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धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : विश्वविद्यालयों में जुलाई-अगस्त का महीना प्रेम के फूलों के खिलने का महीना होता है

गताध्याय से आगे...

तीन

यह रात बहुत काली रात थी। फिर एक बहुत से बहुत काली रात। ऐसी रातें क्यों आती हैं, जीवन में, समाज में, साहित्य में और साहित्य और समाज में उजाले के लिए ख़ून-पसीना बहाते रहने वाले किसी लेखक के जीवन में। वह पूरी दुनिया के लिए तनाव लेता है। ख़ुद को हद से ज़्यादा हलकान करता है। कभी अपने बारे में कुछ नहीं सोचता है। न उसे कोई सम्मान चाहिए होता है, न यश, न कहीं कोई महत्त्व, वह अपनी ड्यूटी बजाता है और ड्यूटी बजाते-बजाते किसी दिन धड़ाम से पथरीली ज़मीन पर गिर पड़ता है। अपने को रात के किसी अँधेरे कोने में किसी बिस्तर पर असहाय पाता है। जैसे साहित्य का शास्त्र होता है, उसी तरह शरीर का भी शास्त्र होता है। कविता के नियम टूटते हैं, कविता के स्वभाव में कोई बदलाव आता है तो कई बार थोड़ी और अच्छी कविता बन जाती है। कविता का कोई और रास्ता खुल जाता है। थोड़ा और उजाला हो जाता है। शरीर के शास्त्र को नहीं मानते हैं तो उजाले का नहीं, अँधेरे का सैलाब आता है। उम्मीद की रोशनी नहीं आती है, उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच शरीर डोलता है। मन डोलता है। वक़्त डोलता है। जैसे इस वक़्त उदय सर के साथ हो रहा था।  

आनंद नर्सिंग होम के आई सी यू में बेड पर लेटे हुए उदय का बुरा हाल था। प्रिय शिष्य रामकृष्ण कान के पास सांत्वना देता रहता, सब ठीक हो जाएगा सर। गुरुमाता बग़ल की कुर्सी पर बैठी हुई थीं और उनका कलेजा बैठा जा रहा था। उदय के साले डॉक्टर पाण्डेय बार-बार अपने केबिन से आकर आईसीयू के कर्मचारियों से अपने जीजा उदय शंकर शुक्ल के बारे में रिपोर्ट ले रहे थे। अपनी दीदी के कंधे पर हाथ रखकर, कभी माथे का स्पर्श करके तसल्ली दे रहे थे। रहा नहीं गया, तो दीदी को अपने केबिन में ले जाकर बैठा दिया। सलहज भी आकर दीदी के पास बैठ गई थीं और उनका हाथ अपने हाथ में लेकर कह रही थीं, “दीदी सब ठीक हो जाएगा। जीजा जी को कुछ नहीं होगा।” डॉक्टर पाण्डेय के तीनों डॉक्टर बच्चे भी बुआ के पास पहुँच गए थे। आईसीयू में रामकृष्ण अपने पराक्रमी गुरु को असहाय देखकर हताश हो रहा था। उदय के सफ़ेद बालों और दाढ़ी की सफ़ेदी मद्धिम लगने लगती थी। गुरु की आँखें कभी मुँद जाती थीं, कभी खुल जातीं थीं। रामकृष्ण से इशारे से पूछते कि डॉक्टर क्या बता रहे हैं। रामकृष्ण बताता कि डॉक्टर सौरभ सब देख रहे है। ईसीजी देख लिया है। ब्लड की जाँच भी हो गई है। कह रहे हैं, घबड़ाने की बात नहीं है। तब तक डॉक्टर पाण्डेय ने अपने जीजा जी की हथेलियों को अपने हाथ में लेकर कहा, सब कंट्रोल में है। एक-दो दिन यहाँ रोकेगे। साले डॉक्टर पाण्डेय हैं तो डॉक्टर ही, कुछ छिपा तो नहीं रहे हैं, उदय सोचता है। फिर सोचता है, जो होगा, देखेंगे। हताश नहीं होता है। बस ख़ामोश है, चीज़ों को होते हुए अनुभव कर रहा है। उसे लगता है कि यह एक लेखक की अनिवार्य शय्या है, लंबी लड़ाई के बाद का विश्रामस्थल। एक लेखक इस अंजाम तक नहीं पहुँचा तो कहीं नहीं पहुँचा। उदय को लिखी जा रही अपनी बहुप्रतीक्षित किताब की चिंता होती है। सोचता है कि कुछ हो गया तो पूरा कौन करेगा? एक क्षण के लिए ख़याल आता है कि चंदन पूरा कर सकता है, लेकिन वह चंदन से नहीं कहेगा। छोड़ो, आधा हो गया है। ज़रूरी नहीं कि लेखक की हर कृति पूर्ण हो। किसी की कृति को पूर्ण कर पाना क्या संभव है? नहीं, संभव नहीं है। जीवन के अंत में बहुत कुछ मूल्यवान् छूट जाता है। सब छूट जाता है। जो रह जाता है, अगर कुछ मूल्यवान् हुआ तो उसी में कुछ रह जाता है। किताब की चिंता छूमंतर हो जाती है। उसे बच्चों की चिंता होने लगती है। बच्चे बाहर हैं। पास नहीं हैं। साले के बच्चे पास है। शिष्य रामकृष्ण पास है। 

रामकृष्ण आईसीयू से बाहर निकलकर सामने की कुर्सियों पर ब्रजेश मणि और निरंकार के पास जाकर बैठ गया था। ब्रजेश ने पूछा, “आपके यहाँ तो सुबह पेपर होगा।” रामकृष्ण ने कहा, “हाँ! बीए थर्ड इयर का इग्जाम है। नोडल अफ़सर भी हूँ, लेकिन इंतज़ाम हो जाएगा।” रामकृष्ण को इस समय अपने गुरु की परीक्षा की चिंता थी। यह हिंदी साहित्य का कौन-सा प्रश्न-पत्र है, कौन-सी परीक्षा है जिसमें हिंदी के लिए रोज़ एक लड़ाई लड़ने वाला योद्धा आईसीयू में बेड पर हताश लेटा हुआ है। शहर के किसी लेखक, हिंदी विभाग के किसी आचार्य को हिंदी के इस सपूत की चिंता न कभी थी, न आज है। लेखक के शरीर की चिंता कौन करता है। हिंदी की दुनिया लेखक की किताब के बारे में बात करती है, उसके संघर्ष के बारे में नहीं, उसके जीवन के बारे में नहीं, उसके रोग-शोक के बारे में नहीं। किसी कृति को वह जीवन की किस शरशय्या पर लेटकर रचता है, इससे किसी पाठक को क्या फ़र्क़ पड़ता है, किसी आलोचक के दिमाग़ में कोई उथल-पुथल नहीं होती है।

