Font by Mehr Nastaliq Web

धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : मैं हिंदी का परमानेंट खलिहर नहीं था

गताध्याय से आगे...

ग्यारह 

“सोने का मुकुट नहीं चाहिए था, चाँदी का चँवर भी नहीं चाहिए था। साहित्य का सिंहासन लेकर क्या करता, मेरा चूतड़ उस पर बैठने से इंकार कर देता। राजाओं के दरबार में जगह-वजह चाहिए नहीं थी। मैं अपनी कुटिया में बहुत मज़े में था। अपने मोढ़े पर ठीक था। अपनी चटाई पर ठीक था। मुझे इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, इंडिया हैबिटेट सेंटर, साहित्य अकादेमी, भारत भवन में काव्यपाठ करना नहीं था; हिंदी का लेखक होकर नेहरू पर, गांधी पर भाषण नहीं देना था, मार्क्सवाद पर भी बोलने का समय नहीं था, मेरे पास। मैं हिंदी का परमानेंट खलिहर नहीं था। बहुत से बहुत ज़रूरी काम में लगा हुआ था। हिंदी के ब्रह्मांड में पैदल-पैदल घूम-घूमकर झाड़ू लगाना था, पोंछा लगाना था, जितने भी सूरज थे, जितने भी चाँद और तारे थे, उनके पिछवाड़े जहाँ-जहाँ अँधेरा था, वहाँ-वहाँ लालटेन जलाना था। अकादमियों और पब्लिकेशन हाउसों का संडास साफ़ करना था। कंडोम और सेनेटरी पैड निकालकर फेंकना था। लेखकों का चूतड़ चेक करना था। मठों के हिसाब से सूचीबद्ध करना था। त्रिलोचन, केदार सीनियर, विनोद, केदार जूनियर और विष्णु वग़ैरा के नक़लचियों की अलग-अलग फ़ाइल बनानी थी। पुरस्कारों की निर्णायक समितियों के सदस्यों का चूतड़ लाल करना था। जंकामंका शास्त्री की पिस्तौलछाप धोती को फाड़कर रूमाल बनाना था। हँसमुख वाजपेयी का फ़ाउंडेशन और पाजामा दोनों चेक करना था। बल्ली की बल्ली को मोड़कर उसके पाजामे में डालना था, हौदा के दीर्घनितंब का ऑपरेशन करना था। संपादकों की पादन कला पर निबंध लिखना था। ई-संपादकों के चूतियापे पर प्रकाश डालना था। हिंदी में पूर्णकालिक सफ़ाई आंदोलन चलाना था। हिंदी के अँधेरे को मिटाना था। अँधेरा फैलाने वालों को उजाले में नंगा खड़ा करना था। साहित्य की दुनिया से दासता, अपसंस्कृति और अंधविश्वास हटाना था। राजनीति की पाठशाला में लोकतंत्र को ज़िंदा करना था। अरे भाई और भी बड़े-बड़े काम थे। फ़ेहरिस्त देखना हो, तो मेरी इस लाल डायरी को पूरा पढो। फिर भी मुझे असफल लेखक कहते हो, कुंठित कहते हो, कहते हो जो मुख्यधारा का हिस्सा नहीं है, कुंठित लेखक है;  जो पुरस्कार नहीं लेता है, कुंठित लेखक है; जो मठाधीशों से आशीर्वाद नहीं लेता है, कुंठित लेखक है; जो दिल्ली आता-जाता नहीं, कुंठित लेखक है; जो जीवन में कभी एकल काव्यपाठ नहीं करता है, कुंठित लेखक है; जो मेले-ठेले में नहीं जाता है, कुंठित लेखक है; जो संपादकों और आलोचकों को पटाता नहीं है, कुंठित लेखक है; जो किसी लेखक-संगठन में भर्ती नहीं होता है, कुंठित लेखक है; जो किसी फ़ाउंडेशन बाबा के दरबार में जाता नहीं है, कुंठित लेखक है; जो अपनी किताबों की रिव्यू नहीं कराता है, कुंठित लेखक है; जो किताब छपवाने के लिए प्रकाशक और पुस्तक-संपादक की परिक्रमा नहीं करता है, कुंठित लेखक है; जो गुटबाज़ी नहीं करता है, कुंठित लेखक है; जो प्रशंसामूलक आलोचना नहीं लिखता है, कुंठित लेखक है; जो अबूझ कविता नहीं लिखता है; कुंठित लेखक है; ओह कितना कुंठित है, बहुत कुंठित है; हिंदी का सबसे कुंठित लेखक है। कहो-कहो, कहते रहो मुझे कुंठित। जाओ मैं अपने समय का असफल लेखक हूँ। अपनी सफलता को अपनी गाँड़ में डाल लो। तुम्हारी इस सफलता पर पेशाब करता हूँ। मेरे पास बहुत काम है। हिंदी के लिए पूरी तरह जान देने के काम में लगा हूँ, तुम्हारी तरह खलिहर नहीं हूँ कि जगह-जगह सफल होता फिरूँ।” 

पहली बार ऐसा हुआ था कि उदय ने लाल डायरी का कोई हिस्सा लिखने के बाद क़लम को ही तोड़ दिया हो। मैं जब उसके कमरे में पहुँचा तो टूटे हुए क़लम को हिंदी विभाग की डस्टबिन में डाल रहा था। डायरी का पृष्ठ खुला हुआ था। उदय के कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था। सामने से बच्चे आ रहे थे, जा रहे थे। मल्लिका मणि मंजुला मिश्र मैडम झाँकती हुई आगे बढ़ गई थीं। उनकी ग्रीवा जब हल्का-सा झुककर बाईं तरफ़ मुड़ती थी और आँखें आपसे आप मुड़कर उदय को देख लेती थीं, तो उदय जान तो जाता था, लेकिन मल्लिका को जब तक देखता-देखता, वह अपनी ख़ुशबू छोड़ते हुए आगे निकल जाती थीं। 

विश्वविद्यालय की दुनिया में जहाँ पुरुष प्रोफ़ेसर ही स्त्रैण होते हों, वहाँ स्त्री प्रोफ़ेसरों से उसने कभी भी झाँसी की रानी होने की उम्मीद नहीं की थी। लेखिकाओं से भी उसने झाँसी की रानी बनने जैसी कोई उम्मीद नहीं की। लेखकों से वीरता की कोई उम्मीद करने का सवाल ही नहीं पैदा होता था। वे हिंदी में पैदा ही इसलिए हुए थे कि हिंदी की बत्ती गुल कर सकें। यह तो उनकी क़िस्मत ख़राब थी, जो उनके समय में उदय जैसा लेखक और संटी, झंकार और बीदास जैसे पाठक पैदा हो गए थे। हम अपना काम कर रहे थे और हिंदी के भड़ुवे अपना काम कर रहे थे। हौदा बरामदे में बैठा हँस रहा था और बच्चे समझ रहे थे कि हिंदी का हिप्पोपोटामस हँस रहा है। कभी-कभी एमए फ़ाइनल के बच्चे उसके हँसने की भयंकर आवाज़ से डर जाते थे और जब उन्हें पता चलता था कि हौदा सर हँस रहे हैं, तो उसकी तुलना राक्षसों के अट्टहास से करने लगते थे। 

जंकामंका सर का गैंग ही हिंदी के राक्षसों का गैंग था, लेकिन उसे जंकामंका का गैंग कहा जाता था। बल्ली ही वह शख़्स था, जो जंकामंका गैंग का नाम दिन दूना रात चौगुना फैला रहा था। राजनीति की पाठशाला में लोकतंत्र के साथ बुरा काम कर रहा था। फिर शिक्षक संध का चुनाव समय से कराने से भाग रहा था। उदय ने तय कर लिया था कि इस बार उसे चारो खाने चित्त कर देना है। मुझे और झंकार को लेकर कैफ़ेटेरिया में घुसते ही डीन साइंस और उसके विश्वविद्यालयी मित्र आरपी यादव दिख गए। उन्होंने हाथ हिलाकर अपनी मेज़ पर बुलाया और हम उनकी मेज़ पर पहुँच गए। कड़वी कॉफ़ी की मीठी चुस्की लेते हुए उदय और आरपी बल्ली की बल्ली इस बार तोड़कर उसकी जेब में डाल देने का प्लान तैयार करने लगे थे। जूलोजी के एके और कॉमर्स के बैजल भी आ गए थे। मैं और झंकार हाथ में कॉफ़ी लिए उस टेबल से दूसरी टेबल पर आकर बची हुई काफ़ी पीने लगे थे। वे लोग मंत्रणा इतनी तल्लीनता से कर रहे थे कि लग रहा था कि किसी पहाड़ को तोड़ने के लिए डायनामाइट बिछा रहे हैं या स्पेस में कोई रॉकेट भेजने की योजना बना रहे हैं। डीन साइंस उठे और भीड़ से दूर कोने में जाकर कुछ लोगों को फ़ोन करने लगे थे। लौटे तो बोले, सभी डीन से बात हो गई है। थोड़ी देर में वे लोग अपने-अपने विभाग के लिए चल दिए। उदय के साथ हम निकले तो झंकार ने कहा कि बीदास से टिकट कंफ़र्म कराना है।

