाए-अघाए-ऊबे-सुखी-सेटल्ड लोग अपनी-अपनी ठेकेदारियाँ लेकर लखनऊ-पटना और दिल्ली में बैठे हैं। इनके पास हैं पचास-पचीस हज़ार सोशल मीडिया फ़ॉलोवर्स और तमाम अन्य सेटलमेंट्स के बीच कभी-कभार की परफ़ॉर्मिंग राजनीति।
कई राजनीतिक दल कुछ दिनों से जंतर-मंतर पहुँच रहे थे और उनके यूट्यूबिया नायक भी सक्रिय हुए दिखे; क्योंकि वहाँ जमकर बैठ गए लोग अब सोशल मीडिया में ही सही, लेकिन प्रभाव उत्पन्न करने लगे थे। लोग उनकी भूखी-लाचार, लेकिन अडिग मुद्राओं के विजुअल्स देखकर उद्वेलित होने लगे थे। यही वजह है कि सोनम वांगचुक को वहाँ से उठाया गया। सरकार उनके विजुअल्स रोकना चाहती है; उसे पता है कि रील देखने का आदी समाज, कुछ दिन सोनम वांगचुक के रील नहीं पाएगा तो शांत हो जाएगा।
कांग्रेस के बैटर्स शिकायती होकर यह भी कहते आ रहे हैं कि हमने भी बहुत आंदोलन किए—हर ज़िले, हर राज्य में किए। किए... लेकिन अगर आप वैसी अपील नहीं बना पाए तो जिनकी अपील बन रही है, यह उनकी ग़लती है क्या?
आपको समझना होगा कि आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के दौर में आप संबोधित करने के लिए वह स्पष्ट अस्मिता नहीं खोज पाए, जो कॉकरोच जनता पार्टी ने पाई। इतिहास में संभवतः यह पहली बार है, जब बिल्कुल स्पष्ट रूप से पीढ़ीगत अस्मिता का राजनीतिकरण हुआ है। पिछले कुछ सालों में जेन-ज़ी पर सिर्फ़ सबसे ज़्यादा जोक्स ही नहीं बन रहे थे, बल्कि इसी तरह उनकी एक अस्मिता भी निर्मित हो रही थी। यह अस्मिता उतनी ही वर्चुअल है जितना कि हमारा समय; लेकिन फ़िलहाल यह है और भारत में प्रचलित सारी अस्मिताओं के मध्यमवर्गीय युवा इसमें समाहित हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी का दिल्ली में पहला प्रदर्शन ही जेन-ज़ी को संबोधित नारों के साथ हुआ। लेकिन तब से लेकर अभी कुछ दिनों पहले तक हर तरह के अहमक़ लोग इन्हें हवा में उड़ाने पर आमादा थे। लेकिन उन्हें चेहरा मिला सोनम वांगचुक का और मज़बूत साथ मिला लेफ़्ट के छात्र-संगठनों का। आपको समझना होगा कि यहाँ न तो भाड़े की भीड़ है और न ही मल्टीप्लायर लगाकर भीड़ दिखाने का जतन; सोनम वांगचुक सफ़दरजंग अस्पताल में हैं, लेकिन अभी सीजेपी और आइसा, एसएफ़आई, केवाईएस, दिशा, एआईएसएफ़ जैसे लेफ़्ट के छात्र-संगठन बैठे हैं।
इस आंदोलन के पीछे कौन है! कौन इसका राजनीतिक फ़ायदा लेगा... क्या यह बात समकालीन मुद्दों से बड़ी है?
• बाबा रामदेव कहते हैं : “नीट की परीक्षा देने वाले छात्रों को कम से कम दस मिनट प्राणायाम करना चाहिए। इससे एकाग्रता बढ़ेगी। पिंड में ही ब्रह्मांड है।”
इसे यों समझिए : ब्रह्मांड में ही विद्यार्थी का शरीर है और नीट का पेपर भी। अगर एकाग्रता बहुत बढ़ जाए तो पेपर स्वयमेव दिखने लगेगा। इससे लीक करने-करवाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। लोग विरोध नहीं करेंगे, सरकारें दमन नहीं करेंगी। हर समस्या का समाधान प्राणायाम में है। सरकार, परीक्षक, विद्यार्थी, पेपर-सेटर सबको—बस दस मिनट का प्राणायाम... फिर देखो कमाल!
