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अश्लील स्थितियों में फँसना

उन दिनों मैं मौसी के घर रहकर बारहवीं की परीक्षा दे रही थी। मेरे साथ उसी गाँव की एक लड़की परीक्षा देने जाती थी। उस सुबह भी हम दोनों पेपर देने साथ जा रहे थे, जब रास्ते में उसकी नज़र सड़क के एक किनारे झाड़ियों के पास खड़े मैथुनरत पशुओं पर पड़ी। वहाँ सड़क के किनारे काँस की झाड़ियों के पीछे एक तालाब था, जहाँ बहुत-सी गायें, भैंसें और अन्य छोटे-बड़े जानवर खड़े थे। उन्हीं जानवरों में से एक नर, मादा पर सवार था। उस स्थिति में मौजूद पशुओं पर उसकी नज़र पहले पड़ी, मेरी बाद में। और जैसे ही उसने देखा, वह दुपट्टे से मुँह दबाकर हँसने लगी। हँसी संक्रामक होती है, इसलिए उसकी देखा-देखी, बिन सोचे-समझे मैं भी हँसने लगी। वह हँसी वैसी नहीं थी, जिसे सुंदर कहा जाए, जिसमें फूल खिलने सरीखा आभास होता हो; वह ठीक वैसी ही हँसी थी, जिसे अश्लील कहा जा सकता है। कहा क्या जा सकता है—वह थी ही!

मेरी उम्र तब सोलह साल थी, लेकिन उसकी हँसी में साझीदार बनकर ठीक अगले ही क्षण मैं अपने भीतर शर्म से गड़ गई, मानो मेरे भीतर तुरंत किसी ने प्रश्न किया हो—क्या यह वाक़ई हँसने की बात थी? और अगर नहीं थी, तो वह हँसी तो हँसी, लेकिन तुम क्यों हँसी? अब हँसी हो, तो शर्म से डूब मरो! डूब मरने की ही बात है कि जो हँसने की नहीं थी, उस पर भी हँस रही हो।

इस बात को हुए भी सोलह बरस बीत चुके हैं। मेरे साथ बारहवीं की परीक्षा देने जाने वाली वह लड़की अब तक बाल-बच्चेदार हो चुकी है। मैं नहीं समझती कि उसकी स्मृति में उस घटना का अब तक कहीं नामोनिशान भी बचा होगा, लेकिन मैं वह दिन कभी भूल नहीं पाई, जिस दिन मुझसे भूलवश हुई उस अनुचित, आपत्तिजनक हरकत पर मेरे भीतर से मुझे किसी ने कुरेदकर कहा था—“तुम ऐसी कैसे हो सकती हो?” मैं आज भी वह सोलह बरस पुरानी घटना याद आने पर शर्म से गड़ जाती हूँ। वह मुझे याद हो आती है जब-तब, जब भी ऐसा कहीं कुछ दिखाई पड़ता है। पछताती हूँ कि उस हँसी में मुझे शामिल नहीं होना था। वह हँसने की नहीं, बल्कि भूल से वैसा कुछ दिख जाने पर नज़र फेर लेने की बात थी।

उसके बाद मैंने वैसा कभी किया हो, मुझे याद नहीं आता। मैं बीते पंद्रह-सोलह बरस से इस चीज़ के प्रति इतनी सजग और सचेत रही हूँ कि फिर कभी ऐसी किसी चीज़, किसी अश्लील हँसी या स्थिति का हिस्सा नहीं बनूँगी और भूलवश कभी ऐसा हो भी गया, तो तुरंत उसे सुधारूँगी। उस एक घटना को छोड़ दिया जाए, तो मैं वैसी किसी स्थिति का हिस्सा हुई भी नहीं हूँ। लेकिन यह मैं बहुत गहराई से अनुभव करती आई हूँ कि इंसान वैसी स्थितियों में सम्मिलित नहीं होता, ताली बजाने वाला दर्शक अगर नहीं बनता, तो पात्र होता है। पीड़ित पात्र होता है, भोक्ता होता है। और यह भी लगता है कि अगर हम सजग और सचेत रहें, तो दूसरों को तो ऐसी स्थितियों से बचा सकते हैं, लेकिन स्वयं को नहीं बचा पाते। इस सिलसिले में मुझे एक-के-बाद-एक अपने जीवन में घटी कई घटनाएँ याद आती हैं।

जिनमें सबसे पहली घटना क़रीब दस वर्ष पहले की है। उन दिनों मैं अनियमित पीरियड्स की समस्या से परेशान थी। मैं अपनी माँ के साथ गायनेकोलॉजिस्ट के पास गई थी। वहाँ पहुँची, तो डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड के लिए बोल दिया। अल्ट्रासाउंड जैसी किसी चीज़ से गुज़रने का मेरे जीवन का वह पहला अनुभव था, इसलिए तब मैं यह नहीं जानती थी कि अल्ट्रासाउंड अपने आप में एक बहुत असहज करने वाली प्रक्रिया है। न ही यह जानती थी कि अल्ट्रासाउंड से गुज़रने के लिए इंसान को तब तक पानी पीना पड़ता है, जब तक कि उसे तेज़ पेशाब न लगने लगे; तब कहीं जाकर अल्ट्रासाउंड की नौबत आ पाती है। मैं उस प्रक्रिया को सुनकर ही असहज हो गई थी और एक बोतल में पानी लेकर ख़ुद को सहज बनाने की कोशिश करती, इधर से उधर कॉरिडोर में टहल रही थी कि तभी मैंने देखा—वहाँ अल्ट्रासाउंड के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करती एक चौंतीस-पैंतीस बरस की गर्भवती महिला मुझे इधर से उधर चक्कर लगाते हुए लगातार बहुत ध्यान से देख रही थी।