उदय सर घर लौट आए हैं। बेटियाँ और बेटा, सब आ गए हैं। तीनों बच्चे अपने पिता को साहित्य छोड़ देने के लिए कहते हैं। परिवार का साहित्य देखने की बात करते हैं। नाती-पोतों का साहित्य देखने की बात कहते हैं। उदय सर का प्रिय शिष्य रामकृष्ण भी आ गया है। रामकृष्ण भी कहता है, “सर, छोड़िए यह सब। हमारे लिए आपका होना सबसे ज़रूरी है। डॉक्टर सौरभ ने आपसे कहा ही कि अंकल, लेखक होना बुरी बात नहीं है। काग़ज़ पर लिखिए, लिखकर सारी बातें कह जाइए और मेज़ से हटें, तो सब भूल जाइए।” डॉक्टर सौरभ की बातें कानों में अब भी गूँज रही हैं, लेकिन सौरभ को क्या पता कि यह उसके लिए संभव नहीं है। जिसका देश बर्बाद होता है, जिसका समाज, जिसकी भाषा, जिसका साहित्य बर्बाद हो रहा होता है; वह शांत नहीं रह पाता है। वह चुप नहीं रह पाता है। लड़ाई छोड़ नहीं पाता है। बेटियों ने फ़ैसला सुना दिया है—अब आई फ़ोन बंद, आई पैड बंद, लैपटॉप बंद, सोशल मीडिया बंद, सब बंद। सब अपने बच्चों को बुलाते है। ये रही अद्दू आपका आई फ़ोन, ये रही ईशू आपका आई पैड, ये रही भव्या आपका लैपटॉप। सब छोड़ दीजिए पापा। बेटा जब से सात समुंदर पार से आया है, बहुत उदास है। लगता है, अभी-अभी कमरे से रोकर निकला है। बहू सबके लिए चाय बनाकर लाई है। उदय भी चाय पीना चाहता है। कुछ और कहता नहीं है, सिर्फ़ चाय कहता है। दामादों के फ़ोन घड़ी-घड़ी पर आते हैं। गाँव से बचपन के दोस्त झंकार का फोन आता है। फ़ोन उठा लेता है। उसे, “बेहतर हूँ...” कहता है। झंकार आना चाहता है। कहता है, “अब ठीक हूँ, क्यों परेशान होगे।” झंकार डपटता है, “ख़ाक ठीक हो, तुम्हारा दिमाग़ ख़राब है। आता हूँ।” वह कहता है, “आओ!” फ़ोन रख देता है। 

चौदह गुणा सोलह के ड्राइंगरूम का पूरब का कोना, उदय की सबसे प्रिय जगह है। लिखने की मेज़ के सामने बड़ी-सी खिड़की और उसके अगल-बग़ल किताबें ही किताबें और किताबों के बीच उदय की किताबें। लिखने की मेज़ पर लैपटॉप, कुछ काग़ज़, डायरियाँ और बड़ी बेटी की भेंट की हुई बहुत अच्छी क़लम। आईसीयू से आने के बाद कई दिनों से उदय ने लिखने की मेज़ को छुआ नहीं है, बैठना तो दूर। मैं उसकी मेज़ पर हूँ। बीदास और झंकार सोफ़े पर उसका इंतिज़ार कर रहे हैं। उदय आकर दीवान पर चुपचाप बैठा गया है। छोटी बेटी आकर चाचा लोंगों को प्रणाम करती है और चाय सेंटर टेबल पर रख देती है। पापा की ओर देखती है, फिर चाचा लोगों को देखकर कहती है, “अपने फ़्रेंड को समझाइए। बच्चे बहुत ख़फ़ा हैं।” छोटी तो दूसरे दिन पहली फ़्लाइट से आ गई थी। तय कर लिया है कि अपने पापा को सुधार कर जाएगी। बीदास और झंकार भी उसकी क्लास लेने लगते हैं।

 “तुम अपने को समझते क्या हो? कबीर हो, निराला हो, मुक्तिबोध हो? हिंदी साहित्य का ठेका ले रखा है, अपनी जान दोगे?” बीदास शुरू करता ही है कि झंकार फ़ायर हो जाता है, “जंकामंका शास्त्री और उसका गैंग हिंदी के साथ रेप करेगा, तो तुम उन सबका लिंग काट दोगे? उन सबको गोली मार दोगे? इस चूतियापे से निकलो, उदै। हमें हमारा दोस्त चाहिए, यार!” 

बीदास : “ख़रगोश को घोड़ा बना सकते हैं? घोड़े को बाघ बना सकते हैं? सर्प को तितली बना सकते हो? विष को अमृत बना सकते हो? चूहे को आदमी बना सकते हो? फिर इन सालों के लिए अपनी तबीयत क्यों ख़राब करते हो? कुछ समय के लिए तो बच्चों का कहना मान लो। अभी छोड़ो यह सब, इस वक़्त ख़ुद को देखो।”

झंकार : “पहले ठीक हो जाओ। कोरोना के पहले ब्रेन स्ट्रोक से निकले और अब एंजाइना। ग़ज़ब करते हो। क्या चाहते हो यार! तुम नहीं रहोगे तो हम तुम्हारी किताबें लेकर चाटेंगे? भाड़ में जाएँ तुम्हारी किताबें।” 

मैं तो उदय की लिखने की मेज़ के पास बैठकर उसकी लाल वाली डायरी उठाकर देख रहा था। रहा नहीं गया, तो उबल पड़ा, यह जानते हुए कि किसी लेखक से उसकी आत्मा नहीं छीन सकते हैं। साहित्य में उदय के प्राण बसते हैं। उसके लिए साहित्य न तो धंधा है, न रंडी का कोठा, न वह दल्ला। उदै मेरी ओर देखता है, जैसे कह रहा हो कि संटी, तुम भी चाप चढ़ाए बैठे हो। धीरे से कहता है उदय, “ठीक है, बहुत कह चुका हूँ, बहुत लिख चुका हूँ; अब आराम।” झंकार और बीदास घर-परिवार की बातें करने लगते है। नातिनें और पोती आ जाती हैं, सब उनके साथ खेलने लगते हैं।

मैं उदय की लिखने की मेज़ के नीचे से एक और पुरानी लाल-पीले गुलमोहर के फूलों की छाप वाली डायरी उठाकर देखने लगता हूँ। इसे भूला नहीं हूँ, इसी डायरी को कुंजलगढ़ की राजकुमारी पद्मिनी प्रियदर्शिनी ने उदय को उसके जन्मदिन पर भेंट किया था, बल्कि कहना चाहिए कि पहली बार उसके बिल्कुल पास आकर हैपी बर्थडे कहते हुए उसके हाथों में दिया था। मुझे तो याद है, क्योंकि प्रीवियस की बात है, मेरे सामने दिया था। उस डायरी पर उदय के कुछ नोट्स हैं। एमए के दिनों की सुखद व्यक्तिगत स्मृतियाँ हैं। कुछ सूक्तियों में, कुछ वर्णनात्मक... जबकि लाल वाली डायरी में साहित्यनीति और राजनीति विषयक नोट्स हैं। मैं उसे उठा लेता हूँ, नया नोट है : 

