शिवेन्द्र से 10 सवाल : मुंबई मुझे मज़दूरों का शहर लगता है
हिन्दवी डेस्क
06 अप्रैल 2026
शिवेन्द्र हिंदी की नई पीढ़ी के कथाकार हैं। वह मुंबई में रहते हैं। उनका एक उपन्यास (चंचला चोर) और दो कहानी-संग्रह (‘चॉकलेट फ़्रेंड्स और अन्य कहानियाँ’ और ‘सतरूपा’) प्रकाशित हो चुके हैं। आज प्रस्तुत है उनके जन्मदिन पर रचित और उनके बीच हुई बातचीत :
मुंबई अगर आपकी कहानी का कोई किरदार होता तो वह किस तरह का किरदार होता?
तीन घटनाएँ याद आ रही हैं। उनके माध्यम से शहर के किरदार तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ—
एक
जब मैं मुंबई पहुँचा ही था, तब एक लड़के से मिला, जो पुराना स्ट्रगलर था। थोड़ी देर तक ज्ञान देने और फिर इधर-उधर की कुछ बातें करने के बाद वह बोला—“हज़ार रुपए उधार दे सकते हो क्या?”
तब मेरे पास इतने पैसे नहीं थे। वह तुरत हज़ार से पाँच सौ पर और फिर सौ रुपए पर आ गया। इतने पर भी जब मैंने अपनी असमर्थता जताई तो वह रुआँसा हो उठा—“यार! कम से कम खाना ही खिला दो। कल से कुछ नहीं खाया हूँ...”
तब मैं यह नहीं समझ पाया था कि वह इतनी बुरी हालत में भी मुंबई में क्यों रह रहा है, लेकिन अब जानता हूँ कि यहाँ उम्मीद बिल्कुल जोंक की तरह आपसे चिपकी रहती है।
दो
एक बार सब्ज़ी लेते हुए, मैंने यूँ ही सब्ज़ीवाले से पूछा—“गाँव में तो लौकी 40 रुपए पसेरी है और तुम 40 रुपए किलो बेच रहे हो, इतना महँगा क्यों?”
वह तपाक से बोला—“यहाँ सब कमाने ही तो आते हैं न भैया”
मुंबई में शायद ही ऐसा कोई हो, जिसके कॉनसियस-अनकॉनसियस में यह बात न चल रही हो।
तीन
जब हम थोड़ा-बहुत काम करने लगे थे, तब मेरे एक सीनियर से कहा कि चलो तुमको नेचुरल्स की आइसक्रीम खिलाता हूँ, पैसे हैं न तुम्हारे पास?
“जो था वो तो आपने उधार ले लिया था, अब आइसक्रीम खिलाऊँगा तो कल बस का किराया नहीं दे पाऊँगा”
“अरे! तो कल किसी और से उधार ले लेंगे, चलो अभी आइसक्रीम खाते हैं”
...और उस दिन आइसक्रीम खाते हुए, मैंने पहली बार उस ख़ुशी को महसूस किया था, जिसे विद्वान् लोग ‘आज में जीना’ कहते हैं।
क्या मुंबई ने आपके लेखन को बदला? अगर हाँ, तो किस तरह?
फ़िल्म राइटिंग में एक टर्म है—‘आउटसाइडर पर्सपेक्टिव’। मतलब एक ऐसा पात्र जो उस दुनिया का हिस्सा नहीं है। जब वह वहाँ की चीज़ों को देखता है, तो बिना किसी पूर्वाग्रह के देखता है और तब हम उस दुनिया को ज़्यादा साफ़ और नए ढंग से देख पाते हैं। फ़िल्म ‘PK’ में आमिर ख़ान को इसलिए एलियन दिखाया गया है। मुंबई आने के बाद मैं ख़ुद को भी इसी ‘आउटसाइडर पर्सपेक्टिव’ से देखना सीख पाया और इससे बहुत कुछ बदल गया।
मुंबई आने से पहले इस शहर के बारे में आपकी कोई धारणा जो बाद में बदल गई?
मुंबई के बारे में प्रसिद्ध है कि वह सपनों का शहर है, पर वह मुझे मज़दूरों का शहर ज़्यादा लगता है।
मुंबई लोकल के बारे में बहुत क़िस्से-कहानियाँ सुनने में आती हैं। आपके पास मुंबई लोकल का कोई क़िस्सा है?