उसका देखना ऐसा था, जैसे वह मुझमें कुछ टटोल रही हो, कुछ जाँचना-परखना चाह रही हो, या जैसे मैं वहाँ मौजूद कोई संदिग्ध व्यक्ति होऊँ। उसके इस तरह मुझे लगातार देखते, बल्कि घूरने से मुझे बहुत असहज महसूस हो रहा था। लेकिन मैं अब तक ऐसी मनुष्य नहीं हो पाई हूँ, जो किसी के घूरने पर उससे पलटकर सवाल करूँ, जब तक कि सामने वाला ख़ुद कुछ न कह दे। लेकिन उसके मुझे देखने का ढंग इतना आपत्तिजनक था कि उसके देखने से मेरे बदन में चींटियाँ-सी काटने लगीं और माथे में कोई कीड़ा रेंगने लगा।

मैं हैरान थी कि कोई लगातार ऐसा कैसे कर सकता है? आख़िर किसी अजनबी व्यक्ति को देखने की भी कोई तुक होती है। वह देखना एक मिनट हो, दो मिनट, चार मिनट हो; लेकिन अगर वह देखना जारी ही रहे, बंद ही न हो, तब इंसान क्या करे? लेकिन कुछ-न-कुछ तो करना ही चाहिए। यह बात मन में आई, तो मैं वहाँ से दूसरी तरफ़ चली गई, जहाँ से उस औरत को मेरी और मुझे उसकी सूरत दिखाई नहीं पड़ती थी।

मैं उस बात से न सिर्फ़ हैरान थी, बल्कि बहुत विचलित भी थी। बल्कि सहज तो मैं पहले से नहीं थी, लेकिन इस चीज़ में इज़ाफ़ा उस महिला ने कर दिया था। वहाँ से हटने के बाद भी मेरे मन में यह बात चलती रही कि कोई ऐसा कैसे कर सकता है? यह कितना विचित्र और अटपटा है। आख़िर मेरे वजूद या मौजूदगी में ऐसा क्या है कि कोई मुझे ताड़ता ही रहे—वह भी कोई औरत! क्या मैं कुछ अजीब और अटपटा पहने हुए हूँ? या मुझमें ऐसी कोई चीज़ दिखाई पड़ती है, जो नहीं दिखनी चाहिए? मुझे तो वही लोग नहीं पसंद आते, जो सामने वाले को बहुत गहरी नज़र से देखते हैं—फिर वे परिचित हों या अपरिचित। मैं ऐसे लोगों से हमेशा ही ख़ौफ़ खाती रही हूँ। इसका कारण शायद यह हो सकता है कि मैं ख़ुद कभी किसी को नज़र बाँधकर नहीं देखती। मैं कभी किसी की आँखों में देर तक नहीं झाँकती। किसी परिचित-अपरिचित की आँखों में झाँकते ही बिना वजह मेरे भीतर कुछ दरकने लगता है—शायद इसलिए कि मुझमें बचपन से ही आत्मविश्वास की कमी रही है या इसकी दूसरी एक बड़ी वजह यह भी रही है कि मुझे यह काम कभी पसंद ही नहीं रहा—न देखना और न ही इस तरह देखा जाना। चूँकि मैं ख़ुद यह काम पसंद नहीं करती, इसलिए दूसरों से भी यही चाहती रही हूँ।

लेकिन दुनिया हमारे चाहने से तो नहीं चलती। बल्कि यह संसार ऐसे असंख्य लोगों से भरा हुआ है, जो आँखों से हथियार का काम लेते हैं, जो आँखों से ही जग जीत लेना चाहते हैं। ऐसे लोगों में भाँति-भाँति के बिगड़े हुए लोगों के साथ शोहदों से लेकर कूढ़मगज़ महिलाएँ तक शामिल होती हैं। यह जान-समझ पाने में मुझे एक अरसा लग गया। उस दिन मुझे उस महिला से चिढ़ हो रही थी, लेकिन मेरी चिढ़ का तो मेरे पास कारण भी था; पर उसके मुझे विचित्र ढंग से लगातार घूरने का कारण क्या हो सकता है, यह बात मुझे समझ नहीं आ रही थी। यह पहेली तो मुझ पर तब जाकर खुली, जब घर आकर मैंने अपनी माँ से कहा—“तुमने वह औरत देखी थी, जो मुझे लगातार घूर रही थी? वह कितनी अजीब-सी थी।”

तब उन्होंने बताया—“जब तुम दूसरी तरफ़ चली गई थीं, तब वह मुझसे पूछ रही थी—क्या तुम्हारी लड़की प्रेग्नेंट है?”

“अच्छा, तो वह इसलिए मुझे इतनी अजीब नज़रों से घूर रही थी, जैसे मेरे आर-पार झाँक लेना चाहती हो।”

माँ की बात सुनकर मेरा दिमाग़ भन्ना गया।

“तो तुमने मुझे यह बात उसी वक़्त क्यों नहीं बताई?” मैंने क्रोध में भरकर कहा।

“तुम्हें क्या बताती मैं? मैंने उससे कह दिया कि नहीं, अभी उसकी शादी नहीं हुई है। उसके लिए इतना जान लेना काफ़ी था।”

“यह क्या बात हुई! तुम उसे जवाब देने की बजाय सफ़ाई-सी देने लगीं।”

माँ की बात सुनकर मैं उनसे ही लड़ बैठी, तो उन्होंने कहा, “मान लो, अगर वह मेरे बजाय तुमसे ही पूछ लेती, तो तुम उसे क्या जवाब देती? उसके घूरने पर तुम कुछ कह नहीं पाईं, सिवाय मन-ही-मन कुढ़ने के।”

“हाँ, क्योंकि मैं इतनी बदतमीज़ नहीं हूँ कि किसी के घूरने पर जवाब-तलब करूँ। लेकिन अगर वह यही सवाल तुम्हारी जगह मुझसे करती, तो मैं उसे बढ़िया-सा जवाब ज़रूर देती। कहती—इस जगह क्या हाज़िरी सिर्फ़ तुम्हारे जैसे लोगों की ही लगती है, या जो औरत यहाँ आती है, उसके लिए अनिवार्य है कि वह प्रेग्नेंट ही हो?”