• आचार्य प्रशांत के कान बिल्कुल लाल होते हैं और चेहरा पीत-प्रदीप्त। उनके चेहरे पर वही चमक दिखती है जो किसी अवॉर्ड-शो में शाहरुख़ आदि सेलिब्रिटियों के चेहरे पर होती है, यानी इल्युमिनेटिंग जेल वाली चमक। यह चेहरे को तरल [ग्रीसी] बनाए रखता है, जिससे रौशनी में चमक बनी रहे। यही आधुनिक तेज है और आचार्य प्रशांत आधुनिक तेजपुंज। वह जिस त्याग की बात करते हैं, वह तेजोमयता का त्याग तो बिल्कुल भी नहीं है।
• क्या दर्पण-विश्वासी हैं हम!
प्रिय नए कवियो-लेखको,
आपके पास वास्तविक मित्रताएँ होनी चाहिए। बस कुछ ही, दो-एक ही... लेकिन जेनुइन साहित्यिक मित्र। इससे आप धीरे-धीरे ख़राब लिखना छोड़ देंगे। ख़राबियों का दुहराव बुरी बात है। इसे भी ज़रा समझिए! आपके पलंग के बिल्कुल पास लटके दर्पण को आप बिल्कुल अकेले ही रोज़ देखते हैं, इसमें यह संभावना अधिक होती है कि आप अपनी कमियों के प्रति सहज होते जाएँ और स्वयं को लेकर इतराहट से भरने लगें। आख़िर, शीशे के उस पार भी आप ही हैं। किसी अगले को दिक़्क़त न हो तो अपने से उपजी हरेक बात अच्छी लग सकती है—आपकी छवि भी। आग्रही व्यक्ति के लिए तो दर्पण उसकी दृष्टि के अधीन हो जाए, इसमें समय नहीं लगता। कोई एक भी जेनुइन साहित्यिक मित्र होगा तो वह आपके लिखे पर यों नहीं लिखेगा :
— आपकी शैली चकित करती है।
— आप भाषा से चौंकाते हैं।
— आपमें अतीव संभावना है।
— झकझोर डाला।
— आपको देखकर लगता है कि साहित्य का भविष्य सुरक्षित है।
— पढ़कर बताते हैं।
• आपका जेनुइन मित्र या शुभचिंतक अगर आपके लिखे पर रीझेगा तो कोई एक पंक्ति खोजेगा और कहेगा :
— यह शब्द जँच नहीं रहा।
— यह वाक्य सही कर लो।
— पैराग्राफ़ के क्रम को सही कर लो।
— बात बन नहीं पाई।
— अभी कुछ रोज़ रुक जाओ।
— इत्यादि...
और अगर वह सब कुछ ख़राब पाएगा तो गाली देगा, पर प्रचलित सम्मतियाँ नहीं देगा।
इस बिंदु के शीर्षक के रूप में आई पंक्ति हिंदी के कवि-शाइर अदम गोंडवी की है। बस उनके यहाँ प्रसंग दूसरा था, यहाँ दूसरा है।
• लघुकथा
|| छोटा सवाल ||
मैं : आप ऐसा क्यों लिखते हैं! मसलन, जैसे आँसुओं के हाइड्रोलिक पर काँटे की तरह चुभ कर करकने वाले शब्द!
वह : मैं बेहद तनाव में बहुत छोटी-छोटी साँसें लेता हूँ। अक्सर ही लेता हूँ। इस पर ध्यान जाता है तो और असहजता होती है। फिर लिखने की कोई युक्ति/पंक्ति आती है। कहीं से आती है। उसे लिखते जाने में मैं अपनी साँसों को भूल जाता हूँ। ये हाथ उन साँसों को सम कर देते हैं। मेरे सारे शब्द उस किसी को संबोधित हैं, जिसे मैं बहुत नहीं जानता। मैं ख़ुद को, आपको, अगले को भी बहुत नहीं जानता। अक्सर ही लगता है कि मैं अपने आख़िरी शब्द लिख रहा हूँ और इन्हें कई-कई ज़िंदगियों से लिख रहा हूँ। मेरी वर्णमाला में ‘अ’ से अंतिम ही है। सारे दृश्यों और स्थितियों से मैं अंतिम बार गुज़र रहा हूँ। वे अब नहीं होंगे और न ही मैं। इस एहसास की बेकली ही मेरा जीवन है। इसी में कहीं से कुछ बातें आती हैं और कह दी जाती हैं।
मैं : आपको क्या लगता है कि ग्लोबल साउथ के देशों में नई पीढ़ी के एस्पिरेशन में प्रतिरोध की संस्कृति अक्षुण्ण रहेगी?