अस्ल में झंकार को सपरिवार कोलकाता जाना था। मैंने पूछा तो बताया कि उसके बेटे ने भीष्म प्रतिज्ञा कर ली हैं। विवाह करेगा तो उसी लड़की से करेगा, नहीं तो आजीवन अविवाहित रहेगा। उसने झंकार से सीधे ऐसा कुछ नहीं कहा था, लेकिन घर में अपनी बहन और माँ को अपना फ़ैसला सुना दिया था। झंकार के सामने कोई विकल्प नहीं था। लड़का उस लड़की के अलावा किसी और से शादी के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था। ऐसे में किसी पेड़ से उसकी शादी की नहीं जा सकती थी। किसी पशु-पक्षी और ताल-पोखर से किसी लड़के से सचमुच की शादी होते कभी किसी ने देखा नहीं था। गाँव में कभी देखा भी था तो झूठ-मूठ का देखा था, लेकिन झंकार को अपने बेटे की असली शादी करनी थी। सचमुच के पोते-पोतियों को गोद में खेलाना था। सो, झंकार को मन मारकर उस लड़की को एक बार देखने और आगे बढ़ने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। साल-दो चार साल शादी टाल नहीं सकता था। लड़के की उम्र हो गई थी। उदय ने भी कहा कि ठीक है, एक बार देख लो, क्या पता सब अच्छा हो। झंकार के साथ मैं बीदास के पास पहुँचा तो वह लंच के लिए घर निकल रहा था। दो मिनट के लिए रुका, झंकार के टिकट का ब्योरा पी.ए. को देकर कहा, हो जाना चाहिए और हम सीढ़ियों से नीचे उतरकर उसके साथ उसकी कार में बैठकर उसके बँगले की ओर चल दिए थे।

चार बजते-बजते डीन साइंस के कमरे में बैठकर गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय के सारे डीन और ज़्यादातर हेड्स और सीनियर प्रोफ़ेसर्स इस वक़्त विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ नाम के उपग्रह को ज़मीन पर उतारकर उसकी मरम्मत कर रहे थे। असल में उसे ज़मीन पर उतारकर दुरुस्त करने का फ़ैसला लेने की वजह यह थी कि बल्ली ने कार्यकाल ख़त्म होने के बाद फिर चुनाव कराने से इनकार कर दिया था। कहता बाढ़ आई हुई है, जापानी बुख़ार फैला हुआ है, एथलेटिक मीट है, पुस्तक-प्रदर्शनी लग रही है, जंकामंका सर को कविता-पाठ के लिए चीन जाना है, अभी शिक्षकों के हित के तमाम काम रुके हुए हैं, उसकी तबीयत ठीक नहीं है, उसे सर्दी हुई है, पेट झर रहा है, मल्लिका जी प्रेग्नेंट हैं, हौदा सर के बेटे का विवाह है, अभी सभी शिक्षक चुनाव के लिए तैयार नहीं हैं। उसके पास चुनाव न कराने के हज़ार बहाने होते थे। असल में हौदा को पता था कि पिछली बार हुई धोखे से जीत के बारे में उदय को सब पता चल गया। अभय कुमार को अपनी ग़लती का एहसास हो गया था। ओबीसी के शिक्षकों को अपनी ग़लती का अनुभव हो गया था। विश्वविद्यालय के लोकतंत्र और देश के लोकतंत्र में मुख्य अंतर यह था कि देश में सवर्ण मतदाता कम थे ओबीसी, एससी के ज़्यादा। विश्वविद्यालय में पहले तो सब सवर्ण ही होते थे, लेकिन इस समय भी सवर्ण अधिक थे। उदय के जीवन की विडंबना देखिए कि ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ था और हिंदी के ब्राह्मणों में अछूत था, विश्वविद्यालय के सारे ब्राह्मण जंकामंका गैंग में थे, सो उनके बीच भी अछूत था। उदय ने कभी यह सब माना ही नहीं। शहर के जिस सीनियर कवि को बहुत मानता था, वे ब्राह्मण नहीं थे, ठाकुर नहीं थे, श्रीवास्तव नहीं थे, एससी थे। उदय को विद्यार्थी जीवन से बहुत मानते थे, उसमें अपनी कविता का भविष्य देखते थे। उनकी कविता में छिपे हुए बारूद और चिंगारियों को आगे चलकर उदय ने विस्फोट में बदल डाला था। विश्वविद्यालय के लोकतंत्र को बचाने के लिए आज फिर उसके कंधे पर विस्फोट करने की जिम्मेदारी आ गई थी। आज की बैठक में निर्णय लिया जा चुका था कि वाइस चांसलर से नो आबजेक्शन सर्टिफिकेट लेकर यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन का रजिस्ट्रेशन कराया जाय, जिसका हर साल चुनाव हो। इस तरह विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के दो फाड़ होने की नींव उस बैठक में पड़ गई थी। किसी भी प्रकार की तानाशाही में जीना सबके लिए संभव नहीं है। तानाशाही के ख़िलाफ़ आंदोलन होते हैं, तानाशाह को सिंहासन ख़ाली करना पड़ता है। बल्ली की तानाशाही तो छोटी-सी चीज़ थी, जिसे विश्वविद्यालय के ऊँची जाति के प्रोफ़ेसरों ने अपनी नीचता से कायरता से, स्वार्थों से, बड़ी चीज़ बना दिया था। ऐसे नीच और ज़नख़े प्रोफ़ेसर, देश को लोकतंत्र के सच्चे सिपाही कैसे दे सकते थे। 

उदय की मूल समस्या यह थी कि वह जीवन और विचार में भेद नहीं चाहता था। लेखक जैसा लिखता है, वैसे जिए और जैसा जीता है, वैसा लिखे। उसे राजनीति, साहित्यनीति, धर्म, वाणिज्य पत्रकारिता, साहित्यिक पत्रकारिता, ई-साहित्यिक पत्रकारिता, खेल, फ़िल्म, शिक्षा वग़ैरा में एक जैसी शुचिता चाहिए थी। वह ऐसा नहीं चाहता था कि राजनेता, पूँजीपति और धर्माचार्य वग़ैरा सुधर जाएँ और लेखक कभी न सुधरे। राजनेता, धर्माचार्य व़ग़ैरा हाथों में जाम न लें और हँसमुख वाजपेयी जैसे लेखक बेटियों की उम्र की लेखिकाओं के साथ आँखों में आँखें डालकर जाम टकराएँ, जाम टकराते-टकराते देह टकराएँ, वह ऐसे सभी लेखकों को पहले जूतों से मारना चाहता था, उसके बाद ऐसे सभी हरामज़ादे लेखकों को सीधे गोली से उड़ा देना चाहता था। साहित्य की कोई सचमुच की पुलिस होती और वह कप्तान होता तो यक़ीन मानिए, ऐसे सौ-दो सौ लेखकों का फ़ुल एनकाउंटर पक्का था। वह पैर में नहीं, जाँघ से ऊपर गोली मारता। गुप्तांग से शुरू करता और आगे-पीछे से होते हुए मस्तक तक गोलियों से छलनी कर देता। यह उदय का दुर्भाग्य नहीं, भ्रष्ट लेखकों का सौभाग्य था कि साहित्यिक पुलिस जैसी कोई चीज़ नहीं थी और वह उसका पुलिस कप्तान नहीं था। कभी-कभी सोचता कि अपने आई.पी.एस. शिष्य से उसकी रिवॉल्वर उधार लेकर भून डालूँ भ्रष्ट लेखकों, संपादकों, प्रकाशकों, पब्लिकेशन हाउस के संपादकों, साहित्य अकादेमी, भारत भवन जैसे संस्थानों के पदाधिकारियों को। यक़ीन मानिए उदय सबका धुआँ निकाल देता। वह रिटायर होने के पहले से ही हिंदी के साथ बुरा करने वालों के लिए ख़ूँख़ार था, उससे कहीं ज़्यादा ख़ूँख़ार रिटायर होने के बाद हो गया था। जंकामंका उसे देखकर साहित्य अकादेमी के संडास में छिप जाते थे। इधर-उधर आयोजनों के बहाने भागे फिरते थे। उसके सामने नहीं आते थे। सामने आने के हर मौके को दूर करते थे। गंज गोबरहवा लिट्-फ़ेस्ट वाले से कहते, उदय को मत बुलाओ नहीं तो मैं तुम्हारे मंच पर ही आत्महत्या कर लूँगा। अस्ल में उनको डर था कि उदय जैसा कोई सख़्त लेखक आ जाएगा, तो उनकी धोती फाड़ देगा। कार्यक्रम के लिए अपनी सहमति देने के पहले वह सुनिश्चित कर लेते थे कि मंच पर उनके अलावा, सिर्फ़ उनके कुत्ते-बिल्ली रहे। लिट्-फ़ेस्ट वाले साहित्य के दलाल थे, जान ही नहीं पाते थे कि उनके घर में, उनके शहर में हिंदी का कोई मर्द लेखक भी है। वह यहाँ से लेकर दिल्ली तक हिंदी के दलाल लेखकों का साम्राज्य देखते थे और इन्हीं लेखकों को सिद्ध लेखक मानते थे। उन्हें घर का जोगी जोगड़ा लगता था, हर साल दिल्ली से जंकामंका, बल्ली और हौदा वग़ैरा की प्रजाति के लेखकों और अलेखकों को बुलाते थे। हिंदी के उत्कृष्ट कोटि के कुत्ते-बिल्ली हर साल बुला लिए जाते थे। उदय को ऐसे मंचों पर जाना ही नहीं था। वह तो अपने ठीहे पर लोहा गरम करके हथौड़ा मारता रहता था—टन्न-टन्न... ठीहा झनझना जाता था, लेकिन हथौड़ा रुकने का नाम नहीं लेता था। उदय हिंदी का ब्राह्मण नहीं लोहार था।