उस रोज़ मैं माँ से मगज़मारी करके भी देर तक कुढ़ती रही और इस पर सोच-विचार करती रही कि अगर उसने सचमुच ही वह बात मुझसे कही होती, तो क्या मैं ऐसा कर पाती? तब मुझे लगा कि हाँ, कर पाती। मुझे उस पर क्रोध तो चढ़ा ही हुआ था। भले ही मैं चुपचाप उसे बर्दाश्त करती रही थी, लेकिन अगर वह मुझसे उलझती, तो मैं उसे सबक़ ज़रूर सिखाती। यूँ भी, मैं चाहे जितनी दबी-छिपी शख़्सियत की मालिक होऊँ, लेकिन मैंने यह हज़ार बार देखा है कि क्रोध में मेरा आप इंसान से शोलों में बदल जाता है। और कहीं-न-कहीं मुझे ख़ुद में यह बात अच्छी ही लगती है कि जो काम मैं सामान्य परिस्थितियों में नहीं कर पाती, उसे क्रोध में कर गुज़रती हूँ। क्रोध में मैं उसी तरह हाज़िर-जवाब हो जाती हूँ, जैसी मैं आम दिनों और सामान्य परिस्थितियों में भी बने रहना चाहती हूँ। अपने अंदर यह गुण न होने के कारण बरसों-बरस कुढ़ती आई हूँ।

उस दिन की जिस घटना का आज मैं यहाँ ज़िक्र कर रही हूँ, उस दिन के बारे में सोचने पर लगता है कि वह वक़्त ही अश्लील था, जिसमें उस डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड बोला, जिसे और अधिक अश्लील वहाँ बैठी उस औरत ने बना दिया था, जो अल्ट्रासाउंड के लिए हमारी ही तरह क़तार में बैठी थी। उसे वहाँ मौजूद महिलाओं से मैं कुछ अलग-थलग दिखाई पड़ रही थी, क्योंकि उसे समझ नहीं आ रहा था कि गर्भ और सुहाग-चिह्न—दोनों नदारद होने के बावजूद वहाँ मेरी मौजूदगी का आख़िर क्या कारण हो सकता था? मैं उस नासमझ औरत के लिए कौतूहल का कारण थी, तो वह मेरे लिए ख़ासे सिरदर्द का।

बहरहाल, मेरे बारे में अनहोने ख़याल लगाते हुए उसका मुझे ताड़ना एक अश्लील स्थिति में फँस जाना ही तो था। लेकिन तब मैं यह नहीं जानती थी कि उस दिन क़ुदरत ने मेरे जीवन के कुछ घंटे बड़े ही अलग ढंग से लिख रखे थे, जिनके कारण यह सिलसिला टूटेगा नहीं, बल्कि मैं ऐसी एक स्थिति से निकलकर दूसरी में दाख़िल हो जाऊँगी। उस रोज़ अगर बात वहीं ख़त्म हो जाती, तो क्या ही बुरा था; मगर ऐसा हुआ नहीं। बल्कि हुआ तो यह कि जैसे ही मैं अपनी बारी आने पर अल्ट्रासाउंड रूम में दाख़िल हुई, वहाँ मैंने ख़ुद को इससे भी विकट और असहज करने वाली स्थिति में पाया और मन-ही-मन वहाँ फँसकर, अपने साथ-साथ जो भी उस सबके लिए ज़िम्मेदार था, उसे कोसती रही।

उस रोज़ उस औरत से पार पाने के बाद, जैसे ही मैं अल्ट्रासाउंड रूम पहुँची और वह प्रक्रिया शुरू हुई, डॉक्टर ने मुझसे मेरी ज़िंदगी के बारे में एक के बाद एक सवाल करने शुरू कर दिए। डॉक्टर, जो उसी अस्पताल में फ़िज़ीशियन थे—साथ ही मैं जिस डॉक्टर से इलाज कराने गई थी, उनके पति भी! हमारे शहर के उस अस्पताल में अल्ट्रासाउंड का काम भी वही करते थे। चूँकि मेरा तो अल्ट्रासाउंड से ही ज़िंदगी में पहली बार पाला पड़ा था और साथ-साथ ऐसे डॉक्टर से भी, इसलिए मैं, जो पहले से विचलित और परेशान थी, इस स्थिति का सामना करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। न ही मैं ऐसे मिज़ाज की इंसान रही हूँ, जो इस चीज़ को सहजता से ले पाऊँ। (मुझे हमेशा लगता है कि इंसान बस अपने काम से काम रखे—क्यों किसी के जीवन के बारे में अनावश्यक जानना या दख़ल देना है।) फिर वह स्थिति भी सहज होने लायक़ नहीं थी।

