पटना में अरुंधति रॉय
राजेश कमल
22 जुलाई 2026
बारिश की पहली फुहारों और सावन की आहट के बीच, 18 जुलाई 2026 की शाम पटना के सांस्कृतिक जीवन की एक उल्लेखनीय शाम बन गई। वर्षों से अपनी साहित्यिक और सांस्कृतिक सक्रियता के लिए पहचाना जाने वाला यह शहर पहली बार अरुंधति रॉय की किसी पुस्तक के लोकार्पण का साक्षी बना। अवसर था उनकी नवीनतम पुस्तक Mother Mary Comes to Me के हिंदी अनुवाद ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ के लोकार्पण का। यह कार्यक्रम राजकमल प्रकाशन समूह और अर्थशिला की साझा सांस्कृतिक पहल ‘परस्पर’ के प्रथम कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया।
कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही सभागार श्रोताओं से भर चुका था। साहित्य-प्रेमियों, शिक्षाविदों, कलाकारों, शोधार्थियों और युवा पाठकों की बड़ी उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि अरुंधति रॉय का लेखन अब भी व्यापक जिज्ञासा और संवाद का विषय है। अनेक लोगों के हाथों में उनकी पुस्तकें थीं और वातावरण में अपने प्रिय लेखक से मिलने का उत्साह स्पष्ट दिखाई देता था। किसी भी लेखक के लिए पाठकों का ऐसा आत्मीय स्वागत अपने आप में एक सांस्कृतिक घटना है।
अरुंधति रॉय का पटना-आगमन भी इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण था। उनके पाठकों, युवा लेखकों, रंगकर्मियों, कलाकारों और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों ने इस शाम को एक साझा सांस्कृतिक अनुभव में बदल दिया। कार्यक्रम का संचालन कथाकार प्रत्यक्षा ने किया। मंच पर अरुंधति रॉय के साथ पुस्तक के अनुवादक प्रभात सिंह उपस्थित थे।
कार्यक्रम के दौरान पुस्तक के कुछ अंशों का पाठ हुआ। अरुंधति रॉय ने मूल अँग्रेज़ी पाठ पढ़ा और प्रभात सिंह ने उसका हिंदी रूप प्रस्तुत किया। पहली सुनवाई में यह अनुभव सुखद था कि हिंदी अनुवाद मूल की लय, संवेदना और आत्मीयता को काफ़ी हद तक अपने साथ लेकर चलता है। अनुवाद का अंतिम मूल्यांकन तो पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद ही संभव होगा, लेकिन प्रारंभिक पाठ भरोसा जगाता है।
अरुंधति रॉय ने बताया कि इस पुस्तक का अब तक पैंतालीस भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और अब यह हिंदी में भी उपलब्ध है। स्वाभाविक है कि हिंदी में प्रकाशित होने के बाद इसका पाठक-वर्ग और व्यापक होगा।
कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष ‘परस्पर’ की अवधारणा भी थी। 7 जुलाई 2026 को इसकी घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट कर दिया गया था कि राजकमल प्रकाशन समूह और अर्थशिला का यह सहयोग केवल पुस्तक-लोकार्पणों तक सीमित नहीं रहेगा। उद्देश्य एक ऐसे सांस्कृतिक सिलसिले को विकसित करना है; जहाँ साहित्य, कला और समाज के बीच जीवंत संवाद संभव हो। ऐसे समय में, जब सार्वजनिक विमर्श का दायरा लगातार सिकुड़ता महसूस होता है; यह पहल संवाद की उस परंपरा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास है, जिसने भारतीय सांस्कृतिक जीवन को हमेशा ऊर्जा दी है।
‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ स्मृति, परिवार और स्त्री-अस्मिता के जटिल संबंधों की पड़ताल करने वाली पुस्तक है। यह पारंपरिक अर्थों में आत्मकथा नहीं, बल्कि लगभग चालीस संस्मरणात्मक वृत्तांतों का ऐसा संकलन है जिसमें अरुंधति रॉय अपने बचपन, पारिवारिक अनुभवों, संघर्षों और अपनी माँ मैरी रॉय के साथ रहे जटिल लेकिन गहरे संबंधों को असाधारण ईमानदारी से दर्ज करती हैं। निजी अनुभवों के माध्यम से वह व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों तक भी पहुँचती हैं।
पुस्तक का दायरा केवल पारिवारिक स्मृतियों तक सीमित नहीं है। इसमें विकास, विस्थापन, राज्यसत्ता, सामाजिक आंदोलनों और न्याय की लड़ाइयों से जुड़े उनके अनुभव भी शामिल हैं। माओवादी इलाक़ों की यात्राएँ, नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ाव, अदालतों से टकराव और जेल में बिताया गया समय—ये सभी प्रसंग इस संस्मरण को एक बड़े सामाजिक परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हैं।
इस पुस्तक की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उसकी बेबाकी है। अरुंधति रॉय आर्थिक असुरक्षा, प्रेम, विवाह, पारिवारिक तनाव, आत्मसंघर्ष और अपनी असफलताओं पर भी उतनी ही स्पष्टता से लिखती हैं, जितना कि सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर।
इस पुस्तक में मैरी रॉय एक ऐसी स्त्री के रूप में सामने आती हैं जिन्होंने पितृसत्ता को चुनौती दी, लड़कियों के अधिकारों के लिए लंबी क़ानूनी लड़ाई लड़ी और सामाजिक रूढ़ियों से लगातार टकराईं। साथ ही लेखिका उनकी कठोरता, उनके ग़ुस्से और माँ-बेटी के रिश्ते की जटिलताओं को भी बिना किसी संकोच के दर्ज करती हैं।
अठारह वर्ष की उम्र में घर छोड़ने का निर्णय, संघर्षपूर्ण जीवन, Massey Sahib से जुड़ा दौर, पटकथा-लेखन और सामाजिक आंदोलनों के बीच उनकी वैचारिक यात्रा—ये सभी प्रसंग पुस्तक में स्वाभाविक रूप से आते हैं। वे यह भी दिखाते हैं कि निजी जीवन और सार्वजनिक प्रतिबद्धताएँ किस तरह एक-दूसरे को आकार देती हैं।
इन सबके बीच पुस्तक का भावनात्मक केंद्र माँ और बेटी का संबंध ही बना रहता है। मतभेदों, दूरियों और संघर्षों के बावजूद माँ के प्रति बना रहने वाला स्नेह इस संस्मरण को गहरी मानवीय ऊष्मा देता है।
संरचना की दृष्टि से पुस्तक पारंपरिक आत्मकथा से अलग है। स्मृतियाँ रैखिक क्रम में नहीं आतीं और कई बार आत्मचिंतन घटनाओं पर भारी पड़ता है, जिससे पाठ की गति धीमी होती है। फिर भी उसकी भावनात्मक प्रामाणिकता, वैचारिक स्पष्टता और साहित्यिक संवेदनशीलता उसे समकालीन संस्मरण साहित्य की उल्लेखनीय कृतियों में शामिल करती है।
अरुंधति रॉय की उपस्थिति ने ‘परस्पर’ के इस प्रथम आयोजन को विशेष अर्थ प्रदान किया। साहित्य, समाज और राजनीति के बीच निरंतर संवाद कायम रखने वाली लेखिका के रूप में उनकी पहचान इस कार्यक्रम को केवल एक पुस्तक-लोकार्पण तक सीमित नहीं रहने देती। यह विचारों, स्मृतियों, असहमतियों और रचनात्मक संवाद का सार्वजनिक मंच बनकर सामने आया।
अब देखना यह है कि ‘परस्पर’ अपने पहले आयोजन के बाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। यदि यह पहल निरंतर बनी रहती है, तो पटना के सांस्कृतिक जीवन में संवाद की एक नई परंपरा स्थापित कर सकती है। फिलहाल इतना निश्चित है कि 18 जुलाई 2026 की यह शाम शहर की साहित्यिक स्मृतियों में लंबे समय तक दर्ज रहेगी।
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बेला पॉपुलर
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