“कई दिनों से चुप हूँ। आगे भी तब तक चुप रहना चाहता हूँ, जब तक स्वस्थ नहीं हो जाता। वैसे भी, आज जब सब कविता को समझे बिना कविता पर वाह-वाह कर रहे हों, तो ऐसे में चुप रहना बेहतर है या शोर थम जाए, तब कुछ कहना चाहिए। इशारे में कुछ कहकर फिर चुप होता हूँ। कविता भी एक देह है। जिसका अगला-पिछला, दाएँ-बाएँ, ऊपर-नीचे और चेहरा-मोहरा होता है। आप मुँह से कान का काम नहीं ले सकते हैं और न आँतों से दिल का और न गुदा से दिमाग़ का, न पीठ से मुखड़े का। कविता का नाम भी, मनुष्य के नाम की तरह बेमतलब नहीं रख सकते हैं। कविता क्या कहना चाहती है, वह कौन-सी केंद्रीय बात है जिसे कहने के लिए कवि विकल है और ठीक-ठीक कह पा रहा है, यह पाठक को समझ में आ जाना चाहिए। कविता छुरछुरी, पटाख़ा वग़ैरा नहीं है कि बस आँखों को देखने में सुंदर लगना चाहिए। कविता आतिशबाज़ी नहीं है, बुद्धू! कविता दिल और दिमाग़ को भी पसंद आए, यह ज़रूरी है। आज एक कविता दिखी, जिसकी मुंडी, जिसके हाथ-पैर और जा कहाँ रही है, पता नहीं चला। बहुत माथापच्ची करो, चूरगाँठ बैठाओ, यह सब पाठक का काम नहीं है। एक माँ मुकम्मल बच्चे को जन्म देती है, तो कवि को भी अपनी कविता को पूरा का पूरा समाज को सौंपना चाहिए। पाठक-समाज दोस्त-यार नहीं है कि बिना समझे प्रशंसा करेगा। देखा, कुछ लोग अपने हेली-मेली कवि की कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। शायद ये कवि के हेली-मेली थे या इसलिए प्रशंसा कर रहे थे कि कहीं उन्हें कविता को समझ पाने में अक्षम न समझ लिया जाए। ये साहित्य के ऐसे बैल थे कि यह मान ही नहीं सकते थे कि कवि ही अपनी बात उनसे साफ़-साफ़ कह नहीं पा रहा है। उनकी नहीं, उसकी कमी है। ये बैल हर कवि को कविता का मास्टर समझ लेते थे।”  

मैं उदय की डायरी देखता रहा और इधर झंकार और बीदास की बातों में शाम हो गई। जैसा कि दोस्तों की बातों अक्सर शाम हो जाया करती है। बीदास को निकलना है। बँगले पर कुछ रिश्तेदार रात के खाने पर आने वाले हैं। निकलते हुए झंकार से पूछता है, क्यों झंकार चलोगे? झंकार कहता है, “आज यहीं रुकूँगा। सुबह आऊँगा।” बीदास मना करता है, “सुबह इंस्पेक्शन के लिए निकलना है। गाँव लौटना हो तो सुबह आठ बजे स्टेशन पर मिलो। सैलून में बैठाकर गाँव के स्टेशन पर छोड़ दूँगा।” झंकार सिर हिलाता है। बीदास मुझसे पूछता है, “संटी! गाँव का चक्कर लगाना है? मना कर देता हूँ। इस वक़्त मेरा उदय के पास रहना ज़रूरी है। बीदास के जाने के बाद उदय बाथरूम जाता है। हम लॉन में आ जाते हैं। बाहर हम बेंत की कुर्सियों पर आराम से बैठकर निकलते हुए चाँद को देखते है। अशोक और पाम के लंबे-लंबे दरख़्तों के बीच झाँकता हुआ चाँद, आज मुक्तिबोध का टेढ़े मुँह वाला पूँजीवादी चाँद नहीं लग रहा है। आज सचमुच इस चाँद की ज़रूरत थी, जिस पर ख़ूब प्यार आए। हताशा के आकाश में खिलता हुआ आशा का चाँद है। उदय की कविताओं में भी चाँद कुछ इसी तरह आता है। झंकार ने भी चाँद पर एक कविता लिखी थी। पूछता हूँ, तो भावुक हो जाता है। कहता है, “अब मैं कवि कहाँ! जीवन के सारे घुँघरू टूटकर बिखर चुके हैं, बस दूर से आती हुई एक टूटी-फूटी झंकार है ज़िंदगी। बीवी-बच्चे, तेल, नून, लकड़ी, इसी में बीत रहा है जीवन। वह तो तुमसे उदय के बारे में ख़बर पाकर भागा-भागा आया।” 

झंकार का जीवन, एक अर्थ में सफलता का जीवन नहीं है। फिर भी उसे अपने सफल मित्रों से कभी कोई ईर्ष्या नहीं हुई। उनके सुख-दुख को जानता रहा, पूछता रहा। वह अपनी धोती और कुर्ते और अपने उलझे हुए बालों और माथे की आड़ी-तिरछी लकीरों में संतुष्ट रहा। जीवन की पुरानी-धुरानी साइकिल मस्ती में चलाता रहा। उदय की नौकरी, उदय की गाड़ी और उदय के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से, उदय की कविताओं और किताबों से कभी कोई दिक़्क़त नहीं हुई; बल्कि ख़ुश होता था देख-देखकर। मैं गाँव जाने पर झंकार के घर अक्सर जाता रहा हूँ। उदय भी जाता था। इधर नहीं जा पाता है। और अब तो बीमारियों ने उसे जकड़ लिया है। मुझे याद है। ऐसे ही चाँदनी रात थी। पानी बरस रहा था और मैं झंकार के साथ, उसकी मड़ई में, उसकी झिलँगी चारपाई पर उसका प्यारा गीत, उसकी दर्द भरी आवाज़ में सुन रहा था। उसने मुझे बताया था कि उदय को भी मड़इया में मोर मन वाला गीत बहुत पसंद है, लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि उसने गीत-वीत सब छोड़ दिया। चाहता था कि जीवन की इस निस्तब्धता में कोई उसे झंकार कहकर न पुकारे। अक्सर यह प्रश्न मुझे परेशान करता है कि जो लोग जीवन में विफल होते हैं, प्रेम के मामले में भी उन्हें विफलता ही क्यों मिलती है? हालाँकि प्रेम की विफलता के कई पहलू हैं। मजबूरियों की लंबी फ़ेहरिस्त है। कब कहाँ कैसे किसका प्रेम किसी खड्ड में लुढ़का और किसका चाँद पर पहुँचा, इसके नियम स्थिर नहीं हैं। 