उस वक़्त मुझे यही महसूस हो रहा था कि मैं एक नरक से निकलकर दूसरे नरक में आ गई हूँ। यह एक तरह का नरक ही तो था कि अल्ट्रासाउंड रूम में मैं पेट उघाड़े लेटी थी; मेरे पेट पर कोई गोल-गोल चीज़ घूम रही थी और वहाँ मौजूद तीन जोड़ी आँखें मुझे लगातार देख रही थीं—डॉक्टर, उसके साथ मौजूद एक लड़की और तीसरी मेरी माँ। बहुत अधिक मात्रा में पानी पीने के कारण मुझे तेज़ पेशाब लगी हुई थी। और डॉक्टर मेरी निजी ज़िंदगी के बारे में एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, तीसरे के बाद चौथा-पाँचवाँ-छठा-सातवाँ-आठवाँ सवाल किए जा रहे थे, जैसे मैं वहाँ अल्ट्रासाउंड के लिए नहीं, इंटरव्यू के लिए पहुँची होऊँ। मैं उस वक़्त बड़े ही अनमने ढंग से उनके किसी सवाल का उत्तर दे रही थी, तो किसी पर चुप्पी साध लेती थी—यह सोचकर कि शायद इस तरह डॉक्टर को मेरी बात समझ आ जाए। पर डॉक्टर बातों में इतने मग्न थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

मुझे उस वक़्त डॉक्टर पर अथाह क्रोध आ रहा था। बल्कि एक बार तो स्थिति यह हो गई कि मन में तीव्र इच्छा हुई कि या तो इस डॉक्टर को कोई करारा जवाब दे दूँ या उसी वक़्त वहाँ से उठकर चली जाऊँ। क्योंकि डॉक्टर अगर मेरी बीमारी से संबंधित कोई प्रश्न पूछते, तो मुझे क्या ही दिक़्क़त होती; लेकिन वह मेरे स्कूल-कॉलेज से लेकर घर-परिवार, पसंद-नापसंद और शादी-ब्याह तक न जाने क्या-क्या पूछे जा रहे थे। उस वक़्त मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कोई कारपेंटर अपनी बनाई किसी प्रिय वस्तु में बड़े लगन से, आहिस्ता-आहिस्ता, दुनियादारी बिसराकर कीलें ठोंकता है; ऐसे ही वह डॉक्टर मग्न होकर मेरे अंदर एक के बाद एक सवालों की कीलें ठोंक रहे थे।

अब स्थिति यह थी कि हर गुज़रते क्षण और हर पूछे जाने वाले प्रश्न के साथ मेरा माथा गरम होता जा रहा था। मैं मन-ही-मन डॉक्टर को गालियाँ देते हुए कह रही थी—“डॉक्टर, तुम्हारी ऐसी की तैसी!” पर असल ज़िंदगी में उस वक़्त यह मेरे साथ हो रहा था। मेरे क्रोध का उस वक़्त कोई पारावार नहीं था। हालाँकि यह बात उन लोगों को सामान्य लग सकती है, जिन्हें बोलना-बातें करना बहुत पसंद होता है। इसके साथ-साथ दूसरों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप भी उन्हें कोई अटपटी बात नहीं दिखाई पड़ती। लेकिन मेरे जैसे अंतर्मुखी और चुप्पा इंसान के लिए उस स्थिति में फँसकर मन-ही-मन छटपटाना नरक भोगने जैसा ही था।

मैं उस वक़्त ख़ुद को बहुत बेबस महसूस कर रही थी, क्योंकि डॉक्टर मुझसे सवाल पूछने में इतने मग्न थे कि उन्होंने अल्ट्रासाउंड के लिए जितना समय लगना चाहिए था, उससे कुछ अधिक समय लगा दिया था। हालाँकि इसके पीछे वजह यह नहीं थी कि डॉक्टर की मेरे शरीर में कोई दिलचस्पी थी। अगर होती, तो बहुत संभव था कि मैं जान जाती। लेकिन मेरे शरीर में दिलचस्पी न होते हुए भी डॉक्टर की मुझमें और मेरे जीवन के बारे में जानने में भरपूर दिलचस्पी थी। यह बड़ी ही विचित्र बात थी और इस चीज़ से तब मेरा जीवन में पहली बार पाला पड़ा था।

उस दिन डॉक्टर के अनजाने सवालों के जवाब देते-देते मेरा चेहरा शर्म, संकोच और ग़ुस्से से लाल हो गया था, लेकिन मैं कुछ कर सकने की हालत में नहीं थी। मेरे अंदर कई तरह की भावनाएँ एक साथ न सिर्फ़ घुमड़ रही थीं, बल्कि मुझे झिंझोड़ रही थीं। कोई लहर-सी एक के बाद एक आकर मुझसे टकरा रही थी। ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे उस वक़्त मेरा सिर्फ़ पेट नहीं उघड़ा, बल्कि मैं पूरी की पूरी उघड़ गई थी—जैसे वह सब जानबूझकर किया गया हो। डॉक्टर को सब पता हो; बल्कि वहाँ मौजूद हर शख़्स को सब पता हो, फिर भी सब तमाशबीन बने खड़े हों।

ख़ैर, किसी तरह वह अल्ट्रासाउंड पूरा हुआ और मैं उस स्थिति से बाहर निकली, लेकिन कई दिनों तक उसमें फँसकर होने वाली अनावश्यक बातचीत से मेरा मन ख़राब रहा और मैं उस नरक से निकलकर भी उसकी आग में कई रोज़ तक जलती रही। रह-रहकर मुझे इस बात पर ग़ुस्सा आता रहा कि मैं, बजाय अंदर-ही-अंदर सुलगने के, उसे सीधे मना भी तो कर सकती थी। कह सकती थी कि मुझे अपने निजी जीवन के बारे में अनावश्यक बातचीत पसंद नहीं है। लेकिन मैं उस दिन अपने पक्ष में एक शब्द भी नहीं कह पाई—इस बात का मुझे आज तक अफ़सोस है!

