सतलुज : ‘मैं हनेरे नूं चैलेंज करदां’
राजेंद्र देथा
07 जुलाई 2026
“हिंसा को केवल झूठ के द्वारा छिपाया जा सकता है और झूठ को केवल हिंसा के द्वारा ही क़ायम रखा जा सकता है।”
— लेव तोल्स्तोय
हनी त्रेहन निर्देशित फ़िल्म ‘सतलुज’ [पहले ‘पंजाब 95’] लंबे संघर्ष के बाद 3 जुलाई को ZEE 5 पर प्रदर्शित हुई थी, लेकिन रविवार रात फ़िल्म को वहाँ से उतार दिया गया। यह फ़िल्म लगभग तीन बरस बाद रिलीज हुई थी। यह फ़िल्म आठवें-नवें दशक में पंजाब के मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जिसमें खालड़ा का किरदार दिलजीत दोसांझ ने निभाया है। फ़िल्म पर आने से पहले तत्कालीन पंजाब का थोड़ा राजनीतिक परिदृश्य जानना बेहद ज़रूरी है।
1966 का पुनर्गठन, आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, धर्मयुद्ध मोर्चा आदि घटनाओं से जद्दोजहद कर गुज़रा चौरासी का पंजाब आग बरसा रहा था। लंबी और विस्तृत लपटों वाली आग। कहा जाता है सिखों का महत्त्वपूर्ण धार्मिक स्थल हरमंदिर साहिब जरनैलसिंह भिंडरावाले और उनके साथियों का मुख्य निवास स्थल बन चुका था। इसी सिलसिले में एक लंबे संघर्ष के बाद जून चौरासी में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ का हुकुम दे दिया। यह आदेश मैडम गांधी की ‘अंतिम लड़ाई’ साबित हुआ। हरमंदिर साहिब की इस अप्रिय घटना के कुछ ही महीनों बाद उनकी हत्या हो गई। उसके बाद कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और अन्य प्रो-कांग्रेसी और सिखविरोधी लोगों ने दिल्ली में ज़ुल्म की इंतिहा कर दी।
लेकिन पंजाब में मिलिटेंसी का दौर ख़त्म नहीं हुआ था। इसी दरमियान असम कैडर के आईपीएस अधिकारी कंवरपाल सिंह गिल, जिन्हें केपीएस गिल कहा जाता है, को सन् अट्ठासी में डीजी पंजाब नियुक्त किया जाता है। लगभग इसी के आस-पास सुरजीत सिंह बरनाळा का राज बरख़ास्त हो जाता है और पंजाब में राष्ट्रपति शासन लग जाता है। यह 1992 के शुरुआत तक जारी रहता है। 1992 में चुनाव होते हैं और राज आता है कांग्रेस का। बेअंत सिंह मुख्यमंत्री बनते हैं, वही बेअंत सिंह जिनके पोते रवनीत सिंह बिट्टू को देश का एलओपी ‘ग़द्दार’ कहता है। अब यह विडंबना ही है कि राहुल गांधी जिसको ग़द्दार कह रहे, उसके दादा को पंजाब ग़द्दार कहता है। पंजाब में पुलिस का क्रूर दमन बस यहीं से शुरू होता है। यहीं से शुरू होती है फ़िल्म। यहीं से शुरू होती है वरिष्ठ एससपी सुग्गा की क्रूरता।
कहते हैं कि बेअंत की सरकार ने उग्रवाद के ख़ात्मे के लिए केपीएस गिल, जिसे पंजाब का एक बड़ी आवाम ‘बुच्चड़’ [कसाई] भी कहती हैं, को खुली छूट दे दी। और फिर शुरू हुआ तशद्दुद का ख़ूनी दौर। प्रचलित है कि इस काम के लिए केपीएस गिल ने अपने प्रिय और क्रूर अफ़सरों को चुना और उग्रवाद के नाम पर बहुत सारे निर्दोष लोगों की हत्याएँ होती रहीं, जो कि ‘सतलुज’ फ़िल्म में भी दिखाया गया है। तब बैंक के एक