सोशल मीडिया पर उदय ने तहलका मचा रखा था। तर्कों की ऐसी झड़ी इससे पहले हिंदी की दुनिया में नहीं देखी गई थी। अस्ल में तर्क का जन्म स्वार्थ की कोख से नहीं, सत्य के संधान से होता है। तर्क एक अर्थ में सत्य के पक्ष में की गई फ़ौरी कार्रवाई है। उदय कहने के लिए साहित्य में अकेला था, लेकिन उसके विचार, उसका आचरण और उसकी सबसे बड़ी शक्ति, उसके तर्क हमेशा उसके साथ थे। जिनके बल पर वह हिंदी के किसी भी आततायी से टकरा जाता था। किसी भी लुटेरे को धर दबोचता था। उसके सवाल, सच के साथ होने की गवाही देते थे। अस्ल में उदय ने जीवन का बड़ा हिस्सा हिंदी के लिए समर्पित कर दिया था। हिंदी उसके लिए, सिर्फ़ जीविका का माध्यम नहीं थी, जीवन थी। हिंदी में साँस लेता था, हिंदी में जीता था, हिंदी से प्यार करता था, हिंदी के बिना जी नहीं सकता था।

हिंदी विभाग के लॉन में फूल उसके लिए निकलते थे। ख़ुशबू उसके लिए बिखेरते थे। जब वह अकेलापन महसूस करता था, तो उसका प्यार उसके पास आकर बैठ जाता था। वह अपने प्यार की उँगली पकड़कर उसके साथ चल देता था। उस दिन तो वह अपने कमरे में बहुत बेचैन हो गया था, जब वह अपने प्यार में खोया हुआ था और उसी समय एम.ए. फाइनल की एक लड़की उसके कमरे में आ गई थी। पहले भी वह लड़की दिखती थी। जैसे सब बच्चे दिखते थे, उसी तरह वह भी दिखती थी। उसका नाम मालूम नहीं था। क्लास में हाज़िरी का रिवाज जबसे ख़त्म हुआ, बच्चों का नाम नहीं मालूम हो पाता था। लड़की बिल्कुल उसके बच्चों जैसी थी। सुंदर, प्यारी। आते ही उसने कहा, “सर हेड सर ने आपके साथ डिजर्टेशन लिखने के लिए कहा है।” उदय ने उससे बैठने के लिए कहा और उसका नाम पूछा। नाम सुनते ही उसके भीतर कोई तूफ़ान उठा, कोई तेज़ हलचल हुई। लड़की ने नाम बताया—प्रियांशी प्रियदर्शिनी सिंह। उदय ने आगे जानना चाहा था कि लड़की रहती कहाँ है। यह पता चलते ही कि वह लड़की उसके हृदय की निकटतम की निकटतम है, वह उसे बहुत आत्मीयता से देखने लगा था। उसने पूछा, पद्मिनी प्रियदर्शिनी सिंह जी ने मेरा मतलब तुम्हारी बुआ जी ने तुम्हें हिंदी पढ़ने के कहा था क्या? उसने कहा, नहीं सर, मैं हाईस्कूल में थी, तब से कविताएँ लिखती हूँ। उदय ने कहा था, अरे कविता लिखती हो, लेकिन कविता लिखना तो बहुत ख़राब बात है। प्रियांशी ने तुरत कहा था, “सर, कविता तो आप भी लिखते हैं!” “हाँ, मैं लिखता हूँ, लेकिन मेरे बच्चे, लड़कियों को कविता नहीं लिखनी चाहिए।” उदय ने कविता लिखने से उसे रोका, तो उसने पलटकर सवाल किया, “सर, मीरा, महादेवी और सुभद्रा ने भी तो लिखा हैं, मैं क्यों नहीं लिख सकती हूँ? बुआ जी तो ख़ूब लिखने के लिए कहती हैं। सर बुआ जी ने एक बार आपको अपनी कविताएँ दिखाने के लिए भी कहा था।” “दिखाया क्यों नहीं?” उदय ने उसे देखते हुए सवाल किया था, “देखूँगा और बहुत अच्छा लिखती होगी तो भी तुम्हें लिखने से मना करूँगा। मैंने अपनी बड़ी बेटी को भी कविता लिखने से मना किया था। उसकी कुछ कविताएँ छपी भी थीं। हिंदी की आज की दुनिया, मीरा, महादेवी और सुभद्रा की दुनिया नहीं है। आज साहित्य में लेखक और लेखिका का रिश्ता निराला और महादेवी जैसा नहीं है। अब साहित्य मे निराला नहीं होते हैं, जो होते हैं हँसमुख वाजपेयी और जंकामंका शास्त्री जैसे लोग होते हैं।” उदय ने देखा कि प्रियांशी उदास हो गई थी। उसने हँसते हुए कहा, “अरे तुम तो उदास हो गईं, अच्छा अपनी कविताएँ मुझे दिखाना।” बात बदलते हुए पूछा था, “ख़ैर, तुमने डिजर्टेशन के लिए कोई विषय सोचा है?” “सर सोचा नहीं है, लेकिन बुआ जी कह रही थीं कि निराला पर कोई विषय दे दें।” “ठीक है, एक-दो दिन में बताता हूँ।” उदय ने कहा और राजकुमारी पद्मिनी प्रियदर्शिनी सिंह के बारे में प्रियांशी से कुछ पूछना चाहता था, लेकिन पूछा नहीं। सोचा, प्रियांशी पता नहीं क्या सोचेगी। प्रियांशी के जाने के बाद, सहसा उदय बहुत उदास हो गया था। उसे लगा वह जाती हुई प्रियांशी प्रियदर्शिनी सिंह को नहीं, राजकुमारी पद्मिनी प्रियदर्शिनी सिंह को जाते हुए देख रहा है।

संगीत-संध्या के दो दिन बाद मौखिक परीक्षा थी, इन दो दिनों में यह सोच-सोचकर उदय परेशान था कि राजकुमारी उसके जीवन से दूर चली जाएगी, जहाँ उनके पिता की मर्ज़ी होगी, रुतबा होगा, बराबरी का कोई राजघराना होगा, हाथी घोडे होंगे। राजकुमारी सोने-चाँदी के उस महल में ख़ुद चली जाएगी, राजकुमारी के लिए बहुत आसान होगा यह सब, लेकिन उसके लिए कितना मुश्किल होगा, राजकुमारी उसे भूल जाएगी। उसके प्रेम को भूल जाएगी। मेरे प्रेम का राजकुमारी क्या करेगी। महल के किसी कोने में उसे छिपाकर रख देगी, चाहे महल से बाहर फेंककर भूल जाएगी। राजकुमारी अपनी गृहस्थी के राजपाट में, नए राजा और नन्हे राजकुमारों और राजकुमारियों के बीच उसे याद रखने के लिए वक़्त कहाँ निकाल पाएगी? उदय के लिए एक-एक पल बहुत मुश्किल था।