झंकार काफ़ी समय बाद उदय के घर आया है। पता नहीं उसने टिकट के लिए पैसे का कैसे इंतज़ाम किया होगा। ज़ाहिर है, जैसे अनाज बेचकर सारे काम करता है, टिकट भी उसी से लिया होगा, लेकिन किसी को पता नहीं चलने देता है कि उसे पैसे की कोई परेशानी है। शुरू में स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने का काम करता था, बच्चे भी वहीं पढ़ते थे। बच्चे अब काम पर लग गए हैं, लेकिन उनसे पैसा लेना पसंद नहीं करता है। उदय भी जाते समय डर के मारे उसकी जेब में पैसे नहीं रखता। मेरी भी हिम्मत नहीं होती। अलबत्ता पत्रिकाओं का और कुछ किताबों का पैकेट उसे थमा देता है। जिसे वह इस समय लेते हुए कहता है, “उदय अपना ख़याल रखना, बहुत सोचना मत। पूरी तरह ठीक हो जाओ तो गाँव का चक्कर लगाना।” 

मैं झंकार को रेलवे स्टेशन छोड़ता हूँ। वही ट्रेन है। वही पटरियाँ हैं। वही रास्ता है। बीदास अपने सैलून में रेल का आला अफ़सर बनकर बैठा हुआ है और झंकार कुछ डिब्बों के फ़ासले पर उसी ट्रेन में, उन्हीं रास्तों पर जनरल कोच में अपनी सीट पर बैठा हुआ है। उसकी अपनी ख़ुद्दारी है। जब वह रेल का आला अफ़सर नहीं है, तो उसके सैलून में क्यों बैठे। बीदास भी जानता है, वह ऐसा ही है। सब जानते हैं, झंकार ऐसा ही है। झंकार भी जानता है, वह ऐसा ही है। उदय के लिए झंकार मुश्किलों का देवता है। जब भी उदय जीवन में विचलित होता है, किसी मुश्किल में होता है, झंकार की याद आती है। धीर-गंभीर और ज़मीन से चिपटे-लिपटे हुए विनम्र जल की तरह रास्ते के पत्थरों को पार करता हुआ, उनसे आगे बढ जा़ता है। काश, जीवन की यह कला उदय के पास भी होती!

छोटी नातिन की चाँदी की नई-नई पायल की रुनझुन से घर झंकृत हो जाता है। उदय के शांत और शिथिल मन के तार बज उठते हैं। सुबह जितनी अच्छी है, नातिन की रुनझुन से और अच्छी लगने लगती है। सुबह की मद्धिम धूप, लॉन में नातिन के साथ जुगलबंदी कर रही है। टेबल पर चाय रखी हुई है, उदय अपनी नातिन को छोटे से लॉन में लगे फूलों, पत्तियों और काँटों के बारे में बता रहा है। “नानू, इसका फूल लाल क्यों है और इसका पीला क्यों?” उदय चकित होता है। फूलों पर नहीं, नातिन पर। इतना कठिन प्रश्न। नानू तो फ़ेल हो जाएँगे। नातिन अदिति को पास खींचकर सीने से लगा लेता है। उसका माथा चूमता है। इतनी छोटी बच्ची में अभी से सृष्टि के रहस्यों को जानने की ऐसी तीव्र इच्छा, पता नहीं उसे विज्ञान की दुनिया में ले जाएगी या ज्ञान की या कला की या साहित्य की! मेरी प्यारी अद्दू, यह तो तुम्हें ठीक-ठीक तुम्हारी साइंटिस्ट मौसी और साइंटिस्ट मौसा बताएँगे। वे तुम्हें पिग्मेंट के बारे में बताएँगे। एंथोसायनिन के बारे में बताएँगे, कैरोटीनायड के बारे में बताएँगे, वे तुम्हें रसायन-विज्ञान की दुनिया में ले जाएँगे। नाना तो हिंदी के प्रोफ़ेसर हैं। फिर भी मैं जितना समझता हूँ, बताता हूँ, “तुम्हें पता है, कितने कलर होते हैं। अपनी ड्राइंग की कापी में सभी रंगों का इस्तेमाल करती हो। लाल, पीला, हरा, गुलाबी, बैंगनी, नीला, काला, सफ़ेद। तुम्हारी ड्राइंग की कॉपी का रंग बनाया हुआ रंग है और यह जो तुम्हारे सामने रंग-बिरंगे फूल दिख रहे हैं, ये प्राकृतिक हैं, ये स्वाभाविक रूप से लाल, नीले हैं या इनकी पत्तियाँ हरी हैं। इन फूलों की माँ का रंग ऐसा ही था, उनकी माँ का रंग भी ऐसा ही था। इन फूलों के रंग में अलग से कोई मिलावट नहीं है। ये असली हैं। ये बहुत पवित्र फूल हैं, तुम्हारे होंठों की तरह, इन्हें चूम लो। इनके रंगों को, इनकी कोमलता को, इनकी अपने जैसी निश्छलता को प्रेम करो।” अदिति ही कहती है, “नानू, चाय!” उदय चाय की प्याली उठा लेता है और तितली जैसी नन्हीं अदिति तितली के पास पहुँच जाती है। नानू अख़बार हाथ में लेकर भी उसे खोलते नहीं, बस सफ़ेद फ़्राक वाली परी जैसी अदिति को देखते हैं। धूप तेज़ होने लगती है, तो छोटी बेटी आकर सबको अंदर ले जाती है।

ड्राइंगरूम का दीवान उदय की प्रिय जगह है, जहाँ आकर वह लेट जाता है और कभी छत को तो कभी खिड़की के उस पार देखता है। उससे भी प्यारी जगह उसकी लिखने की मेज़ है। उदय वहीं बैठना चाहता है, लेकिन बेटी मना कर देती है। “दीवान पर लेटिए...” हुक़्म देती है। मुझसे कहती है, “अंकल आपको मना करना चाहिए। डॉक्टर ने अभी ये सोचने-लिखने-पढ़ने सबसे मना कर रखा है।” मैं भी कहता हूँ, “उदय दीवान पर आराम करो।” मैं ख़ुद उसके लिखने की मेज़ पर बैठ जाता हूँ। उसकी लाल-पीले फूलों वाली डायरी के नीचे रखी लाल डायरी उठा लेता हूँ। मैं उसकी डायरी के पन्ने पलटते हुए सहसा एक पंक्ति पर ठहर जाता हूँ, “हमारे समय का लेखक मुंडी झुकाकर लिखता है और गर्दन उठाकर पुरस्कार लेता है।” ओह, क्या विडंबना है! उदय के जीवन में एक ओर जीवन की मुश्किलें हैं, तो दूसरी ओर साहित्य की मुश्किलें। 

