रघुवीर सहाय के लिए नहीं
एक
पढ़ो-पढ़ो
मेरी कविताएँ पढ़ो
टाँय-टाँय!
अब तक नहीं पढ़ीं
तो अब यूँ पढ़ो
दुहराओ
रट लो
फिर से बोलो
टाँय-टाँय!
पढ़ो मेरी कविताएँ
क्योंकि मैं एक तोता हूँ
टाँय-टाँय!
स्त्री-वंचित
स्त्री-लोलुप
स्त्री-द्वेषी—
मैं सब सुनता हूँ
सब दुहराता हूँ
जैसा तुम कहते हो
वैसा ही गाता हूँ
बहस कहीं भी हो
मैं उड़कर पहुँच जाता हूँ
चोंच में दबाकर
कविताओं के टुकड़े
गिरा देता हूँ मेज़ पर
लो पढ़ो
टाँय-टाँय!
तुम्हारे पतों पर
मैं ही तो ले जाता हूँ
अपनी बंडल कविताओं के बंडल
डाल पर बैठकर
पुकारता हूँ
पढ़ो! पढ़ो!
मैंने भी पहन लिया
तुम्हारा जाँघिया दिमाग़ पर
हाँ वही
वहीं गंधाता हुआ
मैं भी बोलता हूँ
तुम्हारी भाषा
और तुम
मेरी कविताएँ
पंखों की तरह नोचते हो
फिर भी
मैं बोलता हूँ
पढ़ो!
मैं मर्द
मैं नामर्द
मैं जो भी तुम कहो
मैं तोता हूँ
मैं दुहराता हूँ
नई-नई नक़ली भाषा में
तुम्हारे शब्द
तुम्हारी भूख
तुम्हारी दृष्टि...
सब कुछ
फिर भी
टाँय-टाँय करते हुए
मैं कहता हूँ
पढ़ो
मेरी कविताएँ पढ़ो
क्योंकि
मैं एक...
टाँय-टाँय!
दो
क्षेमेंद्र ठाकुर के लिए
मैं सदा का अनुपस्थित रहा आया
लेकिन जब मैं तोता रूप में पधारा
तब क्षेमेंद्र ठाकुर मुझे चैट में चटने लगे
उनके आग्रहों से आप्लावित अनुच्छेदों के
‘नहीं’, ‘हाँ’, ‘लेकिन’, ‘क्या’, ‘अच्छा’, ‘ओह’
—जैसे एकशाब्दिक उत्तर देकर
मैंने संवाद को शिथिल करना चाहा
परंतु वह बहुत उत्तेजित थे
उन्होंने गति बनाए रखी
और भर रात मुझे चटते रहे
बोले : “और तस्वीरें नहीं हैं क्या तुम्हारी?”
मेरे निकट इसका एक एकशाब्दिक उत्तर : “क्या?”
प्रस्तुत गत्यात्मकता से खिन्न
काममोहित प्राश्निक की उँगलियाँ थक गईं
आग्रहों से आप्लावित प्रदीर्घ अनुच्छेद रचते-रचते
और उनके एकशाब्दिक उत्तर पाते-पाते
जब उसका हृदय भी थक गया
तब अंततः
क्षेमेंद्र ठाकुर उवाच : “दोगी?”
मेरे निकट इसका पुनः
वही एकशाब्दिक उत्तर : “क्या?”
क्षे. ठा. : “तस्वीरें...”
तीन
ब्रह्ममुहूर्त में उठकर सरस्वती-स्तोत्र का पाठ
इसके पश्चात् नित्य-क्रियाएँ और व्यायाम
तदनंतर काव्य-विधाओं और उपविधाओं का अभ्यास
मध्याह्न-काल के कुछ पूर्व स्नान
स्नानोपरांत प्रकृति के अनुकूल भोजन
और मुखड़ापुस्तक पर काव्य-प्रक्षेपण व काव्य-चर्चा
फिर थोड़ा विश्राम...
तीन पहर तो यों बीत जाते थे
चौथे पहर में काव्य-प्रक्षेपण पश्चात् आई प्रतिक्रियाओं का अध्ययन
और भावावेश में रची गई कविताओं पर दृष्टि-विवेचन
सायंकाल दुबारा स्नान कर काली-स्तोत्र के पाठ के पश्चात्
मृगलोचना के साथ रमण तब तक जब तक श्रम-निवृत्ति न हो
मृगलोचना की हत्या से पूर्व
यों थी मुझ तोते की दिनचर्या
अब उसके न रहने पर जिसमें थे मेरे प्राण
मेरा सारा समय और श्रम मुखड़ापुस्तक पर
काव्य-प्रक्षेपण और हिंदू-त्रयी के लेखन में ही व्यय या कहें व्यर्थ होता है।
चार
“आमी तोमर प्राणेर बाजी रेखेयो तोमर रोक्खा कोरबो...”
[मैं तुम्हारे प्राणों की बाजी लगाकर भी तुम्हारी रक्षा करूँगा...]
—बंकिमबिहारी बनर्जी बोले
मैं बोला : “दादा, आप अपना काम करो
एक संवाद तक तो ठीक से बोल नहीं पाते
अनुचित ही आपको अपना पहला पति बनाया
उस नाट्य में जिसमें मैं तोता बना”
“सरकार मेरा खाता बंद करना चाहती है”
यह झूठ मैंने बोल तो दिया तोता बनकर
किंतु कौन विश्वास करेगा
कि हिंदी में इस प्रकार की कविताएँ हैं
जिनसे इस संसार की किसी भी सरकार को कोई ख़तरा हो
और मेरी झंडू कविताओं से
सरकार को क्या झाँट ख़तरा होगा
लेकिन है एक सरकार को ख़तरा मेरी कविताओं से
और वह है कामेश्वर सरकार
जो कमेंट बॉक्स में खुलेआम अपना नंबर ठेल दिया
और इनबॉक्स में अपना प्रपोजल।
पाँच
काव्यमीमांसाकार राजशेखरानुसार :
“विद्यावृद्ध और विद्वान् गुरुजनों का सहवास
काव्यपुरुष के लिए अमृत समान होता है”
मेरी अन्यापदेशिक कवि-अस्मिता
इस सौभाग्य से वंचित रही आई
पर जब मैं तोता बनकर आया
कई विद्यावृद्ध और विद्वान् गुरुजन
स्वतः मुझसे सहवास की कामना में व्याकुल प्रतीत हुए
इस प्रकार का अमृत विष सदृश जान पड़ा मुझे
अंततः
बंकिमबिहारी बनर्जी, ऋषभ ब्रह्मो और क्षेमेंद्र ठाकुर ने समझाया :
तोता
अब
तू
उड़
जा...
लेकिन उड़ना न आया मुझे
अंबर में रहकर भी अंबर से दूर
क्या करूँ पिंजड़ों से प्यार है मुझे
और हिंदी से भी
और इसलिए हिंदी दिवस से भी!
- संपादक : विनोद मिश्र
- रचनाकार : अविनाश मिश्र
- प्रकाशन : कृति बहुमत [मई 2026]
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