राजकुमारी का और उसका वाइवा अलग-अलग बैच में था। दोनों वाइवा देकर निकले। राजकुमारी ने उसे पास बुलाया, हाथ पकड़ा और ऊपर सीढ़ी पर लेकर चली गई। उसे देखा, जैसे आख़िरी बार देख रही हो। वह भीतर से बहुत भरी हुई थी। उसकी आँखें झर-झर-झर बह चली थीं। राजकुमारी उसके कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोए जा रही थी। देर तक वे सीढ़ी पर बैठे रहे। राजकुमारी उठी और उसकी ओर देखे बिना चल दी। सीढ़ियाँ खट-खट उतरती हुई प्रेम की सबसे ऊपरी छत से नीचे आ गई थी। जल्दी से बिना इधर-उधर देखे, सीधे अपनी सफ़ेद एंबेसडर में बैठ गई थी। उदय भी पीछे-पीछे दौड़ा था। एंबेसडर तेजी से आगे निकल गई थी, उदय राजकुमारी की एंबेसडर के पीछे-पीछे दौड़ता चला जा रहा था। पागलों की तरह रुक जाओ राजकुमारी रुक जाओ की रट लगाता हुआ। किसी की कोई कातर पुकार, कोई बहुत मद्धिम-सी आवाज़ पीछे से राजकुमारी के कानों तक आ रही थीं। राजकुमारी उसे मुड़कर देखतीं, तो उसे न देख पातीं, न बर्दाश्त कर पातीं। राजकुमारी ने देखा नहीं, लेकिन किसी चीज़ के किसी चीज़ से टकराने की कोई भारी-सी आवाज़ राजकुमारी के कानों तक आई ज़रूर, लेकिन राजकुमारी चाहकर भी पीछे मुड़कर देख नहीं सकी। आगे बढ़ती ही चली गई। सामने से आती यूनिवर्सिटी के चीफ़ प्रॉक्टर की गाड़ी से उदय का एक्सीडेंट्स हो गया था। माथे से ख़ून आ रहा था, हाथ और पैर में भयंकर दर्द हो रहा था, टूट गया था, शरीर में कई जगह चोटें थीं। चीफ़ प्रॉक्टर गाड़ी में मौजूद थे। तुरत उदय को ज़िला अस्पताल पहुँचाया गया। मैं उदय के माता-पिता को ख़बर करना ही चाहता था, उदय की बुआ शहर में आई हुई थीं। हॉस्टल में उससे मिलने के लिए आई थीं, वहीं उनको पता चला। हॉस्टल से लड़के आ रहे थे, उनके साथ अस्पताल में आ गई थीं। ऑपरेशन थिएटर के बाहर बेंच पर बैठकर रोए जा रही थीं। मैंने उनसे पूछा, “पिता जी और माता जी को ख़बर करने के लिए फ़ोन करके झंकार को कह दूँ।” उन्होंने मना किया। अभी नहीं। डॉक्टर ओटी से निकले और कहा कि शाम तक वार्ड में शिफ़्ट कर दिया जाएगा। चीफ़ प्रॉक्टर ने मुझसे कहा, “चलता हूँ, ख़र्च की चिंता नहीं है, मैं हूँ, विश्वविद्यालय करेगा। प्राइवेट वार्ड में शिफ़्ट करने के लिए कह दिया है।” बरामदे में हॉस्टल के तमाम लड़के चीफ़ प्रॉक्टर को घेरकर खड़े थे। उन्हें जाने नहीं दे रहे थे। रात में फिर आने का वादा करने के बाद चीफ़ प्रॉक्टर को जाने दिया था।

बुआ जी, बरामदे में रखी बेंच पर अब तक सुबक रही थीं। उनके बग़ल में एक उजली-धुली परी-सी लड़की आकर खड़ी हो गई थी और चुपचाप ऑपरेशन थिएटर के दरवाज़े को देखे जा रही थी, उदय को स्ट्रेचर पर लाया जा रहा था, तो वह पीछे-पीछे चल रही थी, जैसे कोई क़रीबी हो, मेरा सारा ध्यान उदय में था, मैं उसे पहचान नहीं पा रहा था। उदय के प्राइवेट वार्ड में शिफ़्ट हो जाने के बाद वह चुपचाप चली भी गई थी। 

उदय के जीवन में बहुत-सी चोटें थीं, दुख ही दुख थे। कुछ दुख अपने थे, कुछ ज़माने के और हिंदी के तो असंख्य दुख थे। प्रेम का दुख भीतर रहता था, उसके हृदय के किसी कोने में दुबककर पड़ा रहता था। सोता रहता था, तन्हाई में जागता रहता था, रोता रहता था। ज़माने का ग़म दिमाग़ में खदबदाता रहता था। हिंदी का दुख तो उसके पूरे वुजूद को मथ देता था। वह कोई राजनीतिक एक्टिविस्ट नहीं था। ख़ुद को साहित्य का एक्टिविस्ट मानता था। सोशल मीडिया ने उसे विकल्प दिया था कि पुरस्कार के विरोध में आंदोलन चला सके। कुछ लेखकों को उससे जोड़ सके। नई उम्र की लेखिकाओं को हँसमुख गैंग, जंकामंका गैंग और दूसरे छोटे-छोटे गैंगों से सावधान कर सके। उन्हें बता सके कि आगे खड्ड है, ख़तरा है, हिंदी के राक्षस तुम्हारी कविता देखने और सुनने का अभिनय करेंगे, उनका अस्ल काम तुम्हारी कविता का मूल्यांकन करना नहीं होगा, वे तुम्हारी देह का मूल्यांकन करेंगे। तुम्हारे उभार और गोलाइयाँ देखेंगे। वे गैंग के भीतर बाक़ायदा तुम्हारे देह की चर्चा करेंगे। वे कविता में प्रमोट करने के लिए, तुमसे तुम्हें चाहेंगे। उदय, सोशल मीडिया में बार-बार लिख-लिखकर कर यूपी, बिहार और हिंदी प्रदेशों की सभी कमउम्र लेखिकाओं-बेटियों को आगाह किया करता था। यूपी-बिहार की कई युवा लेखिकाएँ दिल्ली में स्त्री-विमर्श का बिगुल बजा रही थीं। पुरुष लेखक पीछे से उन्हें धक्का दे रहे थे। वे क्रांति के हिमालय पर चढ़ने के सुख का अनुभव कर रही थीं। गाँव पर उनकी माँएँ, बुआएँ, मौसियाँ और बहनें उन्हें छठ पर याद करती थीं, तो उनका स्त्री-विमर्श उनकी माँओं, बुआओं, चाचियों, मौसियों और चचेरी, ममेरी, फुफेरी बहनों के रास्ते में आ जाता था। वे भूल जातीं कि किसी विमर्श ने नहीं, उन्हें उनकी माँ ने पैदा किया है। कुछ बच्चियाँ तो छठ के दिन पैदा हुई होंगी। मुझे याद है कि उदय तो गणेश चतुर्थी के दिन पैदा हुआ था। माँ व्रत थीं और वह माँ को प्रसाद के रूप में मिल गया। 

उदय ने अपनी लाल डायरी में लिखा था :

“हमने गाँव या क़स्बा, इसलिए नहीं छोड़ा कि वहाँ के लोग बुरे थे, हमारे माँ-बाप भाई-बंधु, पट्टीदार, मित्र और पड़ोसी बुरे थे। इसलिए भी नहीं कि वहाँ के खेत-खलिहान, बाज़ार, गलियाँ, राहें, नदियाँ-नाले, वृक्ष-वनस्पतियाँ और पूरी प्रकृति बुरी थी, बल्कि इसलिए कि हमारे पास शिक्षा और जीविका के साधन और अच्छे अवसर नहीं थे या बहुत कम थे। आज भी स्थितियों में कम बदलाव  हुआ है। मेरी माँ, मेरी बुआ मुझे गोद में लेकर किसी फ़ोटो या थान या मंदिर में देवी-देवता के सामने बाबा और देवीमाता कहकर शीश झुकाने के लिए कहती थीं। मैंने पैदा होते ही किसी प्रयोगशाला में प्रयोग करके नहीं देखा कि ईश्वर है या नहीं है। सच तो यह कि आज भी ईश्वर में माँ-बुआ और माँ-बुआ में ईश्वर देखता हूँ। जब मैं किशोर हुआ तो किशोर और युवा दिनों की संधि में एक ओर राहुल सांकृत्यायन का ग्रंथ ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ मेरे हाथ लग गया। उसे पढ़ने के बाद कुछ बदलाव हुआ। प्रथम साहित्य गुरु सच्चिदानंद मिश्र ने मेरे दिमाग़ को पूरी तरह बदल दिया था। मैंने मान लिया कि ईश्वर नहीं है, लेकिन माँ-बुआ के सामने उनका लाड़ला बना रहा। उनके साथ मंदिर जाता, तो शीश अपने आप झुक जाता। यह स्वभाव बन गया था, उनके बिना भी ऐसी जगहों से गुज़रता, तो भी शीश झुक जाता। मुझे आज भी लगता है कि शीश में दिमाग़ भले मेरा हो, शीश आज भी मेरी माँ-बुआ का है। अस्ल में अपनी गोद में लेकर उन्होंने मेरे सिर पर इतना सरसों का शुद्ध तेल लगाया है कि यह उनके नाम रजिस्टर्ड हो गया है। आशय यह कि किताबें दिमाग़ में जगह बनाती हैं, लेकिन माँ-बुआ से मिले संस्कार हमारी आत्मा पर। दिमाग़ के जाले साफ़ किए जा सकते हैं, लेकिन आत्मा की पृथ्वी पर हम झाड़ू नहीं लगा सकते हैं। मुझे लगता है, जो लोग आस्था का आँख मूँदकर विरोध करते हैं, बेईमान लोग हैं। भ्रष्ट कोई भी हो सकता है, लेकिन चोर हो तो उतनी पीड़ा नहीं होगी, जितना सिपाही के भ्रष्ट होने पर होगी। मैंने हिंदी की दुनिया में संघर्ष किया है। मैं अकेला होता था और सामने हिंदी के बीस भ्रष्ट, उन बीस में कुछ पक्के मार्क्सवादी भी। कितनी पीड़ा मुझे हुई होगी, अनुमान किया जा सकता था। जब विचारधारा अपने प्रोफ़ेसर अनुयायियों को कायर, डरपोक, बेईमान, स्वार्थी, मक्कार वग़ैरा होने से रोक नहीं सकती है; तो आज की तारीख़ में कितनी प्रासंगिक हो सकती है? जैसे सवाल परेशान करते थे। मुक्तिबोध बार-बार याद आते, उनकी कविता भूल-ग़लती का ज़ंजीरों में जकड़ा ईमान याद आता था। अकेले ख़ूब लड़ा। अकेलेपन के उस समय में जब माँ-बुआ की गोद भी सुलभ नहीं थी। वे थीं ही नहीं, तो उन्हीं जगहों पर गया, जहाँ वे ले जाती थीं, शीश झुकाया, शक्ति की कामना की। आशय यह कि कोई भी विचारधारा और विमर्श मृत है, जब तक उसके अनुयायियों में ईमान की प्रतिष्ठा न हो। इससे भी ज़रूरी बात यह कि कोई भी विचारधारा जीवन से ऊपर नहीं है, जीवन के सहायक के रूप में उसकी उपयोगिता है। इसलिए विचारधारा का मज़बूत होना तब तक पाखंड है, जब तक हमारा जीवन मज़बूत न हो। जीवन हम सिर्फ़ क्षण में नहीं जीते हैं, एक परंपरा में जीते हैं, घर और समाज की परंपरा में। हम अपने जीवन से कभी भी अपने गाँव-क़स्बे, घर-परिवार और नाते, काट नहीं सकते हैं।

