पत्र : वियोगिनी ठाकुर के लिए : ‘अश्लीलता’ के नए आयाम
रूद्राणी प्रियदर्शनी
31 अक्तूबर 2026
प्रिय वियोगिनी ठाकुर जी,
आपके लिखे ‘अश्लील स्थितियों में फँसना’ पढ़ते हुए कुछ बातें मन में आईं। लगा कि आपसे उन पर बात की जानी चाहिए। आपके लिखे प्रसंगों में अश्लीलता, स्त्री-देह, सामाजिक पूर्वाग्रह और हमारे भीतर बैठी धारणाओं के कई सवाल मौजूद हैं। लेकिन इन प्रसंगों को पढ़ते हुए मुझे लगा कि कुछ जगहों पर आपने जिन स्थितियों को दर्ज किया है; उनके भीतर मौजूद सामाजिक दृष्टि पर पर्याप्त सवाल नहीं उठाए गए, बल्कि कहीं-कहीं वही दृष्टि अनजाने में आपके लेखन में भी जगह बना लेती है।
सबसे पहले उस लड़की की बात जिसे मैथुनरत पशुओं को देखकर हँसी आ जाती है और जिसकी हँसी आपको भी संक्रमित कर जाती है। आप इसे आपत्तिजनक मानकर शर्म से गड़ जाने की बात करती हैं, पर क्या उन पशुओं की स्वाभाविक क्रिया को आपत्तिजनक मानकर शर्मिंदा होना उचित है? मैथुन जीवन-चक्र की एक सहज प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से नवजीवन का बीजारोपण होता है। इसे अश्लीलता के मुखौटे से देखना उस अवधारणा को दर्शाता है, जो हमारे भीतर शूल की तरह धँसी हुई है। यह अवधारणा हमें प्रकृति और जीवन की सहज प्रक्रियाओं को भी मनुष्यता के इतर किसी अश्लील गतिविधि की तरह देखने के लिए बाध्य करती है। सवाल यह है कि अश्लीलता उस प्रक्रिया में है या उसे देखने वाली हमारी दृष्टि में?
दूसरा प्रसंग उस महिला का है, जो आपको अल्ट्रासाउंड केंद्र में घूर रही थी। आपके अनुसार, उसके मन में यह सवाल था कि अगर वह ख़ुद प्रेग्नेंट होकर अल्ट्रासाउंड कराने आई है, तो आप भी शायद इसी वजह से आई होंगी। आपके चेहरे से उसे शादीशुदा होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे और शायद वह उन्हीं संकेतों को ढूँढ़ने की कोशिश में आपको घूर रही थी। यहाँ उस महिला के भीतर मौजूद पूर्वाग्रह और जानकारी की कमी साफ़ दिखाई देती है। संभव है कि वह अल्ट्रासाउंड को केवल गर्भावस्था से जोड़कर देखती हो, जबकि अल्ट्रासाउंड के कई दूसरे चिकित्सकीय उपयोग भी हैं।
इस प्रसंग में ही एक दूसरा प्रश्न भी उठता है : क्या आप उस महिला की नज़रों से बचने के बजाय उससे संवाद करने की कोशिश कर सकती थीं? क्या उसे यह बताकर उसके पूर्वाग्रह को चुनौती देना संभव नहीं था कि अल्ट्रासाउंड केवल गर्भावस्था के लिए नहीं होता? आपने उसकी नज़रों से ओझल होना चुना। यह आपका स्वभाव हो सकता है, पर क्या इस तरह उस पूर्वाग्रह को जस का तस छोड़ देना भी एक तरह की विफलता नहीं है? हम अक्सर उन लोगों से बचकर निकल जाते हैं, जिनकी धारणाओं को बातचीत के ज़रिये बदला जा सकता है।
