हैदराबाद विश्वविद्यालय के बाद
निकिता यादव
22 अक्तूबर 2026
हैदराबाद में मेरी पढ़ाई अब पूरी हो चुकी है। ज़िंदगी के एक पड़ाव को पीछे छोड़कर दूसरे की ओर बढ़ने से पहले मैं कुछ दिनों के लिए अपने गाँव लौट आई हूँ। शायद यह लौटना सिर्फ़ घर लौटना नहीं है; यह उन गलियों, उन चेहरों और उन स्मृतियों के बीच लौटना भी है, जिन्हें पीछे छोड़कर मैं बहुत दूर निकल गई थी।
डेढ़ साल बाद गाँव वापस आई तो बहुत कुछ वैसा ही था... वही रास्ते, वही खेत, वही घर, वही लोग। लेकिन जाने क्यों, इस बार सब कुछ थोड़ा बदला-बदला-सा लगा। शायद गाँव नहीं बदला था, मेरी देखने की दृष्टि बदल गई थी। पहले जिन चीज़ों को सहज मानकर आगे बढ़ जाती थी, अब उनमें सवाल दिखाई देने लगे हैं। जिन रिश्तों को केवल रिश्तों की तरह देखा था, उनमें अब समाज, व्यवस्था, पितृसत्ता, ग़रीबी और असमानता की परतें दिखाई देने लगी हैं।
गाँव में मेरा एक दोस्त है। वह अपने घर का छोटा और बड़ा ही सज्जन इंसान है। हम स्कूली दिनों में साथ पढ़ा करते थे, लेकिन दसवीं के बाद से लड़कियों और लड़कों की कक्षा अलग बिल्डिंग और अलग क्लास में लगने लगी थी।
गाँव के बहुत कम लोग ही मुझे जानते हैं। लेकिन दोस्त की अम्मा बहुत अच्छी तरह से जानती हैं। यह बात मुझे इतने सालों बाद अब पता चली। हाल ही में जब हैदराबाद से मैं घर आई, तो दोस्त ने बताया :
“मोर अम्मा तोके बहुत पूछतथिन...”
मैंने हैरानी से पूछा, “अरे! सच में?”
“हाँ, पूछ भाई से।”
“उन मोके कईसे जानतथिन?”
“जानतथिन, ऐसे (भाई) हरदम पूछतथिन।”
“ई कहत है, ऊ काव मिली, ऊ बोलही न जानत।”
मतलब कि मैं औरतों से क्या बात करूँ; नहीं समझ पाती, मैं चुप बैठी रहती हूँ!
तो कल शाम दोस्त घर पर आया था, दीदी का बनाया हुआ फरा खाने। बाइक साथ में थी, तो मैं गई उसकी अम्मा से मिलने। मिलकर बहुत अच्छा लगा कि चलो, किसी बहाने ही सही, मैं भी गाँव में दो-चार लोगों द्वारा जानी जाती हूँ। हम दोनों में ख़ूब सारी बातें हुईं। बातें करते-करते उनकी सब्ज़ी भी कट चुकी थी।
इतने में अम्मा मुझसे बहुत सारे सवाल पूछ डालीं :
“कय में हऊ? अब का करबू?”
“बहिनी तोहरे खाना बनावे आवत है कि न?”
“वहाँ खाना मिलत है कि बनावत तू?”
“खेत-वोत के काम कय-कय लेतु की न?”
“दिदिया और मम्मी खाना बनावत होइहे?”
“तू हूँ कुछ करावतु की न?”
“आज हमरे ही कीहा रहतू?”
कुल मिलाकर अम्मा ने मेरा पूरा इंटरव्यू ले लिया और बदले में अपना प्यार दे दिया।
उनके लगभग हर सवाल का केंद्र मेरे सपने, मेरी पढ़ाई या मेरी रुचियाँ नहीं थीं; बल्कि यह था कि मुझे खाना बनाना आता है या नहीं, खेत का काम आता है या नहीं, घर कैसे सँभालूँगी, ससुराल में कैसे निभाऊँगी आदि-आदि...
मैं उन सवालों में बहुत पीछे थी।
शायद अम्मा ने मन ही मन सोचा भी होगा : “अरे! इस लड़की को तो कुछ नहीं आता!”
लेकिन अम्मा का मेरे प्रति इतना प्यार इस बात को ग़लत साबित करता है।
मुझे नहीं पता उन्होंने क्या सोचा, लेकिन मैं इतना ज़रूर समझ पाई कि इस समाज ने गाँव-घर की औरतों को इस तरह गढ़ दिया है कि वे पढ़-लिख रही लड़कियों से भी सबसे पहले यही सवाल पूछती हैं।
यह ग़लत इसलिए नहीं कि खाना बनाना या घर का काम सीखना बुरा है। ग़लत इसलिए है क्योंकि ये सारे सवाल केवल लड़कियों से पूछे जाते हैं।
क्या किसी लड़के से कभी पूछा जाता है :
“रोटी बनानी आती है?”
“घर और नौकरी दोनों कैसे सँभालोगे?”
नहीं... क्योंकि समाज ने यह मान लिया है कि घर स्त्री का है और दुनिया पुरुष की।
हाँ, मुझे ये सब काम नहीं आता। लेकिन क्या केवल इसी वजह से मेरी योग्यता कम हो जाती है? क्या लोग मुझे इन कामों को सीखे बिना जीने देंगे? क्या मेरी शादी होगी? क्या कोई मुझे कहेगा : “हाँ, यह बहुत गुणवान् लड़की है।” या फिर स्त्री का ‘गुण’ केवल इस बात से तय होगा कि वह कितनी अच्छी गृहिणी है? मुझे लगता है कि यही सबसे बड़ा अन्याय है।
एक स्त्री की बुद्धिमत्ता, उसकी शिक्षा, उसके सपने, उसका संघर्ष, उसकी संवेदनशीलता... इन सबका मूल्य अक्सर रसोई के एक चूल्हे के सामने जाकर शून्य कर दिया जाता है। फिर भी, अम्मा से मिलना बहुत अच्छा लगा। मैं दुबारा भी उनसे मिलने जाऊँगी। उन्हें देखकर दुख भी हुआ। पैरों में दर्द होने के बावजूद वह सीढ़ियाँ चढ़-उतर रही थीं, पूरे घर का काम अकेले सँभाल रही थीं और रोज़ तीन-चार मर्दों का खाना अकेले बनाती हैं। शायद उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि यह श्रम केवल उनका दायित्व क्यों है।
वापसी में मैं और मेरा दोस्त पैदल घर की ओर चल रहे थे। बहुत दिनों बाद इत्मीनान से बातें हुईं। उसने बताया कि उसकी पढ़ाई छूट गई।
मैंने पूछा, “क्यों?”
उसने बहुत धीरे से कहा, “घर वाले पढ़ाए ही नहीं।”
मैंने फिर पूछा, “तुम कहते, तब भी नहीं?”
उसने सिर्फ़ एक शब्द कहा, “नहीं।”
उस “नहीं” के बाद एक बहुत लंबी चुप्पी थी। हम दोनों कुछ देर बिना बोले चलते रहे। फिर उसने बताया कि उसका बड़ा भाई कमाता है। चाहता तो उसे पढ़ा सकता था, लेकिन उसकी कमाई अपने शौक़ और मौज-मस्ती में खर्च हो जाती है। घर की ज़िम्मेदारियों से उसका कोई लेना-देना नहीं, क्योंकि उसकी कमाई ठेकेदारों और शराबख़ानों की जेब भर रही है। फिर बात उसके पिता पर आई। वह भी कभी बहुत भले इंसान थे, लेकिन धीरे-धीरे ठेकेदारों और शराब की लत ने उन्हें भी अपनी गिरफ़्त में ले लिया। उसकी बात सुनकर मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ गए। जब मैं बारहवीं में थी और कहती थी, इसके बाद मैं दिल्ली जाकर यूपीएससी की तैयारी करूँगी, तब कुछ दोस्त मुस्कुरा देते थे, कुछ चुप हो जाते थे। आज भी दो-तीन चेहरे याद हैं, जिन्होंने कहा था : “पापा के पास इतने पैसे नहीं हैं कि बाहर पढ़ा सकें। मुझे दुकान सँभालनी होगी, क्योंकि भैया इलाहाबाद में पढ़ रहे हैं।”
उनकी बात सुनकर मुझे तब इतना अजीब नहीं लगता था, जितना आज लगता है। मन मसोसकर रह जाती हूँ। तब मैं बचपन की मासूमियत में सबसे कहती थी : “मैं तो किसी ऐसे ग़रीब लड़के से शादी करूँगी; जो पढ़ना चाहता था, लेकिन पढ़ नहीं पाया। मैं अधिकारी बनूँगी, उसे पढ़ाऊँगी और उसका पूरा घर बदल दूँगी। कम-से-कम एक परिवार तो बदल ही जाएगा।”
लोग मेरी बात सुनकर हँसते थे और कहते थे : “ग़रीब होगा, गंदा रहेगा। चलो, तब जो सड़कों पर रहते हैं या फिर जो लोग खेत में काम करने आते हैं, उनसे करा दिया जाएगा।”
और मैं पूरे आत्मविश्वास से कहती थी : “ग़रीब रहेगा तो क्या हुआ? मैं शहर में नौकरी करूँगी, वह गाँव में अपने परिवार के साथ रहेगा।”
आज सोचती हूँ, वह बचपना था। समाज को समझने की उम्र नहीं थी। मुझे लगता था कि सिर्फ़ एक घर बदल देने से दुनिया बदल जाएगी। बाद में समझ आया कि समस्या किसी एक घर की नहीं, पूरी व्यवस्था की है। कितनी विडंबना है कि जिस शिक्षा को संविधान ने हर बच्चे का अधिकार माना, वही आज सबसे महँगा सौदा बन चुकी है। स्कूलों के बाहर बड़े-बड़े बोर्ड लगे हैं—“ज्ञान का मंदिर...” लेकिन भीतर प्रवेश की पहली शर्त शुल्क है। लगता है अब ज्ञान नहीं, सीटें बिकती हैं।
कहा जाता है कि “पढ़ोगे-लिखोगे, बनोगे नवाब...” लेकिन यह कोई नहीं बताता कि पढ़ने के लिए पहले जेब का नवाब होना भी ज़रूरी होता जा रहा है। एक तरफ़ करोड़ों रुपए की शिक्षा-नीतियों के विज्ञापन हैं, दूसरी तरफ़ लाखों बच्चे फ़ीस, ग़रीबी, शराब, जुए और पारिवारिक मजबूरियों के कारण किताबों से पहले मज़दूरी सीख रहे हैं।
सब कहते हैं : “बच्चे देश का भविष्य हैं।” लेकिन जब वर्तमान ही उनके हाथों से किताब छीनकर फावड़ा, ईंट, दुकान या शराब के ठेके का हिसाब थमा देता है; तब भविष्य आख़िर बनेगा कैसे? सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि समाज बाद में उसी बच्चे से पूछता है : “पढ़े-लिखे क्यों नहीं?” जैसे किसी प्यासे से पूछा जाए : “पानी क्यों नहीं पिया?” और यह पूछने वाला वही हो, जिसने रास्ते के सारे कुएँ पहले ही बेच दिए हों।
ग़रीबी से बड़ा अभिशाप शायद अवसरों का असमान बँटवारा है और शराब से बड़ा अपराध वह व्यवस्था है, जो एक पिता की कमाई को परिवार तक पहुँचने से पहले ठेके की मेज़ पर रोक लेती है।
मैं डेढ़ साल बाद गाँव लौटी हूँ और गाँव की हवा बदली हुई लग रही है। अब यहाँ शराब पीने वालों की संख्या डराने लगी है। जवान लड़के, छोटे-छोटे बच्चे तक शराब पी रहे हैं। ऐसी ही मिलती-जुलती कई कहानियाँ हैं। अब गाँव में नए-नए शराब पीने वाले पैदा हो गए हैं... जवान लड़के, छोटे बच्चे भी पी रहे हैं और न जाने क्या मज़ा पा रहे हैं कि अपने स्वास्थ्य और भविष्य को ही निगलना उनको ठीक लग रहा है! जिन सज्जनों की अभी नई-नई शादियाँ हुई हैं; वे सभी रात में अपनी बीवियों को पीने के बाद पीट रहे हैं, उनके साथ गाली-गलौज कर रहे हैं, अपमानित कर रहे हैं... और सुबह होते ही प्यार बरसा रहे हैं!
बात यहाँ तक आ पहुँचती है कि बेचारी औरतों को पुलिस की मदद लेनी पड़ती है! हिंसा और प्रेम का यह झूठा चक्र स्त्रियों की ज़िंदगी को क़ैद बना देता है। जब गाँव की औरतों या लड़कियों का जमावड़ा होता है, तो उनकी बातचीत का सबसे बड़ा विषय यही होता है कि “अब कौन-कौन पीने लगा है?” नाम गिने जाते हैं। सूची लंबी होती जाती है... और औरतें बस गिनती रहती हैं। उनके हिस्से प्रतिरोध नहीं, केवल सहने की कहानियाँ छोड़ी गई हैं और सबसे भी ज़्यादा दुःख तब होता है, जब सुबह वही नई-नवेली बहुएँ अपने ही घर और समाज की औरतों से सुनती हैं : “अरे! इतना भी नहीं सह सकती?”
“हमारे ज़माने में तो दिन-भर चूल्हा-चक्की करते थे, शाम को मर्दों की तेल-मालिश भी करते थे और दो-चार लात-घूँसे भी चुपचाप खा लेते थे। मज़ाल है कि किसी को भनक भी लग जाए!”
यही पितृसत्ता की सबसे बड़ी सफलता है। उसने केवल पुरुषों को सत्ता नहीं दी, बल्कि औरतों को भी यह विश्वास दिला दिया कि अत्याचार सहना ही उनका धर्म है। उन्हें सिखाया गया कि पति चाहे कितना भी निकम्मा, हिंसक या ग़ैर-ज़िम्मेदार क्यों न हो, वह ‘परमेश्वर’ है। अब विडंबना देखिए कि यही औरतें अगली पीढ़ी की लड़कियों को भी उसी क़ैद में धकेल रही हैं।
मुझे ग़ुस्सा आता है। इसलिए नहीं कि अम्मा ने मुझसे खाना बनाना पूछा। ग़ुस्सा इसलिए आता है कि इस समाज ने अम्मा जैसी लाखों औरतों को यह यक़ीन दिला दिया है कि स्त्री का पूरा अस्तित्व रसोई, सेवा और सहनशीलता में सिमट जाना चाहिए।
मुझे ग़ुस्सा उन पुरुषों पर भी आता है, जो शराब के नशे में हिंसा करते हैं और उससे भी ज़्यादा उस समाज पर जो उस हिंसा को ‘घर की बात’ कहकर सामान्य बना देता है।
स्त्री का सम्मान उसके त्याग की मात्रा से नहीं, उसके मनुष्य होने से तय होना चाहिए। उसे देवी बनाकर पूजने की नहीं, इंसान मानकर बराबरी देने की ज़रूरत है। जिस दिन गाँव की बेटियों से यह पूछना शुरू होगा कि “तुम क्या बनना चाहती हो?” और बेटों से यह पूछा जाएगा कि “तुम घर का काम कब सीखोगे?”, शायद उसी दिन समाज सचमुच बदलना शुरू होगा।
अब उन बेचारी भोली-भाली औरतों को कौन समझाए कि दादी, चाची, ये जो फ़िज़ूल की बातें उछाल रही हो, ये सब अस्ल में कुछ है नहीं! ये सब तुम्हारे पूज्य पुरुषों द्वारा तुमको बंदी बनाने का एक खेल था, जो आज भी तुम लोगों की ही वजह से आगे चलता जा रहा है...
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