उस दिन अगर करना ही था, तो वह बाद में मुझसे कुर्सी पर आमने-सामने बिठाकर सवाल-जवाब कर लेते; लेकिन उस वक़्त जिस स्थिति में मैं मौजूद थी, उसमें उनका प्रश्नोत्तर करना एक तरह से जीवित नरक झेलने जैसा ही था, जिसने मुझे कई दिनों तक सामान्य नहीं रहने दिया। उससे बाहर आकर भी मेरे मन में कई रोज़ तक उथल-पुथल होती रही। अपने आप से सवाल-जवाब का सिलसिला—इस बात को लेकर एक लड़ाई-सी चलती रही कि मैं उन हालात में अपने हक़ में क्या बेहतर कर सकती थी? मुझे कई दिनों तक—कभी विचित्र ढंग से देखने वाली उस औरत की मेरी देह को बेधती नज़रें दिखाई देतीं, तो कभी डॉक्टर के सवाल सुनाई देने लगते। और सबसे बड़ा प्रश्न, जो मेरे सामने मुँह बाए खड़ा था, वह यह था कि मैं जैसी हूँ—वैसी आख़िर क्यों हूँ?

जिन लोगों का यह रोज़मर्रा का काम होगा, वे तो इसे करके कब का भूल चुके होंगे; फिर मुझे इस सबसे इतना फ़र्क़ क्यों पड़ रहा है? मेरे मन में यह सब हमेशा के लिए दर्ज क्यों होता जा रहा है? यह सब जो मुझसे होकर गुज़रा है, बहुत संभव है कि छह महीने, साल भर बाद मुझे बहुत तकलीफ़ के साथ याद न रहे; पर याद तो रहेगा—भूलूँगी कभी नहीं, यह मैं भली-भाँति जानती हूँ।

यह कितनी विचित्र बात है कि जो लोग दूसरों के जीवन में अनावश्यक रूप से इस तरह दाख़िल होते हैं, उन्हें कभी इस चीज़ का एहसास तक नहीं होता कि उनका किया-धरा—जो उनके लिए रोज़मर्रा की मामूली-सी बात होती है—किसी को गहरी यातना में धकेल सकता है, मानसिक रूप से लंबे समय के लिए विचलित कर सकता है। इस संसार में यह क्यों संभव नहीं है कि इंसान किसी के जीवन में किसी भी क़िस्म का ग़ैर-ज़रूरी हस्तक्षेप करते हुए एक नज़र सामने वाले के मिज़ाज पर भी डाल ले? संसार के अधिकतर लोगों को यह क्यों लगता है कि जैसे वे ख़ुद हैं, संसार का हर दूसरा-तीसरा-चौथा-पाँचवाँ या आख़िरी मनुष्य भी वैसा ही होगा?

मुझे याद है, मेरे जीवन में इस तरह की दूसरी-तीसरी घटना भी एक डॉक्टर के यहाँ ही घटी थी। पिछले बरस मुझे कुछ स्किन प्रॉब्लम थी। उसके इलाज के लिए मैं डॉक्टर के यहाँ पहुँची, तो केबिन के अंदर दाख़िल होते ही उसने पहला सवाल पूछा, “कैसी हो?” डॉक्टर की यह बात सुनते ही मुझे अपने पुराने अनुभवों के हवाले से सावधान हो जाना चाहिए था, लेकिन मैं सजग-सतर्क नहीं हुई। क्योंकि बहुत-सी चीज़ें अपने असल अर्थ में मेरे पास देर से पहुँचती हैं—यानी तब, जब तीर कमान से छूट चुका होता है। यह मैं इसलिए भी कह रही हूँ कि जिस डॉक्टर के पास आप जीवन में पहली बार गए हों, उसका पहला सवाल ही यह करना कोई सामान्य बात नहीं थी; दूसरे, अगर थी भी, तो उसके पूछने का लहज़ा सामान्य नहीं था। होना तो यह चाहिए था कि डॉक्टर के यह पूछते ही मैं आगे आने वाले सवालों के लिए चौकस हो जाती, लेकिन मैं इतनी ही तेज़-दिमाग़ और होशियार होती, तो डॉक्टर ऐसा प्रश्न करता ही क्यों? बल्कि वह मुझसे पूछता—“बताइए, क्या समस्या है आपको?”

और उसका यही पूछना सही भी था, लेकिन उसने मेरी शक्ल पर पता नहीं क्या देख-पढ़ लिया कि यह पूछने की बजाय उसने मेरी तरफ़ भौंहें चलाते हुए पूछा—“कैसी हो?”—यह भी नहीं, “कैसी हैं आप?”, बल्कि “कैसी हो?” इस तरह, जैसे मेरी उससे बहुत पुरानी जान-पहचान या दोस्ती-यारी हो; जबकि इससे पहले हमने कभी जीवन में एक-दूसरे की शक्ल नहीं देखी थी। लेकिन डॉक्टर ने यह बात जिस अंदाज़ में पूछी थी, मैं कुछ कहने की बजाय हाँ में सिर हिलाकर रह गई।