उदय को लगता है और उचित लगता है कि हिंदी के दुश्मन उसके साहित्यिक जीवन के प्राकृतिक रंगों को नष्ट कर देना चाहते हैं। उसे अपना जीवन फूलों की तरह सरल नहीं लगता है। फूलों की पंखुडियों पर कोई दूसरा रंग नहीं चढ़ा पाता है, लेकिन उसके जीवन के आधे हिस्से को ज़माने ने किसी काग़ज़ की तरह काले रंग से रँग दिया है। आधे हिस्से में बच्चे हैं, घर है। आधे काले हिस्से में बाहर की दुनिया है। यूनिवर्सिटी है, कविता है, साहित्य की दुनिया है। साहित्य की दुनिया में कहाँ से अप्राकृतिक रूप से लाल-पीले रंगों में रंगे हुए लंबे-लंबे नाख़ूनों और लंबे-पीले नुकीले दाँतों वाले, गले में लेखकों की मुंडी की माला पहने हुए विचित्र लोग आ गए हैं। अपने चेहरों पर कितना पाउडर पोत रखा है, कैसी सुंदर माँग काढ़ रखी है।

हिंदी विभाग की छात्राओं को गुरुओं के नुकीले दाँत नहीं दिखते हैं, फूल जैसी छात्राओं को मसल देने की वासना में डूबी उँगलियाँ नहीं दिखती हैं। नाख़ून नहीं दिखता है। मुँह से टपकता हुआ राल नहीं दिखता है। एमए की छात्राएँ भला, अपनी बुराई को छिपाकर रखने की कला में प्रवीण अपने गुरुओं के हृदय की मलिनता को कैसे देख सकती हैं। उन्हें तो गुरुजन हर समय उजले-धुले बहुत पवित्र देवता के रूप में दिखते हैं। उदय भी जब हिंदी विभाग में गुरु बनकर आया था, तो उसे भी अपने गुरु पहले की तरह देवता ही लगते थे। यह तो धीरे-धीरे उनकी पर्तें खुलनी शुरू हुईं। चेहरे से पाउडर उतरना शुरू हुआ। बल्ली सर और हौदा सर जैसे गुरु भाइयों को प्राध्यापक के रूप में हिंदी का ख़ून छक कर पीते और बची हुई तलछट द्वितीय श्रेणी के गुरुओं में बाँटते देखा। उदय को शुरू से ही हिंदी के इन राक्षसों से वितृष्णा हो गई थी। नौकरी ख़ुद से छोड़ नहीं सकता था। बच्चे हो गए थे, ज़िम्मेदारियाँ थीं। बल्ली और हौदा को इस अर्थ में बर्दाश्त करना था कि इन्हीं के साथ विभाग में रहना था, स्टाफ़ रूम में बैठना था। हालाँकि उसकी प्यारी जगह स्टाफ़ रूम का बरामदा था। जहाँ बैठकर वह सामने विभाग के लान में लगे फूलों को देखता रहता था। छात्रों के हुजूम को देखता था। उन्हें कविता के गुर बताता था। कक्षा में कहता था कि यह एक संयोग है कि मैं हिंदी का प्रोफ़ेसर हूँ, मैं कोई ठेले वाला भी हो सकता था, कोई इमारत बनाने वाला मज़दूर भी हो सकता था, रिक्शा खींचने वाला हो सकता था और तुम सब कहीं किसी जगह छोटे-मोटे काम करने वाले पिता के बच्चे हो सकते थे, लेकिन संयोग है। यह भी संयोग है कि जिसे पुलिस में लंबी मूँछों वाला दारोग़ा होना चाहिए था, ठेले पर आलू-टमाटर बेचने वाला होना चाहिए था, जिसे यूनिवर्सिटी के गेट पर चाट-बताशा बेचने वाला होना चाहिए था, वह प्रोफ़ेसर हो जाता है। तुम सबको लगता होगा कि हम सब बहुत पवित्र लोग हैं, दूध में दुले हुए, लेकिन हमें यहाँ कक्षाओं में सुभाषित बोलते हुए नहीं, कुलपति के कार्यालय में या उनके बँगले पर उनके तलुए सहलाते हुए देखो। उनके सिर में चंपी करते हुए देखो। आगे-पीछे नाचते हुए देखो। जिस दिन तुम लोग वह सब देख लोगे, विद्या के इस मंदिर का काला सच जान जाओगे। शायद तुम देखकर भी नहीं देख पाओगे। तुम कोई रिपोर्टर नहीं हो कि यहाँ अपने गुरुओं का काला चिट्ठा निकालकर अपने अख़बार में छापने के लिए आए हो। यहाँ डिग्री लेने के लिए आए हो। 

उदय जानता है कि कुछ बच्चे आते तो हैं पढ़ने के लिए, लेकिन उन्हें प्रेम हो जाता है। पहली बार यूनिवर्सिटी में आकर इतनी सुंदर लड़कियों और मोटी-मोटी किताबों के जंगल में खो जाते हैं। उदय अपनी रौ में हिंदी विभाग के पुराने दिनों में खो जाता है। सुंदरता की राजकुमारी, राजकुमारी पद्मिनी प्रियदर्शिनी सिंह गुलाबी कपड़ों में उसके सामने उपस्थित हो जाती हैं। उसके हाथ से उसकी उसकी किताबें छीन लेती हैं। यह सब राजकुमारी जिस तरह छापामार ढंग से करती हैं कि उदय कुछ समझ ही नहीं पाता है कि राजकुमारी को उसकी किताबों से भला क्या बैर है। राजकुमारी खट-खट सीढ़ियाँ चढ़ती हुई कला संकाय के तीसरी मंज़िल की छत पर आ जाती हैं। पीछे-पीछे उदय अपनी किताबें लेने के लिए भागा-भागा आता है। छत पर कोई और नहीं है। जो हैं, राजकुमारी हैं, उनका गुलाबी सूट है, गुलाबी दुपट्टा है, चेहरे पर लाली है ओर आँखों में क्रीड़ा है और उदय है। उदय सामने है और उसकी बँधी हुई घिग्घी है। राजकुमारी उदय को देख रही हैं और उदय राजकुमारी को कम देख रहा है। शुरू से ही वह राजकुमारी को कम-कम देखता है। क्लास के बाक़ी लड़कों की तरह दीदा फाड़-फाड़कर नहीं देखता है। एक कवि भला किसी सुंदरता को अशालीन ढंग से कैसे देख सकता है। पूरी क्लास में राजकुमारी को सिर्फ़ उसका कम देखना ही दीखता है। राजकुमारी उसे कम से अधिक देखती हैं। राजकुमारी हैं। राजकुमारी, सहसा राजकुमारी के ग़िलाफ़ से बाहर निकल आती हैं। पद्मिनी प्रियदर्शिनी सिंह बन जाती हैं। एक क़दम और आगे बढ़ती हैं। सिर्फ़ पद्मिनी बन जाती हैं। पूछती हैं, “मुझसे इतना डरते क्यों हो?” खा जाऊँगी क्या? उदय सकपका जाता है। बड़ी-बड़ी आँखों को देखते हुए कहता है, “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। आप राजकुमारी हैं।”  