अधिकारी जसवंत सिंह खालड़ा इसी राज्य-समर्थित पुलिसिया दमन के खिलाफ़ खड़े हुए और जब उनके ही आस-पास कुछ लोगों को उग्रवाद को शय देने या उसमें शामिल होने के नाम पर मारा गया तो उन्होंने इसे एक अभियान के तौर पर लिया और इसके ख़िलाफ़ लड़ने के लिए प्रण ले लिया। अपने इस खोजी अभियान में उन्होंने यह पाया कि पुलिस ने पच्चीस हज़ार लोगों का अंतिम संस्कार कर दिया है और उन सबके नाम अलग-अलग मुर्दाघरों में लावारिस की सूची में लिखे गए हैं। इन पच्चीस हज़ार में अपहरण, शरण देने के कारण एनकाउंटर, मिलीटेंसी में एक एक्टिव मेंबर के कारण उसके पूरे परिवार को हिरासत में लेकर यातना देना आदि शामिल था। ऐसे दौर में सतलुज और लाशें एक दूसरे की पर्याय बन चुकी थी, फ़िल्म का नाम इसी अर्थ में शायद रखा गया हो।
जेएनयू से संबद्ध शोधकर्ता हरिंदर सिंह के लेख का एक हिस्सा उनके काम का न्यायिक ब्योरा देता है :
श्री खालड़ा का काम ‘मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा’ [UDHR, 1948] में बताए गए सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसे भारत ने भी अपनाया है। हालाँकि उनकी सोच और UDHR का आधार एक ही है, लेकिन इस घोषणा के कुछ अनुच्छेद ख़ासतौर पर उनके प्रयासों के महत्त्व को उजागर करते हैं। UDHR का अनुच्छेद 5 कहता है, “किसी भी व्यक्ति को यातना या क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार या सज़ा नहीं दी जाएगी,” और अनुच्छेद 9 कहता है, “किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से गिरफ़्तार, नज़रबंद या देश-निकाला नहीं दिया जाएगा।” खालड़ा का काम सीधे तौर पर इन्हीं अहम मुद्दों से जुड़ा था।
—हरिंदर सिंह, पिंडोलॉजी [pindology.com]
इस फ़िल्म में दूसरा महत्त्वपूर्ण किरदार एसएसपी सुग्गा का है। एसएसपी सुग्गा—एसएसपी अजीत सिंह संधू है। अजीत सिंह संधू पंजाब पुलिस सर्विस का एक अधिकारी था, जिसे ‘अत्तवाद’ [चरमपंथ] विरोधी अभियान में भारतीय पुलिस सेवा में पदोन्नत किया गया था। संधू कई ज़िलों का एसएसपी रहा जिनमें मजीठा, रोपड़, कपूरथला और तरनतारन शामिल है। इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि तरनतारन एसएसपी के लिए आईपीएस बिट्टा [संभवतः केपीएस गिल] ने एसएसपी सुग्गा को अपने दफ़्तर में बुलाकर ज्वानिंग-लेटर दिया और यह भी कि सुग्गा रिपोर्टिंग ख़ुद आईपीएस बिट्टा को ही करेगा। सुग्गा उर्फ़ अजीत संधू ने जमकर अपने बॉस के आदेशों का पालन किया और उस सीमावर्ती इलाक़े में पुलिसिया अपहरण, नहरों में लाशें और तमाम तरह की ग़ैर-न्यायिक हत्याओं को अंजाम दिया। जैसा कि पहले वह कम ताक़त से करता भी आ रहा था। उसने किसी की नहीं सुनी, सब अपनी मर्ज़ी से चलाया। इन हत्याओं में सब सिविलियन नहीं थे, बहुत से पुलिस महकमे के लोग थे, जिन्हें मुख़बिरी या शरण देने के बहाने मार दिया गया था। बाद में इसके लिए अजीत सिंह संधू [सुग्गा] को इस ‘वीरता’ के लिए दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फ़िल्म में अजीत सिंह संधू का क़िरदार एसएसपी सुग्गा के किरदार में सुविंदर पाल विक्की ने निभाया है। सुग्गा का चरित्र देखते हुए यह आसानी से सोचा जा सकता है कि वह कितना वीभत्स और क्रूर अधिकारी रहा होगा। पाल ने इस किरदार को बहुत गहरे उतरकर निभाया है।
