गद्य होती कविता, थकता हुआ कवि
आशुतोष प्रसिद्ध
02 अप्रैल 2026
जिस दौरान नवंबर बीत रहा था, उसी दौरान घर में एक नया जीवन उतर रहा था। मेरा मन हर घड़ी लगभग बैठा जाता था। लगभग घंटे दो घंटे बाद लगता—अब निकले प्राण कि तब निकले, लेकिन निकले अभी तक नहीं। अब यह कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी लेकिन कह दिया। पहले मेरे आस-पास मरीज़ थे, अब मैं भी मरीज़ हूँ। दिल की बीमारी के बारे में मैंने पहली बार सामने से अपने बड़े पिताजी के ऑपरेशन के बाद जाना था, उस शाम छत की सीढ़ी पर बैठकर बहुत रोया था। अब यह मुझे सामान्य बात लगती है। जब ख़ून की गति बढ़ती या घटती है—एक टिकिया पानी के साथ गटक लेता हूँ, फिर वैसे ही खीस निपोरे हर जगह खड़ा हो जाता हूँ। कई जगहों पर कहे जाने पर, कई जगहों पर बस प्रेमवश, ज़्यादातर मेरे चेहरे पर वैसे ही भाव रहता है—जैसे हॉस्पिटल में भर्ती मरीज के साथ बैठे आदमी के चेहरे पर रहता है। उसकी भाषा में कहें तो ‘मैने कभी आपको देर तक ख़ुश नहीं देखा’। मैं ख़ुद भी अपने को देर तक ख़ुश रख नहीं पाता। मेरे पास ख़ुश रहने के कोई विशेष कारण नहीं होते हैं। अब यह फालतू बात कोई कहे कि ख़ुश रहने के कारण नहीं होते तो मुझे बस हँसी आती है, वह हँसी ख़ुशी वाली हँसी नहीं होती है।
मन लगभग किसी न किसी रचना के अधूरेपन में अटका रहता है या कुछ पढ़ लेने के बाद उसके छिछलेपन पर कुढ़ता रहता है। मेरी दिनचर्या पिछले कई बरसों से एक जैसी है, मैं या तो लगातार पढ़ता रहता हूँ या पढ़े जा चुके के विषय में सोचता रहता हूँ। मैं रील स्क्रॉल करते हुए भी किसी न किसी रचना का या अपने प्रियजनों के बोले गए तल्ख़ और प्रिय वचनों का विश्लेषण ही कर रहा होता हूँ। उंगलियाँ चलते रहने को मैं वैसे ही लेता हूँ जैसे ध्यानी तुलसी की माला पर उंगली फेरता है। स्क्रीन पर क्या आया क्या गया मुझे पता नहीं होता, बस चलती है।
दिसंबर, जनवरी किसी क्रूर महीने की तरह जीवन में आया। जागते हुए देखे गए सब सपनों पर पानी फिर गया। हम फिर से ग़लत समय और आर्थिक तंगी का राग अलाप कर योजनाओं के आगे से विस्मयादिबोधक चिह्न हटाकर पूर्ण विराम लगा चुके थे। अब इसके बाद बचा वही दो काम जो मैं करता हूँ, गृहस्थी देखना और किताब पढ़ना—वही किया गया। खेती की गई। कुछ लोगों के मरे-जिये और शादियों में गया। कुछ के साथ हॉस्पिटल-हॉस्पिटल चक्कर काटा, ख़ून दिया और हर जगह से प्रश्नचिह्न ही लेकर लौटा।