“विश्वविद्यालयों में जुलाई-अगस्त का महीना प्रेम के फूलों के खिलने का महीना होता है। बारिश में भीगे गुलमोहर और अमलतास के पेड़ों और दूसरी वनस्पतियों पर हरियाली की बहुत लंबी और नई चादर फैली होती है। इस महीने में गुलमोहर और अमलतास के पेड़ों पर लाल-पीले फूलों के गुच्छे नहीं खिलते। यह फूलों के आँखों की कोरों और गालों के बीच में और दिल में कोनों में खिलने का मौसम होता है। यह एमए में एडमिशन और कलासरूम में मह-मह का ही नहीं, एक-दूसरे के दिल पर दस्तक का महीना भी होता है। पहली नज़र के प्यार की पाठशाला में प्रवेश का महीना होता है। नए लड़कों और लड़कियों के लिए हाथ में प्रेम की परखनली पकड़ने का महीना होता है। सबके साथ ऐसा कुछ हो ही, ज़़रूरी नहीं। बहुत से लड़के और लड़कियाँ ऐसा कुछ होते हुए देखते तो हैं, लेकिन ख़ुद उसका हिस्सा नहीं बन पाते हैं। शायद भाग्यशाली होते हैं, जो इस मुश्किल से बच जाते हैं। प्रेम दिल से करो तो मुश्किल है और दिमाग़ से करो तो बहुत आसान। जिनके लिए प्रेम एक खेल नहीं है, अक्सर मारे जाते हैं। प्रेम का हासिल हमेशा एक लंबी टीस के अलावा भला और क्या हो सकता है? न प्रेम में विवाह की गारंटी है और न विवाह में प्रेम की गारंटी। प्रेम का फूल खिलेगा ही, प्रेम के देवता तक पहुँचेगा ही, अधबीच में मुरझाएगा नहीं, कोई नहीं जानता। प्रेम एक कच्चा सौदा है, नुक़सान भी उठाना पड़ सकता है, बहुत से लड़के नहीं जानते। छोटी जगहों और गाँव से पहली बार यूनिवर्सिटी में आने वाले लड़के कहाँ जान पाते हैं, यह सब...”

यह मैं नहीं कह रहा हूँ। प्रेम के बारे में बिल्कुल अनाड़ी हूँ। इस विषय पर मेरे पास न कोई डिग्री है, न ज्ञान है, न अनुभव। यह तो उदय सर का कहना है, जो उनकी लाल-पीले फूलों वाली डायरी में दर्ज है। इस विषय पर उनके पास गद्य और कविताएँ, दोनों हैं। सच तो यह है कि उदय सच्चे और ईमानदार कवि नहीं रहे होते तो बहुत नाम कमाया होता। सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता कि कोई शत्रु नहीं रहा होता। एक बात और बताना ज़रूरी है कि उदय ने कविता से दिल से दोस्ती नहीं की होती, थोड़ी-बहुत तुकबंदी वग़ैरा की होती, तो बल्ली सर और हौदा सर कभी किसी बात का बुरा मानते ही नहीं। कोई ईर्ष्या, दुश्मनी वग़ैरा का सवाल ही नहीं पैदा होता। बल्ली सर और हौदा सर की मुख्य समस्या यह थी कि उदैवा ससुरा कविता-फविता, लेख-वेख क्यों लिखता है। पत्रिकाओं में इसकी कविता क्यों छपती है, यह सवाल बाद में आता, पहले यह कि इसका नाम उदय शंकर शुक्ल क्यों छपता है। वे सारी पत्रिकाओं को फाड़ देना चाहते थे, उन मंचों में आग लगा देना चाहते थे, जिन पर उदय कभी भूलवश चढ़ जाता था। एक दिन तो रिफ्रेशर कोर्स का उद्घाटन करने के लिए आला अफ़सर और कवि हँसमुख वाजपेयी आए हुए थे, हालाँकि संवाद भवन में होने वाले इस कार्यक्रम का संचालन बल्ली सर को ही करना था; लेकिन उदय सर ने माइक को जाँचने के लिए मंच पर चढ़कर उसे छू क्या दिया और हौले से उसमें हेलो बोल क्या दिया, बल्ली सर ने सबके सामने ही चीख़ते हुए माइक को स्टैंड से निकालकर कोने में फेंक दिया। सामने जंकामंका शास्त्री के बग़ल में बैठे हुए हँसमुख वाजपेयी कुछ समझ नहीं पाए। बिना समझे ही हँसमुख वाजपेयी बुलाए जाते ही मंच पर जाकर बीच की कुर्सी पर बैठ गए। भला जंकामंका शास्त्री को इस बात से क्या फ़र्क़ पड़ता कि कोने में कौन-सी चीज़ फेंकी जा रही है या किसे फेंका जा रहा है या भरी सभा में माइक फेंक कर किसी कवि को अपमानित किया जा रहा है। बेचारा एक तुच्छ माइक दुखी होने के सिवा क्या कर सकता था, बल्ली सर का कुछ बिगाड़ तो नहीं सकता था, उसके वश में नहीं था, नहीं तो बंदूक़ की गोली की रफ़्तार से पलटकर बल्ली सर के फेफड़े में घुस जाता, अफ़सोस जताते हुए इशारे से उदय सर से कहा था, कोई बात नहीं सर, आपका दिन भी आएगा। आज जिस कोने में हमें फेंक दिया जा रहा है, यह कोना ही कल इन दो कौड़ी के मंचों से अधिक जगमग होगा। जब आपका दिन आएगा तो इन बल्ली सर और हौदा सर और इनके आका प्रोफ़ेसर जंकामंका शास्त्री को एक कुत्ता भी नहीं पूछेगा। उदय सर ने माइक जी से ही सम्मानपूर्वक कहा कि नहीं माइक जी, इस साथ के लिए आपका बहुत आभारी हूँ, मंच का यह कोना भी मुझे नहीं चाहिए और सामने दूसरी पंक्ति में जाकर चुपचाप जाकर बैठ गया था। उसके लिए तो वह सीट भी नहीं ख़ाली थी, यह तो रिफ़्रेसर कोर्स में छपरा से आए उस प्राध्यापक की सदाशयता थी कि जिसने उस अपमानजनक स्थिति में उदय सर को अपनी सीट दी। मंच पर साहित्य के देवता बैठे हुए थे। सामने बैठे हुए सभी लोग उनके भक्त थे, प्रशंसक थे, कनफुँकवा शिष्य थे। हँसमुख वाजपेयी उन्हें संबोधित करते हुए सीधे विश्व को संबोधित करने लगे थे। विश्व साहित्य पर बात करने के कोई पंद्रह मिनट बाद हिंदी कविता से होते हुए अपनी कविता पर आ चुके थे। हँसमुख वाजपेयी जिस रौ में बोल रहे थे, लग ही नहीं रहा था कि रिफ़्रेसर कोर्स का उद्घाटान करने आए हैं, वे तो अपनी कविताओं को हिंदी के लोक-फोक की जगह सीधे विश्व को अर्पित कर रहे हैं। वाजपेयी जी अपनी कविताओं में बारबार डुबकी लगाते-उपराते हुए भूल चुके थे कि मंच पर उन्हें किस विषय पर भाषण देना है। मंच पर घोषणा कर रहे थे कि उन्होंने अब तक कोई दो हज़ार कविताएँ लिखी होंगी, सहसा उन्हें याद आया कि इस आयोजन में बुलाया तो जंकामंका शास्त्री ने है, तुरत कहा कविवर जंकामंका शास्त्री ने भी मुझसे कम ही सही, लेकिन कोई हज़ार-पाँच सौ कविताएँ तो लिखी ही होंगी, क्यों जंकामंका जी? उन्होंने मुँह घुमाकर जंकामंका जी को देखा। जंकामंका ने हाँ कहने के लिए तुरत सिर हिलाया और फुल मुस्कान मुस्काए। कवि-आलोचक हँसमुख वाजपेयी अपनी कविताओं पर प्रकाश डालते ही जा रहे थे, वह यह भूल चुके थे कि विषय भक्तिकाल की कविता है, उनकी कविता नहीं। उन्हें कबीर, सूर, जायसी, तुलसी वग़ैरा पर प्रकाश डालना है; अपनी कविताओं पर नहीं। जब तक उन्हें याद आए-आए, तब तक बहुत देर हो चुकी थी... वह सारा प्रकाश अपनी कविताओं पर डाल चुके थे। उनके पास कबीर, सूर, जायसी, तुलसी वग़ैरा को अँधेरे में छोड़कर बैठ जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। 

