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खुजली देसी बीमारी है

एक साहित्यिक आदमी खुजली को डॉक्टर के नज़रिये से नहीं देख सकता है। उसे केवल संक्रामक बीमारी कहकर संतुष्ट नहीं हो सकता। इसके पूर्व कि मैं खुजली पर बात करूँ, मुझे मौजूदा समय के हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कथाकार प्रियंवद की कहानी के नायक (जो संयोगवश अच्छा लेखक है) की याद आ रही है। वह पीठ की खुजली से परेशान है। वैसे भी लेखक कुछ ज़्यादा परेशान और बेचैन नज़र आते हैं। यही बेचैनी उन्हें सामान्य मनुष्यों  से अलग करती है और लिखने के लिए बाध्य करती है। जो लेखक जितना प्रश्नाकुल है, वह उतना ही सफल और चर्चित है। यह कह कर इस मुद्दे को यहीं छोड़ दें कि लेखक का काम समस्याओं को दिखाना है, समाधान ढूँढ़ना नहीं, बिल्कुल पैथोलोजिस्ट की तरह। ख़ैर, उस मनुष्य लेखक को तमाम तरकीबों से निजात नहीं मिलती है और वह अपने संपादक मित्र की सहायता और सुझाव से इसका समाधान ढूँढ़ता है। समाधान की जानकारी के लिए आपको वह कहानी पढ़नी चाहिए। बहरहाल, मैं अपना ध्यान खुजली पर केंद्रित रखूँगा।

खुजली में जो भी बुराई हो लेकिन एक अच्छाई अवश्य है। यह मनुष्य को एकाग्र करती है। खुजलीग्रस्त व्यक्ति का ध्यान उसी पर रहता है। यह बाँटने की सुविधा तो देती है लेकिन बँटने का अवकाश नहीं देती। तमाम गवाहों और सुबूतों के आधार पर कहा जा सकता है कि खुजली हमारे देश की ज्वलंत समस्या है (विदेशों का ज्ञान मुझे नहीं है)। निवेदन यह कि इस मसले को हल्का बनाने के लिए विदेशी साजिश से नहीं जोड़ा जाए। यह विशुद्ध रूप से देसी बीमारी है। यहाँ की जलवायु में स्वाभाविक रूप से इसका विकास होता है। इसे प्रकृतिगत दोष ही मान लिया जाए। जो भी हो, यह स्वतंत्र और निष्पक्ष जाँच का विषय है। इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने के पूर्व हमारे विद्वान् पाठक टुकड़ो-टुकड़ों में ही सही कुछ विचार-विमर्श तो कर ही सकते हैं। वैसे भी यह देश संवाद से कम विवाद से ज़्यादा गतिशील और प्रगतिशील दिखता है। अब यहाँ कितनी गति-प्रगति और कितना शील है—यह सब बतलाने की ज़रूरत मैं नहीं समझता।

खुजली कोई ऐसी-वैसी समस्या नहीं है कि दवा-दारू से ठीक हो जाए। इसके इतने वैरिएंट हैं कि आसानी से पकड़ में नहीं आ सकते। मतलब यह बहुरूपिया है। वैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो इसके अनेक अपरूप हैं, जैसे कोयला अनेक रूपों में पाया जाता है। रसायन वाले बेहतर जानते हैं। आश्चर्य यह कि इसके वैरिएंट केवल मनुष्यों में पाए जाते हैं। अच्छी बात यह है कि पशु लगभग इससे मुक्त हैं। इस रोग के लक्षण छुपे होते हैं। परंतु यह भी सत्य है कि ये कभी भी प्रकट हो सकते हैं। शुक्र है कि यह कष्टदायक तो है लेकिन जानलेवा नहीं। अपने शुरुआती आक्रमण में यह बेहद आनंददायक होता है। जितना खुजलाओ उतना ही आनंद देता है। जब तक नहीं खुजलाओ, बेचैनी बढ़ती ही रहती है। लेकिन खुजलाने के बाद  भयंकर जलन होती है। यह जलन इतनी तेज़ होती है कि मनुष्य सभ्यता की सीमाओं का अतिक्रमण कर जाता है और नग्न हो जाता है। शरीर में खुजली हो तो कुछ महीने में राहत होने लगती है। लेकिन मन की खुजली एक क्रोनिक डिजीज़ है। इसका अँग्रेज़ी इलाज नहीं है। हमारे यहाँ एलोपैथ को अँग्रेज़ी ही कहते हैं। होमियोपैथ वाले तो हर रोग का शर्तिया इलाज करते हैं। यह बाद की बात है। मैं डॉक्टर नहीं हूँ। केवल लक्षण-निरूपण कर अपनी बात समाप्त करूँगा।

प्रसंगवश, यह बतला दूँ कि एक बार मुझे भी खुजली हुई थी। बाल्यावस्था थी। बचपन में नग्न होने में परेशानी थोड़ी कम होती है। पिताजी मेरे कपड़े उतार कर, मुझे धूप में खड़ा कर देते थे। उन्हें सूर्य-चिकित्सा पर ज़्यादा भरोसा था। फिर स्कोबिअल लगा कर आधे घंटे सूर्य-स्नान कराने के पश्चात तालाब में ले जाते थे। वह “लाइफ़ ब्यॉय है जहाँ, तंदुरुस्ती है वहाँ” पर आँख मूँद कर विश्वास करते थे। उसके बाद जो जलन होती थी, उसका क्या वर्णन करूँ? इस बीच दर्शकों का मनोरंजन होता रहता था। मैं नंगे बदन हाथ-पैर पटकता रहता था। नग्नता का यह लाइव सीन दर्शकों को अलौकिक आनंद प्रदान करता रहता था। मैं समझता हूँ कि आधुनिक नृत्य शैली के इनोवेटिव कोरिओग्राफ़रों ने खुजलीग्रस्त व्यक्तियों के स्टेप्स देखकर कुछ क्रांतिकारी नृत्य-मुद्राओं को अपने नृत्य में अवश्य शामिल किया होगा। ग़ज़ब यह कि मुझे इस तरह तड़पते देख कर दर्शकों को सहानूभूति नहीं हुई ,अलबत्ता वे बीच-बीच में चुटकी लेते रहे—“आवे आसिन जाये आषाढ़, का करिहें तुतुहिया हरताल।” इसका मतलब यह है कि खुजली आश्विन के महीने में आती है और जितना भी इलाज करा लो आषाढ़ में ठीक होती है। सही भी है। अपने देश में कुछ बीमारियाँ प्रतीक्षा और धैर्य की औषधियों से ठीक होती हैं। अंतिम इलाज समय तो है ही। “समय एक दिन सब ठीक कर देगा”—यह सुनते-सुनते न जाने कितने लोग बूढ़े हो गए।

ऊपर वर्णित शरीर की खुजली की कथा को अवांतर समझा जाये। वैसे देह को झुठलाया नहीं जा सकता। हम यह समझने की भूल न करें कि खुजली केवल शरीर का रोग है। यह तन से अधिक मन का रोग है। समस्या तब और विकराल हो जाती है, जब यह मानसिक रोग में कन्वर्ट हो जाती है। शरीर की खुजली (इसे केवल खुजली ही समझें) एकांतिक रोग है और मरीज़ यदि सतर्क रहे तो दूसरों के लिए संक्रमण का ख़तरा पैदा नहीं होता। लेकिन यह मानसिक खुजली बहुत ख़तरनाक है। इसका वायरस बहुत तेज़ी से फैलता है। यह पूरी तरह अनियंत्रित है। ताज्जुब कि लोग इस संबंध में जागरूक तो हैं, लेकिन सतर्क नहीं (लोग में यहाँ पुरुष और स्त्री दोनों शामिल हैं)। इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि मरीज़ को मालूम ही नहीं होता कि उसे खुजली है। उसे डॉक्टर लाख समझाए कि आपको खुजली है, वह मानने को तैयार नहीं होता। उसे जितना समझाया जाता है, वह उतना ही भड़कता है। वह स्वयं को सबसे बड़ा क़ाबिल समझता है, लेकिन स्वस्थ लोग उसे फ़ाज़िल समझते हैं। दरअस्ल वह समझने के लिए बना ही नहीं होता है। समझाने से उसकी बीमारी बढ़ने लगती है। यदि उसके सामने चुप रहा जाए तो थोड़ा शांत रहता है। समर्थन किया जाए तो ख़ुश होता है। ऐसा व्यक्ति अपना ज़्यादा समय आभासी दुनिया में बिताता है। वह देखने में सभ्य, सुसंस्कृत और सुरूचिपूर्ण लिबास में होता है। तस्वीरों में मनमोहक दिखता है। बावजूद इनके वह नग्न दिखता है। पर वह बिल्कुल मानने को तैयार नहीं होता कि वह नग्न है। चिंता की बात यह है कि धीरे-धीरे ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। मैंने इस संबंध में एक अनुभवी मनोचिकित्सक से बात की थी। उन्होंने बतलाया कि दुनिया के नब्बे प्रतिशत लोग  किसी न किसी रूप में मनोरोगी हैं। यह सुनते ही मैं दुनिया के बारे में नहीं, अपने बारे में सोचने लगा। आज भी चिंतित हूँ। तो क्या मेरे सोचने से दुनिया बदल जाएगी। हाँ, बिल्कुल। सोचने से ही तो दुनिया बदली है। ज़ुकरबर्ग, एलेन मस्क आदि ने दुनिया बदल कर रख दी है। सोशल मीडिया ने विश्व-व्यवस्था बदल कर रख दी है। जब सब बदल रहे हैं तो हमें भी बदलना चाहिए। हम भी अपने तरीक़े से बदलेंगे। कैसे? स्वयं को खुजली से मुक्त रख कर। दुनिया में रहूँगा। रहना ही है। कहाँ जाऊँगा? बाज़ार से गुज़रूँगा। ख़रीदार बनने के पहले हज़ार बार सोचूँगा। पुराने ज़माने में कहानियों के नीचे एक वाक्य में कहानी का संदेश लिखा होता था। तो इस लेख का संदेश देने के बजाय संकेत देना अपना लेखकीय धर्म समझता हूँ। लेकिन ऐसा करना पाठकों के विवेक पर अविश्वास करना होगा जो उचित नहीं है।

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