केपीएस गिल का किरदार कँवल जीत सिंह ने ‘बिट्टा’ नाम से निभाया है। हल्की सफ़ेद-भूरी दाढ़ी वाला यह पात्र शुरुआत में केपीएस नहीं लगता। लेकिन अभिनय की परत-दर-परत केपीएस वही लगते हैं जो वह अपने बहुत से दिए हुए इंटरव्यू में लगते हैं। फ़िल्म में उनके संवाद उनकी आक्रामकता को पुष्ट करते हैं। हमारे आसपास पुलिस का चेहरा बहुत क्रूर है, लेकिन स्टेट किस तरह से उसको रोमेंटिसाइज़ करता है और प्रोटेक्ट करता है, उसका एक उदाहरण यह फ़िल्म है। पंजाब की जनता भी यह स्वीकार करती है। हज़ारों सिख नौजवानों, स्त्रियों, वृद्धों की लाशों का ब्योरा आज भी जनता माँग रही है। पुलिस का यह दमन मिलिटेंसी वाले हर सूबे में हम देखते आए हैं।
इस फ़िल्म का मुख्य किरदार जसवंत सिंह खालड़ा है जो मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत है और जब वह पुलिस के इस ख़ूनी चरित्र को उजागर करता है तो उसे एसएसपी सुग्गा के कारिंदों द्वारा अगवा कर लिया जाता है। [यह वही दिन थे जब बेअंत सिंह को एक पुलिसकर्मी द्वारा आत्मघाती हमले में मार दिया गया।] यातना के लंबे दौर के बाद उन्हें मार दिया जाता है। अपने पूरे जीवित काल में खालड़ा एक निडर व्यक्ति के रूप में हमारे सामने आते हैं। उनके परिवार, उनके दोस्तों आदि को धमकियाँ दी जाती हैं। लेकिन हिंसा के ऐसे दौर में वह अपने निर्दोष लोगों के लिए लगातार मोर्चा लिए हुए हैं। फ़िल्म के एक दृश्य में एसएसपी सुग्गा सीबीआई जाँच पीछे पड़ने के बाद जसवंत सिंह खालड़ा के घर जाता है और उनकी पत्नी परमजीत कौर से कहता है कि पुलिस के ख़िलाफ़ स्टेटमेंट वापिस कर दे तो खालड़ा वापिस आ जाएगा। इस पर उनकी पत्नी का यह कहना कि इस शर्त पर तो ख़ुद खालड़ा भी न आना चाहेंगे—यह साहस प्रतिरोध की परंपरा से जा जुड़ता है। यह दमन की सोच तथाकथित सरकारी सिंघमों और राउडियों का असली चरित्र भी बयान करती है। दमन की इसी नींव पर कस्टोडियन हत्याओं की एक शर्मनाक परंपरा इस देश में स्थापित हुई। यह सिर्फ़ पुलिस का अधिनायकवादी रवैया नहीं है, यह हर व्यवस्था का अनिवार्य हो चुका ‘पाताललोक’ है। इसी संवाद सिलसिले में सुग्गा प्रतिवाद में जब यह कहता है कि अगर मुझे पच्चीस हज़ार हत्याओं का हिसाब सरकार को देना पड़ा तो मैं पच्चीस हज़ार एक का दूँगा, तो यह स्टेटमेंट और क्रूर हो जाता है। जसवंत सिंह खालड़ा हमेशा उनके लिए लड़ते रहे जो इस दुनिया में लावारिस थे, लेकिन सरकार समर्थित इस दमन में वह ख़ुद एक दिन लावारिस हो गए। उनकी लाश हरिके में बहाई