रिफ़्रेसर कोर्स में आए, इक्का-दुक्का प्राध्यापक को छोड़ दें तो किसी और प्राध्यापक ने उनकी कविताओं को कभी देखा ही नहीं था, बड़े अफ़सर थे, भोपाल ओर दिल्ली में बड़े आयोजन करते रहते थे; एक आयोजक के रूप में ही वह हिंदी के प्राधापकों के बीच समादृत थे, कवि-आलोचक के रूप में नहीं। उन्हें कवि-आलोचक वे लोग मानते थे, जो उनसे उपकृत होते थे। उपकृत होने वाले कुछ छुटभैये आलोचक और कवि तो उन्हें और भी न जाने क्या-क्या समझते थे। हद है कि हिंदी के इन जड़मति प्रोफे़सरों की जड़ता की कोई हद नहीं थी। वित्रित्र यह था कि इन्हीं विचित्र लोगों के बीच उदय सर को हिंदी के लिए काम करना था। अपने बच्चों का पेट पालने के लिए नौकरी करनी थी। हिंदी की सेवा तो बाहर रहकर भी कर सकते थे, लेकन बच्चों को खिलाते क्या! कई बार उदय सर हिंदी विभाग की नौकरी से अच्छी बमपुलिस की नौकरी को मानते थे। वहाँ सब जिस काम से जाते थे, वही करते थे। यहाँ तो आते हैं किसी और काम से और करने लगते हैं और कोई काम! 

दूसरा दिन, छुट्टी का दिन था। असल में इतवार का दिन था। हिंदी विभाग और अज्ञेय संस्थान की ओर से कुशीनगर के पथिक निवास में एक एकदिवसीय संयुक्त आयोजन था। पहला सत्र अज्ञेय की कविता पर केंद्रित था। मुख्य अतिथि विद्यावास मिश्र थे और अध्यक्ष हँसमुख वाजपेयी। जंकामंका शास्त्री, असीम मिश्र, बीबी लाल, हौदा और बल्ली जैसे लोगों को बोलना था, सो दूसरी कार में इन लोगों को जाना था। पहली कार में विद्यावास जी और हँसमुख वाजपेयी को बैठना था।। किसी भी कार में उदय के लिए जगह नहीं थी। उदय तो जाता भी नहीं, लेकिन एक तो विद्यावास जी को अज्ञेय पर सुनने का आकर्षण था, दूसरे, दूसरे सत्र में कविता-पाठ करने की मजबूरी थी। असीम सर का विशेष अनुरोध था कि वह अपनी ‘एक चाँद कम पड़ जाता है’ कविता ज़रूर पढ़े। शहर के दूसरे कवियों और कवयित्रियों को भी उस पाठ में शामिल होना था। सो उन लोगों के साथ रोडवेज की बस से जाने का कार्यक्रम था। बस नई थी। सरपट भागी जा रही थी, लेकिन रास्ते की किसी छोटी-सी कील ने बस को बेबस कर दिया। बीच रास्ते में बस पंक्चर हो गई तो बाक़ी यात्रियों की तरह कवि लोग भी बाहर छायादार पेड़ों के नीचे खड़े होकर साहित्य-चर्चा में मशग़ूल हो गए। कवयित्री संजना सुमन, अनामिका मिश्र और राधा अग्रवाल; थोड़ा किनारे हटकर एक दूसरे की साड़ियों की प्रशंसा से होते हुए कविताओं की प्रशंसा में लीन हो गई थीं। उदय को इन कवयित्रियों के बारे में अच्छी तरह पता था कि ये सामने वाले की प्रशंसा करती ही इसलिए हैं कि वह उनकी प्रशंसा करे। उदय की भी प्रशंसा वे सब कभी-कभार कर देती थीं, उदय भी उसी तरह औपचारिक प्रशंसा कर देता था। असल में उदय के पास उनके लिए बहुत कम शब्द होते थे। उन्हें इसलिए नहीं देखता था कि वे सुंदर थीं। सुंदरता को विश्वविजयी बनाने के उनके अस्त्र-शस्त्र से भय लगता था और सोचता रहता था कि जहाँ सिर्फ़ शब्दों की सुंदरता से काम चल सकता है; वहाँ क्रीम, पाउडर, लिपिस्टिक और काजल-साजल की क्या ज़रूरत थी। माथे पर उनकी सुंदरता को द्विगुणित करने के लिए सिर्फ़ एक लाल बिंदी काफ़ी क्यों नहीं है? उनमें एक लगभग अविवाहित थीं। प्रसिद्धि के लिए किसी के साथ रहती थीं, उदय ने इस बारे में कभी छान-बीन नहीं की थी। उदय का स्वभाव भी यह सब करने का नहीं था, वह तो असीम सर थे जो इस तरह की और इससे भी ख़तरनाक बात स्त्रियों के बारे में करते थे। कभी किसी के जूड़े के बारे में बात करते थे, तो कभी उसकी सुराहीदार गर्दन की, कभी अन्य अंगों की। असीम सर बहुत मुरहा थे, कभी-कभी तो विशेष अंगों की भी चर्चा करने लगते थे। कविता हो या स्त्रीदेह, खोलते बहुत मन से थे। कवयित्रियों के बारे में तो वे औचित्य संप्रदाय के सबसे बड़े शत्रु थे। कवयित्री है तो उसने सब किया होगा, उसके बारे में सब कहा जा सकता है... ऐसा मानते थे। दिल्ली की एक कवयित्री के बारे में तो पूर्वांचल के एक दिल्लीवासी कवि को लेकर तमाम बातें किया करते थे। यह कि कविवर अपने घर से कहीं और जाने के लिए कहकर निकलते थे और रात कवयित्री के घर बिताते थे। बाद में उसी कवयित्री को कवियों और आलोचकों की सेवा इसी प्रकार करते रहने से एक दिन अकादेमी पुरस्कार भी मिल गया था।  

उदय को असीम सर ने पढ़ाया था। विश्वविद्यालय में पढ़ाने के लिए आने से पहले वह उन्हें सुन चुका था, उनकी कविताओं का प्रशंसक हो चुका था। उदय सर की बातों में न सिर्फ़ स्त्रीरस होता था, कविता को देखने का उनका अपना नज़रिया भी होता था। वे कविता को प्रायः सामने से देखते थे, जबकि उनका एक शिष्य आलोचक कमलकांत त्रिपाठी कविता को मुग्ध भाव से आँख मूँदकर देखने में अधिक रस लेता था और कविता की रचना करने वाला की जगह कोई रचना करने वाली हुई तो कविता और कवयित्री जी को विशेष रूप से मुग्ध होकर पीछे देखता था। बल्ली जो असीम सर की कृपा से यहाँ तक पहुँचा था, वह तो साहित्य का हर तमाशा घुसकर देखता था। कवयित्रियों को कुछ का कुछ बनवा देने का झाँसा इस तरह देता था कि वे उसके झाँसे को साहित्य का चंद्रहार समझ लेती थीं। एक दिन पहले ही उन्हें हँसमुख वाजपेयी से अलग से परिचय कराने का वादा कर चुका था। बस ठीक होने के बाद जब वे वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि पहला सत्र समाप्त हो चुका था। भोजनावकाश चल रहा था। बल्ली, हँसमुख वाजपेयी के लिए प्लेट में खाना निकालकर ले जा रहा था, तो हौदा जंकामंका शास्त्री के लिए। आस-पास के महाविद्यालयों के प्राध्यापकों का जमावड़ा था। जंकामंका शास्त्री ने उदय से कविता-पाठ का संचालन करने के लिए कहा था, लेकिन उदय ने मना कर दिया था। उदय ने सोच रखा था, समय बर्बाद नहीं करना है। कविता पढ़ने का मन नहीं था, लेकिन दूसरे या तीसरे नंबर पर कविता पढ़ने के बाद बिना किसी को बताए वापस घर लौट आया था। सोमवार को विभाग में हँसमुख वाजपेयी का एक और व्याख्यान था। उदय को देखते ही हँसमुख वाजपेयी ने फुल मुस्कान के साथ—मतलब आधा हँसते हुए कहा, “उदय जी आप कल जल्दी लौट आए थे। आपकी कविताओं की भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही थी।” हँसमुख जी जिस तरह खिलकर यह कह रहे थे, उसे लगा, जरूर अपने प्रशंसकों और भक्तों की सूची में उसका नाम जोड़ना चाह रहे हैं। यह उदय था जो हर उस सूची से अलग रहना चाहता था, जो झूठ के काग़ज़ पर बनाई गई हो, जो रोशनाई की जगह पानी से बनाई गई हो, जो ग़लत इरादे से बनाई गई हो। 

शाम की ट्रेन से हँसमुख वाजपेयी को दिल्ली जाना था। उदय स्टेशन पहुँचा तो देखा, जंकामंका शास्त्री, बीबी लाल मौजूद थे। इधर-उधर की बातें होती रहीं, सहसा हँसमुख वाजपेयी को रास्ते में पीने और रसरंजन में मिलाने के लिए पानी की बोतल की याद आई। उन्होंने कहा ऐसे जैसे उदय उनके लिए दौड़कर लाएँगे। ऐसा तो कुछ संभव नहीं हो पाया, उदय ने तीनों महानुभावों को देखा और कहा, “बल्ली जी आते होंगे। पानी ला देंगे। तब तक आगे-आगे बल्ली सर दिखे। पीछे-पीछे तीनों कवयित्रियाँ हँसमुख जी के लिए अपने-अपने घर से रास्ते में खाने के लिए ख़ासतौर बनाई गई मठरी, नमकीन, अनार और चुकंदर का जूस और चाँदी के वर्क़ में लिपटा पान का बीड़ा लेकर आ गई थीं। हँसमुख वाजपेयी बारी-बारी से अपनी फटी-फटी आँखों से उन्हें देखते हुए, प्रसन्नमुख नहीं बल्कि प्रसन्नबदन हो गए थे। उनके गाल और आँखें ही गुलाबी नहीं हुईं, उनका नीला कुर्ता तक ससुरा गुलाबी हो गया था। रेलवे स्टेशन उनके लिए साहित्य का उपवन बन गया था, बिल्डिंग तो बिल्डिंग, प्लेटफ़ॉर्म, सिग्नल, इंजन का मुँह, इंजन का धुआँ, रेल की पटरी, टिकट का रंग, सब गुलाबी हो गया था, आसमान में उड़ते पक्षी ही नहीं, आसमान का आसमान गुलाबी हो गया था। प्लेटफ़ॉर्म नंबर एक पर, साहित्य सम्राट के जिस सिंहासन पर खड़े होकर हँसमुख वाजपेयी, कवयित्रियों की सप्रेम भेंट को हाथों की जगह सीधे हृदय से स्वीकार कर रहे थे, वह सब गुलाबी हो गया था। हँसमुख जी का मुख, हृदय वग़ैरा सब इतना खुला हुआ था कि वह उदय की पानी न लाने की नाफ़रमानी को एक सेकेंड में भूलकर कविता की नई भगतिनों के प्रेम में पूरा का पूरा डूब चुके थे। जब भी हमारे समय के हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा जाएगा, हँसमुख वाजपेयी के व्यक्तिव के अति उल्लेखनीय पक्ष के रूप में यह ज़रूर लिखा जाएगा कि वह हिंदी की ऐसी नई-नई भगतिनों के स्नेह-श्रम-जल की मात्र एक बूँद में, पूरा का पूरा डूब सकते थे, कंठ के ऊपर चुटिया तक, लेकिन लज्जा के विशाल समुद्र में घुटने तक भी डूब नहीं पाते थे, हर बार पानी कम पड़ जाता था, घुटनों के काफ़ी नीचे रह जाता था, बिना कुर्ते का सिर्फ़ पटरीदार जाँघिया में ऊपर का पूरा शरीर नंग-धडंग दिखता था। वह प्रायः अपनी भगतिनों को इसी मुद्रा में दर्शन देना पसंद करते थे। ऐसी भगतिनों के लिए उनका प्रेम अक्षुण्ण था। उन्होंने साहित्य की ऐसी सुंदर भगतिनों के लिए अपने एक हज़ार करोड़ के अज्ञेय फ़ाउंडेशन में बाक़ायदा भगतिन प्रकोष्ठ बना रखा था।

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जारी...

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