इस दौरान ही 12 कविता-संग्रह, 3 कहानी-संग्रह, 2 यात्रा वृत्तांत, 2 उपन्यास, एक नाटक, एक डायरी, कुछ पत्र संग्रह और कुछ पत्रिकाओं में छपी कहानियाँ और शोध आलेख पढ़े। इनके नाम दे सकता हूँ, लेकिन नहीं दूँगा। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरी दृष्टि से आप भी उन्हें पढ़ें। मैं इन सब रचनाओं को—ख़ासकर कविता-संग्रहों को—पढ़कर जो महसूस कर पाया, जो भीतर-भीतर सवालों से छिदा हुआ खड़ा रहा वो कह रहा हूँ और इस उम्मीद से कि इस कहने का भी आप पर उतना ही प्रभाव पड़ेगा, जितना आज से पहले अच्छी और ज़रूरी बातें पढ़कर आप पर पड़ता रहा होगा। कविता पर आने से पहले एक चीज़ कह लेना चाहता हूँ, नहीं तो वह न कह पाने की बात मुझे सालती रहेगी। वह बात यह है कि इधर कुछ बरसों में कहानी से कहानीपन ग़ायब हो गया है। आप कहानी पढ़ना शुरू कीजिए और आप महसूस करेंगे कि यह साहित्य कम सेल्फ़ी-साहित्य अधिक है। लेखक कहानी नहीं कह रहा है, बल्कि अपनी एक ऐसी छवि गढ़ रहा है—जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और नैतिक रूप से अचूक है।
दिक़्क़त यह है कि लेखक ही परम सत्य का इकलौता वाहक बन जाता है, और पात्रों के बीच का द्वंद्व ही समाप्त हो जाता है। कहानी संघर्ष के बजाय एक प्रवचन या व्यक्तिगत विज्ञापन लगने लगती है। कहानियों में अन्य पात्र केवल लेखक की ही महानता को चमकाने वाले बैकग्राउंड कलाकार बनकर रह जाते हैं। लेखक स्वयं को एक देवता या महामानव की तरह पेश करता है, यह कहना थोड़ा-सा अटपटा होगा, लेकिन इधर की नई पीढ़ी के पास ख़ासकर मेरी उम्र के लेखकों के पास कहानी नहीं है, संस्मरण हैं और वे उसका विधागत अलगाव कर नहीं पा रहे हैं। एक दोष यह भी है कि खोजी परंपरा लगभग क्षरित हो गई है, आस-पास जो भी हिंदी में लिखता मिल जा रहा है—सबको कहानीकार और कवि घोषित कर छाप दिया जा रहा है। जैसे ही उन पर कोई टैग चस्पा होता है, उनके भीतर के कलाकार का अवमूल्यन होने लगता है। वह ठीक तरह के मनुष्य भी नहीं बचते हैं। यह मैंने अपने इलाहाबाद रहने के दौरान बहुत क़रीब से महसूस किया। अच्छे और बेहतरीन दिमाग़ प्रशंसा के बोझ में ख़त्म हो गए और अभी भी हो रहे हैं। उसमें स्त्री और पुरूष दोनों लेखक वर्ग शामिल हैं।
ख़ैर यह बात यहीं छोड़ देते हैं...