मुझे याद है, उस दिन इलाज करने के साथ-साथ उस डॉक्टर ने भी वैसे प्रश्न पूछे थे, जो उसे नहीं पूछने चाहिए थे। साथ में हर परिचित-अपरिचित द्वारा पूछा जाने वाला वह सदाबहार प्रश्न भी—“शादी हो गई तुम्हारी?” यह अलग बात है कि डॉक्टर को पता नहीं था, और न ही वह मेरी शक्ल से इस बात का अंदाज़ा लगा सकता था कि मुझे इस सवाल से अब तक सख़्त चिढ़ हो चली है। डॉक्टर के यह कहते ही एक बार फिर से मेरे माथे की नस तन गई, लेकिन मैंने अपने अंदर की कड़वाहट छिपाकर कहा—“अभी नहीं हुई है, सर।” यह सुनकर डॉक्टर ने अगला प्रश्न किया—“तो कब करोगी?” यह बात सुनते ही मेरा दिमाग़ अंदर-ही-अंदर पटरी से उतर गया। लेकिन मैंने सोचा—दुनिया है, हर तरह के लोग हैं; एक बार कर लिया, अब बार-बार थोड़े ही पूछेगा यह। लेकिन मुझे क्या मालूम था कि मैं वहाँ दूसरी बार जाऊँगी, तब फिर से वही सवाल मेरे सामने मुँह बाए खड़ा होगा।

मुझे याद है, मैं जब महीने भर बाद अगली तारीख़ को ट्रीटमेंट के लिए गई, तब डॉक्टर ने फिर से उसी सवाल को उलटा करके पूछा—“शादी नहीं हुई है अभी तक तुम्हारी?” और मैंने किलसकर इनकार में सिर हिला दिया। फिर उसके महीने भर बाद, जब तीसरी बार पहुँची, तो डॉक्टर ने दूसरी इलाज-संबंधी बात के बीच एक बार फिर अचानक से कहा—“शादी कर लेनी चाहिए अब तुम्हें। क्यों नहीं कर रही हो, बताओ?”

मुझे याद है, उस दिन मैं उनके केबिन से सटे छोटे-से रूम में ऊँची-सी बेंच पर लेटी थी। मेरे चेहरे पर कुछ जेल जैसी चिपचिपी चीज़ और आँखों पर एक काली पट्टी लगी हुई थी। चेहरे पर लेज़र मशीन चल रही थी और मेरे सिर पर सवार डॉक्टर अपर लिप पर वह मशीन चलाते हुए मुझसे यह सवाल पूछ रहा था। एक बार फिर से मुझे उस वाहियात सवाल का उतनी ही वाहियात स्थिति में जवाब देना था, जो मुझसे अब तक अलग-अलग लोगों द्वारा इतनी बार पूछा जा चुका था कि उसकी गिनती नहीं की जा सकती। बावजूद इसके, आज तक मैं कभी ऐसे सवालों की अभ्यस्त नहीं हो पाई हूँ। शायद हो जाती, तो मुझे भी ऐसी चीज़ें नॉर्मल लगने लगतीं। जीवन इसीलिए तो इतना दुरुह है—दुनियावी लोगों से कहीं अधिक दुश्वार!

डॉक्टर की बात सुनकर एक बार फिर से मेरा दिमाग़ गरम हो रहा था और मुझे कई बरस पहले अल्ट्रासाउंड रूम में गुज़ारा हुआ वक़्त याद आ रहा था। मुझे महसूस हो रहा था कि ज़िंदगी का चक्र घूमकर एक बार फिर से वहीं पहुँच गया है। हाँ, हालात थोड़े अलग हैं, पर उस दिन से बहुत अलग नहीं हैं। मैं एक बार फिर से उस स्थिति में दाख़िल होकर उसी बेचैनी और कुछ न कह पाने वाली छटपटाहट से भर गई थी।

उस दिन मैं उस डॉक्टर से पूछना चाहती थी कि शादी करना इतना अनिवार्य क्यों है? क्या शादी कोई बहुत पवित्र चीज़ है? मैं तो अपने बचपन से लेकर आज तक शादियाँ ही देखती आई हूँ। बल्कि हम सब जिस समाज का हिस्सा हैं, उसमें सबसे अधिक इन्हीं को देखते हुए हमारा जीवन कटता है। लेकिन जब मन की उस आँख से इन्हें देख पाते हैं, जिससे मनुष्य को देखना चाहिए, तो हमें यह इतना भव्य और अनिवार्य नहीं दिखाई पड़ता, जितना इसे बना दिया गया है।

लेकिन मैं यह बात उस डॉक्टर को नहीं कह सकी। बल्कि एक वाक्य भी इस तरह का नहीं बोल पाई। लेकिन घर आने के बाद घंटों इस बारे में बैठकर सोचती-विचारती रही और कुढ़ती रही—इस पर भी कि अपने विचारों और सोच में बहुत स्पष्ट होने के बावजूद मैं जवाब क्यों नहीं दे पाती हूँ? सारी बातों का जवाब होता है मेरे पास, फिर भी मैं चुप रह जाती हूँ, लिहाज़ कर जाती हूँ; या जब तक सही जवाब मन में आता है, तब तक बात पीछे छूट चुकी होती है, या जिसे जवाब देना होता है, वह लोग ही वहाँ मौजूद नहीं रहते। मैं अपने दब्बूपन पर उम्रभर अपने आप से कितनी चिढ़ती आई हूँ—इसका कोई हिसाब नहीं है!