वह : [देर तक देखते हुए...] ‘मुझे क्या लगता है...’—यह मैं भी ख़ुद से कभी इस तरह तो नहीं पूछता हूँ!
मैं : आपने इतने बड़े सवाल का इतना छोटा जवाब दिया?
वह : कई बार बड़े सवालों की काया ही सिर्फ़ बड़ी दिखती है, जैसे : घिर आने पर तो बादल ही आसमान हो जाते हैं, लेकिन हवा के एक झोंके से अचानक यही होता-दिखता है कि उनमें आधार-तत्त्व कितना कमतर था... जैसे : बचपन में मुझे अक्सर काँटे धँस जाते थे। मैं उन्हें बाँस के मोटे काँटे से देर तक निकालता था। कभी-कभी कोई एकांत खोजकर मैं अपनी धनुषाकार धज लिए हुए इसी उपक्रम में देर-देर तक जुटा रहता था। उस समय यह दर्द कभी मज़े देता था और कभी और अधिक दर्द। यह काँटा निकल जाने के बाद भी कभी-कभी बहुत दिन-दिन तक बिसाता था... जबकि यह कितना छोटा सवाल था।
• यहाँ आई लघुकथा में काफ़ी शब्द हैं। इससे यह समझना चाहिए कि साक्षात्कार शैली में कुछ भी संभव है, बस आज के घिसे-पिटे साक्षात्कार नहीं। इससे यह भी समझना चाहिए कि एक लेखक अपना टेक्स्ट भर है; उसके बाहर उसे क्या लगता है, मायने नहीं रखता।
• राष्ट्रीयताएँ न होतीं तो क्या होता! तब भी खेल होते, खिलाड़ी होते, उत्कृष्टता होती, क़िस्से और संस्मरण होते... पर ऐसा स्टारडम न होता। खिलाड़ियों के पास इतना माल और इतनी ताक़त न होती। इसके साथ अन्य चीज़ें भी हैं, कम से कम इसका एहसास बचा रहता। अस्मिताओं और पूँजी के गठजोड़ ने सिर्फ़ पूँजी की ही अस्मिता बना-बचाकर रख छोड़ी।
• नज़दीकियाँ डरावनी होती हैं।
गोलपोस्ट से पेनॉल्टी मार्क की दूरी महज़ ग्यारह मीटर होती है। वहाँ रखी फ़ुटबॉल की तरफ़ स्ट्राइकर के क़दम बढ़ते हैं और संसार थम जाता है। अगले ही क्षण घास में एक स्पंदनहीन पराजित काया, जो कि सेकेंड से भी सूक्ष्म समय पहले अभी हवा में बाज़ की तरह लपकी थी। गोलकीपर और पेनॉल्टी-किकर के सीने में अभी कुछ फ़्रेम पहले तक क्या रहा होगा! कौन-सा सन्नाटा! कौन-सा तूफ़ान! कौन-से ख़याल! संभवतः इसीलिए इन्हीं क्षणों का बॉलीवुडीय सिनेमा में सस्ते तरीक़े से दोहन भी किया गया।
लियोनेल मेस्सी जिसे स्पेनिश में ‘ला पल्जा’ यानी मक्खी जैसा सूक्ष्म कहा गया है; वह भी इसी भयावह नज़दीकी में पहुँचकर चूक जाता है, जबकि ओयारशाबाल एक विस्फोटक किक मारकर फ़्रांस को मायूस कर देता है।
• चेख़व अपनी एक कहानी में कहते हैं : “अपमानित महसूस करने की क्षमता केवल विकसित मस्तिष्क वाले व्यक्तियों में ही होती है।”
हालाँकि ऐसे वाक्य विशेष प्रसंगों के लिए ही उपयुक्त होते हैं। ज़ाहिर है कि चेख़व ने इसे लिजलिजेपन और आत्महीनता के ख़िलाफ़ ही कहा है, न कि आपको अहमक़ बनाने के लिए। प्रसंग से कटकर आवारा उद्धरण अनर्थकारी हो सकते हैं। बिंदुघाटीकार ऐसे उद्धरण-चेपन को ख़राब मानता है और मीम एवं रील-कल्चर का पूर्वज भी।