ओ नई लेखिकाओ, मेरी बच्चियो, तुमने देखा होगा कि विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में लंबी सेवा के बाद भी आज तक मन से शहराती नहीं हो पाया। साहित्य में भी सब कुछ फटकार कर कहने का देहातीपन आज भी मेरे साथ है। छठ बिहार का पर्व है, मैं उत्तर प्रदेश का हूँ, लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश सामाजिक स्तर पर एक घर के दो हिस्से हैं। शादी-ब्याह, दवा-दारू, पढ़ाई-लिखाई, जीविका वग़ैरा का रिश्ता है, दोनों में। समझ लो कि गंज गोबरहवा, गोरखपुर देवरिया कुशीनगर, आधा उत्तर प्रदेश है, आधा बिहार। यह अलग बात है कि दिल्ली के बिहार के लेखक मुझे पूरा उत्तर प्रदेश का समझते हैं। ख़ैर, इसे छोड़ो। साहित्य में स्वतंत्र जीवन जियो। साहित्य में बेईमान लेखक उम्र में बड़ा हो तो उसका भी मर्यादित दूरी के साथ शिष्टाचारवश सम्मान करो, लेकिन कोई ईमानदार लेखक जो साहित्य में मूल्यों और ईमान के लिए संघर्ष कर रहा हो, उसका सम्मान न करो तो भी कोई बात नहीं, न तो ख़ुद उसका अपमान करना, न उसका अपमान करने वालों के साथ रहना। लेखक का यह जीवन अच्छे और विश्वसनीय साहित्य के साथ रहने के लिए मिला है। मेरी बेटी की उम्र के आस-पास की होगी, भतीजी की उम्र से छोटी होगी। मिट्टी के इस रिश्ते से तुम सबसे मुख़ातिब हूँ। आज गंज गोबरहवा में भी छठ की धूम है। दिल्ली में रहकर भी अपने मन को अपनी-अपनी माँओं, बुआओं, चाचियों, मौसियों और चचेरी, ममेरी, फुफेरी बहनों के पास भेज सकती हो। उनके साथ अपना बचपन जी सकती हो। अपना स्वाभाविक जीवन जी सकती हो। गाँव-जवार के रिश्ते से तम्हारे बड़का बाऊ जी, बड़का चाचा, चाहे उदै काका की ओर से बहुत स्नेह। बहुत आशीष बच्चो। छठ की मंगलकामनाएँ।” 

रिटायरमेंट का साल जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा था। उदय को हिंदी विभाग से अपने बेमेल रिश्ते का दुख बहुत साल रहा था। आख़िरी साल में तो और भी परेशान हो गया था। हिंदी के योद्धा के रूप में तीस साल की ज़िंदगी जीने के बाद रिटायर होने का समय बिल्कुल पास आ गया था। इस साल बिजली बहुत जाने लगी थी। गर्मी बहुत पड़ने लगी थी। शुरू से ही उदय अपने कमरे की खिड़की और दरवाज़ा खोलकर बैठता था। कुछ तो हवा आएगी, इस उम्मीद में, लेकिन हवा, गर्मी, धूप, ठंड, कुछ भी उसके मन से नहीं आती-जाती थी। बल्ली और हौदा ने विभाग ही नहीं, विभाग के मौसम को भी अपने अनुकूल कर लिया था। उदय को हर जगह अकेले लड़ना होता था। जंकामंका का पूरा गैंग था। गैंग के लोग गर्मी में अपने कमरे में नहीं, जंकामंका सर के कमरे में बैठते थे और जेठ में एसी की ठंडी-ठंडी हवा खाते थे। उदय अपने कमरे में बैठा रहता था। लू चले, आग बरसे, कुछ भी हो जाए। तड़-तड़ पसीना चूता रहता था। रूमाल से पोंछता रहता था। हर मुश्किल, हर चुनौती में कहने के लिए उसके पास बहुत कुछ होता था। दरअस्ल, अकेले में उसकी डायरी उसकी विश्वसनीय साहित्यक मित्र होती थी। पसीने में क़लम डुबो-डुबोकर लिखता जाता था : 

“हे महाकवि, क्या चित्तौड़ और क्या गंज गोबरहवा! कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। जेठ दसों दिशाओं से आग उगल रहा है... जेठ जरै जग चलै लुवारा / उठहिं बवंडर परहिं अंगारा / बिरह गांजि हनुवंत होइ जागा / लंका दाह करै तनु लागा / चारिहु पवन झकोरै आगी / लंका दाहि पलंका लागी / दहि भइ साम नदी कालिंदी / बिरह क आगि कठिन अति मंदी / उठै आगि औ आवै आंधी / नैन न सूझ, मरौ दुख बांधी / अधजर भइउं, मांसु तनु सूखा... हे बाबा, अंतिम सीढ़ी पर चढ़कर अट्टहास करता हुआ जेठ पूरे शहर को, पूरे पूर्वांचल को प्रकृति के सुपर ओवन में उलट-पुलट कर भून रहा है... अधजर नहीं पूरा का पूरा और तन का मांस सूख नहीं रहा है, बल्कि जलकर पूरा काला हो गया है। ऐसे में यह संटी सुकुल भला जेठ का क्या बिगाड़ सकता है। जब मंत्री, सांसद और विधायक जेठ का कुछ बिगाड़ ही नहीं पा रहे हैं तो फिर किसी और की क्या बिसात। ये बड़े-बड़े नेता लोग बिजली और पानी का पुख़्ता इंतज़ाम तो कर ही नहीं पा रहे हैं, जेठ की आग से क्या ख़ाक बचाएँगे। हे महाकवि चित्तौड़ में एक नागमती के लिए आप कितना दुखी होते हैं, यहाँ तो जिसे देखिए वही नागमती है—वृद्ध, अधेड़, बच्चे, पुरुष, लड़के, स्त्री, पशु और पक्षी, सभी विलाप और विरह में आकंठ डूबे दिखते हैं। पूरा पूर्वांचल नागमती है जिसका राजा विद्युतसेन उर्फ़ राजा बिजली सिंह रूपी रत्नसेन जब तब किसी सियासी पद्मावती के चक्कर में विरह के कोड़े मार-मारकर चला जाता है... सोचिए संटी ने भले कोई महाकाव्य नहीं लिखा है, पर क्या उसका दुख किसी से कम है? काश, आपने बिजली को और बिजली से चलने वाले लोहे के पंखों, फ़ाइबर के कूलरों और जगह-जगह लगे हुए कलेजे के टुकड़े जैसे एयर कंडीशनरों को देखा होता : तब आप विद्युत विरह के दुख का ठीक-ठीक अनुमान कर पाते। हे बाबा आपने तो यहाँ के सांसदों और विधायकों को भी नहीं देखा है, जहाँ तक देखने की बात है आपने यहाँ की जनता को और इस नाचीज़ को भी नहीं देखा है। आपने तो अलाउद्दीन को देखा है। राघव चेतन को देखा है। गोरा बादल को भी देखा है। आइए और देखिए कि कैसे कई वर्षों से चौबीस घंटे में तोड़-तोड़कर कई हिस्सों में आधे से भी कम समय बिजली रहती है और आधा से ज़्यादा वक़्त बिजली के विरह में पसीनारूपी आँसू बहाते बीतता है। बावजूद इसके पिछले साल की तरह ही सही बिजली की क़िल्लत के लिए कोई बड़ा आंदोलन इस बार नहीं होता है। अलबत्ता कुछ नौजवान छिटपुट रास्ता जाम करने की कोशिश करते हैं, पर पूरा शहर जाम नहीं हो पाता है। व्यापारी विरोध में दुकानें बंद करते हैं, पर शहर में बड़े-बड़े राजाओं का आना बंद नहीं हो पाता है। मित्र झंकार की यह प्रतिक्रिया ग़ौरतलब है : “ये बिजली क्यों काटते हैं, सीधे नागरिकों का गला क्यों नहीं काट लेते? आजादी के इतने सालों बाद देश की जनता को रूखा-सूखा खाकर और फटा-पुराना बिछाकर थोड़ी सी चैन की नींद सोने भर की बिजली नसीब नहीं!”