कई बार मैं सोचती हूँ कि अगर मेरी परवरिश थोड़े बेहतर ढंग से हुई होती, तो शायद आज मेरी शख़्सियत ऐसी नहीं होती, जैसी कि है। लगता है कि कुछ कमी मुझमें पैदाइशी थी, तो कुछ दोष मेरे माँ-बाप का भी रहा कि उन्होंने मुझे कभी कुछ बेहतर नहीं दिया—लाड़-दुलार, अच्छा माहौल, अच्छी पढ़ाई-लिखाई—कुछ भी नहीं। मैं जो भी बन सकी, ख़ुद से, अपनी कमियों, अपने अभावों, अपनी लगन और जीने की चाह से बनी। हाँ, यह अलग बात है कि मैंने कभी जीवन में फटे कपड़े नहीं पहने और न ही मुझे कभी भूखे पेट सोना पड़ा। लेकिन मेरे मन में यह बात हज़ार बार आती रही है कि सिर्फ़ अच्छा खाना और अच्छा पहनना ही तो ज़िंदगी नहीं होती। ज़िंदगी तो वह होती है, जब हमारे जीवन के लक्ष्य ऊँचे हों—अपने लिए और संसार के लिए भी। या फिर वे लम्हे होते हैं कि बार-बार उनके नज़दीक पहुँचें, जिन्हें हम सुख की तितलियाँ कहते हैं—जो जीवन में बनी नहीं रहतीं, पर हम उन्हीं के लिए जीते हैं, उन्हीं के लिए मेहनत और संघर्ष करते हैं; बावजूद इसके कि हमें मालूम नहीं होता कि वे हमें कब मिलेंगी या मिलेंगी भी या नहीं। पर जब भी मिलती हैं, हम जी उठते हैं, तरो-ताज़ा हो उठते हैं। और जीवन में लगातार बनी रहने वाली दुख-मुसीबतों के बावजूद, उनके सहारे ही बरस-दर-बरस गुज़ारते रहते हैं—कम-से-कम मेरे जैसे लोग!

यह सब कुछ मैं डॉक्टर के केबिन से निकलने के बाद रास्ते भर और घर आने के बाद भी सोचती रही। और यह भी कि—क्या मेरे जैसे लोग सिर्फ़ सोचते ही रह जाते हैं? क्या यह सिर्फ़ मेरे साथ होता है कि कोई अनचाहा या अनजान व्यक्ति किसी भी तरह का पर्सनल सवाल करे, तो मैं भीतर तक बुझ जाती हूँ, जवाब भले ही उस बात का दे दूँ? क्या इस तरह दूसरे लोग भी सोचते या महसूस करते हैं? या मेरा मन ही बातों को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है? जो बातें सबके लिए नॉर्मल हैं, वे मेरे लिए क्यों नहीं हैं? मैं जिन बातों पर दूसरों से नहीं लड़ पाती, उन पर अपने आप से घंटों लड़ती-झगड़ती रहती हूँ। मैं चीज़ों को उस नज़र से क्यों नहीं देख पाती, जैसे अधिकतर लोग देखते हैं? क्या इस तरह देखना, सोचना, महसूस करना और ज़िंदगी जीना—जीने को बहुत मुश्किल नहीं बना देता? मैं कितना सोचती-विचारती हूँ, फिर भी सही समय पर मेरे कुछ भी काम नहीं आता—जैसे उस दिन नहीं आया था।

जब डॉक्टर ने मुझसे शादी करने की बात कही, मैं उसकी इस बात का जवाब नहीं देना चाहती थी, लेकिन फिर भी न जाने क्यों मैंने पलटकर कहा—“किसी को सड़क से पकड़कर शादी थोड़े ही होती है? दूसरी बात, मैं खरीद-फ़रोख़्त वाली शादी नहीं करना चाहती।”

“खरीद-फ़रोख़्त वाली मतलब?” डॉक्टर ने पूछा।

“मतलब दान-दहेज, लेन-देन वाली।”

मैंने उसे जवाब दिया, तो उसने पलटकर कहा—“तो अपनी पसंद के लड़के से कर लो।”

मन ने तुरंत जवाब दिया—“अपनी पसंद से कैसे कर लूँ? अपनी पसंद की चीज़ों की तरह अपनी पसंद के लड़के भी क्या बाज़ार में मिलते हैं? यह तो बड़ी ख़ुशनसीबी की बात होती है, जो किसी-किसी के जीवन में ही हुआ करती है।”

मैंने यह बात अपने मन में कही, पर उस दिन मैं डॉक्टर के हर बार के शादी-पुराण से इतनी तंग आ गई थी कि जब चौथी बार लेज़र के लिए गई, तो मैंने घर से ही इस बात का पक्का इरादा कर लिया था कि आज अगर डॉक्टर ने फिर से शादी का ज़िक्र किया, तो मैं उसे ऐसा जवाब दूँगी कि फिर कभी किसी से भी शादी के बारे में बात करना भूल जाएगा।

लेकिन डॉक्टर की क़िस्मत अच्छी थी कि चौथी बार जब मैं वहाँ पहुँची, तो उस दिन उसने शादी से संबंधित कोई बात नहीं की। यह देखकर मेरे मन को बड़ी राहत मिली कि डॉक्टर ने मुझसे ऐसे बेफ़िज़ूल सवाल पूछने बंद कर दिए और इससे भी कि मैं उसके साथ उस ढंग से बात करने से बच गई, जिसे सुनकर उसे अच्छा तो नहीं ही लगता। हालाँकि किसी बात के लिए स्पष्ट हाँ या ना करना बदतमीज़ी नहीं होती, बल्कि यह किसी भी इंसान का जायज़ हक़ होता है। लेकिन जो ख़ुद बदतमीज़ होते हैं, उन्हें बिना घुमाए-फिराए जवाब मिलने पर कई बार यह ज़रूर लगता है कि सामने वाले ने बदतमीज़ी की है; न कि उनके मन में कभी यह प्रश्न उठता है कि किसी के जीवन के निजी निर्णय पर बार-बार सवाल खड़े करना या उसे कुरेदना कहीं से सही तो नहीं कहा जा सकता!

