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मैंने तो न्याय माँगा था, आपने मनोरंजन बना दिया

कभी-कभी मैं यह भूल जाती हूँ कि यह इक्कीसवीं सदी है और हम ‘स्क्रीन’ में जी रहे हैं। हमारा पूरा जीवन एक ‘स्क्रीन’ के आस-पास ही बीत रहा है। वैसे जहाँ जीवन आता है, वहाँ तरह-तरह के लोग भी आते हैं और जहाँ लोग आते हैं, वहाँ क्या कुछ नहीं आता। हमें एक समाज में रहना है तो हम उस समाज से मुँह नहीं मोड़ सकते और तब तो बिल्कुल नहीं जब पूरी दुनिया की चौहत्तर फ़ीसद आबादी (प्रत्येक चार में तीन व्यक्ति) इसी स्क्रीन पर आ गई हो। ऐसी स्थिति में हमारे पास पर्याय नहीं बचते हैं। सहूलत के नाम पर हमें वह सब झेलना पड़ता है जो शायद किसी जानवर को भी अपने जीवन में न झेलना पड़ा हो।

आज सुबह जब मेरी आँख खुली, तब अपनी रोज़मर्रा की आदत से मैंने सबसे पहले अपना फ़ोन ही अनलॉक किया। और फिर...!!! जो मैसेज मेरी आँखों के सामने था, मैं नहीं चाहती कि इस तरह का कोई मैसेज कभी किसी को आए। मैं नहीं जानती कि आज के समाज में कितने पुरुष ऐसे हैं जो इस बात को गंभीरता से लेंगे। अब चूँकि यह इक्कीसवीं सदी है, मुझे यह भी संशय है कि कितनी ही स्त्रियाँ भी इस बात को पढ़कर सोच-विचार करेंगी। बात को संक्षिप्त में बताऊँ तो आज सुबह किसी अपरिचित पुरुष ने अपने लिंग की तस्वीर मेरी मेल आईडी पर भेजी थी। यह मेरे लिए इतना बड़ा धक्का था कि मैं उस मेल को खोलने तक की हिम्मत नहीं कर पाई।

हम यहाँ थोड़ा भूतकाल में लौटे तो धरातल पर मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी दिखता है, जिसे अतीत में कभी अपने ही गुप्तांगों पर शर्म आई होगी और उसने अपनी इस शर्म से बचने के लिए पहले पत्तों से और उसके बाद कपड़ों से ख़ुद को ढकना शुरू किया होगा। इसके सदियों बाद मनुष्यों ने उसी शरीर को अपने आकर्षण का केंद्रबिंदु बनाया, जिससे उसे कभी शर्म आती थी। स्त्रियों के स्तन और योनि ने, पुरुषों को आकर्षित किया और पुरुषों के लिंग ने स्त्रियों को। बात यही है कि दोनों अपनी शर्म को एक-दूसरे के माध्यम से समाप्त कर देना चाहते थे। पर कामवासना के शिकार हो चुके स्त्री-पुरुष का वासना से शिकार नहीं छूटता; वह उस जानवर की तरह है, जो एक बार ख़ून चखने पर और ख़ून पीने के लिए ललचा जाता है और कई शिकार कर बैठता है।

उस घटना के बाद मैंने सबसे पहले साइबर कंप्लेंट दर्ज कराई। यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि जितना आसान आजकल छेड़छाड़ करना है, उतना ही आसान अगर छेड़खानी के आरोपी को दंड देना होता तो ऐसी घटनाएँ कभी घटती ही नहीं। मैं इस बात पर दुबारा से ज़ोर देना चाहूँगी कि यह ‘स्क्रीन’ युग है। यहाँ ऑनलाइन छेड़खानी के मामले अधिक हैं क्योंकि स्क्रीन के माध्यम से हुई छेड़खानी में दोषी बेनाम होकर पूरी बेशर्मी के साथ अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति कर सकता है। इंटरनेट पर किसी अपरिचित स्त्री को अपने लिंग की तस्वीर भेजने वाले पुरुष को लगता है कि स्क्रीन की दूसरी ओर इसे देखने वाली स्त्री को वह अपने लिंग के दम पर ख़रीद सकता है, उसे नचा सकता है, उसके मनोबल को गिरा सकता है, उसकी मान-मर्यादा को हानि पहुँचा सकता है। पर वह यह बात नहीं जानता कि ऐसा करने से वह पुरुष नहीं रहता—नपुंसक बन जाता है, उसकी सोच भी नपुंसक बन जाती है।

और रही ऐसे अपराधों के विरुद्ध आवाज़ उठाने की बात—तो जिस देश में रेप (दुष्कर्म) जैसे गंभीर मामलों में पीड़ितों को सालों तक न्याय नहीं मिल पाता, वहाँ ‘साइबर हैरेसमेंट’ और ‘स्टॉकिंग’ वाली घटनाओं पर कौन ध्यान देगा? कुछ कहेंगे कि आज के युग में सोशल-मीडिया आपको न्याय दिला सकता है, तो जब आप सोशल-मीडिया पर अपनी बात रखना चाहोगे, तो लोग आप पर हँसने के सिवाय कुछ नहीं करेंगे। इसके विपरीत वहाँ आप पर ही उल्टे आरोप लगाए जाएँगे, आपको ही दोषी सिद्ध करने के लिए लोग आपसे ही लड़ने-झगड़ने लगेंगे, आपके साहस पर सवाल उठाएँगे। आपका इस बात के लिए मज़ाक़ बनाया जाएगा कि आपने इंटरनेट पर आवाज़ उठाई है। अंत में एक गंभीर विषय को लोग एक चुटकुले में परिवर्तित कर अपना मनोरंजन करेंगे।

किसी ने ‘X’ पर कहा, “हिंदी कवयित्रियों को लिंग भेजा जा रहा है... वो भी मेल के ज़रिये। ऐसे-कैसे बचेगा हिंदी साहित्य?”

यह लिखने वाले को किसी स्त्री के साथ हुए ‘यौन उत्पीड़न’ से अधिक ‘हिंदी साहित्य’ के बचने की चिंता सता रही है, इससे बड़ा विनोद क्या हो सकता है? मैंने तो न्याय माँगा था, आपने मनोरंजन बना दिया। शायद यह वही सड़ी-गली मानसिकता है, जिसे सालों से किसी ने साफ़ करना नहीं चाहा; और अब वह इतनी सड़ चुकी है कि उसकी बदबू लोगों में उसे मिटाने का साहस पैदा नहीं कर पा रही।

हमारे पुरखों ने और हमने मिलकर एक ऐसे समाज की रचना की है—जहाँ न्याय की माँग करने वाले को पहले दोषी माना जाता है। यह एक ऐसा समाज है, जहाँ ‘न्याय’ एक विनोद भर है, मनोरंजन का साधन है और न्याय माँगने वाला किसी विदूषक से कम नहीं है।

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