इधर पढ़े कविता-संग्रहों को पढ़कर भीतर अजीब तरह का मोहभंग हुआ है। पिछले दो-ढाई दशकों की हिंदी-कविता को क़रीब से देखें, तो एक बात जो सबसे अधिक खटकती है, वह यह कि अब कविता से विचार नहीं विचार को ही कविता बनाकर रख दिया गया है। कविता से संगीत का पूरी तरह देश निकाला हो गया है। लगभग कवि इस ग़लतफ़हमी में हैं कि वह जितना गद्यात्मक, विचारात्मक और सपाट होंगे, उतना ही यथार्थवादी और प्रगतिशील चेतना के दिखेंगे। पूरा-पूरा दोष इनका भी नहीं है, हमसे पहले की पीढ़ी के कवियों ने भी इतनी सपाट गद्य कविता लिखी कि उसे कविता कहते संशय होता है। उन सभी कविताओं के बीच किए गए पंक्ति भंग को हटाकर एक साथ लिख दें तो वह एक गद्य बन सकता है। कविता से नाद ग़ायब है, ध्वनि ग़ायब है, वह रूमानियत ग़ायब है जिसके लिए कविता को पद्य कहा जाता है।
गद्य कविता ने हिंदी में अनपढ़ों और कुपढ़ों को फैलने की इतनी जगह दे दी कि अब अच्छी कविता को खड़े होने की भी जगह नहीं मिलती। भारतीय काव्यशास्त्र में जिसे नाद या ध्वनि कहा गया था, वह कोई बाहरी सजावट भर नहीं थी, न ऐसा था कि उन कविताओं में प्रगतिशील और जनवादी चेतना नहीं थी, बल्कि कविता की रीढ़ ही वह चेतना थी। लेकिन 2000 के बाद की कविता को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हम कोई सरकारी रिपोर्ट या फ़ेसबुक स्टेटस पढ़ रहे हों। आचार्य आनंदवर्धन ने ध्वन्यालोक में अनुरणन की जो बात कही थी, उसका मतलब यही था कि शब्द कहने के बाद भी हवा में एक गूँज रहनी चाहिए। अब वह गूँज क्या शब्द भी नहीं रहते सब ग़ायब है।
मैनेजर पांडेय ने यह कहा था शायद कि ‘शब्द जब सूचना बन जाता है, तो वह मर जाता है।’ आज की कविता सूचनाओं का अंबार भर है या नीति वचनों की तरह ज्ञान देने की एक विधा। हम वक्तव्य देने की इतनी जल्दी में हैं कि शब्द की आंतरिक शक्ति को पहचान ही नहीं पा रहे हैं । आचार्य कुंतक ने जिसे वक्रोक्ति कहा था, वह दरअस्ल कवि की वह टेढ़ी चाल थी, जो सीधी बात को भी दिल में उतार देती थी। आज कवियों ने सरलता के नाम पर कविता को इतना सपाट कर दिया है कि उसमें विस्मय के लिए कोई जगह ही नहीं बची। अब मन कुछ भी पढ़ने के बाद हतप्रभ नहीं होता बस सूचनाओं से भर जाता है। हर दूसरी कविता का टोन एक जैसा है। सारे उपमान बने बनाए हैं। नएपन के नाम पर बस इतना होता है कि कौन कविता में कितना गद्य ला सकता है। अगर यह कहूँ तो ग़लत नहीं होगा कि ज़्यादातर कवि अच्छे शोधात्मक लेख लिखते तो बेहतर लिखते, कविता लिखने के प्रयास में उन्होंने वह क्षेत्र भी बेकार किया। निराला रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ हो या श्रीनरेश मेहता रचित ‘संशय की एक रात’, कुँवर नारायण रचित ‘कुमार जीव’ हो या केदारनाथ सिंह की ‘बाघ’ और ‘बनारस’, मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ हो; इसमें जो ध्वन्यात्मकता है, वह आज के कवियों के लिए जैसे किसी दूसरे ग्रह की चीज़ हो गई है।
नियमों को ताक पर रखने को आधुनिकता और प्रगतिशीलता कहकर सेलिब्रेट कर रहें हैं, हम जल्द ही इसके लिए पछताएँगे। हमारी भाषा या हमारी कला क्या इतनी दरिद्र है? कविताओं में लोक के बिम्ब लाने की एक नई चालाकी दिखती है, लेकिन कविता से लोक ग़ायब है। इधर की सारी कविता क़स्बे और शहरों की कविता है। क्या अच्छी कविता वह नहीं है, जिसे पढ़ते हुए दिमाग़ में बिम्ब बनें, न कि केवल तर्क की कैंची चले?