गई, जो कभी मिली नहीं। उनके अपहरण और हत्या के पीछे एसएसपी संधू या केपीएस गिल या बेअंत सिंह नहीं थे, बल्कि एक सिस्टेमिक पाखंड था जो सत्ता में झूठ और हिंसा को एकमेक करने के लिए हमेशा सक्रिय रहता है। सत्ता इसे इसलिए भी ज़रूरी समझती है कि यह सामूहिक चेतना को रिप्रेस करता है। फ़िल्म के लगभग अंत में सीबीआई की जाँच में एसएसपी सुग्गा और अन्य कुछ उसके कारिंदे आरोपी पाए जाते हैं और सुग्गा कुछ समय बाद रेल के आगे आकर आत्महत्या कर लेता है, जिसे कई लोग यह भी मानते हैं कि वह आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या थी।
प्रतिबंध की संस्कृति इस महादेश के लिए कोई नई नहीं है। यहाँ अनेकों फ़िल्में प्रतिबंधित हुई हैं। लेकिन प्रतिबंध की अपनी एक राजनीति होती है। यह फ़िल्म जिस दौर का विवरण देती है, वह कांग्रेस का दौर था। अब सवाल यह आता है कि वर्तमान समय में देश चला रही भाजपा इसे बैन क्यों कर रही है? लेकिन इसके पीछे स्टेट की अपनी अस्मिता है। वह दमन का मॉडल उजागर करने से ख़ौफ़ खाता है। यही फ़िल्म अगर सिख दंगों पर होती तो उसे यह सरकार आसानी से हर जगह अनुमति देती। प्रतिबंध की यह प्रक्रिया इतनी सरल नहीं है। इस फ़िल्म के संवाद बहुत कसे और ठोस हैं, कहीं भी वैचारिक लूप-होल देखने को नहीं मिलता। संवेदना के हर स्तर पर फ़िल्म गहरा प्रभाव छोड़ती है। पूरी फ़िल्म देखकर ऐसा लगता है कि आप भावुक नहीं होते; बल्कि आपके भीतर प्रतिरोध का एक अंकुर फूटता है जिसकी जड़ों में खाद नहीं है, लेकिन विस्तार में आसमान का एक टुकड़ा ज़रूर है। फ़िल्म में सीबीआई अधिकारी का किरदार अर्जुन रामपाल ने अच्छे से निभाया है। सौरभ सचदेवा, गीतिका विद्या, जगजीत संधू आदि की अभिनय-उपस्थिति भी सुसंगत है। जब देश में बॉलीवुड-मुंबई-अंडरवर्ल्ड वर्सेज माफ़िया के परिदृश्य के बहाने पुलिस का एक ऐसा रूप इस देश के सामने प्रस्तुत करता रहा है, जहाँ सब कुछ गर्व से फला-फूला है, ऐसे में इस आलोचनात्मक फ़िल्म का आना एक बड़ी घटना के रूप में देखा जाना चाहिए और इसका हटाया जाना भी।
अंत में पाश की ये कविता-पंक्तियाँ :
सबसे ख़तरनाक वह चाँद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद
वीरान हुए आँगनों में चढ़ता है
पर आपकी आँखों को मिर्चों की तरह नहीं गड़ता है
सबसे ख़तरनाक वह गीत होता है
आपके कानों तक पहुँचने के लिए
जो मरसिये पढ़ता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर
जो ग़ुंडे की तरह अकड़ता है
•••
राजेंद्र देथा को और पढ़िए : ‘बिना शिकायत के सहना, एकमात्र सबक़ है जो हमें इस जीवन में सीखना है’ | मोटरसाइकिलों का लोक वाया इन्फ़्लुएंसर | सरकारी नौकर, टीका और अन्य कहानियाँ | 'बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ निकला...' | अपने माट्साब को पीटने का सपना! | तू साडे नाऴ वरत के देख
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट