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लगभग तीन दिन दो रातें

मुझे पता चल चुका था कि वहाँ वह मेरी प्रतीक्षा करने के लिए नहीं होगा… और जब यह पता चल चुका था तो यह कैसे न मालूम होता कि वहाँ मुझे उसका इंतिज़ार करना था। उसके स्कार्फ़ का... मेरे गले का फंदा बनने को आतुर।

गोदो का इंतिज़ार! मेरा गोदो आया। यह अलग बात कि वह आने से पहले तक ही गोदो रहा। हिंदी के अनंत प्रिय कवि ने स्वागत किया। उनसे पहले बारिश ने।

कुछ नहीं होता। न कोई आता है, न कोई जाता है। यह वाहियात है।

इंतिज़ार...

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इतना इंतिज़ार मैंने किसका किया था पहले? कभी किया भी था? किसको बुलाया इस तरह? किसको कहा था इतनी बार कि जल्दी आ; और किसने कहा था इस तरह कि मेरी माँ ने भी मुझे कभी इस तरह नहीं बुलाया? और यह भी भला किसने कहा था कभी कि मुझे लेने तू भी आ जा!

वह आया। बारिश-कविता-खैनी की तलब की तरह। वह था जैसे पेड़ों पर अमलतास या सकुचाई किशोरी के गाल पर हल्दी का लेप।

...लेकिन वह दरअस्ल गोदो नहीं था। कम-से-कम वह गोदो तो नहीं ही था जो वह न आने से पहले था, जिसका मुझे इंतिज़ार था, जो जेठ की दुपहरी बरामदे में घुस आई गौरैया की तरह मार्क्सवाद, दोस्तोयेवस्की, नज़्म, फ़िल्में, ग़ज़ल के चूर-चूराते घूमते पंखे के गिर्द अपनी पूरी गति से घूमता रहा था।

गर वह, वह गोदो होता—जो वह तब था जो मुझसे पिछले चार घंटों से लगातार चैटियाता रहा था—तो कैसे भला मेरे बग़ैर निवाले उसकी हलक़ से नीचे उतर जाते? कैसे उसके क़दम उन क़दमों के साथ आगे-आगे-आगे बढ़ते जाते, जिन्हें उसने मेरे क़दमों के बाद चीन्हा था? कैसे भला वह... कैसे!

हम दोनों को लेकर बनाए मेरे प्रत्येक प्लान पर उसका मैसेज था : ‘डन!’ मैंने उस पर यक़ीन किया था। उसकी उँगलियों पर जो उसके होंठों की जगह ले चुकी थीं, जो ट्रेन की किसी बोगी में चार्जर प्वाइंट ढूँढ़ रही थीं, जो शीशे और लोहे-लक्कड़ के बने बक्सेनुमा आकृति में फँसी बाहर हो रही बारिश की बूँदों की टप-टप के लिए ऐंठ रही थीं। कितना यक़ीन किया था मैंने, कितने सपने संजो लिए थे! कहाँ, किस जगह घुसेड़ लिया था अपने वो तमाम सबक़, ख़ुद से किए वे तमाम प्रण!

नहीं... वह, वह गोदो नहीं था जिसका मुझे इंतिज़ार था। होता तो ‘केऑस थ्योरी’ और ‘बटरफ़्लाई इफ़ेक्ट’ और ‘एंट्रॉपी’ और फ़्रायड की साइकोएनालिसिस यूँ नीरस न होती कि फ़्रायड को दो विलक्षण प्रतिभाओं से बचाने के लिए मेरा ढाल इतना कमज़ोर न होता; कि मैं इतना ख़ाली न होता; कि मैं भर रात भूखा न रहता; कि इतनी सिगरेटें न फूँकता; कि रात के सुनसान सड़क पर उससे इतना आगे न चलता; कि तिराहे को रोशन करती भद्दी-सी बत्तियाँ मेरी आँखें यूँ न फोड़ रही होतीं; कि पेड़ की पत्तियाँ इतनी उदास न होतीं; कि बारिश के बाद का रात का करियाया आसमान इतना करियाया न होता; कि दिल यूँ न धड़कता जैसे चाँद पर प्रथम क़दम रखते वक़्त आर्मस्ट्रांग का धड़का; कि क्रोध नहीं होता (दुःख से लिथड़ा); कि लगभग हर उस कवि-लेखक का—जिसे मेरे सामने लाया गया—मैं इतना सस्ता टाँग खिंचवा आलोचक न होता; कि एक समकालीन कवि का नाम नहीं होता; कि एक हरामख़ोर के नाम और उसके पद को लेकर वबाल न होता...

बहुत कुछ नहीं होता और न हुए उस बहुत कुछ की जगह बहुत-बहुत कुछ होता जो बहुत-बहुत सुंदर होता।

अपना-अपना कहा-अनकहा दुःख होता
एक की बेरोज़गारी और एक की गाँड़ घिसाई होती
फूल और पत्तियाँ होती (रियल, इमोजी नहीं)
दो जोड़ी पाँवों का आगे बढ़ना और ठहरना होता
रिक्रिएशन ऑफ़ ‘बिफ़ोर सनराइज’ होता
मेरा कंधा और उसके सिर का मज़ाक़ होता

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चीज़ें बिगड़ चुकी थीं। इस क़दर बिगड़ चुकी थीं चीज़ें कि उन्हें सुधारने का ख़याल तक नहीं आया। हालाँकि स्वभाव भी नहीं ऐसा... कि जो बिगड़ चुका उसे और बिगाड़ने का स्वभाव है। और ऊपर से वह क्रोध जो दुःख में सना था जो अकेले के दुःख और अकेले के क्रोध से बहुत अधिक क्रूर था; बहुत अधिक भयावह; बहुत अधिक ख़तरनाक।

“रोगोज़िन ने नस्तास्या को क्यों मारा था?” भारत नहीं, मेरा मन पूछता है।

फिर यों हुआ कि स्टडी टेबल पर रखा कॉफ़ी का जूठा कप धो दिया गया और उस स्टूल पर रख दिया गया—जिस पर एक कटोरा, एक गिलास, एक चम्मच और एक काँटा था; कि तकिए के नीचे से खींच निकाला गया कच्छा और अलगनी पर डाल दिया गया; कि फ़र्श पर पड़ी किताबों के बुकमार्क ठीक किए गए और बिस्तर पर सिरहाने रख दिए गए; कि बीन-बीनकर निरोधों को कूड़ेदान में डाला गया, सिगरेट के जले आख़िरी हिस्से को भी... उत्तर-आधुनिकतावाद के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा!

...कि चीज़ें ठीक होने लगी थीं। या कम से कम ऐसा मुझे लगा था। मुझे लगा था कि गोदो की जगह आ चुके को ठेल, गोदो आ चुका था और उस जगह पर क़ाबिज़ था जहाँ उसे होना था। मुझे लगा कि वह होने को था जो होना मैंने चाहा था। (मेरी चाहनाएँ मेरी शत्रु हैं, यह तथ्य रात के अँधेरे में किसी गुमटी के पीछे निहुर गाँड़ मराने जा चुका था!)

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चीज़ों का ठीक होना दरअस्ल मुझ जैसे अव्यवहारिक-असामाजिक-असामान्य व्यक्ति के लिए एक न्योता था कि मैं चीज़ों को और ख़राब कर दूँ। इतना ख़राब कि उनको उनके नाम से भी घिन आने लगे! और मैंने यही किया। मैंने फिर-फिर यही किया। मैं यही करने के लिए शापित हूँ।

मैं—जो न केवल बात व विचार में, बल्कि व्यवहार में भी तब तक लिंग-भेद नहीं समझ पाता, जब तक कि मेरे तथा किसी विपरीत लिंगीय के बीच सेक्स का पिल्ला न आ धमके—उससे माफ़ी माँग रहा था। इस तरह माफ़ी किससे माँगी थी कभी? किसके सामने इस तरह गिड़गिड़ाया था? किसको दी थी इस तरह सफ़ाई? [किसी से नहीं, किसी के सामने नहीं, किसी को नहीं।]

फिर उससे, उसके सामने, उसे क्यों? क्योंकि वह गोदो था; क्योंकि वह, वह था जो मिलने-देखने-सुनने से पहले से मेरा था; क्योंकि उसने एक बात पर कहा था : ‘सेम।’

तेज़ आँधी में एक ग़रीब की मड़ई उधिया गई थी।
अस्पताल जाते वक़्त रास्ते में प्रसूति का मिसकैरिज हुआ था।
पियानो ख़रीद लाते वक़्त सड़क हादसे में हाथ की उँगलियाँ सड़क हो गई थीं।

दुःख था। बहुत दुःख था। बहुत समय बाद इतना था। 

इतना अधिक नहीं था कि सबकुछ ख़त्म हो चुका था, बल्कि इतना कि इस तरह ख़त्म हुआ था—कि मेरी कोमल-निश्छल भावनाएँ कटघरे में खड़ी थीं; कि एक बार फिर मुझे ग़लत समझा गया था! और यह भी कि मेरे गले का फंदा वह स्कार्फ़ नहीं बल्कि वहाँ से न भाग पाने की मेरी लाचारी थी।

क्रोध था—ख़ुद से। अपने इतिहास को भूला देने के लिए।

एक तरफ़ ‘आई रिस्पेक्ट यू’ था, दूसरी तरफ़ था ‘डोंट, हेट मी।’

एक तरफ़ ग़ुस्सा था, दूसरी तरफ़ था भय। एक तरफ़ ‘बात नहीं होगी अब’ था, दूसरी तरफ़ था ‘ठीक है, बस ग़लत मत समझो।’

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‘बात नहीं होगी’ को मैंने बात नहीं होगी की तरह लिया। अपनी तरफ़ से मैंने बात नहीं की। दूर-दूर रहा। दूर-दूर से देखता हुआ। यों मैं दूर-दूर जा रहा था... फिर क्यों यह प्रश्न कि मैं अकेले क्यों था, कहाँ था... बात नहीं होगी न! डन था। (मेरा ‘डन’ उसका ‘डन’ नहीं था।)

वह अपने ‘डन’ से मेरे ‘डन’ को डिगाता अपने तय समय पर चलता बना। मेरा समय तय नहीं था। मैंने नहीं तय किया था क्योंकि मुझे पता था कि वह वहाँ होना था। उसने विदा ली। दिल की खोह में मैंने उसे विदा नहीं किया। इसलिए नहीं कि नहीं कर सकता था; इसलिए क्योंकि उसके विदा से बहुत-बहुत पहले मेरा अलविदा था।

इंतिज़ार और जिसका इंतिज़ार उसकी जगह किसी और के आ धमकने, फिर यों चले जाने का यह नाटक उस मंच पर खेला गया था, जहाँ कहते हैं कि कभी तीन नदियाँ मिला करती थीं; अब दो मिलती हैं। 

संगम!

मैं दोनों नदियों से नहीं मिल सका। मिलने की इच्छा भी नहीं हुई वैसी। किसी ने कहा था कि संगम दो बार आना चाहिए, एक बार अकेले एक बार किसी के साथ। मैं संगम नहीं गया। न मैं अकेला था न किसी के साथ था।

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