इधर के वर्षों में ख़ासकर 2014 से हिंदी कविता जिस तरह काग़ज़ से फिसलकर स्क्रीन पर आई, उसने इसके पूरे चरित्र को ही बदल कर रख दिया। अब संकट यह नहीं है कि कविता क्या कह रही है, संकट यह है कि वह कितनी देर टिक रही है। लाइक्स और शेयर्स की इस अंधी दौड़ ने कविता के उस हृदय को मार दिया है जिसकी कल्पना आचार्य मम्मट ने कभी की थी। आज का पाठक वर्ग भी सहृदय नहीं, एक उतावला स्क्रॉलर है। ऐसे में कवि भी वही लिख रहा है जो एक सेकेंड में समझ आ जाए। नतीजा यह हुआ है कि वह व्यंजना जो कविता को गहरा बनाती थी उसे अस्पष्टता कहकर कचरे के डिब्बे में फेंक दिया गया। सब कुछ नंग-धड़ंग देखते-देखते लोग शब्दों को भी नग्न ही देखने की आदत बन ले रहे हैं।
कविताओं से ख़त्म होती लय और राग का सबसे बड़ा दुष्परिणाम जो मैंने महसूस किया वह है स्मृति का संकट। पुराने समय की कविताएँ हमें याद रहती थीं क्योंकि उनमें एक लय थी, एक साँचे का अनुशासन था। पूरी की पूरी किताब याद रहती थी। अब तो मुझे अपनी लिखी कोई कविता नहीं याद रहती और कवियों का क्या ही बताएँ। वहीं अपनी कही ग़ज़लें याद हैं और शाइरों की ग़ज़लें भी याद हैं, लेकिन कविता एक भी याद नहीं। आज की गद्यात्मक कविता को आप एक बार पढ़ते हैं और दूसरी बार भूल जाते हैं।
इस पर कोई कह सकता है, आप पुरातनता के समर्थक हैं; तो कहे लेकिन यह न्यूरोलॉजिकल सच है कि हमारा दिमाग़ संगीत और लय को पकड़ता है, बेतरतीब वक्तव्यों को नहीं। विचार कुछ देर को एक सुई की तरह चुभते हैं, लेकिन चुभन को दिमाग़ तुरंत नए तरह के हॉर्मोन से ठीक कर देता है। राग चाहिए जिसमें आत्मा कई दिनों तक झूलती रहे और दिमाग़ को पंक्ति दर पंक्ति उसका आस्वाद मिलता रहे। विचार दवा की तरह पिलाकर नहीं दिया जा सकता, उसे संस्कार जनित ही बेहतर ढंग से बैठाया जा सकता है। किसी आलोचक ने कहीं कहा था—नाम याद नहीं आ रहा लेकिन यह याद है कि किसी स्त्री आलोचक को ही पढ़ रहा था—“शिल्प के बिना संवेदना शोर है”। यह पढ़कर मैं देर तक सोचता रहा था और यह मान पाया कि मेरा लिखा हुआ भी सब लगभग शोर ही है। मैंने अपने को ख़ारिज किया। उस दिन के बाद मैने नए ढंग से सोचना सीखा। इतना तो साफ़ है कि इस बात का इशारा इसी ओर है। हमने नियमों को ताक पर रखने के नाम पर अपनी कविताओं को इतना हल्का कर दिया है कि वे केवल सोशल मीडिया का कैप्शन बनकर रह गई हैं। अच्छी कविता कभी वक्तव्य नहीं हो सकती, क्योंकि वक्तव्य एक सूचना है जो बाहर से आती है, जबकि कविता एक अनुभव है जो भीतर घटित होता है। यदि कविता सब कुछ साफ़-साफ़ कह दे, तो फिर पाठक की अपनी कल्पना के लिए जगह कहाँ बचेगी?
अब जब हमारे सामने ऐसी मशीनें खड़ी हैं जो मिनटों में सपाट और यथार्थवादी कविताएँ लिख सकती हैं, तो एक कवि के पास अपना क्या बचा है? यदि कविता केवल सामाजिक समस्याओं का बयान दर्ज करना है, तो मशीन हमसे बेहतर बयान लिख रही है। यहीं आकर वह प्रतिभा का सिद्धांत याद आ जाता है, जिसे हमारे आचार्यों ने मनुष्य की विशिष्ट शक्ति माना था। काफ़ी हद तक मैं इसी बात का अनुग्रह करता हूँ। मशीन पैटर्न पकड़ सकती है, आत्मा नहीं। कवि भी पैटर्न ही पकड़ रहें हैं, आत्मा उनमें ख़ुद भी नहीं है। कविता के विषय सोचे जाते हैं और उनपर लिखा जाता है। जैसे आप उसे पढ़ेंगे आप समझ जाएँगे, यह स्वतः स्फूर्त नहीं है, सोची समझी और बुनी हुई शब्दावली है; लेकिन विडंबना देखिए कि कवि ख़ुद मशीन जैसा बनने की कोशिश कर रहा है—वही सपाट भाषा, वही घिसे-पिटे बिम्ब और वही वक्तव्य देने की मजबूरी। इन कविताओं को पढ़ना इतना थकान भर देता है कि मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि यदि कविता को अगले 25 वर्षों में जीवित रहना है, तो उसे अपनी उन शास्त्रीय जड़ों की ओर लौटना ही होगा जिन्हें हमने पुरानी कहकर ठुकरा दिया है। नियम को जेल की तरह नहीं उस राह की तरह देखना पड़ेगा जहाँ से चलकर मंज़िल पाई जा सकती है—आत्मा की मंज़िल, इस राह में नदी-नाले-तालाब हैं, खेत खलिहान हैं, गाँव हैं, किसान हैं, जो थकन में गीत गाते हैं लय से... राग में साँस लेकर और काम करते हैं उसी लय के भरोसे।
अपना मन कहूँ तो अच्छी कविता वक्तव्य का अंत है। वह वक्रोक्ति की उस टेढ़ी गली से गुज़रती है, जहाँ सत्य अपनी पूरी नग्नता में नहीं, बल्कि कलात्मक सौंदर्य के साथ प्रकट होता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का वह कथन आज भी सबसे बड़ा सत्य है कि कविता मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों से ऊपर उठाती है। लेकिन यह तभी संभव है जब शब्द ब्रह्म की तरह गरिमापूर्ण हों, न कि बाज़ार के विज्ञापनों की तरह सतही। हमें वक्तव्य से काव्य की ओर वापस मुड़ना ही होगा, वरना आने वाली पीढ़ियों के पास इतिहास तो होगा, लेकिन उस इतिहास को महसूस करने वाली संवेदना नहीं होगी।
इन कविताओं की ऊब से निकलने के लिए ही मैंने दिनकर की डायरी पढ़ी, मलयज के पत्र पढ़े और यह हर पन्ने पर महसूस किया कि क्यों दिनकर आज भी पढ़े और गाए जा रहे हैं। क्यों मलयज आज भी अपने पत्रों में रुला देते हैं! उनके पास लय है, गद्य में भी एक तरलता है, वह सूचना भी देते हैं तो उस सूचना की मार्मिकता में उतरकर, वो विदागीत गाएँ या युद्ध के मैदान में खड़े होकर हुँकार के शब्द कहें, उन्हें शब्दों की महत्ता पता है।
यह सब कह देने और कह देने के बाद इसे पढ़ते हुए सोच रहा हूँ, क्या मैं इसमें कहीं फ़िट बैठता हूँ तो मैं पा रहा हूँ कि नहीं, मैं कवि तो नहीं हो पाया, मैं कहानी भी कई वर्ष से अधूरी लिखकर बैठा हूँ, नाटकों पर तो जा ही नहीं पा रहा हूँ, मैं क्या हूँ? क्या मेरा मैं इतना छोटा हूँ कि मुझे एक कहानी लिखनी चाहिए जिसमें मैं अपने का यशगान कर सकूँ... क्योंकि कविता में तो वह यशगान हो नहीं पाएगा, कहानी में जगह मिलेगी।
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