• चिनुआ अचेबे नाइजीरियाई हैं—प्रख्यात उत्तर-औपनिवेशिक लेखक। उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों और लेखकों के दस्तावेज़ों की पड़ताल की और उपनिवेशों की जीवन-संस्कृति को लेकर उनके बनाए स्टिग्मा को उजागर किया। वह अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘थिंग्स फ़ॉल अपार्ट’ में दिखाते हैं कि किस तरह उपन्यास के हीरो ओकोंको को एक ब्रिटिश ज़िला कमिश्नर अपनी किताब में सिर्फ़ एक पैराग्राफ़ भर जगह ही देता है।
• दरअस्ल, हर छूटना—छोड़ दिया जाना है और हर भूलना—भुला दिया जाना। चिनुआ अचेबे सरीखे लेखन ने हमें वह दृष्टि सौंपी है, जिससे हम पाठ्य का पाठ करना सीख पाते हैं। हिंदी में भी ऐसा लेखन बहुत हुआ, जिन्होंने समांतरों की ख़ोज की। वहाँ टॉर्च मारी जहाँ अँधेरा होने से अनस्तित्व मान लिया गया था। ऐसे लोगों के अभिवादन में ही; हमें टेक्स्ट को पढ़ना सीखना चाहिए, यह मेहनत का काम है। टेक्स्ट-रीडिंग का सबसे फूहड़ उदाहरण आज यहाँ-वहाँ प्रकाशित होने वाली पुस्तक-समीक्षाओं में मिलता है। वे अक्सर ही सिर्फ़ जार्गनों का सतही समुच्चय भर होती हैं।
• एक कवि के समक्ष सर्वाधिक भीषण और सबसे मासूम सवाल यही है कि वह क्या कर पाएगा युवाओं के बिना!
• आलोकधन्वा अपनी एक कविता ‘युवा भारत का स्वागत’ में कहते हैं :
युवा नागरिकों से
भारत का एहसास
ज़्यादा होता है
वे युवा जो अभी आत्महत्याएँ कर रहे हैं या फिर अपने भविष्य को लेकर निराशा से भरे हुए हैं, वे एक कवि को किस भारत का एहसास दे पाएँगे! इस सीन में ऐसे भी युवा हैं जो उपकरण बनकर डोल रहे हैं, हर अच्छी बात का मख़ौल बना रहे हैं, कुछ हज़ार रुपयों में उन्माद फ़ैलाने के लिए काम पर लगाए जा रहे हैं। ऐसे विपरीत समय में ही कवि के उन शब्दों की करुणा महसूस की जा सकती है जो आगे इस तरह से आते हैं :
कितना लंबा गलियारा है
क्रूरताओं का
जिसे पार करते हुए ये युवा
पहुँच रहे हैं पढ़ाई-लिखाई के बीच
दाख़िले के लिए लंबी क़तारें लगी हैं
विश्वविद्यालयों में
यह कोई साधारण बात नहीं है
आज के समय में
वे जीवन को जारी रख रहे हैं
एक असंभव होते जा रहे
गणराज्य के विचार
उनसे विचलित हैं
उनकी सड़कें दुनिया भर में
घूमती हैं
वे कहीं भी बसने के लिए
तैयार हैं
यह सिर्फ़ लालच नहीं है
और न उन्माद
आप पुस्तकालयों में जाइए
और देखिए
इतनी भीड़ युवा पाठकों की
वहाँ कला होती थी
मैं डालता हूँ उनकी भीड़ में
अपने को
मुझे उनसे बार-बार घिर जाना
राहत देता है
आख़िर मैं क्या कर
पाऊँगा उनके बिना?
•••
अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है | मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है
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