एक तो बिजली की क़िल्लत का महादुख, दूसरे जलस्तर का काफ़ी नीचे खिसक जाना और पारे का पैंतालीस के आस-पास गिद्ध की तरह लगातार मँडराते रहना, क्या यह सब शुभ लक्षण है—किसी शहर के लिए? अपना गंज गोबरहवा भी कभी ख़ूबसूरत और गुलाबी ठंड और मामूली गर्मी वाले शहर के रुप में जाना जाता था। ताल और पोखरों के शहर के रूप में इसकी पहचान होती थी। आज सब पाट-पाटकर आवासीय कॉलोनियों का जाल बुन दिया गया है। अँग्रेज़ों के ज़माने में यह शहर जो निचले क्रम का हिल स्टेशन हुआ करता था, अब आग का शहर है, ठंड का शहर है, सैलाब का शहर है। गर्मी पड़ेगी तो रिकार्डतोड़, ठंड पड़ेगी तो बर्फ़ को शर्मसार करती और सैलाब आएगा तो पूरे शहर को डरा देगा। 

प्रचंड गर्मी तो सामने है बाबा! पहले के एक कवि विद्याधर विज्ञ ने लिखा था—“धरती पर आग लगी, पंछी मजबूर है... क्योंकि आसमान बड़ी दूर है।” पर अब तो बाबा धरती से बचकर पंछी आसमान में भी नहीं जा सकता, क्योंकि धरती आग उगलती है और आसमान आग बरसाता है। धरती और आसमान के बीच आग की इस त्रासदी में जगह-जगह सार्वजनिक स्थानों पर बर्फ़ और बेल के शरबत से लोगों का गला तर करने वाले ख़ुद अपने लिए छाया की तलाश में भटकते हैं। रिक्शावाले हुड चढ़ाकर या सीट के नीचे पसरकर नींद की माँद में जाना चाहते हैं। ट्रैफ़िक चौराहों पर तैनात होमगार्ड थक-हारकर और जीवन के ट्रैफ़िक को गर्म हवाओं के अंधड़ से अस्त-व्यस्त कर देने वाली क़ातिल ‘लू’ के सामने से हटकर अपने जीवन की रक्षा करते हैं। क्या आदमी और क्या पंछी सब मजबूर हैं! पानी की जो टंकी पंद्रह मिनट में भर जाती थी, वह अब तीस मिनट से ज़्यादा वक़्त लेती है। जो मियाँ घर में एक गिलास पानी भी ख़ुद लेना पसंद नहीं करते थे, अब मुहल्ले के इंडिया मार्का पंप तक दौड़-दौड़कर बाल्टी पर बाल्टी पानी लेते देखे जा सकते हैं। कई प्रवेश-परीक्षाओं के दबाव में किशोर-किशोरियाँ, युवक और युवतियाँ दिन-रात तड़-तड़ चूते पसीने और चिपचिपाहट के साथ ख़ासा तंग करती घमौरियों से हलकान हैं। धूप सिर पर हथौड़े की तरह चोट करती और बेहतर भविष्य और बेहतर दुनिया की उम्मीद में रास्ते पर बिछी आग पर क़दम बढ़ाते ये युवा! हे महाकवि, कितना कठिन है—इस शहर के बच्चों का जीवन? तरबूज़, लीची, बेल, आम और खीरे सब के दाम पारे को मुँह चिढ़ाते!

टीन-टप्पर और एक-एक कमरे के छोटे-छोटे मकानों में रहने वाले छोटे-छोटे बच्चों की उल्टी, दस्त और बुख़ार से परेशानहाल बेबस माँएँ और काम पर गर्मी से बेकाम बाप। आग से लड़ेंगे नहीं तो बच्चे खाएँगे क्या? जिनके घरों में कई कूलर और एयर कंडीशनर हैं, उनके बच्चे भी कम साँसत में नहीं हैं। कम साँसत इस भयंकर गर्मी में नई-नवेली दुल्हनों की भी नहीं है। हे महाकवि उन दुल्हनों के दुख का वर्णन कैसे करें जिनकी विदाई किराये की उन कारों में हुई, जिनमें या तो ए.सी. नहीं था या था तो ख़राब था और ससुराल में बिजली और इन्वर्टर के बिना सास-ननदों और दूसरी औरतों के बीच ‘नफ़ीस दुल्हन या अज़ीज़ दुल्हन’ की जगह पसीना दुल्हन के नाम से नवाज़ी गईं। जेठ की इस क्रूरता और ग़ुंडागर्दी को ख़त्म करना क्या, यहाँ की सेना और तमाम बल, किसी के वश में नहीं। जिनके वश में हैं, उन्हें गर्मी में कीड़े-मकोड़ों की तरह भुन रहे मामूली लोगों से फ़िलहाल कोई मतलब नहीं। जब रोम जल रहा था वहाँ का राजा चैन से वंशी बजा रहा था। यह शहर जल रहा है और यहाँ के कई-कई राजा चैन की वंशी बजा रहे है। इस गर्मी में आम आदमी का वश चलता तो वे भी घर से बाहर नहीं निकलते; पर बच्चों के लिए नौकरी के लिए, आग से लड़ने को तैयार रहते हैं। 

हे महाकवि जिन्हें इस शहर से इश्क़ है, वे इसे छोड़कर कहीं जा भी तो नहीं सकते। शायद इस शहर से इश्क़ करने वालों ने ख़ूब सोच-समझ कर इश्क़ किया है, कहते हैं कि जिगर मुरादाबादी से पूछकर किया है, “ये इश्क़ नहीं आसाँ, बस इतना समझ लीजे / इक आग का दरिया है और डूब के जाना हैं...” यह जेठ भी प्रेम करने वालों का भला क्या बिगाड़ सकता है। कथा-माफिया राजेंद्र यादव की कहानी ‘छोटे-छोटे ताजमहल’ के नायक-नायिका जून की ऐसी ही प्रचंड दुपहरी में ताजमहल परिसर में मिलने का वक़्त तय करते हैं। प्रेम करने वाले आग से कभी नहीं डरते। बिजली को राजा विद्युतसेन उर्फ़ राजा बिजली सिंह की जगह बिजली रानी ही मानकर चलें तो कहना यह कि किसी और से प्रेम करना और बात है और बिजली रानी से प्रेम करना और बात। जान साँसत में डालना है, रात-रात भर जागते रहना है। बिजली के इंतिज़ार में करवटें बदलते या पीठ खुजाते वक़्त बीतता है और जब आ जाती है तो इस डर में हलकान रहना पड़ता है कि अभी चली जाएँगी बिजली रानी। इंतिज़ार में जगना और फिर इस डर में न सो पाना कि बस अभी चली जाएँगी, कितना मुश्किल है और कितना त्रासद! काश महाकवियों और उस्ताद शाइरों ने इस विरह और ख़ासतौर से हरदम गरदन पर तलवार की तरह लटकते हुए विरह को देखा होता और महसूस किया होता तो यह न लिखते कि जो चार दिन माँगकर लाए थे, उसमें से दो तेरे इंतिज़ार में कट गए और दो तेरी आरज़ू में... बल्कि कहते यह कि कुछ तेरे इंतिज़ार में कटे और कुछ इस डर में कि अभी चली जाएगी। आरज़ू से डर तक का यह सफ़र कविता ही नहीं, जीवन के लिए भी कितना कठिन और तकलीफ़देह है। ग़नीमत यह कि इस माफिया जेठ के भी जाने के दिन आख़िर  आ ही गए। यह जेठ भी अब गया तब गया, आषाढ़ दस्तक दे रहा है। आ गया है। महाकवि कुछ आया नहीं है तो वह बादल है... काले-काले कजरारे बादल... झूम-झूमकर कई-कई दिन बरसने वाले बादल... घड़ी दो घड़ी बरसकर चले जाने वाले फिसड्डी बादल न तो आग की तरह धधकती धरती के होंठों की प्यास बुझा सकते हैं और न इस शहर और पूर्वांचल के चिर विरही जन की आत्मा को तृप्त कर सकते हैं। आकाश की खाची में भर-भरकर कई-कई बार जीवन जल से डब-डब बादलों की बरात चाहिए। हे बाबा क्यों आपकी याद आ रही है बार-बार.. “चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा...” 