जीवन में इनके अलावा और भी ऐसी छोटी-बड़ी अनेकानेक घटनाएँ हुई हैं। उन्हें जब भी याद करती हूँ, वे आज भी असहज करती हैं। बारहवीं की परीक्षा के उन्हीं दिनों की एक और घटना याद आती है। उन दिनों हम दोनों लड़कियों के घर में हमारे बड़ों द्वारा यह नियम बनाया गया था कि सुबह का पेपर बारी-बारी से हमारे भाई दिलाने जाएँगे। भाई यानी उसका और मेरा भाई। उस गाँव से क़रीब सोलह किलोमीटर दूर हमारा सेंटर पड़ा था, तो तय हुई बात के मुताबिक़ हम तीन लोग बाइक से परीक्षा देने जाने लगे—मैं, वह लड़की और कभी उसका, तो कभी मेरा भाई। लेकिन इस बीच हुआ यह कि उस लड़की ने एक नया सिलसिला शुरू कर दिया।

होता यह था कि जिस दिन उसका भाई साथ जाता था, उस दिन वह ख़ुद बीच में बैठती थी और जिस दिन मेरा भाई साथ जाता था, उस दिन वह कहती थी, “तुम बीच में बैठो, मैं नहीं बैठूँगी।” मुझे यह बात बहुत नागवार गुज़रती थी। मुझे लगता था, यह कैसा गंदा नियम है! देह को लेकर इतना असहज क्यों होना है कि पराए आदमी का शरीर ग़लती से भी छू न जाए? इसको लगता है कि इस तरह यह पवित्रता क़ायम रखे हुए है, जबकि असल में तो यही गंदगी है!

शुरू में एक-दो बार तो मुझे समझ ही नहीं आया कि वह ऐसा क्यों कर रही थी, लेकिन जब हर बार यह अघोषित नियम लागू होने लगा, तब समझ आया कि यह सिर्फ़ बैठने का तरीक़ा नहीं, बल्कि कुछ और था। और जो भी था, ठीक बिल्कुल नहीं था। हालाँकि मैं ख़ुद भी तो तब उसकी हमउम्र ही थी। हमारे घर-परिवार और आस-पास की दुनिया भी लगभग एक जैसी ही थी, लेकिन एक ही चीज़ को लेकर हमारी सोच में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ था।

आज इतने बरसों बाद लगता है कि बारहवीं की परीक्षा देने वाली किसी सोलह साल की लड़की के मन में शरीर को लेकर ऐसे ख़याल आने ही क्यों चाहिए? और अगर आ रहे थे, तो उनकी नींव कहाँ पड़ रही थी? लेकिन उस उम्र में जिस तरह की बातें मैं सोचती थी, वे मेरे पास कहाँ से आ रही थीं, यह भी तो मैं नहीं जानती थी!

उन दिनों वह लड़की जब भी यह बात दोहराती थी, मुझे उस पर न सिर्फ़ बहुत क्रोध आता था, बल्कि मैं इतनी असहज हो जाती थी कि उस दौरान कई बार मेरे मन में आया कि मैं परीक्षा ही छोड़ दूँ। शरीर को लेकर उसका वह आग्रह मुझे विचलित और परेशान करता था, मगर मेरे पास कोई चारा नहीं था। और वह बात, ग़लत होते हुए भी, किसी को बतलाई नहीं जा सकती थी। पर वह भी मेरे लिए एक तरह की अश्लील स्थिति ही थी, जिससे होकर न चाहते हुए भी बार-बार गुज़रना हुआ था।

लोग कहते हैं कि अश्लीलता कपड़ों में होती है, बातों में होती है और नज़र में भी होती है; लेकिन यह अश्लीलता तो वह होती है, जो साफ़-साफ़ दिखाई पड़ती है, ठीक वैसे ही जैसे अपने आस-पास होते बहुत सारे अपराध हमें दिखाई पड़ते हैं। जबकि अपराध सिर्फ़ वहीं तो नहीं होते, जो खुली आँखों से दिखाई पड़ते हैं; इसके अलावा भी तो अपराध हुआ करते हैं। चूँकि वे दिखते नहीं, इसलिए कहीं अधिक मात्रा में होते हैं। ऐसे ही बहुत कुछ वह सब भी अश्लील हो सकता है, जो हमें उथली आँख और उथले मन से दिखाई नहीं पड़ता। कई बार ख़ुद को बहुत पवित्र बनाए रखने की कोशिश, विपरीत लिंग के व्यक्ति के प्रति सोते-जागते चौबीसों घंटे असहज रहना भी अश्लीलता को जन्म देता है। दुनिया यह बात माने न माने, मैं तो मानती हूँ।

कई बरस हुए, मैंने अश्लीलता पर अलग से एक लेख लिखा था, जिसमें यह भी लिखा था कि अश्लीलता हर उस जगह है, जहाँ मनुष्यों द्वारा किसी भी कारण से मनुष्यता हताहत होती है। अश्लीलता हर उस जगह है, जहाँ कोई किसी के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करता हो। क्योंकि यह अश्लीलता वह नहीं है, जिसे हम जानते, बताते और समय-समय पर चिह्नित करते हैं। वास्तव में अश्लीलता के कितने रूप हो सकते हैं—होते हैं—यह हमें ठीक-ठीक मालूम ही नहीं है। कई बार लगता है कि इसे देखने की आँख तो उनके पास भी नहीं है, जिन्होंने सैकड़ों किताबें पढ़ रखी हैं, जो बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लेकर ऊँचे-ऊँचे पदों पर जमे हुए हैं; जिनके ऊपर न सिर्फ़ ख़ुद बेहतर होने, बल्कि समाज को बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी भी है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। क्योंकि यहाँ जिस अश्लीलता की बात हो रही है, उसे देखने के लिए वह नज़र चाहिए होती है, जो सबके पास नहीं होती। और जिनके पास होती है, वह उन्हें जीवन भर व्याकुल किए रहती है!

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