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एक हिंदू द्वारा गांधी की हत्या; भारत स्तब्ध, विश्व शोकमग्न

महात्मा गांधी की हत्या पर ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट

नई दिल्ली, 30 जनवरी 1948 : मोहनदास के. गांधी आज एक हत्यारे की गोली से मारे गए। हत्यारा एक हिंदू व्यक्ति था, जिसने तीन फ़ीट की दूरी से पिस्तौल से तीन गोलियाँ चलाईं।

78 वर्षीय गांधी, जो इस उथल-पुथल भरे देश में परस्पर विरोधी तत्त्वों को एक साथ बाँध कर रखने वाले और किसी न किसी रूप में एकता बनाए रखने वाले एकमात्र व्यक्ति थे, शाम 5:15 बजे उस समय गोली का शिकार हुए जब वह बिरला हाउस के उद्यान से गुज़रते हुए उस मंडप की ओर जा रहे थे, जहाँ से उन्हें अपनी दैनिक प्रार्थना-सभा का संदेश देना था।

हत्यारे को तुरंत ही पकड़ लिया गया।

बाद में उसने अपनी पहचान नाथूराम विनायक गोडसे, उम्र 36 वर्ष, पूना के मराठा समुदाय के एक हिंदू के रूप में बताई। पूना गांधी की विचारधारा के विरोध का एक केंद्र रहा है।

श्री गांधी की मृत्यु पच्चीस मिनट बाद हो गई। उनकी मृत्यु ने पूरे भारत को स्तब्ध और किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया है कि अब यह नव-स्वतंत्र राष्ट्र अपने ‘महात्मा’ के बिना किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

इस अपूरणीय क्षति ने 30 करोड़ की आबादी वाले इस देश को अचानक एक चौराहे पर ला खड़ा किया है। आज रात इस राजधानी में शोक के साथ-साथ भय और अनिश्चितता की एक अंतर्धारा भी मिली हुई है, क्योंकि भारत में शांति के लिए वह सबसे सशक्त प्रभाव, जिसे यह पीढ़ी जानती थी, चला गया है।

नेहरू की अपील

प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने, रुँधे गले से, आज रात अपने रेडियो संबोधन में भविष्य के प्रति विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की अपील की। उन्होंने आह्वान किया कि महान् शांतिदूत की स्मृति में, जो अब विदा हो चुके हैं, भारत का मार्ग हिंसा से दूर मोड़ा जाए।

श्री गांधी के पार्थिव शरीर का दाह-संस्कार उनकी बारंबार व्यक्त इच्छा के अनुरूप पारंपरिक हिंदू विधि से किया जाएगा। उनका पार्थिव शरीर कल सुबह 11:30 बजे नई दिल्ली स्थित उनके निवास-स्थान से चादर से ढकी एक साधारण लकड़ी की खाट पर ले जाया जाएगा। अंतिम यात्रा नई और पुरानी दिल्ली के प्रत्येक प्रमुख सड़कों से होकर गुज़रेगी और लगभग शाम 4 बजे पवित्र यमुना नदी के तट पर स्थित श्मशान घाट पर पहुँचेगी। वहाँ, गौतम बुद्ध के बाद के इस सबसे बड़े भारतीय महापुरुष के पार्थिव शरीर को कफ़न ओढ़ाया जाएगा, लकड़ी की चिता पर रखा जाएगा और दाह-कर्म किया जाएगा। उनकी अस्थियाँ यमुना के जल में प्रवाहित की जाएँगी, जो अंततः गंगा में जाकर मिलेंगी, जब ये दोनों पवित्र नदियाँ तीर्थ नगरी इलाहाबाद में संगम करती हैं।

ये सादे समारोह आज रात पंडित नेहरू द्वारा श्री गांधी की इच्छाओं के सम्मान में घोषित किए गए, यद्यपि कई नेता चाहते थे कि उनके शरीर को संरक्षित कर राजकीय सम्मान के साथ प्रदर्शित किया जाए। भारत श्री गांधी को अंतिम बार उसी रूप में देखेगा जैसा वह अपने जीवनकाल में थे—एक सादा और सरल हिंदू।

समाचार का द्रुत प्रसार

श्री गांधी की हत्या का समाचार—उस पाँच-दिवसीय उपवास के कुछ ही दिनों बाद, जिसे उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए पूर्ण किया था—नई दिल्ली में द्रुत गति से फैला। तुरंत ही हज़ारों लोग स्वतः स्फूर्त रूप से बिरला हाउस की ओर बढ़ने लगे, जो करोड़पति उद्योगपति जी. डी. बिरला का निवास है, जहाँ श्री गांधी और उनके छह सचिव नई दिल्ली आने के बाद से, राजधानी में फैली अशांति के बीच, अतिथि के रूप में ठहरे हुए थे।

आज शाम की प्रार्थना-सभा के लिए उद्यान से गुज़रते हुए श्री गांधी अभी ईंटों की छोटी-सी सीढ़ी के शीर्ष पर पहुँचे ही थे; उनकी दुबली, साँवली बाँहें उनकी पौत्रियों—मनु (17 वर्ष) और आभा (20 वर्ष)—के कंधों पर टिकी थीं।

किसी ने उनसे कुछ कहा और वह अपनी पौत्रियों की ओर से मुड़े और नम्र हिंदू अभिवादन (प्रणाम) किया—हथेलियाँ आपस में जुड़ी हुईं और उँगलियों के सिरे ठोड़ी तक उठे हुए, जैसे ईसाई प्रार्थना की मुद्रा में होता है।

श्री गांधी के मंडप तक जाने के लिए भीड़ ने मार्ग दिया और उसी क्षण एक युवा भारतीय भीड़ से निकलकर आगे बढ़ा और यूरोप में बनी पिस्तौल से घातक गोलियाँ दाग़ दीं। एक गोली श्री गांधी के सीने में और दो दाईं ओर पेट में लगीं। वह आगे की ओर झुके और फिर ज़मीन पर गिर पड़े। उनकी दोनों पौत्रियाँ रोती हुईं उनके पास गिर पड़ीं।

भीड़ स्तब्ध रह गई

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, लगभग 500 लोगों की भीड़ सन्न रह गई। एक-दो क्षण तक न कोई चीख़-पुकार मची, न कोई उत्तेजना फैली। फिर मौजूद लोग हत्यारे को धक्का देने लगे, ऐसे जैसे वह क्रोध से अधिक विस्मय में थे।

हत्यारे को मैसाचुसेट्स के लैंकेस्टर निवासी टॉम राइनर ने पकड़ लिया, जो अमेरिकी दूतावास से संबद्ध वाइस-कौंसल हैं और हाल ही में भारत आए थे। वह जिज्ञासावश श्री गांधी की प्रार्थना-सभा में उपस्थित हुए थे, जैसा कि नई दिल्ली आने वाले अधिकांश आगंतुक कम से कम एक बार अवश्य करते थे।

श्री राइनर ने हमलावर को कंधों से पकड़ा और उसे पुलिस गार्डों की ओर धकेल दिया। तब जाकर भीड़ को वास्तव में समझ आया कि क्या घटित हुआ है और हत्यारे पर घूँसों की बरसात होने लगी, जब उसे उस मंडप की ओर घसीटकर ले जाया जा रहा था जहाँ श्री गांधी को प्रार्थना करनी थी। वह पीछे रक्त की एक लकीर छोड़ता गया था।

श्री गांधी को सहायकों ने उठाया और तेज़ी से उस सादे शयनकक्ष में ले गए जहाँ वह अपने अधिकांश कार्य और विश्राम के घंटे व्यतीत करते थे। उन्हें जब दरवाज़े से भीतर ले जाया गया, हिंदू दर्शक जो उन्हें देख पा रहे थे, विलाप करने लगे और छाती पीटने लगे। आधे घंटे से भी कम समय बाद श्री गांधी के दल का एक सदस्य कमरे से बाहर आया और द्वार पर खड़े लोगों को बताया :

“बापू नहीं रहे।”

लेकिन यह ख़बर व्यापक रूप से तब फैली जब शाम 6 बजे ऑल इंडिया रेडियो द्वारा श्री गांधी की मृत्यु की सूचना दी गई।

हत्यारा ले जाया गया

इसी बीच हत्यारे को पुलिस थाने ले जाया गया। उसने स्वयं को पूना का निवासी बताया।

बताया जाता है कि श्री गांधी के जीवन पर पहला हमला 25 जून 1934 को पूना में किया गया था, जब उस कार पर बम फेंका गया था जिसे श्री गांधी की कार समझा गया था। पूना कट्टरपंथी, गांधी-विरोधी, रूढ़िवादी हिंदू महासभा का एक केंद्र है।

श्री गांधी की हत्या का दूसरा संभावित प्रयास इसी वर्ष 20 जनवरी को उनके बाग़ की दीवार पर एक कच्चा बम रखकर किया गया था।

कथित रूप से हत्यारे द्वारा एकमात्र वक्तव्य एक विदेशी संवाददाता को दिया गया जहाँ उसने कहा : “मुझे कोई पछतावा नहीं है।”