तीसरा प्रसंग उस डॉक्टर का है, जो आपका अल्ट्रासाउंड करते हुए अपने मन में आपकी संभावित गर्भावस्था के कारणों की कल्पना कर रहा था। आपका प्रेग्नेंट होना अभी सिद्ध नहीं हुआ था, लेकिन उसके मन में आपकी उम्र और संभावित यौन-अनुभवों को लेकर कई प्रश्न और दृश्य बन रहे थे। यह भी संभव है कि डॉक्टर अपने परिवेश और रोज़मर्रा के अनुभवों के कारण लोगों को एक ख़ास नज़रिये से देखने का आदी हो चुका हो। यहाँ जानकारी की कमी नहीं, बल्कि व्यवस्थागत सोच को बिना सवाल किए स्वीकार कर लेने की स्थिति दिखाई देती है। डॉक्टर ने शायद इस दृष्टि को इतना आत्मसात् कर लिया है कि वह अपने सामने आने वाले लोगों को भी उसी नज़रिये से देखने लगा है।
चौथा प्रसंग आपकी उस दोस्त का है, जो अपने भाई के गाड़ी चलाने पर बीच में बैठती है। उसके शरीर में होने वाली हलचलों को वह महसूस तो करती है, लेकिन भाई के साथ रिश्ते के कारण उन हलचलों को कोई विशेष महत्त्व नहीं देती। दूसरी ओर, वह इस बात का ध्यान रखती है कि आप उसके भाई के गाड़ी चलाने पर बीच में बैठ जाएँ, क्योंकि किसी ग़ैर मर्द के साथ उन हलचलों को महसूस करना उसे सही नहीं लगता।
यहाँ भी कुछ सवाल हैं : क्या वह लड़की अपने भाई के अलावा किसी दूसरे पुरुष के शरीर को अश्लीलता के नज़रिये से देखती है और उससे दूर रहने का प्रयास करती है? क्या पता, वह भी अपने स्वभाव के प्रति बाध्य हो? और क्या उसका यह स्वभाव उसी सामाजिक व्यवस्था की देन नहीं है, जिसमें ग़ैर मर्दों (चाहे वे प्रेमी हों या दोस्त) के साथ दिखाई देना भी अश्लील मान लिया जाता है! इस व्यवस्था में स्त्री और पुरुष के बीच बनने वाले दूसरे रिश्तों और उनकी सहजता के लिए बहुत कम जगह बचती है।
मुझे लगता है कि इन चारों प्रसंगों को एक साथ रखकर देखने की ज़रूरत है। एक बालमन हमें नंगा भी देख ले, तो उसके मन में अश्लीलता का कोई बोध नहीं होता। उसके लिए देह सहज होती है। वह पूर्वाग्रहों और सामाजिक अवधारणाओं से घिरा हुआ मन नहीं होता, जो हर चीज़ को किसी निष्कर्ष से जोड़कर देखे। लेकिन बड़े होने के साथ हमारे भीतर अनेक धारणाएँ आकार लेने लगती हैं। धीरे-धीरे हमें बहुत-सी सहज चीज़ें अश्लील लगने लगती हैं। ये धारणाएँ हमारे आस-पास के लोगों और उनके क्रिया-कलापों को प्रभावित करती हैं और हमारे भीतर के सहज बिंबों को तोड़कर अपनी जगह बना लेती हैं। आपकी दोस्त भी शायद इसी विचारधारा से प्रभावित हो।
अल्ट्रासाउंड और स्किन-केयर के डॉक्टरों की सोच को भी इसी संदर्भ में देखना चाहिए। वे अपनी धारणाएँ मरीज़ों पर थोपते हैं। यह सोच किसी एक व्यक्ति की निजी समस्या भर नहीं है, बल्कि सामाजिक पूर्वाग्रहों और परंपरागत धारणाओं से निर्मित व्यवस्थागत सोच का हिस्सा है। हम बिना प्रश्न किए इसे स्वीकार करते आए हैं कि ऐसा ही होता है और आगे भी ऐसा ही होता रहेगा। मसलन, स्किन-केयर का डॉक्टर हर बार आपसे शादी के बारे में पूछता है, क्योंकि उसके मन में यह धारणा है कि किसी लड़की को मुँहासे या त्वचा संबंधी समस्याएँ हैं तो उसका संबंध मास्टरबेशन और प्रबल यौन-इच्छाओं से ज़रूर होगा, जबकि ऐसा होना अनिवार्य नहीं है। फिर भी वह अपनी इसी धारणा के आधार पर आपको जज करता है और शादी करने की सलाह देता है।