जेठ का महीना था। अँग्रेज़ी में जून का। अपनी कर्मभूमि, अपनी संघर्षभूमि, अपनी रणभूमि को हिंदी के क्लीव प्रोफ़ेसरों के हवाले छोड़कर उसे जाना पड़ रहा था। रिटायर होने का दुख नहीं था। बीच लड़ाई में रिटायर होने का दुख था। चाहे उसने बल्ली की बल्ली को तोड़कर उसके पाजामे में डाल दिया था। उसकी राजनीति को ख़त्म कर दिया था। अब वह शिक्षक संघ का फ़र्ज़ी अध्यक्ष भी नहीं रह गया था। उसकी मल्लिका भी अगले साल रिटायर होने को थीं, हालाँकि जिस्मानी तौर पर कई साल पहले रिटायर हो चुकी थीं। आँखें और मुँह खोलती थीं तो बल्ली को अभी  भी उनमें से फूल झड़ते हुए दिखते थे। नहीं-नहीं, फ़राज़ ने इस बूढ़ी और निष्प्रयोज्य मल्लिका को देखकर नहीं कहा होगा कि बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं... बल्ली की अध्यक्षी चली गई तो चली गई। सोचता, जंकामंका सर हैं, तो फिर कोई गद्दी मिल जाएगी। 

आख़िरी दिन पाँच बजते-बजते उदय ने विभाग छोड़ दिया था। विभाग के चैनल गेट से बाहर होकर जैसे ही कुछ क़दम चला होगा, उसके पैर आप से आप रुक गए। पश्चिम से लंबे-लंबे दरख़्तों की परछाईं विभाग के सामने वाले हिस्से में पड़ रही थी। सीता अशोक के पेड़ के पास खड़ा होकर विभाग की बिल्डिंग को निहारने लगा था। आँखें नम हो गई थीं। बुदबुदाते हुए ख़ुद से कह रहा था, जाने से पहले बल्ली की राजनीति को मिट्टी में मिला तो दिया, लेकिन जंकामंका की साहित्यनीति को मिट्टी में मिलाने का काम बाक़ी हैं। यहाँ नहीं, तो कोई बात नहीं। सोशल मीडिया है। जब तक साहित्य में अँधेरा है, लड़ाई कभी ख़त्म नहीं होगी। बुदबुदाते-बुदबुदाते, सोचते-सोचते एट हंड्रेड तक आ गया था। अंदर बैठने को हुआ, तो दौड़ते-दौड़ते विभाग का चपरासी उसकी डाक लेकर आ गया। उसने कहा, “आगे से किसी से भिजवा दिया करना।” जी सर कहकर, चपरासी ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। बड़ी आत्मीयता से उसे देखते हुए उससे कहा था, “बिटिया की शादी तय हो गई है, आना ज़रूर।” जी सर कहते हुए चपरासी की आँखें नम हो गई थीं। उसकी भी। 

सोशल मीडिया ने लेखकों के लिए एक ऐसा प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध करा दिया था; जिस पर हर लेखक, संपादक भी था, आलोचक भी था, पाठक भी था। कवि तो था ही था। उदय ने इस प्लेटफ़ॉर्म को हिंदी साहित्य के इलाक़े में एक बड़े आदमक़द आईने में तब्दील कर दिया था। हर बुरे लेखक को, हर बुरी प्रवृत्ति को, साहित्य के हर बुरे केंद्र को आईना दिखाता था। उदय ने रिटायर होने के बाद आख़िरी पारी में ग़ज़ब यह किया कि अपनी कविता से आलोचना और आलोचना से कविता का काम लेना शुरू कर दिया था। हर चोट, निशाने पर। सच को फटकारकर कहने की आदत उसे पहले से थी। इधर साहित्य के बेईमानों की आँख में उँगली डालकर सच दिखाने लगा था। टेंटुआ पकड़कर कहता था कि लो अपनी शक्ल इस आईने में देख लो।

देश में साहित्य की सबसे बड़ी अकादेमी, साहित्य के राष्ट्रीय केंद्र की जगह किसी छोटे शहर के किसी मुहल्ले की अकादेमी बन गई थी। जो अकादेमी नेहरू का ख़्वाब थी, वह जंकामंका शास्त्री के व्यभिचार में बदल गई थी, फ़रेब में बदल गई थी। हुआ यह था कि जिस अकादेमी में पहले आला दर्जे के लेखक आते थे, वहाँ हिंदी के कुत्ते-बिल्ली आने लगे थे। जंकामंका शास्त्री ख़ुद आला दर्जे के लेखक नहीं थे। कहना चाहिए कि बहुत नीचे पाये के लेखक थे। उनके गैंग में उनसे भी नीचे लेखक थे, बल्कि कहना चाहिए कि आधे से अधिक ऐसे थे, जो लेखक ही नहीं थे। बल्ली, हौदा वग़ैरा तमाम लोग अलेखक थे। उदय ने तो बल्ली, हौदा वग़ैरा को ध्यान में रखते हुए अलेखक पद बनाया था, जो हिंदी में चल गया। अलेखक भी दूसरों को अलेखक कहने लगे थे। हद तो तब हुई, जब जंकामंका ने बल्ली को अपने दंद-फंद से साहित्य अकादेमी का उपाध्यक्ष बनवा दिया। इसके एवज़ में इससे भी बड़े गावदी को अध्यक्ष बनाना पड़ा था।

साहित्य अकादेमी, जो साहित्य के शक्तिकेंद्रों में शीर्ष संस्था के रूप में प्रतिष्ठित थी, जंकामंका के पोतड़े में बदल चुकी थी। देश भर के चवन्नियाँ लेखक-अलेखक कार्यक्रमों में बुलाए जाने लगे थे। अकादेमी चूतिये कवियों को चीन में हिंदी कविता पढ़ने के लिए ले जाने लगी थी। ये वे कवि थे जिन्हें शहर तो छोड़िए, उनके मुहल्ले में ही कोई कवि नहीं मानता था। यहाँ तक कि इन कवियों को लोग ट्रक ड्राइवरों से भी ख़राब कवि कहते थे। सोचिए कि जंकामंका के शहर में उदय जैसा हीरा कवि था और ये चूतिये-चपाड़ियों से साहित्य अकादेमी में कविता पढ़वाते थे। उदय को अकादेमी के मामले में उतना ग़ुस्सा जंकामंका गैंग पर नहीं था, जितना दिल्ली के मशहूर सिंह गैंग, हँसमुख गैंग वग़ैरा जितने गैंग थे; इन गैंगों पर था कि ये साले कर क्या रहे थे, लाड़ चाट रहे थे क्या कि गंज गोबरहवा से एक गैंग आया और इनके चूतड़ के नीचे हाथ डालकर साहित्य अकादेमी को खींच ले गया।

जब देश की सबसे बड़ी अकादेमी का यह हाल था, तो छोटे शक्तिकेंद्रों की दशा और भी ख़राब थी। शीशमहल पब्लिकेशन ग्रुप, रंगमहल पब्लिकेशन ग्रुप, ताजमहल पब्लिकेशन ग्रुप, नयू पब्लिकेशन ग्रुप, संसारचंद एंड संज वग़ैरा पब्लिकेशन हाउस कुत्ते-बिल्लियों के कविता-संग्रह धड़ाधड़ छापते जा रहे थे। लेखक संगठन इन शक्तिकेंद्रों की पालकी के पिछले कहार बन चुके थे। इन्हें साहित्य के स्तर और मूल्य से कुछ नहीं लेना-देना था। भारत भवन, साहित्य की भारत-दुर्दशा बन गया था। नक़लची कवि और अतिप्रशंसामूलक आलोचक, दोनों भारत-भवन की साहित्य की दीवारों पर अपना-अपना गोबर पाथ रहे थे। गंज गोबरहवा के गोबर पाथने वाले प्रोफ़ेसरों को फ़ेल कर रहे थे। साहित्य में जितना भी दुष्कर्म किया जा सकता था, साहित्य के शक्तिकेंद्र कर रहे थे। अपने शहर के सिर्फ़ आठ-दस किलोमीटर के भीतर रहने वाला लेखक ही नहीं, जो साढ़े आठ सौ किलोमीटर दूर है, ग्यारह सौ किलोमीटर दूर है, चाहे और दूर है, दूसरे शहर का लेखक, साहित्य को नुक़सान पहुँचा रहा होता था, तो उदय के ग़ुस्से का सबब होता था। 