वह सामान्य हिंदू क़द-काठी के हिसाब से हट्टा-कट्टा था और उसने स्लेटी पतलून, नीला पुलओवर और ख़ाकी बुश जैकेट पहन रखी थी। उसकी पिस्तौल, जिसे गोलीबारी के तुरंत बाद रॉयल इंडियन एयर फ़ोर्स के फ़्लाइट सार्जेंट डी. आर. सिंह ने उससे छीन लिया था, में चार ज़िंदा कारतूस अब भी बचे हुए थे।

अपने शयनकक्ष में लकड़ी की खाट पर पड़े हुए श्री गांधी ने मृत्यु से पहले पानी माँगने के सिवाय और कोई शब्द नहीं कहा। अधिकांश समय वह अचेत ही रहे। जब उनके चिकित्सक ने उन्हें मृत घोषित कर दिया तो उनके कर्मी दल के रोते हुए सदस्यों ने हिंदू रीति के अनुसार उनके चेहरे के निचले हिस्से को चादर से ढक दिया और उपस्थित महिलाएँ फ़र्श पर बैठकर पवित्र हिंदु ग्रंथों से मंत्रोच्चार करने लगीं। जो लोग खिड़कियों से ये क्रियाएँ देख पा रहे थे, वे समझ गए कि श्री गांधी का देहांत हो चुका है।

पंडित नेहरू लगभग 6 बजे वहाँ पहुँचे। मौन में डूबे हुए और सुलगती आँखों से उन्होंने उस स्थान का निरीक्षण किया जहाँ श्री गांधी को गोली मारी गई थी और फिर बिना कुछ कहे घर के भीतर चले गए। बाद में वह बिरला हाउस के मुख्य द्वार पर एक ऊँचाई पर खड़े हुए और सड़क पर एकत्र हज़ारों की भीड़ को—जिन्होंने पूरा यातायात रोक रखा था—अस्थायी अंतिम संस्कार की व्यवस्था के बारे में बताया। उनकी आवाज़ दुःख से काँप रही थी और भीड़ में सैकड़ों लोग अनियंत्रित रूप से रो रहे थे।

हज़ारों शोकाकुल लोग बिरला हाउस के सभी द्वारों पर व्यवस्थित और शांत क़तारों में खड़े हो गए थे और कुछ समय के लिए उन्हें पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन हेतु जाने की अनुमति दी गई थी। बाद में जब यह स्पष्ट हो गया कि आज रात बहुत कम लोग ही श्री गांधी के पार्थिव शरीर को देख पाएँगे तो शव को दूसरी मंज़िल की बालकनी में ले जाया गया और तेज़ प्रकाश के नीचे रखी एक खाट पर रखा गया ताकि परिसर में मौजूद सभी लोग अपने दिवंगत नेता को देख सकें।

उनका सिर पाँच बत्तियों वाले दीपक से प्रकाशित था, जो पाँच तत्वों—क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर—का प्रतीक था और हिंदू आस्था के अनुसार उनकी आत्मा को अनंतकाल तक प्रकाश देने के लिए प्रज्ज्वलित था।

पंडित नेहरू ने आज देर शाम अपने रेडियो संबोधन में श्री गांधी को अंतिम विदाई दी। काँपती हुई आवाज़ में उन्होंने कहा :

“गांधी हमारे जीवन से चले गए हैं और चारों ओर अँधेरा छा गया है। हमारे राष्ट्रपिता अब नहीं रहे—अब हम सलाह और सांत्वना के लिए उनकी ओर दौड़ नहीं लगा सकेंगे। यह इस देश के करोड़ों-करोड़ों लोगों के लिए एक भयानक आघात है।

हमारा प्रकाश बुझ गया है, किंतु उनके रूप में जो प्रकाश इस देश में चमका था, वह साधारण प्रकाश नहीं था। हज़ार वर्षों तक वह प्रकाश इस देश में देखा जाएगा और दुनिया उसे देखेगी… आह, यह हमारे साथ क्यों हुआ! करने को अभी बहुत कुछ शेष था।”

हत्यारे का उल्लेख करते हुए पंडित नेहरू ने कहा :

“मैं उसे एक पागल व्यक्ति ही कह सकता हूँ।”

उन्होंने शांति की पुनः जागृत भावना का आग्रह किया, जो श्री गांधी की अंतिम परियोजना थी और कहा :

“उनकी आत्मा हमें देख रही है—उन्हें इससे अधिक कोई बात दुखी नहीं करेगी कि हम हिंसा में लिप्त हों। इस महान् त्रासदी के समक्ष हमारे सभी तुच्छ संघर्ष और मतभेद समाप्त हो जाने चाहिए... अपनी मृत्यु में भी उन्होंने हमें जीवन की वृहत बातों का स्मरण कराया है।”

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‘द न्यूयॉर्क टाइम्स आर्काइव्ज़’ से साभार | रिपोर्ट : रॉबर्ट ट्रम्बुल | अनुवाद : शायक आलोक

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