यहाँ असली समस्या यह है कि व्यक्ति अपने मन में मौजूद अश्लीलता की अवधारणा को दूसरे व्यक्ति पर आरोपित कर देता है। वह किसी घटना या व्यक्ति को उसी नज़रिये से देखने लगता है और फिर उसी के आधार पर उसका मूल्यांकन करता है, जबकि किसी व्यक्ति या घटना का वास्तविक स्वरूप हमेशा हमारी धारणाओं के अनुरूप हो, यह ज़रूरी नहीं।
मेरे ख़याल से असली अश्लीलता उस विचार में है, जो अपने भीतर के पूर्वाग्रहों को दूसरों पर जबरन लागू करता है। हमारी ये धारणाएँ व्यवस्थागत विफलता की द्योतक हैं। ऐसी व्यवस्था में सुंदर को सुंदर कहने तक पर अंकुश लगाया जाता है।
इस तरह देखें तो वे डॉक्टर, वह महिला और वह लड़की भी इसी व्यवस्था से प्रभावित लोग हैं। वे अपने भीतर बैठी धारणाओं के अनुसार व्यवहार कर रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उनके व्यवहार पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए, बल्कि यह कि उनके व्यवहार के पीछे काम कर रही सामाजिक संरचना को भी समझना ज़रूरी है। किसी व्यक्ति को केवल उसके व्यवहार के आधार पर दोषी ठहराने से उन पूर्वाग्रहों की पड़ताल नहीं हो पाती, जिन्होंने उस व्यवहार को जन्म दिया है।
इन सबके बीच एक बात और है, जिस पर आपसे बात करना चाहती हूँ। आपने उस लड़की के बारे में लिखा कि वह अब ‘बाल-बच्चेदार’ हो गई होगी। मेरा सवाल है कि इस वाक्य की ज़रूरत क्या थी? अगर यह ज़रूरी था, तो किस अर्थ में? क्या उस लड़की के जीवन की कल्पना करते हुए आपने अनजाने में उसे विवाह और बच्चों की एक तयशुदा सामाजिक परिणति से जोड़ दिया? और क्या इस वाक्य में कहीं सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स की झलक दिखाई देती है?
यदि ऐसा है, तो यह भी अपने आपमें एक अश्लील विचार है। इसमें हम ख़ुद को एक ऊँचे स्थान पर रखकर दूसरे को हाशिए पर धकेलते हैं और उसका मज़ाक़ बनाते हैं। दूसरों के जीवन को अपनी कसौटी पर रखकर उसका मूल्यांकन करना भी उसी मानसिकता का हिस्सा है, जिस पर हम सवाल उठा रहे हैं। यह बेहद शर्मनाक है।
मैं यह सब आपके लिखे को ख़ारिज करने के लिए नहीं लिख रही हूँ, बल्कि इसलिए कि मैं इसमें उठाए गए सवालों को थोड़ा और आगे ले जाना चाहती हूँ। मुझे लगता है कि अश्लीलता की पड़ताल करते हुए हमें केवल दूसरों की दृष्टि में मौजूद अश्लीलता नहीं देखनी चाहिए, बल्कि अपनी दृष्टि और अपने भीतर बैठी धारणाओं की भी जाँच करनी चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन पूर्वाग्रहों से हम दूसरों को मुक्त करना चाहते हैं, वे किसी दूसरे रूप में हमारे भीतर भी मौजूद हैं?
सादर
रूद्राणी
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रूद्राणी प्रियदर्शनी [जन्म : 2006] का कहीं कुछ भी प्रकाशित होने का यह प्राथमिक अवसर है। वह मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार में रहती हैं और बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद NEET परीक्षार्थी हैं। वह साहित्य पढ़ने-लिखने में गंभीर रुचि रखती हैं। ‘हिन्दवी’ की तरफ़ से उन्हें इस प्रथम प्रकाशन और उज्ज्वल भविष्य हेतु हार्दिक शुभकामनाएँ...
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