शुरुआत में मैं पैसे बचाने के लिए लोकल में बेटिकट चढ़ जाया करता था। एक दिन कहीं से लौटते हुए टीटी ने मुझे पकड़ लिया। तब फ़ाइन था क़रीब 250 रुपए और मेरी जेब में थे सिर्फ़ 30 रुपए। टीटी ने कहा कि एटीएम से निकालकर दे दो। मैंने उसे बताया कि अकाउंट भी ख़ाली है। पहले तो उसने सारे पैसे ले लिए, पर फिर जब मैं हताश-निराश वहाँ से जाने लगा तो उसने मुझे बुलाया—“घर तक पहुँचने में कितने लगेंगे?”
तब स्टेशन से घर पहुँचने में सात रुपए लगते थे। मैंने उसे बता दिया। आश्चर्य कि उसने मुझे 10 रुपए लौटा दिए। इतना रहमदिल टीटी मुझे फिर कभी नहीं मिला।
मुंबई की बारिश—आपके लिए रोमांस है, संघर्ष है या कोई तीसरी चीज़?
बारिश मुझे पसंद है। बनारस में भी कई बार मैं बारिश होने पर साइकिल लेकर निकल जाता था। पर वहाँ ज़्यादातर ऐसा होता था कि अभी आधे ही भीगे हैं कि बारिश बंद हो गई। फिर आधा गीला और आधा सूखा मन अजीब-सी किचकिचाहट से भर जाता था। यही वजह रही कि जब मैं मुंबई आया, तो बारिश के समय आया और महीने भर जमकर भीगता रहा। फिर मैं बीमार पड़ गया और समझ गया कि थोड़ा सँभलकर भीगना है, लेकिन आज तक मैंने छाता नहीं ख़रीदा है।
मुंबई में आपके खाने की पसंदीदा जगह और चीज़ कौन-सी है?
दोस्तों का घर और वे जो भी प्यार से गरियाते हुए खिला दें।
अगर आपको मुंबई के किसी एक हिस्से को हमेशा के लिए अपनी कहानी में ‘संरक्षित’ करना हो, तो वह कौन-सी जगह होगी और क्यों?
मुंबई में एक इलाक़ा है मड आयलैंड। मछुआरों की बस्ती। वहाँ के जो लोकल लोग हैं, उनमें अब भी पुरानी तासीर बची है। शाम होते ही वहाँ के ज़्यादातर सब्ज़ीवाले, दूधवाले, दुकानदार, ऑटोवाले हिलते-डुलते नज़र आएँगे। पार्क, मंदिर के पिछवाड़े की ख़ाली जगह, समंदर के किनारे, सैकड़ों लोग, छोटे-छोटे ग्रुप में अपना-अपना चखना और गिलास लेकर बैठ जाते हैं। रात के बारह-एक बजे तक वे जिस सुख-शांति से वहाँ बैठे रहते हैं, वह मुंबई के हाय-तौबा और भाग-दौड़ वाली संस्कृति के बिल्कुल उलट है। इस आयलैंड को केंद्र बनाकर मैंने एक डिस्टोपियन नॉवेल लिखना शुरू किया था। उम्मीद है किसी दिन उसे पूरा भी कर पाऊँगा।
आप इतने वर्षों से मुंबई में हैं, क्या अब भी यहाँ ख़ुद को बाहरी महसूस करते हैं?
मैं घर में ज़्यादा बाहरी महसूस करता हूँ। हमारे घर कुछ उन मूल्यों पर बने हैं, जहाँ ख़ुद को ठीक-ठीक अभिव्यक्त कर पाना, लगभग असंभव है। इसलिए रिश्तेदारों से अधिक सगे मुझे दोस्त लगते हैं। मेरा मानना है कि बाहरी और अनजान लोगों के बीच हम ख़ुद के ज़्यादा क़रीब रह पाते हैं।
मुंबई में कोई मलाल?
मराठी न सीख पाने का।
अगर आप मुंबई से दूर हुए तो कहाँ?
अपने टीनेज में कुछ साल छत्तीसगढ़ में रहा हूँ। मन में एक दबा-छुपा-सा ख़याल था कि विनोद कुमार शुक्ल के घर के सामने मेरा भी एक घर हो। पर अब उसके लिए शायद बहुत देर हो चुकी है।
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बेला पॉपुलर
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