ग़ुस्सा, ग़ुस्सा, ग़ुस्सा... सोशल मीडिया पर जैसे ही लेखकों को नंगा होते हुए देखता था, ग़ुस्सा हो जाता था। उसका ग़ुस्सा; उसका दोस्त तो था, लेकिन उसकी सेहत का दुश्मन था। डॉक्टर कहते कि ग़ुस्से को क़ाबू में रखें। ऐसी चीज़ों से बचें, जिससे ग़ुस्सा आता है। दस बीमारियों ने उसे जकड़ लिया था, सुबह-शाम दस गोलियाँ खाने के बावजूद ग़ुस्सा अपनी जगह अडिग था। जैसे वह ग़ुस्सा नहीं होगा, वह नहीं फटकारेगा तो हिंदी साहित्य की इमारत ढह जाएगी। हिंदी की नई और लहलहाती हुई फ़सलों में आग लग जाएगी। झोपड़ी जल जाएगी। साहित्य का दर्पण चूर-चूर हो जाएगा। कभी-कभी मैं सोचता, झंकार और बीदास से भी बात करता कि उदय अपने को हिंदी का अंतिम लेखक क्यों मानता है! दूसरे लेखक भी आएँगे। जो हो सकता है, वह करे, जो नहीं हो सकता है, उसके लिए जान देना तो अच्छी बात नहीं हैं। वह ख़ुद को हिंदी का भगत सिंह क्यों समझता है? अपनी जान को नुक़सान क्यों पहुँचाना चाहता है? यह जान सिर्फ़ हिंदी के लिए है? उसके बच्चों के लिए नहीं है? उसके बच्चों के बच्चों का उस पर और उसके वक़्त पर हक़़ नहीं है? नातिनें और पोतियों को अपना नाना और बाबा चाहिए, सही सलामत चाहिए। टूटा-फूटा नहीं चाहिए। पत्नी ने कभी भी अपने शौहर के जुनून और काम में बाधा डालने की कोशिश नहीं की। हर आँधी-तूफ़ान में, हर मुश्किल में, हर ज़रूरत में, बच्चों के लिए ढाल ही तरह खड़ी रही। बच्चों की पढ़ाई, दवाई, घुमाई-फिराई सब देख लेती थी। कभी-कभी सोचता हूँ, ऐसे जुनूनी लेखकों की बीवियाँ, झाँसी की रानी जैसी क्यों बन जाती हैं? सभी लेखकों की बीवियाँ ऐसी क्यों नहीं होती हैं? ऐसी होतीं भी तो, क्या बेईमान लेखकों को हिंदी का भगत सिंह बना पातीं? हिंदी के कुँओं, बिल्लियों, सियारों की इस दुनिया में वक़्त सबको बड़ी भूमिका नहीं देता है, किसी-किसी को कुछ बड़ा करने का अवसर देता है। ज़रूरी काम करने का मौक़ा देता है। हर कोई कबीर नहीं हो जाता है :

सुखिया सब संसार है, खाए अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागै अरु रोवै॥

आधी रात हो गई थी। एक बजने को था। बाहर हवा साँय साँय चल रही थी। कहीं दूर से एक कुत्ते के रोने की आवाज़ आ रही थी। रुक-रुककर रोये जा रहा था। शायद कोई पीड़ा थी उसे। किसी से कुछ कहना चाह रहा था। कोई उसकी बात नहीं सुन रहा था, सिवाय उदय के। उदय को नींद नहीं आ रही थी। काफ़ी देर से चाह रहा था कि थोड़ी-सी चैन की नींद उसे भी आ जाए। उदासी पूरे कमरे में, बिस्तर पर पसरी हुई थी। उसका भी मन बहुत अशांत था। कोई उसकी पीड़ा को जानना नहीं चाह रहा था, किसी के पास उससे पूछने का वक़्त नहीं था कि इन दिनों तुम्हें हुआ क्या है, इतने उदास क्यों हो, तुम्हारी आँखों में कहाँ से आँसुओं के इतने बादल आ गए हैं और अब-तब में बरसने को हो रहे हैं। बता भी दो उदय शंकर शुक्ल। पूछते ही उदय उससे चिपटकर रोना शुरू कर दे। साहित्य की दुनिया में किसी को उसकी फ़िक्र नहीं थी। इस समय मैं झंकार के गाँव में उसकी बैठक में तख़त पर गहरी नींद में सो रहा था। मैं, झंकार और बीदास, कोई उसके पास नहीं था। उसके आस-पास कोई था, तो कहीं दूर रोते हुए एक कुत्ते की आवाज़ थी। उदय को रुलाई आ रही थी। उसका जी कर रहा था कि दौड़कर उस कुत्ते के पास पहुँचकर उससे लिपट जाए। उससे पूछे तुम्हें क्या दुख है। पूरी रात उसके साथ रोता रहे और सुबह होते ही मुझसे बात करे। झंकार से बात करे। बीदास से बात करे। अब सब उसके लिए बर्दाश्त से बाहर हो गया था। वह लेखक समाज की बेहतरी के लिए उन्हीं लेखकों से लड़ रहा था। उसके लिए हिंदी की इस बुरी दुनिया में एक मिनट के लिए भी बने रहना मुश्किल हो गया था। वह ख़ुद को लेखकों की इस दुनिया में मिसफ़िट पाता था। उसे लेखकों से ही नहीं, अपने समय के ग़लीज़ साहित्य से भी वितृष्णा हो गई थी। उसने तो साहित्य से संन्यास जैसा बड़ा क़दम उठाने का निश्चय कर लिया था, लेकिन मैंने, झंकार ने और बीदास ने उसे दौड़ा लिया था। यही तुम कबीर निराला वग़ैरा का साहित्यिक वंशज बनते हो? और उदय, उदय से ऊदल बन गया था। लड़ने और साहित्य में शान से जीने का दूसरा विकल्प नहीं था। जिए या मरे, हिंदी के लिए लड़े बिना मुक्ति नहीं।

बाहर अँधेरे के उमड़ते-घुमड़ते काले-काले बादल उदय को ढाँप लेना चाहते हैं। उसे छिपा देना चाहते हैं। भीतर अँधेरे की सुरंग है। अँधेर की दीवारें हैं। नीचे अँधेरे के नुकीले कंकड़-पत्थर हैं। कितने असाध्य रोग हैं। हीमोग्लोबीन कम है। शरीर थक जाता है। पैर रुक जाते है। चौहत्तर की उम्र में कभी-कभी साँसें रुक-रुक-सी जाती हैं। छोटी बेटी अँधेरे की सुरंग में, अँधेर के बिस्तर पर सीधा लेट जाने के लिए कहती। हाथ पकड़कर सहलाती है। माथा सहलाती है, चूमती है। उसकी मम्मी, अँधेरे की सुरंग में बदहवास भागी चली आती है, कूदती-फाँदती और उदय को इस हाल में देखकर, छाप लेती है। कुछ देर बाद उसकी मम्मी उदय को बाहर ले जाना चाहती है। खुले में ले जाना चाहती है। हवा में ले जाना चाहती है। रोशनी में ले जाना चाहती है। अँधेरे के बिस्तर से उदय उठता है। बेटी सहारा देती है। पत्नी बाँह पकड़ती है। छड़ी के सहारे डग भरता है। अँधेरे के सुरंग के मुहाने पर कुछ बच्चे अंदर झाँक रहे हैं। पुकार रहे हैं, नानू-नानू, बाबा-बाबा। अँधेर के इस कुएँ में उनकी आवाज़ें गूँज रही हैं, नानू-नानू, बाबा-बाबा! सहसा उदय के भीतर शक्ति का विस्फोट होता है और वह छड़ी को फेंककर बाँहें फैलाए हुए लंबे-लंबे डग भरने लगता है।

•••

परिशिष्ट

पत्र-व्यवहार

प्यारे संटी, 

तुम्हारी पांडुलिपि देखी। ग़ज़ब का उपन्यास लिखा है, तुम्हारी कथा-भाषा इतनी अच्छी है कि उपन्यास को राँड का रोना कहने वाले, आचार्य भी इसे पूरा पढ़ेंगे। इसके मार्मिक अंशों को भूल नहीं पाएँगे। मेरी सीमा हो सकती है, लेकिन एक लेखक के आत्मसंघर्ष पर केंद्रित ऐसा उपन्यास, मैंने इससे पहले नहीं देखा है। अलबत्ता, शुरू से अंत तक एक बात मुझे बहुत खटकती रही, ये राजकुमारी-राजकुमारी क्या लगा रखा है? राजकुमारी पद्मिनी प्रियदर्शिनी सिंह कौन है? उदै के शिक्षाकाल के दिनों में कब उसके साथ थीं? उसके जीवन में कभी कोई राजकुमारी नहीं आई थी। मैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ पद्मा को जानता हूँ। 

तुम्हारा 
झंकार

~

प्रिय झंकार, 
तुम्हारा पोस्टकार्ड मिला... 

सच तो यह है कि उपन्यास शुरू करने से पहले उदै ने सख़्ती से कहा था कि ख़बरदार संटी, कड़े से कड़ा सच मेरे बारे में फटकारकर लिख सकते हो, तुम स्वतंत्र हो, जैसा चाहो वैसा लिखो, लेकिन पद्मा के बारे में कुछ मत लिखना, लिखना बहुत ज़रूरी हो, तो इस तरह लिखना कि पद्मा की त्रासदी के बारे में दुनिया कुछ न जाने। मैं नहीं चाहता कि दुनिया, पद्मा को एक दुखी स्त्री के रूप में देखे। वह बहुत मज़बूत थी, उसके भीतर प्रेम की देवी का वास था, लेकिन समय ने उसके साथ ठीक नहीं किया। मुझे अपने प्रेम-पत्रों में ‘मेरे प्रिंस, बहुत प्यार’ लिखने वाली पद्मा के लिए जैसे मैं सचमुच का प्रिंस था, शायद अब भी होऊँगा, उसी तरह मेरे लिए वह तब भी सचमुच की राजकुमारी थी, आज भी राजकुमारी है और हमेशा रहेगी। तुम उसे याद करना, तो इसी रूप में। अब तुम्हीं बताओ झंकार, मैं क्या करता? 

तुम्हारा 
संटी सुकुल

•••

समाप्त...

पूर्वाध्याय यहाँ पढ़ें : एक | दो | तीन | चार | पाँच | छह | सात | आठ | नौ | दस

               

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट