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चुप्पी में सारे उत्तर छुपे होते हैं

20 जुलाई 2022

अदीब अचानक नींद से उठ बैठा। किसी ऊबड़-खाबड़ सपने की वजह से शायद। कुछ क्षण बाद ठीक से उसकी चेतना लौटी तो उसको लगा कि वह अकेला नहीं सो रहा है, कमरे में चैतन्या की यादें भी सो रही हैं। इस ख़याल के बाद फिर उसे नींद नहीं आई। आ भी कैसे सकती थी भला! उसके ज़ेहन में एमिली डिकिन्सन की एक कविता पंक्ति कौंध गई— ‘आय शैल नॉट लिव इन वेन’, उसे पूरी कविता की तलब हुई। याद नहीं आई। बहुत बार उसके साथ ऐसा होता है, कोई एक पंक्ति ज़ेहन में अटकी रहती है और वह कभी भी, वक़्त-बेवक़्त उछलकर सामने आ जाती है और वह पूरी कविता के लिए तड़पता है। उसने उठकर लैपटॉप खोल लिया, पंक्ति गूगल की; सामने आई कविता को अनुवाद करके डायरी नामक वर्ड फ़ाइल में सुरक्षित कर लिया—

अगर मैं बचा सकूँ एक दिल को टूटने से
तो मेरा जीना व्यर्थ नहीं होगा।
अगर एक जीवन को पीड़ा में राहत दे सकूँ 
या एक दर्द को ठंडक।
या एक घायल रोबिन [अमेरिकन पक्षी] को पहुँचा सकूँ
वापिस उसके घौंसले तक
तो मेरा जीना व्यर्थ नहीं होगा।

उसने घड़ी में वक़्त देखा, साढ़े तीन बज रहे थे, सुबह दूर थी। मुँह ढककर दुबारा सोने की कोशिश करने लगा। नींद एक सयानी बच्ची की तरह आ ही गई। नए शैतान सपने तक…

अगली सुबह अदीब ने कलंदर को संदेश लिखकर भेजा—“मुझे तो कमबख़्त तुम्हारी मुहब्बती मनुहार में ज़्यादा ही हो गई तो सुबह इंटेंस वाले हैंगओवर में हुई है...”

उधर से जवाब में आँख मारने के इमोजी के साथ ‘चीयर्स फ़ॉर द मूड’ लिखा हुआ आया। रात को कब कैसे कलंदर के साथ ‘ग्रीनयार्ड’ में पीते-बतियाते फ़्लैट तक पहुँचा, उसे बिल्कुल भी याद नहीं था।

नींबू-पानी बनाकर पिया और बालकनी में आकर बैठ गया… सुबह की हवा और आवाज़ों के बीच... कुछ अच्छा महसूस किया। उसने सोचा कि ईजा के पास होता तो ये कौल पद्म के फूल खिलने के दिन होते, ईजा अब तक पूजा करके कौल पद्म के पुष्पों का प्रसाद दे रही होती... अदीब अपनी दोनों हथेलियों से अपने चेहरे को ढँकते हुए सूँघने लगा तो हज़ार मील दूर के फूलों की सुगंध महसूस हुई...

आज की इस ख़ूबसूरत सुबह को वह क्षणप्रभा को देना चाहता था, “मॉर्निंग डेट विद क्षणप्रभा!”

उसने आज मूल क्षणप्रभा के साथ के स्टेपलर से बँधे काग़ज़ों को उठाया—ये पत्रनुमा थे—उसने पढ़ना शुरू किया :

एक

प्रिय जसविंदर, 

आज ही दिन में मिली हूँ और पत्र लिखने बैठ गई हूँ, कल संभवतः पुनः मिलना भी होगा; फिर यह पत्र क्यों लिख रही हूँ, नहीं जानती। ऐसा क्या है जो बोलकर नहीं, पत्र लिखकर ही कहा जा सकता है। तुम समझ जाओ तो बताना प्रिय!

हम कई बार कुछ नहीं जानते, पर कहते-कहते, बताते ख़ुद को भी जान लेते हैं। यह उपक्रम शायद ऐसा ही हो!

यह भी संभव था कि डायरी में लिखकर रख लेती ये सब मन की बातें! पर तुमको ही डायरी मान लूँ तो—जहाँ भय न हो कि बनते-बिगड़ते-आकार लेते विचार को भी हम कह पाएँ, जैसे स्वयं चिंतन करते हैं, खंडन-मंडन करते हैं; फिर कोई विचार किसी उपयुक्त-सा आकार ग्रहण करता है तो हम जगत के सामने रखने में संकोच नहीं करते। सुनते रहा करो, मुझे यूँ ही—मेरे कच्चे-अधपके विचारों को बिना कुछ जोड़े, बिना मेरे बारे में कोई मूल्य निर्णय किए हुए। बिना उसमें अपना ज्ञान या अनुभव जोड़े। यह भी तो प्रेम का ही रूप होता होगा ना!

भीतर कुछ उथल-पुथल-सी है, अपरिभाषेय-सी। व्याकुलता नहीं है, कामना नहीं है, कहीं पहुँचने की शीघ्रता भी नहीं है, न पहुँचने की पीड़ा भी नहीं है। पर कुछ हैं जिसे विचार या शब्द की परिधि में सीधे-सीधे बाँधने में असमर्थ पा रही हूँ। जैसे कोई गाँठ है जो खुल नहीं रही अकेले।

कितना कुछ असहज करने वाला सोच रही हूँ, रात्रि के दूसरे और तीसरे प्रहर की संधिवेला के समय।

तुम कहते हो कि कितनी चुप रहती हूँ। कितना सत्य है यह? पूर्ण तो नहीं। तुम्हारे साथ जितना बोलती हूँ, लगता है कि अब तक जीवन में—सबसे बोले गए और तुमसे बोले को तराज़ू के दो पलड़ों में रखूँ तो तुम्हारा पलड़ा भारी रहेगा।

मैं मानती हूँ कि चुप्पी कभी निर्वात में नहीं होती, चुप्पी में सारे उत्तर छुपे होते हैं। बस कोई सुनना चाहे, इतनी-सी शर्त है।

तुमसे कहने का मन होता है— 
जब थम जाए, संगीत और शोर!
सन्नाटे में रहना साथ मेरे!
रहोगे ना?

अब जबकि मुझसे दूर हो, चाहे कुछ ही दूर हो, पर देखो ना, मेरे भीतर ठहर गया है तुम्हारा न होना, यह सघन अनुपस्थिति जितना स्थान घेर चुकी है कि उसने मेरे अस्तित्व से मुझे ही निष्कासित कर दिया है। तुममें कुछ विशेष तो है, रहस्य-सा, जो मुझे तुम्हारे लिए जिज्ञासु और उत्साही बनाता है।

जसविंदर, मेरी समझ में जीवन के पुष्प का मधु है प्रेम। तुम्हें अक्षरशः सहमत होने की आवश्यकता नहीं है, प्रकट करने की भी नहीं। फिर तो वह उथला प्रेम होगा ना? प्रश्न भी प्रेम बढाते हैं, बस वे प्रेमी या प्रेमिका को लेकर मूल्य निर्णय के लिए न हों, ऐसा भी न लगे कि छात्रावास के अधीक्षक सब कुछ जान लेना चाहते हैं। वयस्क प्रश्न होने का अर्थ तथाकथित ‘अश्लील’ या अंतरंग प्रश्न होना नहीं है। वयस्क प्रश्न बिना मूल्य निर्णय के प्रिय के साथ चलते रहने के लिए सहज भाव को उत्पन्न करने की चेष्टा है कि प्रश्नों से नया जगत खुले, क्षितिजों का विस्तार हो। एक बात बताऊँ, यह मुझे माँ ने सिखाया था। उस दिन मुझे पहली बार वेणी बाँधना भी सिखाया था माँ ने। शरद पूर्णिमा के दिवस की अपराह्न का समय था, मेरी स्मृति में यथावत उपस्थित है वह क्षण।

खिड़की से बाहर देखती हूँ, तीव्र वायु वेग है। हम संध्या भ्रमण कर रहे थे, सतलुज तीरे। स्मरण है, मेघ तो तब से ही आवागमन कर रहे हैं, कितने नटखट हैं तुम्हारी तरह। वर्षा भी हो सकती है, सतलुज में भी तो इन दिनों जलराशि अतिरिक्त ही है, पीछे भारी वर्षा से सतलुज की देह का विस्तार हो गया है ना!

आश्विन की रात्रि है, मिथ्या वचन न करूँगी प्रिय जसविंदर! जीवन ने यह सिखाया है कि जीवन तब ज़्यादा सुंदर बनता है, जब अनुशासन सहजता में परिवर्तित हो जाए।

मैंने एक बार जब तुमसे कहा था कि सांसारिक गुणों से मेरी आत्मा के द्वार तक तो आ सकते हो, भीतर आने के लिए तो आत्मा ही आत्मा की परीक्षा लेगी। योग्य या मेधावी विद्यार्थी के लिए कोई परीक्षा कठिन नहीं होती, वैसे ही योग्य समरूप आत्मा के लिए यह अत्यंत सरल ही होगी। इसे आत्माओं की क्रीड़ा भी कहा जा सकता है—मित्रवत् क्रीड़ा प्रतियोगिता!

तुम साथ होते हो, एक बात कहूँ, साथ होना नि:शब्द भी होता है... गहरा होता है, पता है जस्सू! मेरे आदरणीय गुरुदेव कहते हैं कि साथ होने और जीने को सीखना भी, साधना होता है। यह स्वाभाविक होता नहीं है, जैसे मुख में किसी खाद्य का स्वाद।

कभी-कभी अपना अस्तित्व बचाए रखना भी एक क्रांति जितना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इस अस्तित्व को बचाने के लिए बड़ा मूल्य चुकाना पड़ता है। क्या चुकाया है कभी? इस प्रक्रिया में कभी अपने सबसे प्रिय को ही खोना पड़े तो कैसा लगेगा तुम्हें?

आज, यह सब नहीं भी कहती तो क्या अंतर पड़ता मेरे, तुम्हारे या कदाचित हमारे जीवन पर। पर लिखकर कह दिया है तो लगता है कि कितना आवश्यक होता है, कई बार वह कहना जिसके कहे बिना भी जीवन चलता रहता है, हम जीवित रहते हैं—

तुम मेरा मौन सुनना,
वही मेरा प्रेमगीत है
मेरे शब्दों में तुमको 
मेरी सघन अनुपस्थिति मिलेगी।

फिर किसी दिन नए पत्र में कुछ ऐसा ही लिखूँगी और अपना मन खोलूँगी। संभव हो, मन करे तो तुम भी लिखना... मन का, लगभग निष्प्रयोजन परंतु ऐसे ही नितांत सार्थक हो जाना जिसकी नियति हो।

लिखना, जब स्वयं के सानिध्य में हो तुम्हारा आत्म। न हो तो मत लिखना, अप्रसन्न न होऊँगी।

सुनो जस्सू… रहना, साथ यूँ ही। श्वास नहीं, वायु की तरह।

आदर प्राथमिक है जहाँ, ऐसे सतत प्रेम के साथ।

तुम्हारी प्रतीक्षा में,
मालविका

उसे सिगरेट की तलब हुई। उसने पाया कि वक़्त का पता ही नहीं चला, कब दो घंटे बीत गए थे! अदीब ने क्षणप्रभा से विराम लिया। उसे प्यास भी लगी थी, अंदर से पानी की बोतल लाया और फिर सिगरेट के कश लेते हुए बालकनी से बाहर की ओर देखने लगा… लगभग बेसबब देखते हुए, दिखते हुए सारे मंज़र, कुछ क्षण बाद सब आँख से ओझल हो गए। आँखें खुली थीं, वह अब ज़ेहन की आँखों से देखने लगा था। उसे एक ख़याल ने घेर लिया... छोटे शहर के लड़के थोड़े अजीब होते ही हैं। अदीब को उतनी ही, औसत पहाड़ी क़स्बे के लड़के जैसी अजीबियत अपने किरदार में मिली थी, कभी-कभी थोड़ी ज़्यादा भी लगती थी। इस ज़्यादा होने को उसने कभी अवगुण की तरह नहीं लिया था और यही छोटे शहर का लड़का अगर लेखक हो जाए या हो जाना चाहे तो उसका जीवन आसान नहीं होता।

समय के साथ लेखक के रूप में अदीब का हासिल यही है कि अब उसे अकेलापन कभी विचलित या बेचैन नहीं करता। अकेलेपन को वह लेखन के लिए अनिवार्य और अपरिहार्य शर्त मानता है। उसे कई बार लगता है कि वह किसी के साथ किसी जगह घूमने जाता है तो थोड़ी दूर चलकर ही बोर हो जाता है। उसे अकेलेपन में कभी बोरियत नहीं होती।

उसे ऐसे भी ख़याल आते हैं—“कभी-कभी ख़ुद को सेमीकॉलन यानी अर्ध विराम जैसा महसूस करता हूँ, पता नहीं कि किसका हूँ, कौन है मेरा! कोई है भी क्या? किसी के होने या न होने के बोध से आगे भी तो जीना हो सकता है ना? मैं शायद वहीं पहुँच गया हूँ।”

तो अदीब का पहला प्यार छोटे क़स्बे का इकतरफ़ा प्यार था, जो शुरू होने से पहले ख़त्म हो जाता है। तो क़ायदे से उसे प्यार कहा नहीं जा सकता, जब तक उसमें दो पार्टियाँ न हों। एक पार्टी का प्यार या तो हार्मोनल हरकत है या जुनून या सनक या आकर्षण या कामना। तो सैद्धांतिक रूप से इकतरफ़ा प्यार को प्यार कहने का मतलब कद्दू को आम कहना है। उस लड़की यानी सिमरन के लिए उसने कई महीनों ख़याली पुलाव पकाकर खाए थे, भूख तो बरक़रार रहनी ही थी।

जब दादी के सामने उनकी इस कामना का भेद खुला तो दादी ने कहा—“क्या अच्छा लगा तुम्हें चुहिया-सी लड़की में?”

जवाब में उसने कहा कि मेरी दादी जैसी मासूमियत और बच्चापन।

दादी को एक बार तो समझ ही नहीं आया कि क्या बोले। वह लगभग शर्माते हुए बचीं और हल्की-सी मुस्कुराई। फिर कहने लगी—“मेरे जैसी मुस्कुराहट मेरे मरने के बाद ढूँढ़ियो, अभी मेरे वाली से काम नहीं चल रहा तेरा!”

अदीब की दादी ठहरीं मासूम पहाड़न, तीन लोक के राजपाट और खीम सिंह रौतेला की ‘बाल मिठाई’ के एक टुकड़े में से कोई एक चुनने को कहो तो वह राजपाट को लात मार सकती हैं। दादी ने कहा कि अगर उस लड़की से तुम्हारी कुछ बात बन जाए तो मेरी एक बात गाँठ बाँधकर रख लो, एक पहाड़ी कहावत है कि अच्छी बारिश और शुद्ध प्रेम दोनों पर अधिकार नहीं जमाना चाहिए, वे सबके लिए होते हैं।

लड़की से उसकी बात नहीं बनी, उसने दादी की बात ज़रूर गाँठ बाँधकर रख ली थी।

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