मैंने तो न्याय माँगा था, आपने मनोरंजन बना दिया
कभी-कभी मैं यह भूल जाती हूँ कि यह इक्कीसवीं सदी है और हम ‘स्क्रीन’ में जी रहे हैं। हमारा पूरा जीवन एक ‘स्क्रीन’ के आस-पा
शोक स्थायी है
मैं कितना अपढ़ और अहंकारी हुआ जाता हूँ, इसका भान भी पढ़ने और जीने से ही आता है। आजकल ऐसा लगता है कि मैं अपने आप को ही